Thursday, May 15, 2008

अभी तक तो हम लोग शेर और चीते की प्रजाति के ख़त्म होने की बात सुन रहे थे पर अब तो चिडियों के भी लुप्त होने की ख़बर आ रही है। अभी हाल मे जो नई आउटलुक मैगजीन आई है उसमे गौरईया चिडिया के बारे मे लिखा है की अब गौरईया भी धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है ये पढ़ कर बहुत ही अजीब सा लगा क्यूंकि गौरईया चिडिया का घर-आँगन मे फुदकना, उड़ना,चहकना क्या हम लोग भूल सकते हैपहले जहाँ सुबह हुई कि चिडिया चूं-चूं करती आँगन मे जाती थी.जब भी मम्मी आँगन या छत पर कुछ धुप मे सुखाने के लिए डालती तो एक नौकर बैठाया जाता की कहीं चिडिया-कौवा मुंह ना मार देकहने का मतलब की उस समय इतनी ज्यादा चिडिया हुआ करती थी

ये तो हम सभी जानते है कि गौरईया चिडिया को कमरे के पंखों मे घोसला बनाने मे बड़ा मजा आता थाबचपन से
गौरईया को कमरे के पंखों मे घोसला बनाते देखते हुए बड़े हुए है जहाँ गर्मी आती थी की चिडिया कमरे मे घुसने की कोशिश करने लगती थी मम्मी हम लोगों को कमरे का जाली का दरवाजा बंद करने के लिए कहती थी क्यूंकि उन्हें लगता था की अगर चिडिया अंदर आएगी तो पंखे से कट जायेगीपर ना तो चिडिया मानती और ना ही हम लोग हर समय दरवाजा बंद रख पाते थे और जब भी गौरिया कमरे मे घुसती तो पहला काम होता की पंखा बंद कर दिया जाता और फ़िर शुरू होता चिडिया को बाहर उडाने और निकालने का काम कोई उड़-उड़ तो कोई हुश-हुश करता और चिडिया रानी इधर से उधर उड़ती रहती और तब हम लोगों को मम्मी की डांट पड़ती थी पर गौरईया भी कम नही थी जहाँ मौका मिलता पंखे मे घोंसला बना लेती और अंडे भी दे देती थी

अंडमान मे हम लोगों के घर मे बहुत सारी गौरईया आती थी शुरू-शुरू मे एक-दो और फ़िर जब पतिदेव के कहने पर इन चिडियों के लिए दाना-पानी रखने लगे तो बहुत सारी चिडिया आने लगी थीऔर बाद मे ये हाल हो गया था की सब चिडिया दरवाजे पर आकर बैठ जाती थीऔर ची-ची-करके शोर मचाया करती थीपर सारी चिडिया कैमरा कोंशस थी जैसे ही हम कैमरा ले कर आते की सब फुर्र से उड़ जाती थी अंडमान मे एक दिन बारिश के बाद चिडिया दाना खाने आई थी पर जैसे ही हमारे हाथ मे कैमरा देखा कि खाना-पीना छोड़कर फुर्र से उड़कर तार पर जा बैठी :)


यहां गोवा मे अभी तक तो ध्यान नही दिया था की गौरईया आती है या नही क्यूंकि यहां पर भी सुबह से चिडियां बोलने लग जाती हैऔर बहुत तरह की चिडियां दिखती है . पर अब इस लेख को पढने के बाद हम इस बात पर जरुर गौर करेंगे की यहां गौरईया चिडिया आती है या नही

चलते-चलते एक छोटा सा चिडियों का विडियो भी देख लीजिये हालांकि इसमे बस - गौरईया चिडियां और मैना ही है

video

11 Comments:

  1. DR.ANURAG ARYA said...
    kabi socha nahi is baare me ...aapka saval vakai jayaj hai.
    rakhshanda said...
    लेकिन मैंने कई बार सोचा, आपने बस मेरी सोच को इस पोस्ट का रूप दिया है, वो सारा सारा दिन चहचहाती गौरैया आज ढूंढें से भी नही मिलती...जाने ये इंसान किस किस की बलि लेकर विकास की राह तैयार करेगा.
    कंचन सिंह चौहान said...
    अच्छा...? सच में नही पता था...! अभी थोड़े दिन पहले तो आॡकी मम्मी वाला काम हमने बी किया है,....! गीरैया कमरे में घोसला बनाने जा रही थी..! घर में भांजा excited था..देखिये मौसी कितने प्यार से बना रही है घर...और मौसी को कोई प्यार नही आया बल्कि चिंता हो गई कि " अरे ये घर बना लेगी तो बड़ी आफत हो जायेगी पंखा चलते ही कट जायेगी" बच्चों के ऊपर कोई फर्क नही..! वो बस देखने में मगन...! आफिस और घर के चक्कर में ध्यान नही रहा कि उसने घोसला बनाया या नही..! आज जा के देखुँगी।
    अभिषेक ओझा said...
    गौरैया पुणे में तो कभी देखि नहीं पर घर जब भी जाता हूँ दिख जाती है... आपके इस लेख से याद आया, पिछले दिनों जब गिलहरी दिखी थी तो सोच में पड़ गया था की अरे बचपन में तो बहुत देखा था... ये जीव क्या है?
    महामंत्री (तस्लीम ) said...
    सही कहा आपने। पहले हर घर में फुदकने वाली गौरइया आजकल यदा कदा ही देखने को मिलती हैं।
    Rajesh Roshan said...
    विकास से पहले विनाश की निशानी की हलकी झलक है.
    पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...
    इस प्रस्तुति के लिये आभार।


    हमारे यहाँ कौवे बहुत कम हो गये है। लोग कहते है कि राजधानी बनने के बाद ऐसा हुआ है। उनसे बडे कौवे आ गये तो उन्होने भागने मे ही भलाई समझी। :)


    गौरैया के लिये जो कारण गिनाये गये है वे सभी पंछियो पर लागू होते है। कुछ समय पहले जब मैने गौरैया को गाजर घास के पास देखा तो दुखी हो गया। इस पोस्ट को पढने के बाद अब मै अपने आस-पास इस पंछी पर और नजर रखने की कोशिश करुंगा।
    अनिल रघुराज said...
    गौरैया के इस तरह विलुप्त होने पर मैंने भी पिछले साल पहली जून को एक पोस्ट लिखी थी कहानी की शक्ल में।
    Udan Tashtari said...
    पहले मुझे मालूम नहीं था कि कनाडा में भी गौरैया होती है. पिछले कुछ सालों से, जबसे चिड़ियों के लिये दाना रखने लगे, खूब सारी गौरैया आती हैं. किसी दिन फोटो खीचेंगे.
    Mrs. Asha Joglekar said...
    सच कह रहीं हैं दिल्ली में मैने महसूस किया है कि पिछले ७-८ सालें में चिडिया वाकई कम ही नजर आतीं हैं ।
    सागर नाहर said...
    गौरेया का फुदकना, चहचहाना, काँच में अपना ही अक्स देखकर चोंच मार कर उसे भगाने की कोशिश करना...क्या ये सब बहुत जल्दी खत्म हो जायेगा?
    क्या इस तरह इन्सान सभी प्राणियों को खत्म कर ही चैन लेगा?

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