Wednesday, April 30, 2008




गोवा के ट्राइबल गाँव मे घूमते हुए हम यहां की आंगन वाडी मे गए और आँगन वाडी की साफ-सफ़ाई और बच्चों को ड्रेस मे देख कर अचंभित हुए बिना नही रहे। आम तौर पर आँगन वाडी मे ड्रेस का कोई सिस्टम नही होता है पर इस आँगन वाडी मे इंचार्ज और अभिभावकों ने मिल कर ये ड्रेस का सिस्टम रक्खा है।इस ड्रेस का खर्चा बच्चों के माता-पिता ही करते है। और वहां की इंचार्ज ने बताया की इससे अभिभावकों को भी अच्छा रहता है और बच्चो मे स्कूल जाने की भावना भी आती है।

जब हम लोग यहां पहुंचे तो बच्चे अपने खेल मे मस्त थे।हम लोगों को देख कर पहले टीचर ने और फ़िर बच्चों ने गुड मॉर्निंग कहा। उसके बाद टीचर ने इन बच्चों को एक गाना सुनाने को कहा।और बच्चों ने एक्शन के साथ गाना सुनाया

थोडी देर आँगन वाडी मे रुकने के बाद हम लोग वापिस पंजिम की ओर चल पड़े

Tuesday, April 29, 2008

आजकल टी.वी. मे किसी pain relief cream शायद iodex का विज्ञापन आता है जिसमे एक आदमी सड़क पर पड़े ५०० के नोट को झुक कर उठा नही पाता है क्यूंकि उसकी कमर मे दर्द है।

इसी विज्ञापन को देख कर हमे एक वाकया याद आया है।उस समय दिल्ली के जिस ऑफिस मे हम काम करते थे ये वाकया ऑफिस मे साथ मे काम करने वाली हमारी एक बहुत अच्छी दोस्त के साथ हुआ था।इस घटना को अब ७ साल तो हो ही चुके है।दिल्ली का एम.ब्लाक मार्केट मंगलवार को बंद रहता है बस खाने-पीने की दुकाने खुली रहती है।और इसलिए वहां मंगलवार को ज्यादा भीड़-भाड़ नही होती थी। एक ऐसे ही मंगलवार को हमारी दोस्त अपनी बेटी के साथ एम.ब्लाक मार्केट के pizza hut मे pizza खाने गई थी।जैसे ही वो कार से उतरकर pizza hut की ओर चली कि उनकी निगाह सड़क पर पड़े ५०० रूपये के नोट पर पड़ी और उन्होंने वो रुपया उठा लिया और अपनी बेटी से हँसते हुए कहा की चलो आज तो अपने पैसे बच गए। आज का pizza तो फ्री मे खाया जायेगा क्यूंकि ये ५०० रूपये का नोट जो मिल गया है।

खैर दोनों माँ-बेटी ने pizza खाया और बिल उसी ५०० रूपये से दिया और खुश होकर बाहर अपनी कार की तरफ़ जैसे ही वो बढ़ी की उनका पैर मुड़ गया और वो जमीन पर गिर गई और उनके हाथ और पैर मे चोट आ गई।अगले दिन जब वो ऑफिस आई और हम लोगों को ये किस्सा खूब मजे ले- लेकर सुनाया और अपना सूजा हुआ हाथ भी दिखाया तो हमारी एक और बंगाली दोस्त ने उनसे कहा की आपने ये ठीक नही किया। आपको वो रुपया खर्च नही करना चाहिए था पता नही किसका रहा होगा।
इस पर वो बोली की उस समय ये सब उन्होंने नही सोचा था।
तो उन्ही बंगाली दोस्त ने कहा की देखा ,इसीलिए आपको चोट लगी है।
और फ़िर उन्होंने कहा की अगर कभी भी कहीं भी रुपया पड़ा मिले तो उसे कभी भी नही उठाना चाहिए । और अगर उठाते भी है तो उसे किसी मन्दिर मे रख देना चाहिए।वरना वैसा ही होता है जैसा की हमारी उस दोस्त के साथ हुआ था। यानी कि चोट लग सकती है।

तो अब आप भी कभी सड़क पर पड़ा रुपया मत उठाइयेगा वरना कहीं लेने के देने ना पड़ जाए। :)


Monday, April 28, 2008


जब
से आज तक ने हॉकी फेडरेशन के ज्योतिकुमारन को पैसा लेते हुए दिखाया है तब से सारे देश मे हड़कंप सा मच गया है। अभी तक तो क्रिकेट मे ही घपले होते थे जैसे betting और अब हॉकी की खबर ने लोगों को और भी चौंका दिया है। कैसे खिलाड़ी या एसोसिअशन के लोग देश को इस तरह से हरवा कर रहते है।ज्योतिकुमारन का कहना है कि उसने पैसा ये सोच कर लिया की उसेकिसी बड़े आयोजन के लिए पेशगी दी जा रही है।ज्योतिकुमारन ने ५ लाख मे डील की जिसमे २ लाख तो वो ख़ुद लेते हुए दिखाए गए और बाकी के ३ लाख उन्होंने दिल्ली मे देने को कहा।हॉकी जो की भारत का राष्ट्रीय खेल है उसे साधारण खेल की श्रेणी मे कर दिया गया था पर अब हॉकी को साधारण (general) से हटाकर मुख्य (priority)श्रेणी मे कर दिया गया है


हॉकी को लेकर अब ज़ंग छिड़ी है गिल और गिल के बीच एम.एस.गिल जो खेल मंत्री है उनका कहना है कि के.पी.एस.गिल को इस्तीफा दे देना चाहिए वहीं के.पी.एस.गिल का कहना है की एम.एस.गिल को खेल के बारे मे क्या पता हैखेल मंत्री के इस बयान पर की फेडरेशन मे युवा लोग होने चाहिए इस पर के.पी.एस.गिल का कहना है की फेडरेशन मे ही नही बल्कि खेल मंत्रालय मे भी युवा लोग ही होने चाहिएऔर जब सवाल उनकी उम्र को लेकर उठाया गया तो के.पी.एस.गिल का कहना था कि उम्र उनके काम-काज के आड़े नही आती हैऔर अगर उम्र की ही बात है तो खेल मंत्री की उम्र भी काफ़ी हैके.पी.एस.गिल का तो ये भी कहना है वो इस्तीफा बिल्कुल भी नही देंगे और इतना सब कुछ होने के बाद तो बिल्कुल भी नही


अब गिल इस्तीफा दे या गिल इस्तीफा ले पर सबसे जरुरी है हॉकी को दोबारा ऊपर लाने की

Sunday, April 27, 2008

बेटे की चाहत हर दादा-दादी को होती है क्यूंकि बुजुर्गों का मानना है कि वंश तो लड़कों से ही चलता है। और लड़कियां तो पराया धन होती है जो शादी करके दूसरे घर चली जाती है। ३० साल पहले तो आज से भी ज्यादा बेटे की इच्छा लोगों मे होती थी और बेटी का जन्म होना यानी एक और खर्चा माना जाता था। और ये बात ३०-३२ साल पहले की है और दिल्ली के जिस परिवार की हम यहां बात कर रहे है उसमे पति २ भाई है और पत्नी अकेली बेटी है। और इस दंपत्ति के ३ बेटियाँ है ।और जैसा की हर परिवार मे बेटे के चाहत होती है ठीक वैसे ही इस परिवार को भी बेटे की चाहत थी।

शादी के २ साल बाद जब इस दंपत्ति की पहली बेटी पैदा हुई तो सास कुछ ज्यादा खुश तो नही हुई पर निराशा भी नही हुई क्यूंकि एक तो ये पहला बच्चा था और दूसरे सास के दिल मे कहीं ये उम्मीद थी कि हो सकता है की अगली बार बेटा हो जाए।अभी बेटी ढाई साल की हुई ही थी कि उन्होंने एक और बेटी को जन्म दिया। अब दूसरी बेटी के पैदा होने पर सास-ससुर बहुत दुखी हुए । ससुर जी ने तो कुछ नही कहा पर सास एक और बेटी के पैदा होने से बिल्कुल भी खुश नही थी। उन्हें ये लग रहा था की दो लड़कियां हो गई है अब उनके बेटे का नाम कैसे आगे चलेगा क्यूंकि वंश का नाम तो बेटे से ही होता है। बेटे से तो माँ कुछ नही कहती थी पर वो यदा कदा अपनी बहु को कुछ कुछ सुनाती रहती पर बहुत ज्यादा वो कुछ नही कह पाती थी क्यूंकि उनका बेटा इस तरह की बातों को ज्यादा तवज्जोह नही देता था।और बेटे के सामने ना तो वो ज्यादा बोलती थी और ना ही उनकी बेटे के सामने ज्यादा चलती थी।

दो साल और बीते और उनकी सास हर समय पोता देख लूँ तो धन्य होऊं वाली बात दोहराती रहती। और इसी बीच एक बार फ़िर से वो माँ बनने वाली थी। इस बार सास को यकीन था की उनकी बहु के बेटा ही होगा। पर इस बार भी उन्हें बेटी हुई तो सास बहुत ही ज्यादा निराश हो गई क्यूंकि उनकी पोते को देखने की उम्मीदों पर पानी फ़िर गया था।हालांकि अगर सास का बस चलता तो बेटे की चाहत मे शायद १-२ बच्चे और इस दंपत्ति के हो गए होते।

पर इस बार पति -पत्नी ने तय कर लिया था की बेटा हो या बेटी अब वो और बच्चे पैदा नही करेंगे। अपनी बेटियों को ही वो पढा -लिखा कर इस लायक बनायेंगे कि उन्हें बेटे की कमी कभी महसूस ही ना हो।और उस दंपत्ति ने किया भी वही।उन्होंने अपनी तीनो बेटियों को अच्छे स्कूल और कॉलेज मे पढाया और आज तीनो बेटियाँ पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी कर रही है ।इस दंपत्ति ने हमेशा अपनी बेटियों को अपना बेटा माना और अब तो इन बेटियों की दादी भी अपनी पोतियों की तारीफ करते नही थकती है






Saturday, April 26, 2008

क्रिकेट जिसे अभी तक तो सभी लोग जेंतिलमैंस गेम कहते आए है पर अब क्रिकेट का रूप बदलता जा रहा है।पहले क्रिकेट मे सिर्फ़ खेल को प्राथमिकता दी जाती थी पर अब खेल को कम मनोरंजन को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है।अब ६०-७० के दशक मे सिर्फ़ टेस्ट मैच जो ५ दिन तक चलते थे होता थे और सिर्फ़ सर्दियों मे ही होते थे और क्रिकेट के उन ५ दिनों मे लोग सब कुछ भूल जाते थे। धीरे-धीरे दिवसीय टेस्ट मैच के साथ-साथ वन डे मैच की शुरुआत हुईऔर लोगों को मजा भी आने लगा क्यूंकि वन डे मे एक ही दिन मे जीत-हार का फ़ैसला हो जाता है । और खेल मे रोमांच भी बना रहता है। क्रिकेट मे हार जीत तो होती पहले भी होती ही थी पर आजकल तो हार-जीत के साथ-साथ गाली-गलौज होना आम सी बात हो गई है।

और अब वन डे से आगे t20 मैच आ गया । जिसमे वन डे से कहीं ज्यादा रोमांच होता है।और t20 मे एक और नई शुरुआत हुई चीयर गर्ल की जिन्हें बाकायदा विदेशों से लाया गया है पर अभी तक ये समझ नही आया की ये चीयर गर्ल टीम को चीयर करती है या जनता को या वो ख़ुद अपने आप को चीयर करती है । :) क्यूंकि खिलाड़ियों को चीयर करने के लिए तो मैदान मे मौजूद जनता ही काफ़ी होती है और जनता को चीयर करने के लिए खिलाडियों को बस अपने बल्ले का कमाल दिखाना होता है। अब पवार जी क्रिकेट को भी फ़ुटबाल की तरह का खेल बनाना चाह रहे है।अभी कल ही महाराष्ट्र की सरकार और जनता को चीयर गर्ल और उनके डांस और कपडों पर ऐतराज था पर क्या उन्हें ये नही पता की इन चीयर गर्ल को लाने वाले भी पवार ही है (महराष्ट्र के )। हर मैच के शुरू मे टी.वी.वाले चीयर गर्ल से जरुर बात करते है की उन्हें कौन सा खिलाड़ी पसंद है या वो किस तरह से अपनी टीम को चीयर करेंगी। अब पवार जी इन चीयर गर्ल को क्रिकेट की शान बढ़ाने के लिए लाये है और शत्रुघ्न सिन्हा इन्हे नचानियाँ कह कर इनका अपमान कर रहे है। अरे शत्रु जी लगता है पवार जी ने आपकी ये बात नही सुनी है वरना वो आपको आपके ही अंदाज मे खामोश कह देते।

अब कल के मैच के बाद तो ये कहना ठीक होगा कि भज्जी को गुस्सा क्यों आता है अभी तक तो भज्जी और श्रीसंत विदेशी खिलाडियों से लड़ते थेऔर उन्हें क्रिकेट बोर्ड बचाता था पर अब जब ये दोनों ही आपस मे भिड़ गए तो बोर्ड क्या करेगा। पहले भी ये लोग मैदान मे गुस्सा दिखाते थे और गाली-गलौज भी करते थे पर अब तो अपने ही खिलाड़ियों को थप्पड़ और चांटे भी मारने लगे है। जिस तरह वन डे से t20 मे तरक्की हुई उसी तरह से गाली से चांटे की तरक्की हुई है।क्या खूब उदाहरण पेश किया है भारतीय क्रिकेट टीम काकल साईमंड और गिलक्रिस्ट और पोंटिंग को इन दोनों महान भारतीय खिलाडियों ने खुश होने का मौका दे दिया हारना तो किसी को भी बर्दाश्त नही होता है पर हार के बाद ऐसी हरकत करना तो बस उसी कहावत जैसा है खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे जैसा

अब इस IPL के बाद
क्रिकेट जेंतिलमैंस गेम कहा जायेगा या नही ये देखने की बात है।


Friday, April 25, 2008

आमिर खान और अवार्ड !!
इतने सालों से आमिर खान किसी भी अवार्ड फंक्शन मे ना तो जाते थे और ना ही कोई अवार्ड लेते थे।वो चाहे फ़िल्म फेयर अवार्ड हो या ज़ी सिने अवार्ड हो या फ़िर आई फा अवार्ड ही क्यों ना हो। आमिर ने अपना उसूल बना रखा था इस तरह के अवार्ड फंक्शन से दूर रहने का। पर कल आमिर ने अपने उसूल को तोड़ा । क्या कहा आपको यकीन नही हो रहा है तो इस लिंक पर क्लिक करिये और ख़ुद देखिये और पढिये ।

और कल आमिर ना केवल अवार्ड फंक्शन मे गए बल्कि ख़ुद ही अवार्ड भी लियाआमिर खान को ये स्पेशल अवार्ड उनके हिन्दी सिनेमा मे किए गए योगदान के लिए दिया गया हैकल मुम्बई मे हुए एक समारोह मे लता मंगेशकर ने मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड आमिर खान को दिया।और अवार्ड लेते हुए आमिर भी खुश ही लग रहे थे।



Wednesday, April 23, 2008

तुसी कोलकता की रहने वाली एक बहुत ही आम सी लड़की है। तुसी ने बी.ऐ.पास किया है साथ ही उसने mountaineering institute से भी कोर्स किया हुआ है। तुसी को mountaineering का शौक है और वो माउन्ट एवरेस्ट पर जाना चाहती है। पर चूँकि माउन्ट एवरेस्ट के expedition लिए खर्चा बहुत आता है यही कोई ६-७ लाख रूपये। इसलिए २५ साल की तुसी अंडे बेच कर पैसे इक्कठा कर रही है। पूरी खबर आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते है।


जिस तरह से तुसी अपने सपने को साकार करने मे लगी हुई है उससे लगता है की अगर मन मे ठान ले तो कोई भी काम मुश्किल नही है।

IPL को शुरू हुए ५-६ दिन हो चुके है पर जब भी मैच देखो या मैच की झलकियाँ देखो हर समय बस विदेशी ही छक्के और चौवे मारते हुए नजर आते थे। हर मैच मे अपने भारतीय खिलाड़ी १०-२० रन बनाकर आउट हो जाते थे।एक आध छक्के मारे नही की आउट हो जाते थे। बस एक दिल्ली की टीम मे ही अपने भारतीय खिलाडी कुछ कमाल कर पाये है। पहले मैच मे और फ़िर कल अपने दूसरे मैच मे भी दिल्ली की टीम ने बढ़िया प्रदर्शन किया है।

कल तो जैसे सहवाग ने ठान लिया था की बहुत हुआ अब छक्के मारने वाले खिलाड़ियों की लिस्ट मे उसका नाम लिखा जाना ही है।और जिस तरह से कल सहवाग ने साईमंड के पहले ओवर मे रनों की बरसात की वो इस t20 के मैच मे किसी भारतीय द्वारा पहली बार देखने को मिली।सहवाग ने ४६ बॉल पर ९४ रनों की धुआंधार बल्लेबाजी की थी। कल की जीत के बाद तो सहवाग काफ़ी जोश मे नजर रहे हैअब धोनी,युवराज कब अपने बल्ले का कमाल दिखाएँगे इसका अब सभी दर्शकों को इंतजार है।

इस पोस्ट को हम फ़िर बजे पोस्ट कर रहे है क्यूंकि सुबह १२ बजे पोस्ट करने के बाद ये पोस्ट कहीं दिख नही रही थी

Monday, April 21, 2008



ऐसा नही है की ट्राइबल सिर्फ़ जंगलों मे ही रहते है। अंडमान मे और मध्य प्रदेश मे भी हमने ट्राइबल देखे थे।और अब यहां गोवा मे ट्राइबल को देखने का अवसर मिला। ये ट्राइबल विलेज पंजिम से करीब ५० की.मी .दूर कनकोना के पास कजूर ( cazur ) नाम का छोटा सा गाँव है।जब हम लोग इस गाँव मे पहुंचे तो देखा की एक औरत अपने सिर पर लकड़ी को रखकर बड़े आराम से चली जा रही है।
हालांकि इस गाँव मे पानी के लिए इन सबके घरों मे नल (tap water) नही है। गाँव मे कुआं है ये सब लोग उस कुएं से पानी भरते है। और पूछने पर की कुएं से पानी लाने मे दिक्कत होती होगी तो इनका जवाब था की नही कुआं पास मे ही है। इस गाँव मे महिला मंडल है और आँगनवाडी भी है।यहां के बच्चों को स्कूल के लिए काफ़ी दूर आना पड़ता है। गोवा का ट्राइबल विलेज देख कर खुशी हुई की ये लोग सभ्यता और संस्कृती से अलग नही है। और इसी गाँव मे हमने पहली बार boiled rice कैसे बनाते है उसे देखा।

अब बोएल राइस के बारे मे तो हम सभी ने सुना है और घर मे भी कभी-कभी इस्तेमाल करते है।खास कर फ्राईड राइस के लिए। पर क्या आप जानते है की इसे कैसे बनाते है।नही ना। तो चलिए हम आपको बताते है की बोएल राइस किस तरह से बनाया जाता है।यहां पर हम ये बता दे की ये तरीका हमे यहां के एक ट्राइबल परिवार ने बताया है जिस तरह से वो इसे बनाते है।

तो बस कुछ फोटो और जो कुछ उन्होंने बताया वो नोट कर लिया। ये जो बड़ा सा मिटटी का चूल्हा और उस पर एक बड़ा सा हंडा आप देख रहे है इसी हंडे मे पानी भर कर कच्चा धान डाल कर आंच पर पकाया जाता है।शुरू मे आंच तेज रखते है और जब ये उबल जाता है तो चूल्हे की आंच धीमी कर दी जाती है।और धीमी आंच पर ये पकता रहता है।
और फ़िर धान को इस तरह जमीन पर फैला कर उस पर इस तरह से चलते है जिससे चावल धान से अलग हो जाते है। और पूरी तरह से तैयार बोएल राइस इस तरह का दिखता है।




तो कहिये कैसा लगा गोवा का ये गाँव। अगले हफ्ते हम इसी गाँव के बारे मे कुछ और बताएँगे।



Friday, April 18, 2008

ओलम्पिक मशाल और तिब्बतियों के विरोध के बीच मे ओलम्पिक मशाल का भारत मे आना और सही सलामत ओलम्पिक दौड़ का आयोजन हो जाना भारत सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर मान रही हैपर क्या वाकई ये ओलम्पिक दौड़ का आयोजन सफ़ल रहा है अब ये तो जानकार लोग ही बता पायेंगे ओलम्पिक मशाल की दौड़ के बराबर ही तिब्बतियों ने भी एक मशाल रैली निकाली थी

कल जिस दौड़ को दोपहर एक बजे शुरू होना था वो शाम को बजे शुरू हुई और उसपर भी इतनी सुरक्षा जितनी तो शायद देश के प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति की भी नही होती तकरीबन १७००० सुरक्षा कर्मी लगाए गए थेखैर मशाल की दौड़ जब शुरू हुई और जो देखने को मिला उसमें ना तो खेल भावना दिखी और ना ही लोगों या जनता मे इस ओलम्पिक मशाल की दौड़ को देखने के लिए कोई उत्साह दिखावैसे लोगों मे अगर उत्साह होता भी तो बेचारे सिर्फ़ सुरक्षा कर्मी को ही देख पाते क्यूंकि मशाल को देख पाना तो नामुमकिन ही थातीन तरह का सुरक्षा घेरा था लाल और काले रंग के कपड़े मे सुरक्षा कर्मी तो सफ़ेद और नीले रंग के कपडों मे चीनी और बिल्कुल सफ़ेद कपडों मे तीसरे घेरे के रूप मे भी सुरक्षा कर्मी तीन-तीन सुरक्षा घेरे और उस पर चीनी (chinese ) लोग तो किसी को मशाल के आस-पास भी फटकने नही देते
कितने गर्व की बात है जिस तरह से चीनी लोग मशाल लेकर दौड़ने वालों को instruction दे रहे थे कि किस तरह से मशाल को जलाना है और किस तरह से मशाल को पकड़ कर दौड़ना है और कैसे सीधी लाइन मे दौड़ना हैजब भी कोई मशाल लेकर दौड़ता था तो वो अपने हाथ हिलाते हुए (wave करते हुए )दौड़ता था पर उन लोगों को चीयर करने वाला कोई नही थापूरी दौड़ के दौरान चीनी लोग धावक के साथ-साथ ही दौड़ते रहे

ओलम्पिक मशाल की दौड़ के दौरान ज्यादा फोकस इस बात पर था की इसमे सैफ और आमिर खान दौड़ रहें हैयूं तो सारे न्यूज़ चैनल इस दौड़ को दिखा रहे थे पर ज्यादातर खिलाडियों के नाम चैनल वालों को पता नही थेकुछ के ही नाम वो बताते थे बाकि सारा ध्यान उनका फिल्मी हस्तियों पर थासभी चैनल कह रहे थे कि किसी भी क्रिकेट खिलाडी ने इस दौड़ मे भाग नही लिया पर बिशन सिंह बेदी को भी दौड़ते हुए दिखाया गया था पर न्यूज़ वालों को सैफ,आमिर,और संगीता (चक दे )ही दिखाई दे रहे थे. सबसे ज्यादा दूरी आमिर खान ने तय की भाई आख़िर वो सबसे बड़े अभिनेता और सबसे बड़े सोशल एक्टिविस्ट है ना

और आख़िर मे जहाँ पेस और भूपति को मशाल को लेकर दौड़ना था वहां कन्फ्युजुन हो गया था चीनियों को देख कर लग रहा था की वो लोग शायद पेस और भूपति को दौड़ने की नही देंगेपर खैर - मिनट मे ही उन चीनियों ने पेस और भूपति को दौड़ने की परमीशन दे दी और वो कहते है ना की अंत भला तो सब भला तो पेस और भूपति की जोड़ी ने ओलम्पिक ज्योति इस दौड़ का समापन किया







Wednesday, April 16, 2008

अंडमान मे डी एडिक्शन के o.p.d.मे जो भी क्लाईंट आते थे वो हमेशा परिवार के कहने पर या उन्ही के साथ ही o.p.d. मे आते थे।क्लाईंट हमेशा इस बात से इनकार करते है कि वो ज्यादा नशा करते है। उनका हमेशा ये तर्क होता और वो इस बात पर भी जोर देते थे कि अगर वो शराब पीते है तो अपने पैसे की पीते है। आख़िर वो कमाते भी तो है।और ऐसे मे काउंसलर उनसे पूछता था की बस ५ कारण बता दो कि शराब पीने से क्या-क्या फायदे है ।और काउंसलर कहता कि आप फायदे बताइये हम उन्हें एक पेपर पर लिखते जायेंगे।

और जब क्लाईंट वो फायदे गिनाना शुरू करता था तो काउंसलर उसे एक पेपर पर लिखता जाता । जैसे कि शराब पीने से आराम मिलता है। तकलीफ दूर हो जाती है।चिंता नही रहती है। और मजा तो आता ही है।

और तब काउंसलर क्लाईंट से पूछता ठीक है ये तो आपने फायदे बताये अब क्या आप जानते है कि शराब पीने के क्या-क्या नुकसान होते है। काउंसलर इस बार का ध्यान रक्खता कि नुकसान भी क्लाईंट ही बताये। और क्लाईंट बड़े ही धीरे-धीरे नुकसान गिनाते जैसे इससे शरीर ख़राब हो जाता है। पेट मे दर्द होता है।घर मे झगडा होता है। भूख कम लगती है। लोगों से मिलना-जुलना ( social interaction) कम होता है।

तब काउंसलर पूछता कि एक दिन मे एक बार की शराब पर आप कितना खर्च करते है। इस का जवाब हर कोई बड़े घुमा फिरा कर देता। और साथ ही वो काउंसलर से भी सवाल करता की इस सवाल को पूछने से क्या फायदा होगा।तब काउंसलर कहते कि घबराइये नही आप बताइये फ़िर हम आपको बताएँगे कि हमने ये सवाल क्यों पूछा है ।

और तब बड़ी मुश्किल वो बताते । तो कोई कहता १०० रुपये रोजाना कहता तो कोई कहता २०० रुपये।

और तब काउंसलर उनके सामने ही १०० रुपये को महीने के तीस दिन से गुना करके यानी ३००० रुपये और फ़िर ३००० रुपये को एक साल के १२ महीने से गुना करते। यानी की ३६००० । और फ़िर पिछले जितने सालों से जैसे अगर ३ साल से वो इतने रुपये की शराब पी रहा है तब ३६००० को ३६ महीने से गुना करके उसके सामने दिखाते थे की पिछले तीन सालों मे उसने तकरीबन एक लाख रुपये शराब पर खर्च कर दिए है ।

और ये एक लाख रुपये शराब पर खर्चा करने से उसे मिला क्या ?
औरin एक लाख रुपयों से वो क्या कर सकता था।

और काउंसलर session का अंत यही पर करता और क्लाईंट को सोचने और इस पर विचार करने के लिए कहता।


अंडमान मे क्लाईंट ज्यादातर chronic ही आते थे इसलिए उन्हें बहुत समय देना होता था ।

Monday, April 14, 2008

धोनी ने कानपुर की पिच बनाने वाले curator शिव कुमार को धन्यवाद दिया की उसने ऐसी पिच बनाई थी जिसकी वजह से इंडिया ने उस मैच मे साउथ अफ्रीका को हरा कर सिरीज एक-एक से बराबर कर ली।धोने ने ना केवल धन्यवाद दिया बल्कि शिव कुमार को १० हजार रूपये भी दिए ।

जहाँ तक pitch curator को धन्यवाद और award देने की बात है तो हमारे ख़याल से तो ये ठीक नही है। ठीक है हर देश अपने यहां की pitch अपने खिलाडियों को ध्यान मे रखकर बनाता है है पर इस तरह से curator को reward देना ।

आप क्या सोचते है।

अब बचपन की बातें घूम - फिर कर याद आ ही जाती है।उस समय हम छोटे थे पर खाने के बड़े चोर थे। शाम को खेल कर घर आते तो कई बार खाना खाकर और कई बार बिना खाना खाए ही सो जाते। और जाड़े मे तो ऐसा हम अक्सर करते थे.जहाँ रजाई मे घुसे कि बस पुट से सो गए। मम्मी उठाती तो उठने का नाम ही नही लेते बिल्कुल कुम्भकरण की तरह गहरी नींद मे सो जाते थे।हम तो मजे से सो जाते और मम्मी बेचारी हमे उठाने मे लगी रहती और परेशान भी होती रहती थी।

तो एक दिन शाम को खेल कर आने के बाद हम जैसे ही आंगन मे पडी चारपाई पर सोने के लिए लेटे कि मम्मी आई और प्यार से हमारा सिर पर अपना हाथ फिराते हुए बोली कि कल तुम जब सो गई थी तो पापा ने बताया कि रात मे एक पेट टोंनवा आया था ।
पेट टोंनवा वो क्या होता है।हमने पूछा।
तो मम्मी ने बताया कि ये पेट टोंनवा रात मे आता है और सबके पेट छूकर देखता है कि किसने खाना खाया है और किसने खाना नही खाया है।और जिसने खाना नही खाया होता है उसे वो अपने साथ ले जाता है
और कल तुमने खाना नही खाया था । इसलिए उसने जब तुम्हारा पेट छुआ तो ये उसे पता चल गया था
मम्मी के ऐसा कहने पर हमने थोड़ा डर कर फ़िर पूछा कि तो हमे अपने साथ नही ले गया
मम्मी ने इस पर कहा कि वो तो तुम्हे भी ले जाने को कह रहा था पर पापा ने उसे रोक दिया और कहा कि अब से तुम रोज खाना खाकर के सोओगी
इसलिए आज से तुम बिना खाना खाए मत सोना वरना रात मे फ़िर से पेट टोंनवा आएगा। और उसे पता चल जायेगा कि तुमने खाना नही खाया है।
बस उसके बाद से तो हमने रात मे बिना खाने खाए सोना करीब-करीब छोड़ ही दिया था । अरे भाई पेट टोंनवा से डर लगता था ना।


Saturday, April 12, 2008

ये कल्लू मामा वाला गाना आज के समय मे चारों तरफ़ दिखाई दे रहा है। क्या यू.पी.क्या बिहार,क्या मुम्बई और क्या दिल्ली। बस दो गोली और सामने वाला ढेर।गोली मारने वाले को तसल्ली की उसने अपना हिसाब चुका लिया।

पहले तो हिन्दी फिल्मों मे जितना खून-खराबा देखने को मिलता था उतना तो अब आम जिंदगी मे रोज ही देखने को मिल रहा है। यू.पी.का नोएडा तो जैसे आजकल गोली मारे जाने के लिए ही न्यूज़ मे आ रहा है।तीन दिन पहले ११ बजे रात मे एक एयर होस्टेस की तीन मोटर साइकिल सवार गोली मार कर हत्या कर देते है । अभी ये न्यूज़ ख़त्म भी नही हुई थी की दिल्ली मे गोली मारकर व्यापारी की हत्या करने की ख़बर आ गई।

अभी इन दो गोली मारे जाने की खबर आ ही रही थी की हरियाणा के दस साल के बच्चे की ख़ुद को गोली मारने की खबर आई।तभी दोपहर मे मुजफ्फर नगर मे एक कार मे एक लड़के और लड़की का मृत शरीर मिला और उन दोनों की मौत भी गोली लगने से हुई थी। अब ये हत्या थी या आत्महत्या ये तो पता नही।

कभी आर्मी के तो कभी पुलिस के जवान या तो ख़ुद को गोली मार लेते है या दूसरे को गोली मार देते है।

लगता है गन या पिस्तौल का लाईसेंस मिलना बड़ा आसान हो गया है तभी तो जिसे देखो गोली मारता फिरता है।पहले तो सुनते थे की बंदूक (गन या पिस्तौल ) का लाईसेंस बड़ी मुश्किल से मिलता था। पर आजकल तो हर किसी को लाईसेंस मिल जाता है।ऐसा लग रहा है। गन लेकर चलना भी अब स्टेट्स सिम्बल होता जा रहा है।यू.पी और एम.पी मे तो अक्सर हाई वे पर मोटर साइकिल पर सवार और बगल मे बड़ी सी राइफल लटकाए हुए लोग देखे जा सकते है।

Friday, April 11, 2008

आज सुबह से एक न्यूज़ आ रही थी जिसमे एक लड़की ने किसी राम कुमार पर रेप का आरोप लगाया । लड़की को सभी न्यूज़ चैनल पर दिखाया जा रहा था जिसमे उस लड़की की दो औरतें चप्पल से पिटाई कर रही थी। और कुछ उसी गली-मोहल्ले के लड़के हंस रहे थे ,ताली बजा रहे थे और यहां तक की नाच भी रहे थे। और इतने पर ही वे लड़कों शांत नही हुए बल्कि उन लड़कों मे से एक लड़के ने तो उस लड़की को पीछे से लात भी मारी ।और ये भी न्यूज़ मे बताया गया की उस लड़की की पिटाई पुलिस के सामने हो रही थी। पर पुलिस ने ना तो इस मार-पीट को रोकने की कोशिश की और ना ही उस लड़की को बचाने की।


आज कल हम इतने असम्वेदन शील कैसे होते जा रहे है ?
तकरीबन हर रोज इस तरह की कोई ना कोई घटना देखने को मिल जाती है।
पहले तो नही पर दोपहर बाद पुलिस ने उन लोगों के ख़िलाफ़ केस रजिस्टर कर लिया है।

Monday, April 7, 2008

कल जब कैबिनेट के मंत्रियों के मंत्रालयों का फेर बदल किया गया तो कुछ नए लोगों को मौका दिया गया है। अब पहले तो ये सुनने मे आ रहा था कि यंग लोगों यानी नवजवान पीढ़ी के नेताओं को मौका मिलेगा पर बाद मे सिर्फ़ दो ज्योतिरादित्य सिंधिया और जतिन प्रसाद को ही मंत्री पद मिला । सचिन पाइलेट का नाम भी सुनाई दे रहा था पर बाद मे सचिन को मंत्री पद नही मिला।और इससे गुर्जर लोग दुखी हो गए है। और फ़िर वही सब बड़े-बुजुर्गों को यानी ६० साल के ऊपर वालों को ही मंत्री बना दिया गया ।

एम.एस.गिल का नाम सुनकर तो एक बार को लगा की हॉकी की नईया डुबाने वाले को कैसे मंत्री बना दिया गया पर बाद मे याद आया कि वो तो के.पी.एस.गिल है।


अब जब नवजवान पीढ़ी के नेता को मौका दिया जा रहा था तो भला राहुल भइया के नाम पर विचार-विमर्श कैसे ना होता। अब मंत्री तो सोनिया अम्मा की मर्जी से ही लोग बनते है ना।पर राहुल ने भी साबित कर दिया की वो सोनिया अम्मा के पुत्र है अरे वही त्याग करके । यानी की राहुल ने मंत्री बनने से इनकार कर दिया।लो भाई अब मंत्री बनते तो काम नही करना पड़ता क्या। :) अभी-अभी तो राहुल भइया भारत की खोज पर निकले और खोज पूरी किए बिना कैसे वो मंत्री बन जाए।अभी तो उनके खेलने -खाने के दिन है। :) लगता है तारे जमीं पर नही देखी है।

अब मंत्री बनने पर कुछ लोग खुश होते है तो कुछ दुखी भी होते है।अब मणि शंकर ऐय्यर को खेल मंत्रालय जाने का दुःख है या कुछ और पर कुछ खीजे से टी.वी.पर दिख रहे थे। पर जब ऐय्यर साब ने अपने एक इंटरव्यू मे कहा था की उन्हें खेल मे ज्यादा दिलचस्पी नही है तो उन्हें तो खुश होना चाहिए की अब उन्हें खेल मंत्रालय का काम नही देखना पड़ेगा।

अब केवल ऐय्यर साब ही नही दुखी है यहां गोवा की असेम्बली के नेता भी दुखी है कि गोवा से किसी को भी मंत्री पद नही दिया गया। अब वो क्या है ना की यहां गोवा मे सिर्फ़ १० लोग ही मंत्री बन सकते है पर उम्मीदवार १२ है (वैसे तो पूरे के पूरे इक्कीस लोग मंत्री बनना चाहते है ) और इसीलिए रोज ही यहां की सरकार अब गिरी कि तब गिरी वाली हालत मे रहती है।और शायद इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष ने इन नेताओं को शायद ये आश्वासन दिया था की यहां से दो लोगों को केन्द्र सरकार मे मंत्री पद दिया जायेगा।जिससे यहां की सरकार का खतरा टल जाए।पर लगता है गोवा सरकार पर से खतरे के बादल अभी हटे नही है।

Saturday, April 5, 2008

अब है तो ये अजब-गजब शीर्षक पर इस पर लिखने का ख़्याल एक पुरानी फ़िल्म देखते हुए आया।अब आज के समय मे तो हर हीरोइन के कपड़े और हेयर स्टाइल मिलते-जुलते से रहते है। यहां तक की आज की नई हीरोइनों का डांस का स्टाइल भी बहुत कुछ करीब-करीब एक सा ही होता है

अब ६० और ७० के दशक की हीरोइनों का अपना एक अलग ही अंदाज या स्टाइल होता था बाल बनाने का। और उस समय की ज्यादातर हीरोइने उनके हेयर स्टाइल की वजह से भी जानी जाती थी।और हर हेयर स्टाइल पर हर हीरोइन का अपना अधिकार होता था यानी की ट्रेड-मार्क ।ये हीरोइने ज्यादातर अपने हेयर स्टाइल को ही अपनाती थी पर कभी-कभी हेयर स्टाइल बदल भी लेती थी।और गौर करने की बात ये ही की जो हीरोइने घोसला बनाती थी उनका भी अपना-अपना स्टाइल होता था।


मधुबाला-- इनका हेयर स्टाइल चाहे जैसा भी हो पर इनके चेहरे पर जुल्फे एक अलग अंदाज मे रहती थी। महल, और मुग़ल -- आजम।

साधना -- साधना का नाम याद आता है। माथे पर आगे की तरफ़ बाल छोटे-छोटे कटे हुए जिसे हमेशा साधना कट नाम से जाना गया। आरजू , एक फूल दो माली।
वहीदा रहमान -- सीधी मांग मे बाल कटे होते थे और जुल्फे बिल्कुल माथे पर चिपकी हुई सी और कभी उठी हुई
गाईड, प्यासा।
मीना कुमारी -- गालों पर जुल्फें होना। पाकीजा, कोहिनूर
शर्मीला टैगोर -- जो हमेशा बालों को एक हुड की तरह उठा कर चोटी करती थी। और जो चिडिया का घोसला के नाम से जाना जाता था। वक्त,आराधना
वैजन्ती माला -- ज्यादातर लम्बी छोटी और गालों पर जुल्फों का होना। कठपुतली, नया दौर।
नरगिस -- बहुत सलीके से बना हुआ जूडा और छोटी चोटी ,घुघराले से बाल रात और दिन, आवारा
माला सिन्हा --हलके से कान पर से पीछे की तरफ़ उठा कर बनाए गए बाल और थोडी बेतरतीब जुल्फें चेहरे पर प्यासा,गुमराह
नंदा-- हलके से घोसले के साथ पीछे की तरफ़ बंधे हुए बाल ही रखती थी। हम दोनों,जब-जब फूल खिले

सायरा बानो-- लम्बी सी चोटी छोटे से घोसले के साथ और अधिकतर दुपट्टे को हेयर बैंड की तरह इस्तेमाल करती थी पडोसन,जंगली
मुमताज-- अधिकतर छोटे कंधे तक बाल रखती थी।या एक अजीब से स्टाइल मे पीछे बांधकर कंधे पर लटकी हुई चोटी। आदमी और इंसान ,आप की कसम।
सिमी--या तो बिल्कुल छोटे कंधे तक के बाल या फ़िर लंबे खुले बालों मे होना इनकी पहचान थी। कर्ज,हाथ की सफ़ाई।
जया भादुडी-- तो अपने लंबे,घने और खुले बाल या फ़िर ढीली-ढाली सी चोटी के लिए मशहूर थी उपहार और अभिमान
नीतू सिंह-- सामने से कंधे तक कटे हुए और लंबे खुले बाल। कभी-कभी और खेल-खेल मे


पर बाद मे धीरे-धीरे ये चलन ख़त्म सा होने लगा और आज तो किसी भी हीरोइन का कोई ट्रेड मार्क हेयर स्टाइल नही है।क्या आपको आज की किसी हिरोईन का हेयर स्टाइल याद है नही ना

क्यों है ना हमारा शोध तारीफ के काबिल। :)

नोट--अरे ये शोध भी इसलिए हो पाया क्यूंकि पिछले - दिन से हम कमर दर्द की वजह से आराम जो फरमा रहे थे


Wednesday, April 2, 2008

गोवा मे शनिवार २९ मार्च को शिगमोत्सव फेस्टिवल का आयोजन किया गया थाकार्निवाल की ही तरह शिगमोत्सव मे भी गोवा पूरी मस्ती मे डूब जाता हैपर कार्निवाल और शिगमोत्सव मे बहुत फर्क है कार्निवाल मे जहाँ मौज-मस्ती और फन होता है और उसमे गोवा की एक वेस्टर्न झलक दिखती है तो वहीं शिगमोत्सव मे मौज-मस्ती तो रहती है पर इस फेस्टिवल गोवा की पारंपरिक और धार्मिक झलक देखने को मिलती हैशिग्मो की परेड मे ,फैंसी ड्रेस,फ्लोट और डांस सब कार्निवाल से बिल्कुल अलग होते है। ये शिग्मो परेड करीब - घंटे चलती हैशाम .३० बजे शुरू होकर १०-१०.३० तक ख़त्म होती है



शिग्मो मे भी परेड निकाली जाती हैइसमे भी लोग नाचते-गाते है और फ्लोट निकालते है इसके अलावा कुछ लोग फैंसी ड्रेस मे भी रहते हैफैंसी ड्रेस मे कोई भगवान विष्णु तो कोई नारद बना थातो कोई साई बाबा तो कोई जादू-टोने वाला तांत्रिकऔर कोई मंगल पान्डेतो कोई रावण बना थाऔर रावण बेस्ट लगा थापर रावण की फोटो रात होने और मोबाइल से खींची होने के कारण ज्यादा क्लीयर नही हैरावण ने सीता हरण को दिखाया था जिसमे उसने अपनी पीठ पर गरुण को लगा रक्खा था और सीता का एक पुतला साथ ले कर चल रहा थायहां तक की शिगमोत्सव की फ्लोट मे भी ज्यादातर धार्मिक झलक मिलती हैजैसे शिव-पार्वती ,राम-सीता,गणेश जी,हनुमान जी ही फ्लोट के मुख्य आकर्षण थेइस शिग्मो मे कोम्पतिशन होता है ग्रुप डांस ,फ्लोट ,और इन्दिविजुअल का परेड के शुरू करने के पहले पूजा की जाती है और फ़िर पटाखे चलाये जाते हैऔर बाकायदा बिगुल सा बजाया जाता है और परेड की शुरुआत बैंड-बाजे के साथ होती हैमिलिंद गुनाजी इसमे अतिथि के रूप आमंत्रित थेबाईं ओर काले कुरते मे और दाहिनी ओर महिलायें नृत्य करती हुई

शिग्मो जैसा की इसे आम बोल चाल मे कहा जाता है मुख्य रूप से जाते हुए जाड़े और गर्मी के स्वागत के रूप मे मनाया जाता है। ये फेस्टिवल मुख्य रूप से किसानों और गोवा के ग्रामीण इलाके की झलक दिखलाता है।इस फेस्टिवल की शुरुआत होली के दिन से होती है इसीलिए इसे होली के त्यौहार के रूप मे भी मनाया जाता है।यानी गुलाल खेला जाता है।

इस फोटो मे बच्चे शिवाजी बने हैजो मराठा समय को दर्शा रहे है।




साथ ही कुछ विडियो भी लगा रहे है।ज्यादा बड़े नही , एक-डेढ़ मिनट के है।लोड होने मे थोड़ा समय लग सकता है।


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Tuesday, April 1, 2008

पहली एप्रैल यानी एक-दूसरे को बुद्धू बनाने का दिन है और इस एक दिन का भी अपना ही मजा होता है। अब बचपन मे और बाद मे यूनिवर्सिटी के दिनों मे हम लोग घर मे एक-दूसरे को और स्कूल मे दोस्तों को एप्रैल फूल बनाते थे। धीरे-धीरे बड़े होते गए और अब तो एप्रैल फूल बस एक तारीख की तरह ही आती है और चली जाती है।

अब जब छोटे थे तब घर मे तो एप्रैल फूल बनाने का सबसे आम तरीका होता था फ़ोन का रिसीवर उठाकर दीदी या भइया को कहना की तुम्हारा फ़ोन आया है।और जैसे ही वो फ़ोन पर हेलो बोलते की हम जोर से गाते एप्रैल फूल बनाया ।

स्कूल मे दोस्तों को एप्रैल फूल बनाने मे भी खूब मजा आता था । कभी किसी को कहते की तुम्हे क्लास टीचर ने बुलाया है। तो कभी कोई हमे कहता की तुम्हे इंग्लिश टीचर ने बुलाया है। और ऐसे मे कई बार सच मे भी टीचर बुलाती तो भी लगता था की कहीं हम एप्रैल फूल ना बन जाए।

उफ़ अब तो यादें ही रह गई है एप्रैल फूल की। वो भी क्या दिन थे।अब तो ऐसे मजाक से छोटे बच्चे भी बुद्धू नही बनते है। पर ऐसे ही कल नेट पर सर्फ़ करते हुए मजेदार साईट मिली जिसमे एप्रैल फूल बनाने के कुछ मजेदार तरीके लिखे हुए थे । पहले तो हमे लगा कि आप लोग इसे एप्रैल फूल का मजाक ना समझे पर फ़िर सोचा क्यों ना इस पर अपनी एक पोस्ट ही लिख दे ।