Sunday, December 30, 2007

अभी कुछ दिन पहले शास्त्री जी की एक पोस्ट पढ़ी थी जिसे पढ़कर हमने खूब सोचा कि क्या वाकई एक और साल बेकार गया। बहुत सोचने पर लगा कि नही इतना भी बेकार नही गया हैयूं तो आम तौर पर हर साल जीवन मे कुछ अच्छा तो कुछ बुरा होता है२००७ मे और कुछ अच्छा भले ही हुआ हो पर एक बात बहुत अच्छी हुई कि हम ने ब्लॉगिंग करना शुरू कर दिया। :)
वैसे २००७ हमारे लिए बहुत मायने रखता है। हाँ ये जरुर है कि ये जो कुछ भी हुआ उसे लक्ष्य को पाना भले ही न कहें पर इन सबका हमारे जीवन मे महत्त्व जरुर है।यूं तो ये सब बहुत ही छोटी-छोटी बातें है पर फिर भी हम कुछ बातों का जिक्र यहां करना चाहेंगे।

१)इस २००७ मे ही हमने कंप्यूटर चलाना सीखा। इससे पहले भी कई बार सीखा था पर हर बार कुछ दिन करने के बाद छोड़ देते थे। पर इस साल फरवरी से हमने कंप्यूटर पर जो काम करना शुरू किया तो अभी तक कर रहे है। :)

२)आख़िर इसी २००७ मे हमने ब्लॉगिंग की दुनिया मे कदम रखा जहाँ शुरू मे तो सभी लोग अनजाने थे ,परिवार छोटा था पर धीरे-धीरे यही अनजाने लोग अपने होते गए और ये परिवार बड़ा होता गया। आज इस ब्लागिंग की बदौलत ही हम एक साथ इतने लोगों से जुडे हुए है , हम तो यही मानते है।

३)इसी साल हमारी शादी के पचीस साल पूरे हुए है। जो लक्ष्य पाना तो नही है पर खुशी का मौका जरुर है।

४)और आख़िर मे हम भी इस साल ब्लॉगिंग के लिए एक लक्ष्य को निर्धारित करते है कि हमने जो अपना एक नया ब्लॉग सवा सेर शोपर नाम से बनाया तो इसी साल है, उसमे लिखना नए साल से शुरू करेंगे

भाई हम तो ऐसी ही छोटी-छोटी बातों मे खुश होते हैचलिए बहुत हो गया अब अपना किस्सा यहीं खतम करते है






Friday, December 28, 2007

इस सवाल पूछने का एक कारण है वो ये कि ये सांप ( नाग का बच्चा जैसा कि हमारी झाडू लगाने वाली कह रही है )हमारे घर मे खाने के कमरे (dinning room )की बालकनी मे निकला था। क्यूंकि येसांप का बच्चा दरवाजे के पीछे छिपा हुआ था इसलिए झाडू वाली ने इसे पहले नही देखा और उसने जैसे ही दरवाजे के पीछे झाडू लगाई कि ये सांप का बच्चा बाहर आ गया ।झाडू वाली इसे देख कर डर कर जोर से चिल्लाई और जब हम वहां ये देखने को पहुंचे की झाडू वाली आख़िर चिल्लाई क्यूं तो हमारे भी होश उड़ गए इन छोटे मियां को देख कर। बिल्कुल काला ये बच्चा बार-बार अपना फन उठाता था और जीभ निकाल रहा था जिसे देखकर और भी डर लग रहा था

अब सवाल ये था कि इसे भगाया कैसे जाये क्यूंकि ये बच्चा अपने आप जा नही पा रहा था।बार-बार ये दीवार पर चढ़ता तो था पर दीवार ऊँची होने की वजह से बाहर नही जा पा रहा था।और नाली से बाहर शायद ये जाना नही चाहता था। इसलिए कभी ऊपर कभी नीचे ये इधर-उधर घूमता रहा और इसी बीच हमने इसकी फोटो खींच ली। :)

खैर हम लोगों की हिम्मत नही थी इसे भगाने या मारने की।चूँकि घर मे कुछ काम चल रहा था इसलिए कुछ मजदूर थे तो उन्हें ही बुलाया इसे बाहर निकलने के लिए।


हमारी झाडू वाली को ये डर था कि अगर इसे छोड़ दिया गया तो या तो ये या फिर( इसके माँ-बाप )कोई बड़ा सांप आकर उसे काट लेगा क्यूंकि उसकी झाडू इस बच्चे को लग गयी थी और सांप कभी भी उसे घायल करने वाले को नही छोड़ता है।क्यूंकि सांप की आँख मे उसकी फोटो गयी होगी।ऐसा उसका कहना था।

वैसे हम लोग बचपन से (गाँव मे ) भी ऐसा ही कुछ सुनते आ रहे है कि अगर सांप को मारो तो उसकी आँख को जरुर फोड़ देना चाहिऐ नही तो मारने वाले की तस्वीर सांप की आँख मे रह जाती है और फिर सांप बदला लेने जरुर आता है। अब इसमे कितनी सच्चाई है पता नही। वैसे फिल्मों मे तो ऐसा खूब दिखाते है।

आपका क्या कहना है ?
क्या वाकई मे ऐसा होता है ?




Thursday, December 27, 2007


२६ दिसम्बर२००४ को जब हम लोग अपनी गाड़ी मे भाग रहे थे (ये वही सफ़ेद क्वालिस है जिसने उस दिन हम लोगों को पार लगाया था। )तो सामने हर तरफ पानी नजर आ रहा था और जिस रास्ते से हम लोग हमेशा जाते थे वहां पानी भर रहा था । और सामने के सीधे रास्ते पर गाड़ी ले जाने का मतलब था पानी की चपेट मे आना ।गाड़ी चलाते हुए पतिदेव ने पूछा किधर से चलें तो हमने बिना कुछ सोचे समझे कहा कि बाएँ से वो जो चडाई वाला रास्ता है । इस पर वो बोले रास्ता पता है तो हमने कहा रास्ता तो पता नही है पर जब इतने सारे लोग जा रहें है तो कहीं ना कहीं तो सड़क निकलेगी ही। और जैसे ही हम लोगों ने गाड़ी बायीं ओर मोड़ी तो जो दृश्य देखा कि बयाँ करना मुश्किल है। हर आदमी के चेहरे पर बदहवासी और डर का भाव और हम लोग भी इस भाव से अछूते नही थे।जो जिस तरह था पानी आता देख उसी हालत मे जान बचाने के लिए भाग रहा था। उस चडाई पर चढ़ते हुए लोगों का हुजूम किसी पिक्चर के सीन से कम नही था।उस समय ये तो अंदाजा लग गया था की कुछ गड़बड़ है पर इतनी ज्यादा तबाही ,कभी सोचा भी नही था। हमने उस से कहा कि कैमरा दो । कुछ फोटो ले ली जाये । तो बेटे ने कहा कि कैमरा उसके पास नही है। कैमरा तो ड्राइंग रूम मे सोफे इस रक्खा था।आपने नही उठाया ।गुस्सा भी आया की कैमरा क्यों नही उठाया पर वहां जान बचाने के लाले पड़े थे कैमरा उठाने की भला किसे याद रहती। गाड़ी चडाई पर रेंगती हुई चल रही थी क्यूंकि पूरी सड़क पर लोग पैदल चल रहे थे । बस चडाई चढ़ते हुए पीछे देखा हम लोगों के घर मे पानी घुस चुका था।चढ़ाई वाला वो रास्ता जिस पर हम लोग कभी भी नही गए थे।क्यूंकि जब कभी भी हम ड्राईवर से पूछते थे की ये चडाई वाला रास्ता कहाँ जाता है तो वो कहता कि मैडम वो रास्ता ठीक नही है। पर २६ को हम लोगों को उसी रास्ते ने बचाया।


चढ़ाई से ऊपर आकर जब सड़क पर पहुंचे तो कुछ लोगों ने गाड़ी की और इशारा किया तो हम लोगों ने गाड़ी रोकी और उतर कर देखा कि आगे बोनट की जाली मे घास-फूस लग गयी थी जो उस समय समुन्दर के पानी के साथ बह कर आई थी। खैर वहां से हम लोगों को पहले तो समझ नही आया कि क्या करें फिर पतिदेव बोले कि ऑफिस चलते है।जैसे ही ऑफिस मे हम गाड़ी से उतरने लगे कि पैर मे बडे जोर का दर्द महसूस हुआ तब पैर देखा तो घुटने के नीचे पूरा काला पड़ गया था और चलने मे तकलीफ हो रही थी।
हम लोग असमंजस की स्थिति मे थे कि एक साहब आये और हमसे पूछने लगे कि मैडम आपने घर लॉक तो किया है ना।( चूँकि इन साहब ने पानी का आना देखा नही था। तब तक पानी का आना कोई बड़ी बात नही समझा जा रहा था। )


हमने कहा लॉक कहाँ करने का समय था । जान बचाकर बस भाग आये है।

तो वही सज्जन बोले कि ऐसे घर खुला होने पर तो कोई भी सामान उठाकर भाग जाएगा। ( मतलब कि उस समय तक किसी को भी ये अंदाजा नही था कि कुछ इतना वीभत्स हुआ है। )

उनके ऐसा कहने पर हमने उन्ही से कहा कि आप हमारे घर जाकर ताला लगा आइये। क्यूंकि एक तो हमारे पैर मे दर्द था और दूसरे पानी का खौफ था।

इसपर वो सज्जन बड़ी तेजी से अपने स्कूटर पर गए और पांच मिनट बाद ही लौट आये और बोले कि मैडम सड़क के मोड़ तक पानी आ गया है और चारों और पुलिस आ गयी है। पुलिस किसी को भी वहां घरों मे जाने नही दे रही है।
( यूं तो ये फोटो भी बाद मे ही ली गयी है पर इस फोटो मे पानी का स्तर जो उस समय ऊपर उठ गया था दिखाई दे रहा है। )

ये सुनकर हमे भी कुछ संतोष हुआ कि चलो कम से कम घर से सामान तो गायब नही होगा।

थोडी देर ऑफिस मे रूक कर हम लोग अपने एक दोस्त के घर आ गए।उनके घर पहुँचते ही सबसे पहले हमने मम्मी को इलाहाबाद फ़ोन किया और कहा कि अगर न्यूज़ मे कुछ देखें तो घबदाएं नही क्यूंकि अंडमान मे बहुत जोर का भूकंप आया है और हम लोग ठीक है।(इस समय तक भी हम लोगों को सुनामी के बारे मे कुछ भी पता नही था। ) बस उसके बाद तो फ़ोन लाइन ही खराब हो गयी। बिजली चली गयी। और अगले तीन दिनों तक हम लोग बाक़ी दुनिया से कट से गए थे। चूँकि मम्मी को फ़ोन कर दिया था इसलिए बाक़ी घरवालों को भी मम्मी से हम लोगों के सही-सलामत होने की खबर मिल गयी थी।


सुनामी ने अंडमान मे तो फिर भी कम पर निकोबार मे जबरदस्त तबाही मचाई थी।सुनामी से हुई बर्बादी के बारे मे आगे लिखेंगे।









आजादी एक्सप्रेस जो दिल्ली से सितम्बर मे चली थी और कई राज्यों से होती हुई २३ दिसम्बर को गोवा के वास्को-डी-गामा स्टेशन पर तीन दिन के लिए आई थी। तो चलिए हमारे साथ आजादी एक्सप्रेस देखने।इस ट्रेन मे १८५७ से लेकर २००७ तक का भारत दिखाया गया है।किस तरह भारत आजाद हुआ और किस तरह भारत ने हर क्षेत्र मे तरक्की की है।




आजादी एक्सप्रेस मे चढ़ने के पहले स्टेशन पर गोवा की आजादी की भी एक छोटी सी फोटो प्रदर्शनी लगाई गयी थी कि किस तरह गोवा १९६१ मे पुर्तगाल से मुक्त होकर भारत का हिस्सा बना था




अनिता जी और संजीत जी ने इसके बारे मे बहुत कुछ लिखा था। जिसने इस ट्रेन को देखने की चाहत जगा दी थी। सो जब ट्रेन गोवा आई तो हम पहुंच गए आजादी एक्सप्रेस देखने के लिए। अनिता जी की पोस्ट पढ़ने के बाद मन मे डर जरुर था की अगर कहीं मुम्बई की तरह यहां भी बहुत भीड़-भाड़ हुई तब तो देखना मुश्किल हो जाएगा। पर हमारी एक पोस्ट पर संजीत जी ने फाये जी का जिक्र किया था जिसके लिए हम संजीत जी का शुक्रिया करते है। खैर गोवा मे मुम्बई जैसी भीड़ नही थी और हमने बडे ही आराम से पूरी ट्रेन देखी और खूब सारी फोटो खींची । जिनमे से हम कुछ फोटो यहां लगा रहे है।(बाक़ी बाद मे हम फ्लीकर पर लगायेंगे। ) कोशिश की है कि फोटो के जरिये हम आजादी एक्सप्रेस आप लोगों तक पहुंचा सकें।



सबसे पहले डिब्बे मे घुसते ही अशोक स्तंभ दिखता है।( अशोक स्तंभ को हाथ से नही पकडा हुआ है बल्कि दरवाजे से आने वाले आदमी को रोकने के लिए हाथ दिखा रहा है । :) )





कहने की जरुरत नही है कि ये फोटो इस बात को दिखाती है की आजादी के लिए देश भक्तों ने कैसे कुर्बानी दी थी

















यहीं पर खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी की पंक्तियाँ भी लिखी हुई थी।




पहली संसद के मंत्री गण





आजादी के बाद १९४७ मे भारत के पहले प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति से लेकर २००७ तक के राष्ट्रपति और प्रधान मंत्रियों की फोटो है।इस फोटो मे सभी राष्ट्रपति दिखाई दे रहे है।




ये आजादी एक्सप्रेस मई २००८ को मेरठ होती हुई वापिस दिल्ली जायेगी।







Wednesday, December 26, 2007

भला कैसे भूल सकते है अंडमान की २६ दिसम्बर २००४ की वो सुबह जिसने बहुतों की जिंदगी बदल दी।और कुछ हद तक हमारी भी। उस २६ दिसम्बर को हम लोग निकोबार जाने का प्रोग्राम बना रहे थे क्यूंकि निकोबार मे क्रिसमस और नया साल काफी जोश से मनाया जाता था। अब अंडमान मे थे तो सोचा कि निकोबार का क्रिसमस भीदेख लेना चाहिऐ।पर कहते है ना कि जो होता है अच्छे के लिए ही होता हैइसीलिए उस साल हम लोग क्रिसमस के लिए निकोबार जाकर दो दिन के लिए एक दुसरे छोटे से द्वीप बाराटांग चले गए थेक्यूंकि बेटा अपनी क्लास छोड़ना नही चाहता थाइसलिए २५ को ही घर वापिस गए थे। चूँकि हमारे बेटा जो कि उस समय दसवीं मे था उसने जाने से मना कर दिया था कि एक हफ्ते के लिए वो नहीं जाएगा ,इसलिए हम लोग निकोबार ना जाकर पोर्ट ब्लेयर मे ही थे। उन दिनों हम लोग पोर्ट ब्लेयर के जंगली घाट मे रहते थे।आज भी वो सारा मंजर बिल्कुल आंखों मे बसा हुआ है ,इतने सालों बाद भी कुछ भी नही भूले है। यूं तो उस दिन भी हम लोग सुबह ४.३० बजे उठे थे क्यूंकि हमारे बेटे को ५ बजे टियुशन के लिए जाना होता था (अंडमान मे सुबह चार बजे से ही बच्चों की टियुशन क्लास शुरू हो जाती है। ) एक घंटे की क्लास के बाद बेटाछे बजे लौटा और बोला कि उसे दोबारा आठ बजे फिर से क्लास के लिए जाना है।और ये कहकर की पौने आठ बजे उसे उठा दे , वो फिर से सोने चला गया। चूँकि २६ को रविवार था और दसवीं के बोर्ड के इम्तिहान पास जो आ रहे थे इसलिए एक्स्ट्रा क्लास चल रही थी। । रोज का दिन होता तो शायद पतिदेव घर पर न होते क्यूंकि वो सुबह-सुबह जिम जाया करते थे। पर रविवार को जिम बंद रहता था।अंडमान मे हम लोगों का डुप्लेक्स घर था। और हम लोगों का बेडरूम ऊपर था।सुबह ६ बजे हमारे servant क्वाटर मे रहने वाली काम करने आ जाती थी।क्यूंकि अंडमान मे सवेरा बहुत जल्दी हो जाता है। सबसे पहले वो घर की साफ-सफाई करती थी।फिर नाश्ता बनाती थी। और रोज की तरह उस दिन भी वो सुबह -सुबह नीचे की मंजिल पर पोंछा लगा रही थी।



और जब बेटा सोने गया तो हम लोग भी दुबारा सोने की कोशिश करने लगेपर तभी अचानक ऐसा महसूस हुआ कि बिस्तर हिल रहा हैपहले तो कुछ समझ मे नही आया फिर कुछ हिलने की आवाज सी आई तो आँख खोलकर देखने की कोशिश की तो देखा कि कमरे का दरवाजा ,टी.वी.,अलमारी का दरवाजा हिल रहा हैये देख कर तो होश ही उड़ गए जल्दी से बिस्तर से उठे और बेटे को आवाज लगाई जल्दी उठो बाहर भागो भूकंप आया हैचूँकि बेटा हलकी नींद मे था इसलिए उसे तुरंत समझ मे नही आया उसने बिस्तर पर से ही कहा की मैं तो अभी ही सोया हूँ। तो बड़ी जोर से हमने चिल्ला कर कहा कि बाहर भागो भूकंप है। जल्दी जल्दी हम लोग सीढ़ी उतरने लगे । सीढ़ी क्या थी मानो राजधानी एक्सप्रेस मे जैसे एक डिब्बे से दुसरे डिब्बे मे जाने के लिए बीच का रास्ता जोर-जोर से हिलता है बिल्कुल उसी तरह जोर-जोर से हिल रही थी। अगर सीढ़ी पकड़ के ना उतरे तो गिर ही जाये। नीचे उतरते हुए हम बेटे से कह रहे थे की ध्यान से उतरना नीचे इन्द्रा ने पोंछा लगाया है।बेटा तो उतर गया पर जैसे ही हमनेऔर जब बेटा सोने गया तो हम लोग भी दुबारा सोने की कोशिश करने लगे।पर तभी अचानक ऐसा महसूस हुआ कि बिस्तर हिल रहा है । पहले तो कुछ समझ मे नही आया फिर कुछ हिलने की आवाज सी आई तो आँख खोलकर देखने की कोशिश की तो देखा कि कमरे का दरवाजा ,टी.वी.,अलमारी का दरवाजा हिल रहा है । ये देख कर तो होश ही उड़ गए जल्दी से बिस्तर से उठे और बेटे को आवाज लगाई जल्दी उठो बाहर भागो भूकंप आया है। चूँकि बेटा आख़िरी सीढ़ी से अपना पैर नीचे रखा और सीढ़ी की रेलिंग छोडी कि हम अपने को संभल ही नही पाए और फिसल गए पतिदेव ने उठाया और फिर से हम बाहर भागे। बाहर हम पतिदेव और बेटे एक दुसरे का हाथ जोर से थामे घर को हिलता हुआ देखते रहे । घर तो ऐसे हिल रहा था मानो झूला हिल रहा हो। हम लोगों के घर के पीछे लकडी के घर थे जहाँ से सामान धड़ -धड़ करके गिर रहे थे।आम के पेड़ से आम झर रहे थे।बस गनीमत ये थी कि नारियल टूट-टूट कर नही गिरे । और जमीन इतनी जोर से हिल रही थी कि जमीन पर खड़े -खड़े सोच रहे थे कि अगर जमीन फट गयी तो हम लोगों का क्या होगा। ये सब कुछ तीन मिनट तक होता रहा और और उसके बाद धीरे-धीरे शांति सी हो गयी। सभी लोग अपने-अपने घरों मे वापिस जाने लगे भूकंप से हुए नुकसान को देखने के लिए। हम लोग भी डरते हुए घर के अन्दर गए तो देखा कि कुछ चींजें जमीन पर गिर कर टूट गयी थी।घर की दीवारों मे दरारें जरुर पड़ी थी पर हमारे घर नही गिरे थे।जैसा की आप इस फोटो मे देख रहे है। लकडी वाले घरों मे ज्यादा नुकसान हुआ था।

(वैसे पी.डब्लू.डी.की तारीफ करनी होगी कि उसने बहुत मजबूत घर बनाए है)अभी घर मे देख ही रहे थे कि बाहर से कुछ आवाजें सुनाई दी बाहर आकर देखा तो सामने की jetty टूट कर आधी पानी मे डूब गयी थी और बहुत सारे लोग वहां इकठ्ठा हो गए थे। हम लोगों के घर के गेट की जमीन क्रैक कर गयी थी और भूकंप ख़त्म होने के बाद भी धीरे-धीरे हिल रही थी।और टूटी आधी डूबी jetty देख कर उसकी फोटो लेने की सोची और फोटो खींची भी। हम लोग भी और सभी लोगों की तरह वहां इंतजार करने लगे की कब jetty पानी मे जायेगी । और जब पानी उछलेगा तो हम उसकी फोटो लेंगे। पोर्ट ब्लेयर मे भूकंप और सुनामी के बीच कुछ मिनटों का अंतर था शायद १५ मिनट का ।

हम लोग ये सब देख ही रहे थे की पतिदेव बोले भूकंप के पहले झटके के बाद अक्सर ऐसा होता है की एक-दो झटके और आते है।(गुजरात के भूकंप की याद आ गयी थी ) इसलिए कुछ जरुरी सामान एक बैग मे रख लिया जाये जिससे अगर घर गिर जाये तो कम से कम गाड़ी मे रह सकें।यही सोच कर हम ने सबसे पहले अपना नाईट गाउन बदल कर सलवार सूट पहना और फिर ऊपर बेडरूम मे जाकर तीनों के दो-दो जोड़ी कपडे और कुछ पैसे और जो थोडे बहुत जेवर थे उन्हें एक बैग मे रखना शुरू किया ।नीचे पतिदेव ने गेट खोल कर गाड़ी (कवालिस) मे चाभी लगा रखी थी कि अगर कहीं फिर से भूकंप आया तो इस बार हम लोग घर लगा कि कुछ ख़तरे वाली बात है। फटाफट बैग उठाकर हम लोग बाहर की तरह भागे। और जल्दी से गाड़ी मे बैठ गए । जब गाड़ी स्टार्ट करके गेट से बाहर निकल रहे थे कि सामने देखा तो लगा कि अब तो गए क्यूंकि समुन्दर का पानी पार्क की दीवार लाँघ कर बड़ी तेजी से सड़क पर आ गया था और हम लोगों के घरों की तरफ बढ़ रहा था। हम लोगों को कुछ समझ नही आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है।पलक झपकते ही पानी हम लोगों की गाड़ी के बोनट तक आ गया था और हम लोगों की इतनी हिम्मत नही हो रही थी की अपने साइड मे देखें बस हम तीनों की नजर छोड़कर भाग जायेंगे। हमने बेटे को भी आवाज लगाई की वो आकर हमारी मदद करें क्यूंकि अन्दर से हम डर और दहशत महसूस कर रहे थे की पता नही अब जब भूकंप आएगा तो हम लोगों का क्या होगा ? अभी हम बेटे को आवाज लगा ही रहे थे कि बेटा आकर बोला क्या mom आप इतना क्यों डर रही है। कुछ नही होगा । हमने सामान रखते हुए कहा कि तुम नीचे क्या कर रहे थे तो वो बोला कि सब लोग पार्क के पास खड़े होकर देख रहे थे कि पानी कहाँ चला गया। उसके ये कहने पर आश्चर्य के साथ हम लोग अपनी बालकोनी मे बाहर आये और देखा कि सामने समुन्दर का पानी कहीं दिखाई ही नही दे रहा था ।हम लोग बात कर ही रहे थे कि तभी अचानक दूर से बड़ी ही तेजी से पानी आता दिखाई दिया तब हम लोगों कोें सामने थी जहाँ पानी ही पानी दिख रहा था। और उस पानी मे हमारे पतिदेव ने बिना रोके गाड़ी चलाई और जो १०० मीटर की दूरी सेकेंड्स मे पूरी होती थी उसे पार करने मे लग रहा था कि रास्ता ख़त्म ही नही हो रहा है। माने हमारी गाड़ी कछुए की रफ़्तार से चल रही थी । वो तो भगवान ने बचाया वरना अगर कहीं गाड़ी पानी मे रूक जाती तब तो .... ।


आज के लिए इतना ही बाक़ी कल लिखेंगे क्यूंकि ये सब लिखते-लिखते कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है।



ये फोटो एक हफ्ते बाद लिए थे। इसके दो कारण थे एक तो हमारा कैमरा पानी मे रह गया था और दूसरे शुरू मे घर जाने मे डर लगता था क्यों पानी का लेवल ऊपर हो गया था।इस फोटो मे शहीद पार्क की जाली दिख रही है।

Sunday, December 23, 2007

आजकल जिंदगी से सस्ती तो शायद ही कोई चीज है इस दुनिया मे।जब जो भी जिसकी भी चाहे जिंदगी ले सकता है। वजह कोई भी हो सकती है दोस्त से नही पटी तो मार दो ,तनाव है तो मार दो,छुट्टी न मिले तो मार दो,भाई से गुस्सा तो मार दो ,पत्नी से अनबन तो मार दो,बेटियों को तो लोग बेमोल ही मारते रहते है।मारना भी कितना आसान हो गया है। और सजा मिलते-मिलते तो सालों बीत जाते है।सजा मिली तो ठीक वरना .... । जीवन जो भगवान की दी हुई एक नियामत है पर जिसे छीनने मे मनुष्य ज़रा भी नही झिझकता है।हर दिन ऐसी बातें सुननें और पढ़ने को मिल जाती है। जहाँ मन के खिलाफ बात हुई वहीं झट से जान ले ली। अरे जान ना हुई मानो सब्जी भाजी हो गयी ।पर सब्जी भाजी भी अगर पसंद की नही होती है तो एक बार को लोग छोड़ देते है पर ..... ।

आज के अखबार मे भी ऐसी ही कुछ खबर छपी थी (जिसने हमे सोचने पर मजबूर किया )जिसमे एक पिता ने अपनी बेटी जो कि बोल सकती थी और नाही कुछ समझती थी उसे नदी मे डूबाकर मार डाला ।क्यूंकि पिता का कहना था कि उसके चार बच्चे है और उसके पास कोई नौकरी नही है।


ये तो हम सभी जानते है कि हाल ही मे गुडगाँव के स्कूल मे किस तरह से दो बच्चों ने अपने ही क्लास के एक बच्चे की जान ले ली थी। और वो भी सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो लड़का सबको तंग करता था।

कल ही कोई न्यूज़ चैनल एक और ऐसी ही खबर दिखा रहा था जिसमे पति ने अपनी पत्नी को मार दिया था और जिस निर्विकार भाव से वो सारी घटना को बता रहा था कि बस उनका आपस मे झगडा हुआ और बात-बात मे झगडा बढ़ता गया और चूँकि पत्नी जोर-जोर से बोल रही थी इसलिए उसने उसका मुँह बंद कर दिया और फिर कैसे वो मर गयी। और कैसे उसने अपनी पत्नी के शरीर को एक अटैची मे रक्खा ।

दहेज़ के लिए तो ना जाने कितनी लड़कियों की बलि होती है और भ्रूण हत्या के बारे मे तो हम सभी जानते है। प्यार मे असफल हुए तो भी लोग या तो अपनी जान दे देते है या दुसरे की जान ले लेते है।

ऐसे न जाने कितने ही उदाहरण हमे आये दिन देखने को मिलते है जिन्हें सुन कर और पढ़कर तो यही लगता है कि जिंदगी से सस्ती तो कोई चीज ही नही है।

क्या इस तरह से जान लेने वालों को ज़रा भी डर नही होता कि इस तरह से किसी की जान लेने के बाद उनका क्या होगा ?
जिसे आप जिंदगी दे नही सकते उसकी जिंदगी लेने का क्या हक है ?

Saturday, December 22, 2007

कल यूं ही हम सहारा वन चैनल पर संगीत पर आधारित कार्यक्रम देख रहे थे जिसमे कार्यक्रम की शुरुआत मे राहुल जो प्रोग्राम के संचालक है वो कोई गाना गा रहे थे और जनता को ताली बजाने का इशारा कर रहे थे। आम तौर पर हर कार्यक्रम वो चाहे टी.वी.का हो या स्टेज पर होने वाले प्रोग्राम चाहे बड़े-बड़े फिल्मी प्रोग्राम हों या कोई और प्रोग्राम हों , होस्ट हमेशा लोगों को ताली बजाने के लिए कहते है कि अब फलां स्टेज पर आ रहें है और फलां का स्वागत जोरदार तालियों के साथ कीजिए।और जनता भी ऐसी होती है कि होस्ट के कहने पर ही ताली बजाती है। कभी-कभी बेमन से तो कभी बडे ही जोरदार ढंग से ।

जनता के ताली बजाने और न बजाने के दो उदाहरण हमे अभी हाल मे ही हुए दो बड़े समारोह मे देखने को मिले । पहला समारोह एड्स अवएरनेस पर आधारित कार्यक्रम था जिसकी होस्ट बार-बार जनता से मंच पर आने वाले लोगों का जोरदार तालियों से स्वागत करने को कहती थी तभी लोग ताली बजाते थे।यहां तक कि जो कलाकार प्रोग्राम मे भाग लेने आये हुए थे( मुम्बई और लोकल कलाकार) वो लोग़ भी हर थोड़ी देर मे जनता को ताली बजाने का इशारा करते थे।

दूसरा उदाहरण लिबरेशन डे के मौक़े पर देखने को मिला जहाँ परेड के दौरान तो फिर भी लोगों ने तालियाँ बजाई पर जब लोगों को अवार्ड दिए जा रहे थे तो किसी ने भी ताली नही बजाई , जो हमारे ख़्याल से गलत था। वो शायद इसलिए कि होस्ट ने ये नही कहा था कि फलां का जोरदार तालियों से स्वागत करिये।


ताली उत्साह बढ़ाने के लिए और ख़ुशी जाहिर करने के लिए या स्वागत के लिए बजाई जाती है तो फिर किसी के कहने की जरुरत ही नही पड़नी चाहिऐऐसा अक्सर देखा जाता है कि लोग ताली बजाने मे बड़ी ही कंजूसी करते है जबकि ये नही होना चाहिऐ ।

Tuesday, December 11, 2007

आज दोपहर डेढ़ बजे ज़ी न्यूज़ ने एक ताजा खबर दिखाई जिसमे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी बी.जे.पी.के द्वारा की गयी कल की घोषणा पर बोल रहे थे कि बी.जे.पी.को मोदी से खतरा है इसीलिए बी.जे.पी.ने कल लाल कृष्ण अडवानी को प्रधानमंत्री के पद का उम्मीदवार घोषित किया ।

ज़ी न्यूज़ मे कुछ इस तरह की ताजा खबर दिखाई जा रही थी। जरा गौर फरमाएं।

















अब बेचारे अडवानी जी प्रधानमंत्री बनते-बनते पीए बन गए। :)


चलिए लगे हाथ एक और हिन्दी का नमूना दिखा देते है। ये बोर्ड बंगलोर के टीपू सुलतान के महल के बाहर बने बगीचे मे लगा है। यहां पर अगर हिन्दी गलत है तो एक बार को समझा भी जा सकता है पर ज़ी न्यूज़ पर गलती होना वो अभी ऐसी। पता नही अडवानी जी और बी.जे.पी के लोगों के दिलों पर क्या बीत रही होगी। :)

Saturday, December 8, 2007


अब ये कुछ अजीब सा शीर्षक तो है पर बात ये है की अभी चंद रोज पहले हम बंगलोर गए थेअब चूँकि बंगलोर हम करीब तीस साल बाद गए थे तो सोचा कि क्यों बंगलोर घूम ही लिया जायेऔर वहां घुमते हुए अचानक ही हम लोग एक सात सितारा होटल जो की अभी बन रहा है उसके सामने से गुजरे तो हम लोगों की गाड़ी के ड्राईवर ने बड़ी ही गर्मजोशी से बताया कि साब ये होटल विजय मालया का हैये होटल भी शायद बीस मंजिल का हैऔर इसमे ऊपर हेलीपैड भी बना हुआ हैहमारे ड्राईवर ने ये बताया की चूँकि अब बंगलोर का नया एअरपोर्ट करीब ३०-३५ कि.मी .की दूरी पर बन रहा है और बंगलोर मे ट्रैफिक बहुत बढ़ रहा है तो होटल से एअरपोर्ट जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा रहेगीजिससे कम समय मे एअरपोर्ट पहुँचा जा सकेजब तक उसने ये बताया और जब तक हम लोग होटल को देखते तब तक गाड़ी आगे बढ़ चुकी थीपर फिर भी हमने कोशिश की उसकी फोटो लेने की

हेलीपैड से एक और बात याद गयी कि अभी हाल ही मे मुकेश अम्बानी ने अपनी पत्नी नीता अम्बानी को एक एयरबस जन्मदिन के तोहफे मे दी हैजिसमे हर सुख-सुविधा हैयही नही खबर तो ये भी है कि मुकेश अम्बानी अपनी पत्नी को अगले साल जन्मदिन के तोहफे के रुप मे एक ऐसा घर देने वाले है जिसमे करीब २६-२७ मंजिलें होंगी और एक हेलीपैड भी होगाअब हेलीपैड बनेगा तो हेलिकॉप्टर तो होगा हीवैसे २७ मंजिल के इस घर मे छे मंजिलों पर तो कार पार्किंग बनायी जा रही हैचलो भाई मान लेते है कि इतनी कारें तो हो सकती है पर फिर भी बीस मंजिल रहने के लिए कुछ कम नही है। :)

अब जब २७ मंजिल का घर है तो उसी हिसाब से नौकर- चाकर भी होंगेअरे चौकिये मत कुछ ज्यादा नही बस छे सौ और सबसे मजेदार बात इस पूरे घर मे सिर्फ छे लोग रहेंगेमतलब हर एक के लिए सौ लोगवाह भाई वाह

क्या अच्छा होता कि अगर अम्बानी भारत के कुछ गांवों को एडोप्ट कर लेते तो शायद भारत के गाँव की कुछ तस्वीर ही बदल जाती

Thursday, December 6, 2007

तीन दिसम्बर को ईफ्फी २००७ ख़त्म हो गया।यूं तो हमने पहली ही सोचा था की हम ईफ्फी मे देखी हुई कुछ फिल्मों के बारे मे यहां लिखेंगे फिर सोचा कि नही लिखेंगे कि कहीं आप लोग बोर हो जाएँपर कल शास्त्री जी ने अपनी टिप्पणी मे हमे अच्छी फिल्मों के बारे मे लिखने के लिए कहा इसीलिए हम कुछ फिल्मों का जिक्र करेंगे। तेईस से तीन के बीच मे हमने करीब २०-२५ फिल्में देखी। ये तो जाहिर सी बात है कि इतनी फिल्मों मे से हर पिक्चर तो अच्छी हो नही सकती है पर फिर भी कुछ फिल्में बहुत पसंद आई(जिनका हम जिक्र करते रहेंगे) जिनमे से खुदा के लिए एक है । ये पिक्चर पाकिस्तान के डाइरेक्टर शोएब मंसूर ने बनाई है।इस फिल्म की खास बात ये है की इस फिल्म ने एक ऐसे विषय को उठाया है जिस पर आज तक किसी ने भी कुछ कहने की हिम्मत नही की है। की किस तरह एक साधारण लड़का संगीत और अपने परिवार को छोड़कर तालिबानी बन जाता है।

फिल्म एक छोटे और सुखी पाकिस्तानी परिवार की है । परिवार मे सबको आजादी है कि वो अपनी जिंदगी अपने ढंग से जियें। परिवार मे दो बेटे है और दोनो गायक है। माता-पिता को तो नही पर दादी को बेटों का गाना गाना पसंद नही आता क्यूंकि दादी का कहना था कि इस्लाम मे गाना गाना वर्जित है।फिर छोटा बेटा एक मौलवी के सम्पर्क मे आता है और धीरे-धीरे मौलवी साब उसे संगीत से दूर कर देते है।पर बड़ा बेटा अमेरिका के स्कूल मे आगे संगीत की शिक्षा के लिए जाता है । पर वहां ९/११ के हादसे के बाद उसे अमेरिका मे कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है । इस सबको बहुत ही संजीदगी से फिल्माया गया है।

लड़कों के चाचा जो अमेरिका मे रहते है उन्हें यूं तो अमेरिका बहुत पसंद है । और खुद वो दो बार अमेरिकन औरत से शादी करते है पर उन्हें अपनी बेटी का किसी अमेरिकन लड़के से शादी करना पसंद नही क्यूंकि तब उन्हें अपने मुल्क और धर्म की याद आ जाती है।


फिल्म ने एक बहुत ही संवेदन शील विषय को लिया है कि धर्म (इस्लाम ) के नाम पर किस तरह से कट्टरपंथी और फंडा मेंतालिस्ट मौलवी युवा लड़कों का ऐसा ब्रेन वाश करते है कि उन्हें मौलवी साब के अलावा और किसी की बात ही समझ मे नही आती है। और जब तक बात समझ मे आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।


फिल्म मे जितने भी कलाकार है उन सभी ने बहुत अच्छी एक्टिंग की है।यूं तो इसमे सभी पाकिस्तानी कलाकार है पर इसमे एक भारतीय अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी है । फिल्म थोडी लंबी है करीब-करीब तीन घंटे की । पर फोटोग्राफी वगैरा काफी अच्छी है।

Wednesday, December 5, 2007

आजकल हर तरफ डॉक्टरों के चर्चे हो रहे है। दिल्ली मे डाक्टर A.I.I.M.S.के डाक्टर वेणुगोपाल को लेकर हड़ताल करते है तो कहीं गाँवों मे उनकी नियुक्ति न हो इसको लेकर हड़ताल करते है।पर ये हड़ताली डाक्टर कभी नही सोचते है कि उनके इस तरह बार-बार हड़ताल करने से अगर किसी का नुकसान होता है तो वो मरीजों का होता है ।A.I.I.M.s.मे तो अब आये दिन हड़ताल होने लगी है । जहाँ पर ना केवल दिल्ली अपितु दूर-दराज के शहरों -गाँवों से मरीज आते है।कुछ मरीज जिन्होंने महीनों पहले डाक्टर से समय लिया हुआ होता है तो कुछ जिन्हें इलाज कि सख्त जरुरत होती है उन्हें इस तरह की हड़ताल से कितनी परेशानी होती है इसका ख़याल क्या इन डॉक्टरों को कभी आता है। आजकल हर दो-चार महीने मे डाक्टर हड़ताल करते रहते है। कभी दिल्ली तो कभी तमिल नाडू तो कभी आन्ध्र प्रदेश मे तो कभी यू.पी. तो कभी बिहार मे। हड़ताल का कारण भले ही अलग हो पर भुगतना तो मरीज को ही पड़ता है।


ये डाक्टर जिन्हें पढाई खत्म होने पर शपथ दिलाई जाती है कि वो निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करेंगे। उसका तो कोई अर्थ ही नही रह गया है। यूं तो इस शपथ को डॉक्टरों ने आज क्या काफी सालों पहले से भुला दिया है । पहले भी डॉक्टरों को गाँव मे जाकर काम करना बिल्कुल पसंद नही था पर सरकारी डॉक्टरों को जब भी गाँव मे पोस्ट किया जाता था तो शायद महीने मे दो-चार दिन ही वो गाँव मे जाकर मरीजों का इलाज करते थे पर हाजिरी पूरे महीने की लगी होती थी ।गाँव मे भले ही नियुक्ति हो पर वो शहर के हस्पताल मे काम करते थे ।

पहले तो डाक्टर गाँव की नियुक्ति मे लुका-छिपा का खेल खेलते थे पर अब समय बदल गया है डाक्टर इस बात के लिए हड़ताल कर देते है कि उन्हें गाँव मे काम करने को ना भेजा जाये।पर अगर सरकार उन्हें गाँव की जगह विदेश भेजे तो भी क्या ये डाक्टर नही जायेंगे। और इन हड़ताली डॉक्टरों की माँग है कि अगर उन्हें गाँव मे काम करने जाना ही है तो साढ़े पांच साल की पढाई के समय मे छे महीने उन्हें गाँव मे भेज देना चाहिऐ जिससे जब वो अपनी मेडिकल की पढाई ख़त्म करें तो सीधे विदेश जाकर नौकरी कर सकें औए धूम कर पैसा कमा सकें। ठीक है पैसा कमाने मे कोई हर्ज नही है पर अपने देश मे क्या कुछ दिन भी काम नही कर सकते है।

करीब तीस-चालीस साल पहले के डाक्टर सरकारी हस्पताल मे भी काम करते थे और अपनी प्राइवेट प्रक्टिस भी करते थे।प्राइवेट प्रक्टिस तो बहुत साल बाद बंद हुई ।पहले मरीज को हस्पताल मे देखते थे और फिर शाम को या अगले दिन उसे घर पर या अपने नर्सिंग होम मे देखने को बुलाते थे। पहले तो कहा जा सकता था कि डॉक्टरों को कुछ काम पैसा मिलता था पर आज के समय मे तो डॉक्टरों को हिन्दुस्तान मे भी अच्छा-खासा पैसा मिलता हैहाँ विदेशों की तुलना मे शायद कम हो सकता है


अब मेडिकल प्रोफेशन नही बल्कि बिजनेस बन गया है