Saturday, April 12, 2008

ये कल्लू मामा वाला गाना आज के समय मे चारों तरफ़ दिखाई दे रहा है। क्या यू.पी.क्या बिहार,क्या मुम्बई और क्या दिल्ली। बस दो गोली और सामने वाला ढेर।गोली मारने वाले को तसल्ली की उसने अपना हिसाब चुका लिया।

पहले तो हिन्दी फिल्मों मे जितना खून-खराबा देखने को मिलता था उतना तो अब आम जिंदगी मे रोज ही देखने को मिल रहा है। यू.पी.का नोएडा तो जैसे आजकल गोली मारे जाने के लिए ही न्यूज़ मे आ रहा है।तीन दिन पहले ११ बजे रात मे एक एयर होस्टेस की तीन मोटर साइकिल सवार गोली मार कर हत्या कर देते है । अभी ये न्यूज़ ख़त्म भी नही हुई थी की दिल्ली मे गोली मारकर व्यापारी की हत्या करने की ख़बर आ गई।

अभी इन दो गोली मारे जाने की खबर आ ही रही थी की हरियाणा के दस साल के बच्चे की ख़ुद को गोली मारने की खबर आई।तभी दोपहर मे मुजफ्फर नगर मे एक कार मे एक लड़के और लड़की का मृत शरीर मिला और उन दोनों की मौत भी गोली लगने से हुई थी। अब ये हत्या थी या आत्महत्या ये तो पता नही।

कभी आर्मी के तो कभी पुलिस के जवान या तो ख़ुद को गोली मार लेते है या दूसरे को गोली मार देते है।

लगता है गन या पिस्तौल का लाईसेंस मिलना बड़ा आसान हो गया है तभी तो जिसे देखो गोली मारता फिरता है।पहले तो सुनते थे की बंदूक (गन या पिस्तौल ) का लाईसेंस बड़ी मुश्किल से मिलता था। पर आजकल तो हर किसी को लाईसेंस मिल जाता है।ऐसा लग रहा है। गन लेकर चलना भी अब स्टेट्स सिम्बल होता जा रहा है।यू.पी और एम.पी मे तो अक्सर हाई वे पर मोटर साइकिल पर सवार और बगल मे बड़ी सी राइफल लटकाए हुए लोग देखे जा सकते है।

12 Comments:

  1. अतुल said...
    सामंती चरित्र का प्रमाण है यह बदूक संस्कृति.
    mahendra mishra said...
    ममता जी
    कुछ जगहों मे बंदूक रखना शान माना जाता है भलाई पास मे खाने को कुछ न रहे .
    Kirtish Bhatt, Cartoonist said...
    चलिए इस महंगाई के दौर में आपने कुछ सस्ती होती (इंसान की जान) चीजों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया.
    इष्ट देव सांकृत्यायन said...
    वैसे सरकार एक और इंतजाम बना रही है, बिना गोली के भी मारने के. महंगाई देवी. ये भी भेजे में ही मार रही हैं.
    दिनेशराय द्विवेदी said...
    ममता जी, गोलियाँ सस्ती पड़ रही हैं खाने-पीने की वस्तुओं के मुकाबले।
    mehek said...
    badi mushkil se milta hai manushya ka janam,itni khubsurat zindagi ko khatam karte waqt kisike haah aur ruh kapte nahi hai kya?,wo bhi chote chote bachhe,,bas tv par khabare dekhi thi,koi haal hai iska,pata nahi....
    Gyandutt Pandey said...
    सही है जी - खून सस्ता है, खाना मंहगा।
    DR.ANURAG ARYA said...
    mamta ji
    kuch logo ke liye gan rakhna unke badapan ki nishani hai aor kai young ladko ke liye mard banne ki ....vaise bhi aajkal tolerence power kam hai logo ki.jara jara bat pe bhadak jate hai.
    राज भाटिय़ा said...
    ममता जी, यह सब हमारे कर्मो का ही फ़ल हे जेसा हम वो रहे हे , वो सब सामने आ रहा हे,अगर हम बच्चो को अच्छी शिक्षा देगे तो बच्चे अच्छे बने गे,गलत शिक्षा का फ़ल आप सब देख रहे हे.
    अजित वडनेरकर said...
    कुछ उपाय नहीं है इसका। ग़नीमत है कि हमारे यहां हथियार पश्चिमी देशों की तरह खुलेआम नहीं बिकते।
    कुश एक खूबसूरत ख्याल said...
    भाटिया साहब से सहमत हू.. शिक्षा ही समाज से बुराई मिटा सकती है.. परंतु आजकल तो शिक्षा भी निजी संस्थानो में ऊँचे दामो पर बिकने लगी है.. तो क्या किया जाए..
    दीपक भारतदीप said...
    ममता जी
    आप फिल्मों का देखकर थोडा चिंतन करें तो आपको यह अनुमान लग जायेगा कि किस तरह वह इस देश में मूर्खों और डरपोक लोगों की फौज खड़ी करना चाहते हैं.
    दीपक भारतदीप

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