Friday, May 30, 2008

६ सालों से चल रहे नीतीश कटारा मर्डर केस मे विशाल और विकास यादव को उम्र कैद की सजा हो गई है।फरवरी २००२ मे नीतीश का मर्डर विशाल और विकास ने किया था और वजह थी यादव बंधुयों की बहन भारती यादव का नीतीश से प्यार करना। जो इस परिवार को बिल्कुल भी पसंद नही था।

इस लड़ाई को नीतीश की माँ ने बड़ी हिम्मत से लड़ा क्यूंकि जहाँ एक तरफ़ वो थी वहीं दूसरी तरफ़ यू,पी,के डी.पी.यादव थे जिनके बारे मे तो सभी जानते है। इस ६ सालों मे कितने ही गवाह मुकर गए पर अजय कटारा जो की इस केस का मुख्य गवाह था उसकी गवाही ने इस केस को इसके अंजाम तक पहुंचाने मे मदद की।

२ दिन पहले इस केस की सुनवाई खत्म हुई थी और आज इन दोनों भाइयों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। आज एक माँ की जीत हुई है। और आज ये कहने मे कोई संकोच नही है कि भगवान के घर देर है अंधेर नही।

Thursday, May 29, 2008


मजाक -मजाक मे खींची गई ये तस्वीर बहुत कुछ कह जाती है। तस्वीर vegator beach पर ली गई है और इसमे ये जो तीन बालक है ये हमारे बेटे,भतीजे और भांजे है।इस तस्वीर के लिए और कुछ कहने की जरुरत नही है।आज के समय के लिए भी ये वही संदेश देती है।

Wednesday, May 28, 2008

ये ice creem शब्द सुनकर ही बहुत कुछ याद जाता हैअब जैसे हमे rita ice cream की याद गई भाई हमने तो अपने बचपन मे ये आइस क्रीम बहुत खाई है। इलाहाबाद मे ये अब मिलती है या नही पता नही पर जब हम छोटे थे तब जहाँ शाम के ५ बजे नही कि एक आदमी छोटी सी हाथ गाड़ी जिस पर चारों और rita ice cream लिखा होता था आता rita ice cream की आवाज आती और झट से हम घर के बाहर. हम क्या मोहल्ले के जितने बच्चे सभी घर के बाहर निकल पड़ते थे. और चूँकि हम लोगों के मोहल्ले मे हर घर मे खूब सारे बच्चे थे और गर्मी की छुट्टियों मे तो हर किसी के घर मे ननिहाल या ददिहाल के लोग आए हुए होते थे अरे मतलब ज्यादा बच्चे ,तो ice-cream वाले की भी खूब बिक्री होती थी।

और हर किसी को सबसे पहले ice-cream चाहिए होती और हर कोई चिल्ला रहा होता कोई चिल्लाता orange तो कोई mango तो कोई chocolate bar। किसी को vanila का cup चाहिए होता था। और ice-cream वाला हम सभी को एक-एक करके अपनी ही धीमी स्पीड से ice-cream बांटता ।हमे तो orange ice-cream हमेशा से ही कुछ ज्यादा ही प्रिय रही है। हमारी और हमारी दीदी मे अलग-अलग तरह की शर्त लगती कि कौन ice-cream ज्यादा देर तक खा सकता है या कौन ice cream जल्दी खा सकता है

बाद मे दिल्ली मे बहुत साल तक एक quality ice creem वाला अपनी थोडी stylo गाड़ी लेकर आता था और तब हमारे बच्चे और हम सब मिलकर ice-creem खाते थे।

रीटा ice-cream की याद इसलिए आई क्यूंकि कल हमने अमूल की ice-cream खाई और उसमे कुछ-कुछ रीटा ice-cream जैसा taste लगा तो बस हमे रीटा ice-cream की याद आ गई।

नोट--इस बार इलाहाबाद जायेंगे तो अगर येrita ice-creem मिलती होगी तो जरुर खाएँगे और तब फोटो भी लगायेंगे। अरे ice-creem के ठेले की । :)

तो चलिए बचपन के इस गीत को देखिये और कुछ और पुरानी यादों मे खो जाइए।

Tuesday, May 27, 2008

अरे हमारे पूछने का ये मतलब थोड़े ही था की आप नही कह दे. पर अब जब आपने इस ट्रॉफी को नही देखा है तो हम इसके बारे मे ही बता देते है। अब आई पी एल इतने दिन से हो रहा है और इसके बारे मे हम भी यदा-कदा लिखते ही रहते है तो सोचा की क्यों ना आज आई पी एल की ट्रॉफी कुछ बात हो जाए। पर हम सोच रहे है कि कुछ कहने से अच्छा है कि आप इस लिंक पर जाकर ख़ुद ही देख लीजिये। तो कैसी लगी आपको ये आई.पी.एल की ट्रॉफी ।

तो चलिए अब इस ट्रॉफी के बारे मे थोड़ा और जान लेते है। इसे orra जो की हीरे की एक बड़ी कंपनी है उसने इस ट्रॉफी को बनाया है। इसमे सोना,रूबी,और हीरों का इस्तेमाल किया गया है।पर इस ट्रॉफी की कीमत किसी को नही मालूम है क्यूंकि इसकी कीमत का खुलासा नही किया गया है। ये या तो सिर्फ़ बी.सी.सी.आई.ही जानती है या फ़िर इसे बनानी वाली कंपनी।

और ट्रॉफी पर शाह रुख खान की ओर से दिए जाने वाले मैन ऑफ़ द मैच का हेलमेट भी याद आ गया । ये हेलमेट भी सोने का बना हुआ था और उस हेलमेट का वजन ७ किलो था।(था इसलिए क्यूंकि अब तो कोलकत्ता नाईट राईडर आई.पी.एल.से बाहर जो हो गए है ) अब जिन खिलाडियों को ये हेलमेट मिला उनकी तो हो गई ना बल्ले-बल्ले। :)

Monday, May 26, 2008

गोवा मे कुछ हेरिटेज हौउसेस है तो हमने सोचा क्यों ना इन की आपको सैर करवाई जाएऔर इसकी शुरुआत हम आज से कर रहे है
पंजिम से बस ८-१० की.मी. की दूरी पर पोर्वरिम से आगे तोरदा (torda) मे salvador do mundoया houses of goa नाम का म्यूज़ियम बरदेज मे है।जैसे ही पोर्वरिम के चौराहे से मुड़ते है तब इस museum की ओर जाते हुए लगता है की किसी डेड एंड ३ ३ जा रहे है क्यूंकि जैसे ही मुख्य सड़क से मुड़ते है की बस पतली सी सड़क और दोनों ओर जंगल और ढलान पर गाड़ी चलती जाती है और तब ऐसे ही घने से जंगल यहां पर मे ये museum दिखता है।

इसे बाहर से देखने पर ये कभी शिप तो कभी मछली के आकार का लगता हैऊपर की बालकनी पर जरा गौर करियेगा। और इसे बनाने वाले आर्किटेक्ट का नाम Gerard da Cunha है। और इस आर्किटेक्ट का घर भी बहुत ही खूबसूरत लगता है। इस म्यूज़ियम से ही सटा हुआ बच्चों का एक स्कूल है जिसे देखना भी एक अनुभव से कम नही है। इस म्यूज़ियम मे प्रवेश के लिए २५ रूपये काटिकेट लेना पड़ता हैऔर चप्पल और जूते वहीं नीचे छोड़कर जाना पड़ता है।अगर आप चाहें तो इसके आर्किटेक्ट बाकायदा एक गाईड की तरह सारी बातें बताते है। वरना आप ख़ुद ही सब कुछ देख सकते है ।

ये meuseum तीन मंजिला है और इसकी छोटी और घुमावदार सीढियों से ऊपर चढ़कर जब पहली मंजिल पर पहुँचते है तो यहां पर पुराने समय के गोवा और आज के गोवा दोनों की फोटो देखने को मिलती है। उस समय के दरवाजे ,खिड़कियाँ,सोफे,कुर्सी, और भी बहुत कुछ यहां पर देखा जा सकता है। अगर इतिहास को जानने का शौक हो और समय की कमी ना हो तो यहां पर आराम से एक-एक चीज को देखते पढ़ते हुए चलना चाहिए। यहां पर एक-दो जगहों पर हेड फ़ोन भी लगे है और बैठने के लिए कुर्सी भी बनी है तो यहां बैठकर आप गोअन संगीत का लुत्फ़ भी उठा सकते है।सबसे ऊपर की मंजिल की बालकनी मे खड़े होने पर लगता है कि वो हिल रही है क्यूंकि वी एक तरह से हवा मे ही लटकी हुई है।

इसी तरह दूसरी मंजिल पर अलग-अलग तरह के तुलसी वृन्दावन की फोटो वगैरा देखने को मिलती है। तुलसी वृन्दावन (जिसमे तुलसी का पौधा लगा होता है ) तकरीबन हर घर के बाहर बना होता है।और सबसे ऊपर ऑडियो-विडियो शो भी होता है। और वापिस लौटते हुए अगर इच्छा हो तो आप यहां के रिसेप्शन से किताबें और goan music की सी.डी.भी खरीद सकते है।

Saturday, May 24, 2008

पिछले एक हफ्ते से हर जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ आरुषी के मर्डर की ही खबरें देखने को मिल रही है। एक बच्ची जिसका इतनी निर्ममता से मर्डर हुआ हो उसका और कितना पोस्ट मार्टम होगा । एक पोस्ट मार्टम तो अस्पताल के डॉक्टरों ने किया पर उसके बाद से रोज ही कोई ना कोई नया सुराग लेकर न्यूज़ चैनल वाले पोस्ट मार्टम शुरू कर देते है।

कभी उस छोटी सी बच्ची का नाम उसके नौकर के साथ तो कभी उसके किसी दोस्त के साथ जोड़ कर तो कभी उसके मोबाइल मे मिली काल्स का पोस्ट मार्टम शुरू कर देते है ।

पुलिस की बात माने तो आरुषी का मर्डर उसके पिता ने किया क्यूंकि आरुषी को अपने पिता और उनकी दोस्त अनिता दुर्रानी की दोस्ती पसंद नही थी। पर क्या सिर्फ़ इतनी सी बात के लिए कोई पिता अपनी बेटी का इतनी निर्ममता से खून कर सकता है।क्या उस पिता के हाथ ऐसा करते हुए नही काँपे होंगे. जैसा कि पुलिस ने कहा कि आरुषी को मारने से पहले उसके पिता ने शराब पी थी , तो क्या पिता नशे मे इतना अँधा हो गया कि उसने अपनी ही इकलौती बेटी को मार दिया।

कल पुलिस ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस मे कहा कि आरुषी और उसके नौकर हेमराज को उसके पिता ने कोम्प्रोमाईसिंग पोजीशन मे देखा था और उसी समय पुलिस ने ये भी कहा कि कोम्प्रोमाईसिंग का मतलब यहां objectional position मे देखा था पर आज तक ने कोम्प्रोमाईसिंग शब्द लेकर अपने चैनल पर पोस्ट मार्टम शुरू कर दिया।

पहले आरुषी की माँ कुछ नही बोल रही थी तो सब परेशान थे और जब आज उसने बोला तब फ़िर उसकी कही बातों का पोस्ट मार्टम शुरू हो गया।

ndtv नुपुर से बात कर रहा है तो ज़ी दुर्रानी से तो स्टार प्लस नौकरानी से।

ये सारे चैनल वाले तब तक आरुषी का पोस्ट मार्टम करते रहेंगे जब तक कि इन्हे कोई और नई ख़बर नही मिल जाती है।


Friday, May 23, 2008

सुनामी के एक महीने बाद हम लोग पोर्ट ब्लेयर के गेस्ट हाउस मे शिफ्ट कर गए थे । और जिंदगी ढर्रे पर आ रही थी की १५ फरवरी को जब हमने इलाहाबाद फ़ोन किया तो पता चला सोमनाथ (नौकर)ने फ़ोन पर बताया की सब लोग lucknow गए है माताजी की तबियत ख़राब हो गई है। तो हमे लगा की शायद मामाजी की तबियत ज्यादा ख़राब हो गयी है क्यूंकि २-३- दिन पहले जब मम्मी से बात हुई थी तब वो luckmow मामा को देखने अस्पताल गई थी। और १४ को इलाहाबाद वापिस आई थी।ये सोचकर जब मम्मी को उनके मोबाइल पर कॉल किया तो कोई जवाब नही मिलने पर भइया को फ़ोन किया तो भइया ने कहा की वो lucknow पहुंचकर हमे फ़ोन करेंगे।तो हमने अपनी lucknow और कानपुर वाली दीदी को फ़ोन किया पर उन्हें भी कुछ भी पापा या भइया ने नही बताया था। बस उन्हें अस्पताल पहुँचने के लिए कह दिया था।

उस दिन रात मे भइया ने फ़ोन किया और बताया की मम्मी lucknow के पी.जी.आई.अस्पताल के आई.सी.यू.मे भरती है । ये सुनकर तो बस आंखों से आंसू गिरने लगे।और हमने कहा की हम कल ही lucknow पहुँचते है तो पापा ने कहा की तुम परेशान मत हो ,इतनी दूर से तुम कहाँ भागी-भागी आओगी अभी हम सब है यहाँ । और जैसी मम्मी की तबियत होगी तुम्हे बताते रहेंगे। भइया ने भी यही कहा की तुम परेशान मत हो ।पर जब १८ फरवरी को पापा से बात की तब पापा बहुत ही परेशान लग रहे थे और उन्होंने ज्यादा बात नही की बस ये बताया की मम्मी को सी.सी.एम.(critical care manegement)मे शिफ्ट कर दिया है।और मम्मी को सप्पोर्ट सिस्टम पर कर दिया गया है।इससे पहले इस सी.सी.एम के बारे मे नही सुना था ।

ये सुनकर तो बस पैरों तले जमीन ही निकल गई और अगली सुबह की बुकिंग करवाकर बेटे और पतिदेव को अंडमान मे छोड़कर lucknow पहुंचे और सीधे मम्मी से मिलने गए । मम्मी से मिलने से पहले पापा ने बताया कि १४ कि शाम ही मम्मी मामा को देख कर वापिस इलाहाबाद लौटी थी और रात मे ही अचानक उन्हें साँस लेने मे तकलीफ होने लगी और सारी रात ऐसे ही कटी अगले दिन तबियत और ख़राब होने लगी तो उन्हें lucknow ले कर आ गए थे। सी.सी.एम कि तरफ़ जाते हुए पापा हमे समझा रहे थे कि मम्मी को देख कर घबराना नही तो हमे समझ नही आया और जब हम सी.सी.एम के दरवाजे पर पहुंचे तो वहां ४ और मरीज थे पर हमे अपनी मम्मी कहीं नही दिख रही थी तो पापा से हमने कहा कि मम्मी कहाँ है और जब हम उनके पास गए तो मम्मी को चारों और से मशीनों से घिरा और मुंह मे वैन्तिलेटर लगा हुआ देख कर बड़ी जोर से हमे रोना आया और आंसू रुकने का नाम नही ले रहे थे। तभी पापा ने हमारे कंधे पर हाथ रक्खा और और हम वहां से रोते हुए बाहर आ गए।

पापा ने अस्पताल मे उसी फ्लोर पर एक प्राइवेट रूम ले लिया था और ये रूम तीन महीने तक हम लोगों का घर रहा। रूम मे पापा ने बताया कि मम्मी को चेस्ट इन्फेक्शन की वजह से ये सब हुआ है।और अभी मम्मी कोमा जैसी हालत मे है।और जब मम्मी को होश आएगा तो उन्हें इन दस दिनों मे क्या हुआ है कुछ भी याद नही होगा। और डॉक्टर कहते है कि इनसे बात करना चाहिए क्यूंकि मम्मी सुन तो सकती है पर जवाब नही दे सकती है।और ऐसे मरीजों को मोटिवेशन की जरुरत रहती है। रोज हम सभी जाकर उनसे बात करते और उन्हें कहते कि वो ठीक हो जायेंगी । उस अस्पताल मे हम लोगों को किसी भी समय अन्दर मम्मी के पास जाने की इजाजत डॉक्टर ने दे दी थी।तीन महीने मे हम सब वहां की सभी मशीनों को पढ़ना सीख गए थे ।

दिन भर हम सब भाई-बहन और पापा अस्पताल मे रहते और रात मे हम और हमारी डॉक्टर दीदी अस्पताल मे रुकते।हमारी दीदी के डॉक्टर होने की वजह से हम लोगों को मम्मी की सही स्थिति के बारे मे पता चलता रहता था२३ फरवरी को जब रात मे हम लोग मम्मी को देखने गए तो मम्मी को होश रहा था दीदी ने तुरंत पापा को फ़ोन किया और सब लोग अस्पताल गएऔर मम्मी ऐसे उठी मानो नींद से जागी होऔर हम सभी को वहां देखकर और ये सुनकर की वो lucknow मे है उन्हें समझ नही आया की क्या वो इतनी ज्यादा बीमार हो गई थी सभी ने इसे एक तरह का चमत्कार ही माना हम सभी खुश थे की मम्मी ठीक हो गई है मम्मी ने भी बस इलाहाबाद जाने की जिद की की अब जब वो ठीक है तो अस्पताल मे क्यों रहे और होली मे इस बार सब लोग इलाहाबाद मे ही रहेंगे डॉक्टरों को मम्मी बताती की हमारी ये बेटी अंडमान मे थी और वहां सुनामी आया थाऔर हम मम्मी से कहते की हम एक सुनामी देख चुके है अब और नही देखना चाहते है तो मम्मी प्यार से हाथ फेर देती

उन तीन महीनों मे हम लोगो को ना जाने कितने ही मेडिकल टर्म के बारे मे पता चला।ना जाने क्या-क्या नही देखा. मौत को इतने करीब से हम सबने सी.सी.एम मे रहते हुए देखारोज ही किसी ना किसी की डेथ होती पर भगवान् ने हम सबमे एक शक्ति सी भर दी थी कि हम उन हालातों मे भी अपना संयम बनाए रख सकेउन तीन महीनों मे हम सबके पतियों और बच्चों ने भी बहुत साथ दिया

कभी १० दिन के लिए मम्मी ठीक होती और फ़िर वापिस बीमार हो जाती और इसी बीच उनके शरीर ने उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया। एक दिन सुबह-सुबह जब वो नाश्ता कर रही थी तब अचानक ही वो बोली की पता नही भगवान् मेरी इतनी परीक्षा क्यों ले रहा है। (मम्मी बहुत ज्यादा पूजा-पाठ करती थी)उन तीन महीनों मे जब कभी मम्मी दस दिन के लिए ठीक होती तो हम सबका ध्यान रखने लगतीजब हम सबके बच्चे उन्हें मिलने जाते तो वो भाभी को कहती कि बच्चे आए है उनकी पसंद का खाना बनवानापापा का ध्यान रखा करोपापा हमारी बीमारी से घबरा गए हैपापा जो जल्दी नही घबराते थे वो मम्मी की ऐसी हालत देख कर बहुत परेशान रहते थेमम्मी के ठीक होने के लिए हम सबने वो सब कुछ किया पूजा पाठ,दान-पुण्य,पंडित ज्योतिषी पर भगवान् ने हम सबकी नही सुनी



मम्मी जब भी ठीक होती तो इलाहाबाद चलने को कहती थीइसलिए जब उन्हें कार्डिएक अर्रेस्ट हुआ तो हम सब मम्मी को एम्बुलंस मे इलाहाबाद ले आए जहाँ अपने घर मे एक दिन मम्मी रही और २३ मई को वो हम सबको छोड़ कर चली गई।हम सबको बस ये संतोष था की हम लोग उनके आखिरी वक्त मे उन्हें इलाहाबाद ले आए थे और अपने आखिरी समय मे वो अपने परिवार वालों के बीच थी। हालंकि मम्मी हम लोगों को कोई रेस्पोंस नही दे रही थी पर शायद उन्हें पता चल गया था की वो अपने घर गई है क्यूंकि उनके चेहरे पर एक अजीब सी शान्ति थी।

हमारी सुनामी जो २६ दिसम्बर २००४ मे शुरू हुई थी वो २३ मई २००५ को ख़त्म हुई आज मम्मी को गए तीन साल हो गए है एक ऐसा खालीपन है जिसे कभी भी भरा नही जा सकता है





Wednesday, May 21, 2008

क्या आप रबर की सड़क के बारे मे जानते है। नही तो चलिए हम बता देते है। आजकल की बढ़िया सड़क के बारे मे तो हम लोग जान गए है बकौल लालू यादव हेमा मालिनी के गाल की तरह चिकनी , पर जब हम छोटे थे तब रबर की सड़क होती थी ।क्यों ये सुनकर आश्चर्य हुआ ना ।हमारे दादा खूब किस्से सुनाते थे। तब तो उनकी बातें सुनकर हम सब बच्चे आश्चर्य मे पड़ जाते थे ।ये रबर की सड़क का किस्सा उनमे से ही एक है।

अब ६५-७० के दशक मे तो इलाहाबाद की सड़कें तो फ़िर भी ठीक होती थी पर बनारस की सड़क कुछ अजीब सी तरह की होती थी कुछ उबड़-खाबड़ सी और खुरदरी सी और दिखने मे सफ़ेद। और गोदौलिया के चौराहे के पास तो गड्ढे भी होते थे ।सड़क ऐसी की अगर रिक्शे पर जाए तो पूरे शरीर का अंजर-पंजर ढीला हो जाए। इलाहाबाद और बनारस का क्या तब हर हाई वे बस लाजवाब ही होता था। इतनी पतली सड़क की दो गाड़ी आराम से निकल जाए तो गनीमत और उस पर सड़क के दोनों और मिटटी बारिश मे तो और भी बुरा हाल हो जाता था इन सड़कों का।और बारिश मे जब भी सफर पर जाते तो लगता था की कहीं गाड़ी मिटटी के दलदल मे ना फंस जाए। (इलाहाबाद,बनारस,लखनाऊ ,कानपुर तो हम लोग अक्सर ही कार से जाया करते थे।)


ये बात तब की है जब एशिया ७२ का आयोजन भारत मे दिल्ली मे किया गया था। और देखने के लिए हमारे दादा दिल्ली गए थे।अब उस समय तो दिल्ली जाना ही बहुत बड़ी बात होती थी। और जब दादा दिल्ली से लौट कर आए तो सब बच्चों को जानने की उत्सुकता थी कि दिल्ली कैसा शहर है। अपने इलाहाबाद -बनारस से कितना फर्क है। और भी ना जाने कितनी सारी बातें दादा से पूछनी थी। दादा ने भी खूब मजे ले-लेकर हम सबको दिल्ली के बारे मे बताना शुरू किया की जब वो लोग रेलवे स्टेशन से होटल के लिए निकले तो सड़क पर टैक्सी फर्राटे से दौड़ने लगी जब कहीं भी गाड़ी ने झटका नही दिया तो उनका ध्यान सड़क की ओर गया तो वो ये देख कर दंग रह गए कि दिल्ली की सड़क तो रबर की बनी हुई है दिल्ली की सड़क यहां(इलाहाबाद-बनारस) की तरह नही है बल्कि दिल्ली की सड़क तो रबर की बनी हुई हैना गढ्ढा और ना ही उबड़-खाबड़ सड़क बिल्कुल साफ और चिकनी दिल्ली शहर इतना साफ-सुथरा बिल्कुल लंदन और पेरिस की तरह


हम लोगों का मुंह खुल गया क्या रबर की सड़क !
तो कार चलने से रबर की सड़क ख़राब नही होती है।
तो दादा बोले की अरे नही कार या बस चलने से सड़क मे कुछ भी नही होता है।

अब उस समय हम बच्चों को कुछ समझ नही आया और दादा की बात सुनकर हम लोगों को यकीन हो गया था की वाकई दिल्ली की सड़कें रबर की बनी होती है। और कुछ साल बाद थोड़े बड़े होने पर जब हम दिल्ली गए तब दादा की बताई हुई रबर की सड़क देखी और तब रबर की सड़क का राज समझ मे आया। और दिल्ली की सड़क देख कर लगा की दादा ने दिल्ली के बारे मे कुछ ग़लत नही कहा था । :)

Tuesday, May 20, 2008

आई.पी.एल शुरू हुए एक महीना हो गया है और अब धीरे-धीरे आई.पी.एल की कमियां दिखनी शुरू हो रही है।एक महीने बाद अब बी.सी.सी.आई. सभी टीम के मालिकों को आई.सी.सी.के नियम -कानून के तहत चलने की राय दे रही है। तो क्या पहले बी.सी.सी.आई सो रही थी।अब किसी भी टीम का मालिक या खरीददार अपने खिलाड़ी या टीम से ड्रेसिंग रूम या मैदान मे नही मिल सकता है। लो भाई पहले तो टीम के जीतने पर प्रीटी जिंटा हो या शाह रुख खान हो फटाक से मैदान मे अपनी टीम के पास पहुँच जाते थे। पर तब तो किसी ने कोई रोक-टोक नही लगाई। पर अब बी.सी.सी.आई जाग गई है।

जब १८ अप्रैल को आई. पी.एल. का पहला मैच शुरू हुआ था तब से अब तक शाह रुख खान अपनी टीम नाईट राईडर के मैच के दौरान मैदान मे नाचते और ताली बजाते हुए देखे जाते रहे है और अब अचानक से शाह रुख पर ये रोक लगाई जा रही है की वो अपनी टीम के साथ मैदान मे नही रह सकते है।अब अगर रोक लगानी थी तो पहले दिन से रोकना चाहिए था। तब तो ललित मोदी भी मैदान मे खड़े हुए दिखाए गए थे जो खुश होकर ताली बजा रहे थे और नाईट राईडर के कोच से हाथ भी मिला रहे थे और वहीं पर शाह रुख खड़े होकर ताली बजा रहे थे।अब शाह रुख तो ये काम शुरू से करते आ रहे है तो भला अब वो क्यों मानेंगे। आख़िर उन्होंने इतने करोड़ों रूपये मे बी.सी.सी.आई.से टीम खरीदी है।और शाह रुख तो कह भी रहे है की कोई उन्हें उनके खिलाड़ियों से मिलने से नही रोक सकता है।हालांकि पहले शाह रुख कहते थे कि वो ड्रेसिंग रूम मे नही जाते है।और अब तो ललित मोदी ने भी कह दिया है कि हर टीम को एक लाल बैज दिया जायेगा जिसे दिखाकर टीम के मालिक अपने खिलाडियों के साथ dug-out और ड्रेसिंग रूम मे बैठ सकेंगे

आई.पी.एल.की टीम और इसके खिलाडियों को तो टीम के खरीदारों ने करोड़ों मे खरीदा पर अब ऑस्ट्रेलिया के खिलाडी अपने टीम के मालिकों पर उन्हें उनका पैसा नही देने का आरोप लगा रहे है। ऑस्ट्रेलिया के कुछ खिलाडी जो की शुरू के आई.पी.एल मैच खेलकर वापिस अपने देश जा चुके है उनका कहना है की उनके बार-बार कहने पर भी अभी तक उनका पैसा उन्हें नही मिला है।हर बार जब वो कहते है तो उन्हें कुछ दिन मे पैसा मिल जायेगा यही आश्वासन दिया जाता है।पर अभी तक उन खिलाडियों को उनका रुपया नही मिला है।एक तरफ़ तो वो ये कहते है और दूसरी और ये भी कहते है कि उन्हें विश्वास है कि उन्हें उनका रुपया मिल जायेगा। अरे जब यकीन है तो फ़िर क्यों शोर मचा रहे है। अब ऑस्ट्रेलिया का बोर्ड शायद अपने खिलाडियों को उनका मेहनताना दिलाने मे मदद करेगा।

एक बात और सुनी है की इन खरीदारों ने एक-एक टीम और इसके खिलाडियों को अगले ५-१० साल तक के लिए खरीदा है इसका मतलब की ये सारे सीनियर खिलाडी ४०-४५ साल की उम्र तक खेलते रहेंगे। तो भला नए लड़कों को खेलने का मौका कब मिलेगा। सीनियर खिलाड़ी जो बमुश्किल १०-२० रन बनाते है (कभी-कभी तुक्के मे ८०-९० रन भी बनाते है )उन्हें अगले १० साल तक देखना पड़ेगा। सचिन और सौरव कहते है कि उम्र से खेल पर या परफॉर्मेंस पर कोई फर्क नही पड़ता है। क्रिकेट मे उम्र नही खेल और फिटनेस मायने रखती है।वाह !क्या उच्च विचार है

नए लड़के अगर दो बार ना खेले तो उन्हें टीम से निकाल दिया जाता है पर जो सीनियर खिलाडी है भला उन्हें कौन कुछ कह सकता है। सीनियर पर शोहैब अख्तर के पहले मैच की याद आ गई जिसमे शोहैब ने ४ विकेट लिए थे और उन्हें मैच मे उन्हें मैन ऑफ़ द मैच दिया गया था । शोहैब के साथ-साथ इस मैन ऑफ़ द मैच के हकदार लक्ष्मी शुक्ला भी थे क्यूंकि अगर आख़िर मे उसने तीन विकेट नही लिए होते तो उस मैच मे नाईट राईडर की हार हुई होती। क्यूंकि २०-२२ रन बनाना कई बार मुश्किल नही होता है।पर वही सीनियर खिलाड़ी ने जिताया तो उसे ही मैन ऑफ़ द मैच होना था।कम से कम शोहैब और लक्ष्मी दोनों को ही मन ऑफ़ द मैच बना सकते थे।

कोलकत्ता मे हुए मैच जिसमे चेन्नई के सुपर किंग जीत गए थे उस ईडन गार्डन मे एक बार फ़िर से बत्ती गुल हो गई थी। जब आंधी चलने लगी थी तो एक दर्शक को एस्बेस्टर शीट का एक टुकडा लग गया जिससे वो दर्शक घायल होगया था। क्रिकेट मैदान मे सारे इंतजाम की जिम्मेदारी किसकी है -- टीम के मालिक या टीम को बेचने वाले बी.सी.सी.आई .की है।

Monday, May 19, 2008

आजकल जिस धड़ल्ले से बॉलीवुड के सितारे ब्लॉगिंग मे उतरने लगे है कि ब्लॉगिंग या ब्लॉग जगत को अब ब्लौगीवुड कहा जा रहा है।हालांकि अभी तो कुछ ही फिल्मी सितारे ब्लॉग जगत मे आए है जैसे आमिर और अमिताभ बच्चन और अब तो सुना है कि जूही चावला भी अपना ब्लॉग बनाने जा रही है। पर लगता है कि अब जल्दी हो दूसरे सितारे भी इस मे कूदने को तैयार है।

अमिताभ बच्चन अपने दिल कि बात ब्लॉग पर लिख रहे है वो चाहे राज ठाकरे से संबंधित हो या शाह रुख से। और अब तो अमिताभ ने शाह रुख और उनके बीच की ग़लत फहमी को दूर करने की पहल भी कर दी है अपने ब्लॉग मे।

आमिर अपने ब्लॉग पर अपने कुत्ते जिसका नाम शाह रुख है उस के बारे मे लिख रहे है कि उनका doggi क्या-क्या करता है। और वो उसे कैसे बिस्कुट खिलाते है।कोई कहता है कि आमिर अपने भांजे की फ़िल्म को प्रमोट करने के लिए अपने ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है ,तो कोई कहता है कि वो अपनी फ़िल्म गजनी को प्रमोट करने के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है। पर लगता है कि आमिर अपने फिल्मी दुश्मनों को नीचा दिखाने के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे है। अब आमिर जैसे perfectionist को इतनी घटिया हरकत करने की क्या जरुरत है। ये तो आमिर ही बता सकते है।

सुना था कि शाह रुख खान ने भी अपनी आई.पी.एल टीम नाईट राईडर के लिए ब्लॉग बनाया था पर पता नही शाह रुख ने ब्लॉग लिखना शुरू किया या नही

ये तो हम सभी जानते है कि ब्लॉग पर लोग अपने दिल की बातें लिख सकते है और इसके लिए कोई किसी को रोक नही सकता है। पर ब्लॉगिंग अब बॉलीवुड का अखाडा बनता नजर आ रहा है।इन फिल्मी सितारों के आने और इस तरह की उल-जलूल बातों को लिखने के कारण अब तो टी.वी.चैनल भी ब्लॉगिंग के बारे मे कार्यक्रम दिखाने लगे हैअभी कल रात ही जी न्यूज़ ने इस पर एक कार्यक्रम ब्लौगीवुड नाम से दिखाया था।


ऐसा लगता है कि बॉलीवुड मे ब्लॉग तो ओरकुट,फेसबुक वगैरा से ज्यादा प्रचलित होने वाला हैअरे भाई इससे अच्छा जरिया और क्या होगा दूसरों को भला -बुरा कहने का

Saturday, May 17, 2008

जिंदगी इम्तिहान लेती है वाली पोस्ट पर अमर जी ने जो टिप्पणी छोडी थी इससे दो घटनाएं याद गई जिसमे से एक घटना का हम आज जिक्र कर रहे है और अगली घटना का जिक्र अगली पोस्ट मे। और ये घटना हमारे एक बहुत ही करीबी जानने वाले की भांजी के साथ हुई है।अब यही कोई १० साल पहले की घटना है बेबी उसको घर मे सब लोग इसी नाम से बुलाते है ।बेबी के पिता निहायत सीधे इंसान है । घर मे माँ का ही हुक्म चलता है। माँ जो कहें वही सही और वही घर के सब मानते है। उसकी माँ पढी-लिखी और एक हद तक समझदार भी मानी जाती है पर अपनी बेटी के मामले मे वो बहुत ही ग़लत साबित हुई।

पहले भी और आज भी भी यू.पी.मे परिवार बेटी की शादी करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना ज्यादा बेहतर समझते है।बेबी परिवार की बड़ी और अकेली बेटी।गोरी ,सुंदर । बहुत लाड-प्यार से माँ-बाप ने पाला । माँ को हमेशा ये लगता था की बेटी की जितनी जल्दी शादी हो जाए उतना ही अच्छा हैलोगों ने समझाया की अब ज़माना बदल गया है पहले उसे पढ़-लिख लेने दो फ़िर शादी करना पर उन्होंने इस मामले मे किसी की भी नही सुनी और बेटी के लिए वर की तलाश करती रही और दिल्ली मे रहने वाले लड़के के साथ शादी तय कर दी छोटा परिवार देख कर बेबी की माँ बहुत खुश थी. लड़का दो भाई थे बडे भाई की शादी हो चुकी थी और उसके दो बेटियाँ थी सगाई की तारिख तय हुई और दिल्ली मे सगाई बडे धूम-धाम से की गई खैर सगाई के बाद शादी की तारिख कुछ महीने बाद की तय हुई क्यूंकि बेबी के बी. के इम्तिहान थेऔर सब दान-दहेज़ भी तय हुआ चूँकि बेबी अकेली बेटी थी इसलिए माता-पिता को बेबी की ससुराल वालों की सभी शर्तें मंजूर थी पर बेबी के मामा को ये सब पसंद नही रहा था उसने जब ऐतराज किया तो उसे ये कहकर चुप कर दिया गया की शादी-ब्याह मे तो ये सब होता ही हैखैर इम्तिहान होने के बाद बेबी की शादी कर दी गई



कुछ दिनों तक तो बेबी की ससुराल मे सब कुछ ठीक-ठाक रहा पर साल बीतते- बीतेते बेबी की ससुराल वालों ने फरमाइशें शुरू कर दी। क्यूंकि ससुराल वालों को ये महसूस हो गया था की बेबी की खुशी के लिए उसके माता-पिता कुछ भी कर सकते है। जब भी बेबी की माँ दिल्ली आती तो खूब सारा सामान लेकर बेबी के घर जाती पर अब ससुराल वालों को ये सामान कम लगने लगा था।और उनकी मांग दिन बा दिन बढ़ने लगी थी और जब उनकी मांग पूरी नही होती तो वो लोग बेबी को तंग करते। आख़िर एक दिन बेबी की सहनशक्ति ने जवाब दे दिया । उसने अपने मामा को फ़ोन किया क्यूंकि उसे पता था की मामा उसकी मदद जरूर करेंगे।माँ तो समाज और बिरादरी के डर से उसे वहीं ससुराल मे रहने को कहेंगी। और बेबी मामा के साथ बनारस चली गई और बनारस मे उसने अपने ससुराल वालों के ख़िलाफ़ court मे केस कर दिया। पर बेबी की माँ इस सबसे खुश नही थी बल्कि वो अपने भाई से ही नाराज हो गई बेबी की मदद करने के लिए। क्यूंकि माँ मानना था की बेटी का असली घर उसका ससुराल ही होता ही।

बेबी की माँ को हमेशा ये लगता था की लड़की को ससुराल मे ही रहना चाहिए और इसके लिए वो बेटी की ससुराल वालों की हर मांग मानने को तैयार थी पर बेबी इस बात के लिए तैयार नही थी। ऐसा सुना औरदेखा गया है की मुक़दमे की सुनवाई के दौरान कई बार कोर्ट माने जज साब पति-पत्नी को बुला कर अकेले मे बात करते है और अगर सुलह हो सके तो सुलह करवाने की कोशिश करते है । जब बेबी और उसके पति से जज साब ने बात की तो उसके पति ने भी बेबी को ठीक से रखने और तंग ना करने का भरोसा दिलाया और दहेज़ का केस ख़त्म करने की गुजारिश की। एक बार फ़िर वो लोग बेबी को दिल्ली ले आए। और फ़िर सब कुछ ठीक चलने लगा। साल बाद बेबी के एक बेटा हुआ पर बेटा होते ही उसकी ससुराल वालों ने एक बार फ़िर अपना रंग बदला और एक दिन उन्होंने धोखे से बेबी को बिल्कुल फिल्मी style मे घर से बाहर कर दिया ।

बेबी एक बार फ़िर अपने मामा के पास आई और सारा हाल सुनाया पर इस बार बेबी ने तय कर लिया था की वो ससुराल नही जायेगी पर अपना बेटा ससुराल वालों से वापिस ले कर रहेगी।पर इस बार बेबी कि माँ और परिवार ने भी उसका साथ दिया। बेबी कुछ दिन मामा के पास रहकर लोगों से सलाह -मशविरा करके बनारस आ गई और कोर्ट मे उसने तलाक और बेटे की कस्टडी के लिए केस किया। केस चला और फ़ैसला बेबी के हक़ मे हुआ ।

इतना सब कुछ होने के बाद बेबी के मामा ने बेबी और उसकी माँ को समझाया(माँ का तो ये कहना था की हमारे पास इतना सब कुछ है बेबी को पढने या नौकरी करने की क्या जरुरत है ) और बेबी को आगे पढने के लिए प्रेरित किया। बेबी ने बी.एड.किया और आज कल बनारस के एक स्कूल मे टीचर है। आज बेबी अपने बेटे के साथ माता-पिता के पास बनारस मे रहती है।

Thursday, May 15, 2008

अभी तक तो हम लोग शेर और चीते की प्रजाति के ख़त्म होने की बात सुन रहे थे पर अब तो चिडियों के भी लुप्त होने की ख़बर आ रही है। अभी हाल मे जो नई आउटलुक मैगजीन आई है उसमे गौरईया चिडिया के बारे मे लिखा है की अब गौरईया भी धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है ये पढ़ कर बहुत ही अजीब सा लगा क्यूंकि गौरईया चिडिया का घर-आँगन मे फुदकना, उड़ना,चहकना क्या हम लोग भूल सकते हैपहले जहाँ सुबह हुई कि चिडिया चूं-चूं करती आँगन मे जाती थी.जब भी मम्मी आँगन या छत पर कुछ धुप मे सुखाने के लिए डालती तो एक नौकर बैठाया जाता की कहीं चिडिया-कौवा मुंह ना मार देकहने का मतलब की उस समय इतनी ज्यादा चिडिया हुआ करती थी

ये तो हम सभी जानते है कि गौरईया चिडिया को कमरे के पंखों मे घोसला बनाने मे बड़ा मजा आता थाबचपन से
गौरईया को कमरे के पंखों मे घोसला बनाते देखते हुए बड़े हुए है जहाँ गर्मी आती थी की चिडिया कमरे मे घुसने की कोशिश करने लगती थी मम्मी हम लोगों को कमरे का जाली का दरवाजा बंद करने के लिए कहती थी क्यूंकि उन्हें लगता था की अगर चिडिया अंदर आएगी तो पंखे से कट जायेगीपर ना तो चिडिया मानती और ना ही हम लोग हर समय दरवाजा बंद रख पाते थे और जब भी गौरिया कमरे मे घुसती तो पहला काम होता की पंखा बंद कर दिया जाता और फ़िर शुरू होता चिडिया को बाहर उडाने और निकालने का काम कोई उड़-उड़ तो कोई हुश-हुश करता और चिडिया रानी इधर से उधर उड़ती रहती और तब हम लोगों को मम्मी की डांट पड़ती थी पर गौरईया भी कम नही थी जहाँ मौका मिलता पंखे मे घोंसला बना लेती और अंडे भी दे देती थी

अंडमान मे हम लोगों के घर मे बहुत सारी गौरईया आती थी शुरू-शुरू मे एक-दो और फ़िर जब पतिदेव के कहने पर इन चिडियों के लिए दाना-पानी रखने लगे तो बहुत सारी चिडिया आने लगी थीऔर बाद मे ये हाल हो गया था की सब चिडिया दरवाजे पर आकर बैठ जाती थीऔर ची-ची-करके शोर मचाया करती थीपर सारी चिडिया कैमरा कोंशस थी जैसे ही हम कैमरा ले कर आते की सब फुर्र से उड़ जाती थी अंडमान मे एक दिन बारिश के बाद चिडिया दाना खाने आई थी पर जैसे ही हमारे हाथ मे कैमरा देखा कि खाना-पीना छोड़कर फुर्र से उड़कर तार पर जा बैठी :)


यहां गोवा मे अभी तक तो ध्यान नही दिया था की गौरईया आती है या नही क्यूंकि यहां पर भी सुबह से चिडियां बोलने लग जाती हैऔर बहुत तरह की चिडियां दिखती है . पर अब इस लेख को पढने के बाद हम इस बात पर जरुर गौर करेंगे की यहां गौरईया चिडिया आती है या नही

चलते-चलते एक छोटा सा चिडियों का विडियो भी देख लीजिये हालांकि इसमे बस - गौरईया चिडियां और मैना ही है

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Wednesday, May 14, 2008


निक नेम यानी कि घर मे प्यार से बुलाने वाला नाम घरों मे बच्चों को बुलाने के लिए निक नेम्स रखना कोई नई बात नही है हर माता-पिता या दादा-दादी,नाना -नानी अपने बच्चों के घर मे बुलाने का नाम अलग और बाहर(स्कूल ) बुलाने का नाम अलग रखते हैनिक नेम कि सबसे बड़ी खासियत ये है कि बचपन मे तो ठीक है पर जब ये बच्चे बड़े हो जाते है और ख़ुद भी बच्चों के माँ-बाप बन जाते है पर तब भी इन्हे इनके निक नेम से ही बुलाया जाता हैक्यूंकि कोई और नाम बुलाने मे बड़ा ही पराया पन लगता हैपर चाहे जो हो ये निक नेम होते बड़े ही प्यारे है। क्या हमने कुछ ग़लत कहा।


पप्पू,मुन्नी,गुडिया,बेबी,बबली,गुड्डू,पिंकी,चिंकी, मिक्की,मुन्ना ,चिंटू,चीकू, नंदू,मुन्नू, और भी ना जाने कितने ही ऐसे निक नेम हम आम तौर पर घरों मे सुनते हैहमे यकीन है कि इनमे से कोई ना कोई निक नेम तो आपका भी होगा ही। :)
पर कभी-कभी कुछ अलग से नाम भी सुनने मे आते हैजिन्हें सुनकर अच्छा लगता है और साथ ही मजा भी आता हैतो आज कुछ ऐसे ही - निक नेम की बात हो जाएतो शुरुआत हम एक ऐसे अपने ही नाम से करते है

ढोलक-- अब यूं तो इस नाम से बहुत बचपन मे पापा हमे बुलाते थे क्यूंकि हम बिल्कुल ही गोल मटोल थेवैसे अब भी है पर अब ढोलक जितने नही है ना इसलिए अब हमे इस नाम से नही बुलाया जाता है।पर बाकी नामों से बुलाया जाना अब भी जारी है मसलन गुडिया।

चिया-- ये बच्ची दिल्ली मे हम लोगों की कालोनी मे रहती हैजब ये पैदा हुई तो बहुत ही छोटी सी थी बस इसीलिए चिया नाम पड़ा था खैर अब तो चिया बड़ी हो गई है कॉलेज जाती है पर अभी भी सब लोग उसे चिया ही कहते हैचिया का जुड़वाँ भाई है जिसका नाम है चुम्म-- अब चुम्मु भी कॉलेज जाता है पर वही बात हर कोई इन्हे अब भी चिया -चुम्मु ही कहता है

डिक्की --डिक्की इलाहाबाद मे एक जानने वाले के बड़े बेटे का नाम था और इस नाम को सुनकर हम सब भाई-बहन अक्सर मजाक करते थे की उनके बड़े बेटे का नाम बोनट होगा पर अफ़सोस उसका नाम बोनट नही कुछ और था। ।डिक्की तो खैर अब बहुत बड़ा हो गया है और उसका असली नाम तो हम आज भी नही जानते है

डॉलर-- डॉलर दो भाई हैडॉलर आज कल चेन्नई मे नौकरी कर रहा हैपर जब पहली बार ये नाम सुना तो अनायास ही मुंह से निकला था की एक डॉलर है तो दूसरा पाउंड होगा पर ऐसा नही है दूसरे को घर मे मुन्ना ही बुलाते है

लारा--ब्रायन लारा के बहुत पहले ये नाम सुना थासत्तर के दशक मेहमारी एक भाभी की बहन का नाम हैअपने नाम की कोई ख़ास अहमियत लारा बताती थी

भइया --पहले ज्यादातर घरों मे बड़े बेटे को भइया नाम से बुलाने का बड़ा रिवाज थाअब ये रिवाज है या नही पता नही
पोप --ये हमारे (दादा) ताउजी का नाम थाक्यूंकि वो बहुत गोरे और बहुत अच्छी इंग्लिश बोलते थेशायद इसीलिए उन्हें पोप कहते रहे होंगे

झुन्झुन--ये हमारे एक चच्चा का नाम थाऔर हम लोग बचपन मे उन्हें हमेशा झुनझुना चच्चा ही बुलाते थे।हम लोगों ने कभी भी उन्हें सिर्फ़ चच्चा नही कहा

चक्कू बेबी--ये हमारी दिल्ली की एक बंगाली दोस्त की बेटी का नाम हैचक्कू आज एक साल के बेटे की माँ है पर हम सब उसे चक्कू ही कहते हैवैसे चक्कू खूबसूरत भी बहुत है

टुकटुकी -- ये टुक टुकी और कोई नही हमारी बंगाली दोस्त यानी चक्कू की माँ का नाम हैवो बताती थी की जब वो छोटी थी तो खूब घूरा करती थी ।इसलिए उनके माँ-बाबा ने ये नाम दिया था।
बच्चा--हमारे कजिन भइया हैअब इनकी उम्र साठ के आस-पास की हो रही है पर हम सभी इन्हे बच्चा भइया ही कहते है। है ना मजेदार बात।
कुंवर-- मामाजी के बेटे का नाम हैअब ये नाम उस समय रखा गया था जब जमींदारी का रौब था और घर का बड़ा बेटा होने के नाते सब उन्हें कुंवर जी कहते थे . पर आज भी सब उन्हें कुंवर जी ही कहते है।

इसी तरह बाबु,लाल्टू,टुल्लू,गुर्रन,(अरे वो फैंटम वाला ) आलम -डालम ,तितली,बच्ची, और भी ना जाने ऐसे कितने ही निक नेम होंगेतो आप का क्या निक नेम है
क्या आप शर्मा रहे है
अरे अरे शरमाइये मत बताने मे कोई हर्ज नही हैयहां सब अपने ही ब्लॉगर परिवार के है। :)



Monday, May 12, 2008


ऐसी मान्यता है की पहले गोवा कहीं exist ही नही करता था चारों और सिर्फ़ पानी और बहुत दूर कहीं पर जमीन थी sayadris (सयाद्री ) के पहाडों मे जमादाग्नी ऋषि (जो की एक ब्राह्मण ) अपनी पत्नी रेनुका (जो की एक क्षत्रिय थी ) और पुत्रों के साथ रहते थे परशुराम इन्ही ऋषि के सबसे छोटे पुत्र थे एक दिन रेनुका जब नदी मे नहा रही थी तभी उन्हें एक क्षत्रिय राजा ने देख लिया था और वो राजा वहां रुक गया था और ऋषि ये सब देख कर क्रोधित हो गए थे और इसलिए उन्होंने अपने पुत्रों से अपनी माँ का वध करने को कहा पर उनके तीनो बड़े पुत्रों ने मना कर दिया पर परशुराम ने अपनी माँ का वध कर दिया इस पर खुश होकर ऋषि ने परशुराम से वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने अपनी माँ को जीवित करने का वरदान माँगा था

एक दिन जब ऋषि ध्यान मग्न थे तभी क्षत्रियों ने ऋषि का वध कर दिया जिससे क्रोधित होकर परशुराम ने क्षत्रियों का अंत करने की ठानी और उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध किया और विजय पाई पर इस विजय से वो खुश नही थे क्यूंकि बदले से उनके मृत पिता जीवित नही हो सकते थे इसलिए परशुराम ने वो जमीन एक ब्राह्मण को भेंट कर दी एक दिन क्षत्रिय ( सारे क्षत्रिय मरे नही थे)उस ब्राहमण के पास आए और कहा की वो परशुराम को वहां से जाने के लिए कहे वरना परशुराम उन सबको मार देंगे

ये सुनकर वो ब्राह्मण परशुराम के पास गए और कहा की वो इस भेंट की हुई भूमि पर नही रह सकते क्यूंकि दान करने के बाद भी परशुराम वहां रह रहे है अर्थात जमीन पर अब भी परशुराम का अधिकार है इस पर परशुराम ने चारों ओर जमीन को घेरे हुए पानी या समुन्द्र को देखा और समुन्द्र को आदेश दिया की वो वहां से पीछे हट जाए क्यूंकि उन्हें जमीन चाहिए थीपर समुन्द्र पीछे नही हटा इस पर उन्होंने फ़िर एक बार समुन्द्र को आदेश दिया और तब अचानक एक बड़ी लहर उठी और समुन्द्र देवता वरुण प्रकट हुए और उन्होंने परशुराम से कहा की वो पानी मे तीर चलाये और जहाँ पर उनका तीर पानी को छुएगा वहीं जमीन निकल आएगीऔर इसके लिए तीर जितनी दूरी तय करेगा वो सारी जमीन उनकी होगी ये सुनकर परशुराम भागकर सयाद्री के ऊँचे पहाड़ पर गए और वहां से तीर चलाया और उनके तीर ने एक लम्बी दूरी तय की और तीर पानी मे लगा तीर ने जैसे ही पानी को छुआ कि लहरें अलग हो गई और वहां पर जमीन निकल आई और इस तरह से गोवा का जन्म हुआ

गोवा आने के बाद जब से ये पता चला था की यहां पर परशुराम जी का मन्दिर है पर किसी ना किसी वजह से हम देखने नही जा पा रहे थेवैसे २००७ मे जब हमने ब्लॉगिंग की शुरुआत की थी तब उन्मुक्त जी ने अपने एक चिट्ठे पर अपनी गोवा यात्रा का वर्णन किया था जिसमे परशुराम मन्दिर का भी उल्लेख किया था पर आज हमे उन्मुक्त जी की वो पोस्ट नही मिल रही है लिंक देने के लिए खैर पिछले शनिवार को हमने ठान ही लिया था की इस छुट्टी के दिन तो हम जरुर ही मन्दिर जायेंगे दर्शन के लिएअब ये भी कोई बात हुई की हम गोवा मे रहें और ये मन्दिर ना देखे सो जब जब ठान ही लिया था तो प्रोग्राम बना की सुबह -.३० तक निकलेंगे जिससे साढ़े ग्यारह बजे तक मन्दिर पहुँच जाए क्यूंकि सारे मन्दिर १२ बजे से बजे तक बंद रहते है

परशुराम मन्दिर पंजिम से ८०-८५ कि.मी. की दूरी पर है कनकोना से आगे पेंगिन (Painguinim) नाम का एक छोटा सा गाँव है और इसी गाँव मे ये मन्दिर है जैसे ही मुख्य सड़क से मुड़ते है कि ये मन्दिर दिखाई देता है ये मन्दिर छोटा सा है पर इसे मन्दिर मे इतनी अधिक शान्ति थी कि मन अपने आप ही शांत हो जाता हैवैसे भी हम लोग भरी दोपहरी मे पहुंचे थे और वो भी शनिवार कोहोली के तीसरे दिन यहां पर बहुत बड़ी पूजा होती है और जात्रा भी निकली जाती हैलोग दूर-दूर से इस जात्रा को देखने आते है

इसे मन्दिर मे जैसे ही घुसते है तो दाहिनी तरफ़ परशुराम जी की मूर्ति के दर्शन होते है और जब मन्दिर के बाई तरफ़ के द्वार मे प्रवेश करते है तो भगवान् राम के दर्शन होते है मन्दिर मे परशुराम और भगवान् राम की मूर्ति आमने सामने लगी हुई हैमाने एक छोर पर राम जी और दूसरे छोर पर परशुराम जी की मूर्ति बनी हुई है

मन्दिर के पुजारी ने बताया कि ये मन्दिर साढ़े सात सौ साल पुराना है और यहां पर अक्सर लोग पंच रात्री के लिए आते है हमारे पूछने पर कि पंच रात्री क्या होती है
तो पुजारी ने बताया कि लोग यहां आकर पाँच दिन रहते है और पूजा अनुष्ठान करते है चूँकि परशुराम जी का दिन सोमवार माना जाता है इसलिए लोग गुरूवार को वहां जाते है और मन्दिर प्रांगन मे बने कमरों मे रुकते है और सोमवार की पूजा करके अपने घर जाते है


चूँकि हम लोग दोपहर मे पहुंचे थे और १२ बजे की आरती हो रही थी तो हम ने आरती देखीऔर मन्दिर की परिक्रमा करके बाहर गए मन्दिर के पीछे की तरफ़ एक पोंड है जहाँ पर नहाने की सख्त मनाही है पर फोटो खींचने की नही :)

Sunday, May 11, 2008

माँ जिन्हें हम सब भाई बहन
अलग-अलग नाम से बुलाते
कोई माँ तो कोई अम्मा तो कोई मम्मी कहता
आज माँ हम सबसे बहुत दूर है
पर आज भी माँ हम सबके बहुत करीब है
आज भी उनका प्यार करना
उनका डांटना उनका दुलारना
सब याद आता है


माँ जिन्होंने जिंदगी मे कभी
हार नही मानी , यहां तक की
मौत को भी तीन बार हराया
पर आख़िर मे जिंदगी ने
उन का साथ छोड़ दिया
और माँ ने हम सबका



आज भी माँ का वो हँसता मुस्कुराता
चेहरा आंखों और दिल मे बसा है
माथे पर बड़ी लाल बिंदी
और मांग मे सुर्ख लाल सिन्दूर
सब याद आता है ,बहुत याद आता है

Saturday, May 10, 2008

पहली मई को यहां कला अकेडमी मे गोवा के चौथे कोंकण फ़िल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह मे EUPHORIA ग्रुप भी आया था। समारोह के उदघाटन का समय तो बजे था और उसके बाद ही इन लोगों का कार्यक्रम था।दीप जलाने और भाषण वगैरा होने के बाद लोगों को इस बैंड को सुनने की ललक थी।भाषण और दीप जलाने का काम आधे घंटे मे ख़त्म हो गया और फ़िर ये एनाउंस किया गया की बस आधे घंटे मे EUPHORIA का प्रोग्राम शुरू होगा।

इस एनाउंस मेंट के बाद कुछ लोग तो बाहर चाय-काफ़ी पीने चले गए और कुछ लोग वहीं बैठे रहे।और फ़िर शुरू हुआ स्टेज को सेट करने का काम। कभी माइक टेस्ट करते तो कभी लाईट थोडी देर तो हम लोग भी ये सब देखते रहे पर बजे हमारा सब्र टूट गया और हम लोग बाहर jetty पर घूमने चले गए करीब पंद्रह मिनट बाद बाहर गिटार और ड्रम की आवाज आने लगी तो हम लोग वापिस हॉल मे आए पर हॉल के अन्दर तो अभी भी टेस्टिंग चल रही थी। खैर हम लोग बैठ गए तो हमने समय बिताने के लिए फोटो ही खींचना शुरू कियाधीरे-धीरे वहां मौजूद सभी लोगों का सब्र ख़त्म हो रहा था।एक -दो बार तो जब वो लोग गिटार का volume टेस्ट करते तो लोग ताली बजाने लगते (पर ग्रुप वाले शायद ऐसी चीजों के आदी थे वो मुस्करा कर जनता को धन्यवाद देते )

पौने आठ बजे के आस-पास तो एक सज्जन बोले की अब लाईट और माइक जैसे भी है आप लोग program शुरू करो।अब वो बेचारे क्या करते कभी लाईट तो कभी माइक उन्हें धोखा दे रहे थे। और फ़िर आठ बजने मे १० मिनट पर सारे के सारे गायब हो गए क्योंकि लोगों ने लगातार तालियाँ बजानी शुरू कर दी थी।(वो तो बाद मे समझ आया कि जब सिर्फ़ घंटे का ही कार्यक्रम था (-१०) तो भला वो लोग बजे से ही कैसे प्रोग्राम शुरू कर देते।)


ठीक आठ बजे सारे ग्रुप के लोग फ़िर से स्टेज पर आए और और इस बार सारे लोग काले कपड़े मे यानी की ट्रेडमार्क style मे।और पलाश सेन ने स्टेज पर एंट्री की काली शर्ट और सफ़ेद जैकेट मे और अपना कार्यक्रम शुरूकिया जैसे -जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ता गया लोगों को मजा आने लगा और आखिरी गाने तक आते-आते पलाश नेअपनी जैकेट और शर्ट उतार दी थी। पलाश के गाने और उनकी एनर्जी देख कर और इनके साथी बेनी जो की keyboard
बजाते है इन दोनों को देखने मे बहुत मजा आया। बेनी तो अपनी गर्दन को इस तरह से झटका देतारहता है मानो गर्दन मे कुछ है ही नही जबकि आम आदमी को दो-चार बार गर्दन को घुमाने और झटका देनेमे स्पोंडोलाईसिस का डर रहता है। :) पलाश ने गाने का ऐसा समां बाँधा की सभी लोग उस डेढ़ घंटे के इंतजार कोभूल कर पलाश सेन के गानों पर झूम उठे पर जनता को झूमने के लिए पर्याप्त जगह नही थी क्योंकि एक तो ये कार्यक्रम बंद हॉल मे किया गया था और दूसरा स्टेज के आगे लोगों को नाचने के लिए जगह नही थी जबकि इस तरह के music concert का मजा खुले मे ज्यादा आता है

इसी कार्यक्रम के दौरान पलाश सेन ने बताया की उनके इस ग्रुप को १० साल हो गए है।तो चलिए इस concert मे हमने कुछ विडियो मोबाइल फ़ोन से बनाए हैउनमे से एक-दो विडियो आप भी देखिये ।अगर आपको पसंद आए तो ठीक और अगर ना पसंद आए तो भी ठीक। :)

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