Friday, May 23, 2008

सुनामी के एक महीने बाद हम लोग पोर्ट ब्लेयर के गेस्ट हाउस मे शिफ्ट कर गए थे । और जिंदगी ढर्रे पर आ रही थी की १५ फरवरी को जब हमने इलाहाबाद फ़ोन किया तो पता चला सोमनाथ (नौकर)ने फ़ोन पर बताया की सब लोग lucknow गए है माताजी की तबियत ख़राब हो गई है। तो हमे लगा की शायद मामाजी की तबियत ज्यादा ख़राब हो गयी है क्यूंकि २-३- दिन पहले जब मम्मी से बात हुई थी तब वो luckmow मामा को देखने अस्पताल गई थी। और १४ को इलाहाबाद वापिस आई थी।ये सोचकर जब मम्मी को उनके मोबाइल पर कॉल किया तो कोई जवाब नही मिलने पर भइया को फ़ोन किया तो भइया ने कहा की वो lucknow पहुंचकर हमे फ़ोन करेंगे।तो हमने अपनी lucknow और कानपुर वाली दीदी को फ़ोन किया पर उन्हें भी कुछ भी पापा या भइया ने नही बताया था। बस उन्हें अस्पताल पहुँचने के लिए कह दिया था।

उस दिन रात मे भइया ने फ़ोन किया और बताया की मम्मी lucknow के पी.जी.आई.अस्पताल के आई.सी.यू.मे भरती है । ये सुनकर तो बस आंखों से आंसू गिरने लगे।और हमने कहा की हम कल ही lucknow पहुँचते है तो पापा ने कहा की तुम परेशान मत हो ,इतनी दूर से तुम कहाँ भागी-भागी आओगी अभी हम सब है यहाँ । और जैसी मम्मी की तबियत होगी तुम्हे बताते रहेंगे। भइया ने भी यही कहा की तुम परेशान मत हो ।पर जब १८ फरवरी को पापा से बात की तब पापा बहुत ही परेशान लग रहे थे और उन्होंने ज्यादा बात नही की बस ये बताया की मम्मी को सी.सी.एम.(critical care manegement)मे शिफ्ट कर दिया है।और मम्मी को सप्पोर्ट सिस्टम पर कर दिया गया है।इससे पहले इस सी.सी.एम के बारे मे नही सुना था ।

ये सुनकर तो बस पैरों तले जमीन ही निकल गई और अगली सुबह की बुकिंग करवाकर बेटे और पतिदेव को अंडमान मे छोड़कर lucknow पहुंचे और सीधे मम्मी से मिलने गए । मम्मी से मिलने से पहले पापा ने बताया कि १४ कि शाम ही मम्मी मामा को देख कर वापिस इलाहाबाद लौटी थी और रात मे ही अचानक उन्हें साँस लेने मे तकलीफ होने लगी और सारी रात ऐसे ही कटी अगले दिन तबियत और ख़राब होने लगी तो उन्हें lucknow ले कर आ गए थे। सी.सी.एम कि तरफ़ जाते हुए पापा हमे समझा रहे थे कि मम्मी को देख कर घबराना नही तो हमे समझ नही आया और जब हम सी.सी.एम के दरवाजे पर पहुंचे तो वहां ४ और मरीज थे पर हमे अपनी मम्मी कहीं नही दिख रही थी तो पापा से हमने कहा कि मम्मी कहाँ है और जब हम उनके पास गए तो मम्मी को चारों और से मशीनों से घिरा और मुंह मे वैन्तिलेटर लगा हुआ देख कर बड़ी जोर से हमे रोना आया और आंसू रुकने का नाम नही ले रहे थे। तभी पापा ने हमारे कंधे पर हाथ रक्खा और और हम वहां से रोते हुए बाहर आ गए।

पापा ने अस्पताल मे उसी फ्लोर पर एक प्राइवेट रूम ले लिया था और ये रूम तीन महीने तक हम लोगों का घर रहा। रूम मे पापा ने बताया कि मम्मी को चेस्ट इन्फेक्शन की वजह से ये सब हुआ है।और अभी मम्मी कोमा जैसी हालत मे है।और जब मम्मी को होश आएगा तो उन्हें इन दस दिनों मे क्या हुआ है कुछ भी याद नही होगा। और डॉक्टर कहते है कि इनसे बात करना चाहिए क्यूंकि मम्मी सुन तो सकती है पर जवाब नही दे सकती है।और ऐसे मरीजों को मोटिवेशन की जरुरत रहती है। रोज हम सभी जाकर उनसे बात करते और उन्हें कहते कि वो ठीक हो जायेंगी । उस अस्पताल मे हम लोगों को किसी भी समय अन्दर मम्मी के पास जाने की इजाजत डॉक्टर ने दे दी थी।तीन महीने मे हम सब वहां की सभी मशीनों को पढ़ना सीख गए थे ।

दिन भर हम सब भाई-बहन और पापा अस्पताल मे रहते और रात मे हम और हमारी डॉक्टर दीदी अस्पताल मे रुकते।हमारी दीदी के डॉक्टर होने की वजह से हम लोगों को मम्मी की सही स्थिति के बारे मे पता चलता रहता था२३ फरवरी को जब रात मे हम लोग मम्मी को देखने गए तो मम्मी को होश रहा था दीदी ने तुरंत पापा को फ़ोन किया और सब लोग अस्पताल गएऔर मम्मी ऐसे उठी मानो नींद से जागी होऔर हम सभी को वहां देखकर और ये सुनकर की वो lucknow मे है उन्हें समझ नही आया की क्या वो इतनी ज्यादा बीमार हो गई थी सभी ने इसे एक तरह का चमत्कार ही माना हम सभी खुश थे की मम्मी ठीक हो गई है मम्मी ने भी बस इलाहाबाद जाने की जिद की की अब जब वो ठीक है तो अस्पताल मे क्यों रहे और होली मे इस बार सब लोग इलाहाबाद मे ही रहेंगे डॉक्टरों को मम्मी बताती की हमारी ये बेटी अंडमान मे थी और वहां सुनामी आया थाऔर हम मम्मी से कहते की हम एक सुनामी देख चुके है अब और नही देखना चाहते है तो मम्मी प्यार से हाथ फेर देती

उन तीन महीनों मे हम लोगो को ना जाने कितने ही मेडिकल टर्म के बारे मे पता चला।ना जाने क्या-क्या नही देखा. मौत को इतने करीब से हम सबने सी.सी.एम मे रहते हुए देखारोज ही किसी ना किसी की डेथ होती पर भगवान् ने हम सबमे एक शक्ति सी भर दी थी कि हम उन हालातों मे भी अपना संयम बनाए रख सकेउन तीन महीनों मे हम सबके पतियों और बच्चों ने भी बहुत साथ दिया

कभी १० दिन के लिए मम्मी ठीक होती और फ़िर वापिस बीमार हो जाती और इसी बीच उनके शरीर ने उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया। एक दिन सुबह-सुबह जब वो नाश्ता कर रही थी तब अचानक ही वो बोली की पता नही भगवान् मेरी इतनी परीक्षा क्यों ले रहा है। (मम्मी बहुत ज्यादा पूजा-पाठ करती थी)उन तीन महीनों मे जब कभी मम्मी दस दिन के लिए ठीक होती तो हम सबका ध्यान रखने लगतीजब हम सबके बच्चे उन्हें मिलने जाते तो वो भाभी को कहती कि बच्चे आए है उनकी पसंद का खाना बनवानापापा का ध्यान रखा करोपापा हमारी बीमारी से घबरा गए हैपापा जो जल्दी नही घबराते थे वो मम्मी की ऐसी हालत देख कर बहुत परेशान रहते थेमम्मी के ठीक होने के लिए हम सबने वो सब कुछ किया पूजा पाठ,दान-पुण्य,पंडित ज्योतिषी पर भगवान् ने हम सबकी नही सुनी



मम्मी जब भी ठीक होती तो इलाहाबाद चलने को कहती थीइसलिए जब उन्हें कार्डिएक अर्रेस्ट हुआ तो हम सब मम्मी को एम्बुलंस मे इलाहाबाद ले आए जहाँ अपने घर मे एक दिन मम्मी रही और २३ मई को वो हम सबको छोड़ कर चली गई।हम सबको बस ये संतोष था की हम लोग उनके आखिरी वक्त मे उन्हें इलाहाबाद ले आए थे और अपने आखिरी समय मे वो अपने परिवार वालों के बीच थी। हालंकि मम्मी हम लोगों को कोई रेस्पोंस नही दे रही थी पर शायद उन्हें पता चल गया था की वो अपने घर गई है क्यूंकि उनके चेहरे पर एक अजीब सी शान्ति थी।

हमारी सुनामी जो २६ दिसम्बर २००४ मे शुरू हुई थी वो २३ मई २००५ को ख़त्म हुई आज मम्मी को गए तीन साल हो गए है एक ऐसा खालीपन है जिसे कभी भी भरा नही जा सकता है





6 Comments:

  1. दिनेशराय द्विवेदी said...
    ममता जी मुझे अस्पताल के वर्णन मात्र से ही भय लगने लगता है। हालाँकि वक्त जरुरत जाना भी पड़ता है। लेकिन मन यही कहता है कि किसी को अस्पताल न जाना पड़े।
    Udan Tashtari said...
    माता जी की पुण्य तिथि पर नमन करता हूँ.श्रृद्धांजलि.
    DR.ANURAG ARYA said...
    इश्वर का शुक्र है की आपकी माता जी इस अवस्था से बाहर आ गई...एक डॉक्टर को किन परिस्थितयों से गुजरना पड़ता होगा रोज.....कितने भावनात्मक ज्वार भाटो से ...ओर फ़िर ये कोशिश की इन सबको अपने साथ घर वापस न ले जायूं .....ओर मरीजो की उमीदे ....अब आप एक डॉक्टर का दर्द भी समझ सकती है.......
    Rajesh Roshan said...
    ममता जी अस्पताल की अलग ही दुनिया है. अपना दर्द कम लगने लगता है
    mahendra mishra said...
    माँ को कभी नही भुलाया जा सकता है . ममतामयी माँ को नमन और श्रद्धा सुमन अर्पित है .
    mehek said...
    bahut hi bhavuk bana diya aapne,maa ki jagah koi nahi le sakta,aapki mataji ko hamara bhi naman.

Post a Comment