Tuesday, March 17, 2009

सिनेमा या फ़िल्म इस शब्द का ऐसा नशा था क्या अभी भी है कि कुछ पूछिए मत ।वैसे भी ६०-७० के दशक मे film देखने के अलावा मनोरंजन का कोई और ख़ास साधन भी तो नही था । बचपन मे भी कभी पापा या मम्मी ने film देखने पर रोका नही मतलब हम लोगों के घर मे फ़िल्म देखने पर कभी भी कोई भी रोक- टोक नही थी ।बल्कि अच्छी इंग्लिश फ़िल्म तो पापा हम लोगों को ख़ुद ही दिखाने ले जाते थे .

और हम लोग अक्सर सपरिवार film देखने जाया करते थे ।और वो भी शाम यानी ६-९ का शो ।और फ़िल्म देखने के लिए स्कूल से आते ही फटाफट पढ़ाई करके बस तैयार होने लग जाते थे । पर हाँ पापा इस बात का जरुर ध्यान रखते थे कि film अच्छे हॉल मे लगी हो । इलाहाबाद मे उस ज़माने में सिविल लाईन्स का पैलेस और प्लाजा और चौक मे निरंजन सिनेमा हॉल हम लोगों का प्रिय हॉल था । वैसे अगर पिक्चर अच्छी हो तो कभी-कभी चौक मे बने विशम्भर और पुष्पराज हॉल मे भी देख लेते थे ।

उस समय film लगी नही कि film देखने का प्लान बनना शुरू हो जाता था । रेडियो पर बिनाका गीत सुन-सुनकर film देखने का तै होता था । और घर मे चूँकि हम ५ भाई-बहन थे तो उस ज़माने का कोई न कोई हीरो या हेरोईन हम पांचों मे किसी न किसी को ख़ास तौर पर पसंद होता था । इसलिए film देखने के लिए बहाने की ज्यादा जरुरत ही नही थी ।पर फ़िर भी हमें कभी-कभी छोटे होने का नुकसान भुगतना पड़ता था ।

इसी बात पर एक वाकया सुनाते है । अपने भाई-बहनों मे चूँकि हम सबसे छोटे है और हम film देखते हुए बहुत रोते थे जैसे मझली दीदी film को देखते हुए हमने रो-रोकर अपनी आँखें सुजा ली थी । :) वैसे अब भी रोते है :)

उस ज़माने मे मीना कुमारी की film देख कर अधिकतर महिलायें रोती ही थी क्योंकि उनकी एक्टिंग इतनी लाजवाब होती थी । और फ़िर हम तो बच्चे ही थे ।

खैर ये बात उन्ही दिनों की है हमें अच्छे से याद है वो गर्मियों के दिन थे जब काजल film आई थी तो सभी लोगों ने सोचा की ममता तो film मे बहुत रोती है तो इसे काजल film न दिखाई जाए और इसलिए पापा और दीदी लोगों ने रात का शो ९-१२ का देखने का प्रोग्राम बनाया । और बस फ़िर क्या था सारे लोग यानी हमारी दीदी लोग हमसे कुछ ज्यादा ही प्यार से बात करने लगी थी । पर हम भी कुछ कम नही थे हमें लग रहा था की जरुर कुछ माजरा है पर कुछ समझ नही पा रहे थे ।

खैर शाम को मम्मी ने सबको फटाफट खाना खिलाया और आँगन मे हमें लेकर लेट गई और दीदी लोगों को बोला कि तुम लोग जाओ और पढ़ाई करो । आम तौर पर हम जल्दी सोने वालों मे से थे पर उस दिन हमें नींद ही नही आ रही थी । और हम आँगन में लेटे-लेटे देख रहे थे कि दीदी लोग धीरे-धीरे तैयार भी हो रही थी । हम जब भी उठने कि सोचते मम्मी कहती कि बेटा सो जाओ । तभी हमें कार कि आवाज सुनाई पड़ी तो हमने मम्मी से पूछ कि पापा कहाँ गए है तो मम्मी ने कहा कि दीदी लोग पढ़ाई नही कर रही थी इसलिए पापा उन्हें डॉक्टर से इंजेक्शन लगवाने गए है । (उस जमाने का ये बहुत ही आम सा बच्चों को फुसलाने का बहाना था ) :)

वो तो अगले दिन पता चला कि कौन सा इंजेक्शन लगवाने गई थी हमारी दीदी लोग क्योंकि अगले दिन घर मे फिल्मी गाने की किताब मिली ।और फ़िर तो रो-रो कर हमने घर सिर पर उठा लिया था ।फिल्मी गाने की किताब आपको याद है की नही । भई उस ज़माने मे सिनेमा हॉल के बाहर गाने की किताब भी खूब बिका करती थी जिसमे ५-६ film के पूरे-पूरे गाने हुआ करते थे और उन गाने की किताबों को खरीदे बिना तो पिक्चर देखना पूरा ही नही होता था । :)

वो दिन और आज का दिन हमने काजल film नही देखी है । क्योंकि उसके बाद कभी काजल फ़िल्म हॉल मे देखने गए नही और t.v पर कभी देखी नही ।





18 Comments:

  1. P.N. Subramanian said...
    बहुत ही मजेदार संस्मरण. सी.दी. मंगवा के देख लीजिये काजल और थोडा रो कर मन हल्का कर ही लीजिये. आभार.
    नीरज गोस्वामी said...
    कोई बात नहीं अगर आपने काजल फिल्म नहीं देखी...रोने धोने की फिल्म अब देखने से कोई फायदा भी नहीं है....ऐसा कीजिये आप की काजोल की फिल्म देख लीजिये....कोई सी भी...बहुत रोचक प्रसंग है और हाँ ये गानों की किताब से अपना बचपन याद आ गया...क्या दिन थे वो...
    नीरज
    Science Bloggers Association said...
    रोचक एवं मजेदार संस्‍मरण। शेयर करने के लिए आभार।
    rachana said...
    वाह! आपका संस्मरण सुनकर मजा आया.. और हमे भी बचपन के सिनेमा देखने वाले दिन याद आ गये!! मै सिर्फ़ ६ठी कक्षा मे थी तब मेरी भाभी( ताउजी की बहू ) आ गयी थी.. उनके और भैया के साथ खूब फ़िल्म देखी हमने ! :)
    और हां! मेरे ब्लॊग पर आपकी भी " चतुर पन्क्तियां" आमन्त्रित है.. कोशिश करियेगा! :)
    रचना. (www.rachanabajaj.wordpress.com)
    रंजना [रंजू भाटिया] said...
    बढ़िया रोचक है यह किस्सा ..:)
    कंचन सिंह चौहान said...
    achchha...???? tab talkies ke saamane filmi geeto ki kitaben milti thi, ye jaankaari to rochak hai...!
    अल्पना वर्मा said...
    Rochak sansmaran Mamta ji,
    Kajal film Tv par dekhi hai..bahut achchee hai..jarur dekheeyega...

    -geeton ki kitaaben aaj bhi -'sunday-monday-tuesday etc wale bazaron' mein patri par mil jaati hain...jaise--rafi dard bhare naghme..:D...etc.
    main ne kabhi nahin li kyonki gana sun kar usey likhna jayda sahi rahta hai.
    --waise bhi Ab ham modern ho gaye hain internet se lyrics le lete hain...
    :)
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    Shiv Kumar Mishra said...
    बहुत बढ़िया संस्मरण. फिल्म, गाने के साथ-साथ बहाने भी याद आ गए.
    ज्ञानदत्त । GD Pandey said...
    हम film देखते हुए बहुत रोते थे जैसे मझली दीदी film को देखते हुए हमने रो-रोकर अपनी आँखें सुजा ली थी । :)
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    रोंधी लड़की! मेरी बिटिया भी ऐसी है। रोती भी खूब है और हंसती भी खूब है!
    संदीप शर्मा Sandeep sharma said...
    ममता जी, आपका यह लेख मुझे जाना-पहचाना प्रतीत होता है..., शायद अजय ब्रम्हात्ज के ब्लॉग चव्वनी चाप पर पढ़ा हो.... लेकिन इस ब्लॉग पर आपका यह आखरी लेख मार्च का लिखा हुआ है.... अब लिखना क्यों छोड़ दिया... या कहीं और लिख रही हैं....
    संदीप शर्मा Sandeep sharma said...
    ममता जी,
    sorry
    मैं कन्फ्यूज हो गया था.. आपका लेख तो आज का ही है, लेकिन चूँकि मैंने इसे दुसरे ब्लॉग पर बहुत पहले पढ़ा था, इसलिए भूल होनी स्वाभाविक है... मैं वाकई भूल गया की अभी मार्च का ही महिना चल रहा है... again sorry
    लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...
    बहुत मज़ेदार बचपन रहा होगा आपका ममता जी पढकर मुस्कुरा रही हूँ मैँ भी बहुत रोया करती थी आज भी
    गँगा जमुना बह निकलती है काजल फिल्म है अच्छी - अब देख ही लीजिये ..
    स स्नेह,

    - लावण्या
    mamta said...
    आप सभी का टिप्पणियों के लिए शुक्रिया ।
    अल्पना जी किताबें तो मिलती है पर अब जैसा कि आपने कहा कि अब सभी गीत नेट पर ही मिल जाते है ।
    संदीप जी आपने हिन्दी टाकीज पर ये लेख पढ़ा होगा ।
    और आज हमने इसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट किया है इसीलिए आपको ये जाना -पहचाना सा लगा ।
    आप सबकी राय है तो सोच रहे है कि अब फ़िल्म देख ही ले । :)
    Malaya said...
    सिविल लाईन्स का पैलेस और प्लाजा और चौक मे निरंजन सिनेमा हॉल हम लोगों का प्रिय हॉल था । वैसे अगर पिक्चर अच्छी हो तो कभी-कभी चौक मे बने विशम्भर और पुष्पराज हॉल मे भी देख लेते थे ।

    इलाहाबाद का विद्यार्थी रहा हूँ। आठ महीने पहले गया था तो पता चला कि पैलेस, प्लाजा, निरन्जन, पुष्पराज और दूसरे भी कुछ पिक्चरहाल बन्द हो चुके हैं। बिना बालकनी की ‘लक्ष्मी’ टॉकीज भी बन्द है। बिशम्भर तो कीडगंज में था शायद।

    संस्मरण मजेदार है। अब टीवी और सीडी के बाद पिक्चर जाने का मजा ही खराब हो गया है।

    चौक से आपको कुछ ज्यादा ही लगाव था शायद।
    pallavi trivedi said...
    मज़ेदार संस्मरण.....हमें कभी रोना नहीं आता था फिल्म देखते वक्त! लेकिन रोने वाले सीन में हम दूसरों का चेहरा देखते थे की कौन कौन रो रहा है! फिर उसका खूब मज़ाक उड़ाया करते थे!
    राज भाटिय़ा said...
    बहुत ही सुंदर लगी आप की यह पोस्ट, लेकिन हम कभी नही रोये, ओर ना ही कभी डरे , जो हमरे साथ फ़िल्म देखने जाता ओर रोता तो उस का हम कई दिन तक मजाक उडाते थे, ओर जो फ़िल्म मै डरता उसे खुब डराते, वो बचपन के दिन
    अब कहां है...
    आप का धन्यवाद
    उन्मुक्त said...
    मुझे भी फिल्म में रोना आता है। टीवी के सीरियल में भी आता है। मेरा बेटा हसंता कहता है कि पापा यह तो काल्पनिक दुनिया है क्यों रोते हो पर फिर भी रोना आता है।
    Manish Kumar said...
    रोचक संस्मरण रहा ये भी...

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