Wednesday, October 31, 2007



केक देखकर तो आप समझ ही गए होंगे की हम इतने दिनों तक क्यों गायब थे। वो क्या है ना कि इसी अक्तूबर को हमारी शादी के पच्चीस साल पूरे हुए है।

Thursday, October 4, 2007

खिलाड़ी किस लिए खेलते है देश के लिए ,अवार्ड के लिए,या अपने लिए ?

जब से भारत ने twenty-२० विश्व कप जीता है और जब से इस यंग टीम इंडिया पर इनामों की बौछार हुई है लगता है सारे देश के हर खिलाड़ी को वो चाहे कोई भी खेल खेलता हो उन्हें कुछ परेशानी सी होने लगी है। अब वो चाहे हॉकी की टीम हो या चाहे शतरंज के विश्व चैम्पियन हो या चाहे billiards के विश्व चैम्पियन हो और चाहे गोल्फ के चैम्पियन हो। हर किसी को लग रहा है कि उनके साथ राज्य सरकारों ने और लोगों ने वैसा व्यवहार नही किया जैसा कि टीम इंडिया के साथ किया है।वैसे एक तरह से उनका रोष सही भी है क्यूंकि भला कितने लोग जानते है कि जीव मिल्खा सिंह गोल्फ खेलते है या पंकज आडवाणी billiards खेलते है।

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसे ना केवल लड़के और आदमी ही देखते -सुनते है बल्कि बच्चे महिलाएं और ये कहना अतिशयोक्ति नही होगी कि हर कोई देखता है और सुनता है। क्रिकेट के लिए लोगों मे एक जुनून सा है। जिससे हम सब बड़ी ही अच्छी तरह से वाकिफ है।ऐसा नही है कि क्रिकेट के प्रति लोगों का झुकाव अभी हुआ है बल्कि आज से क्या जब से याद है देश मे क्रिकेट के प्रति लोग पागल ही रहे है और ऐसा पागलपन और दीवानगी किसी और खेल के प्रति नही देखी गयी है। अब इसे क्रिकेट का भाग्य ही कहा जा सकता है। अगर टीम इंडिया अच्छा खेलती है तो लोग सर आंखों पर् बिठाते है पर् जब यही टीम इंडिया खराब खेलती है तो लोग एक मिनट भी नही लगाते है इनकी आलोचना करने मे।और हम भी इससे अछुते नही है। अभी हर दुसरे खेल को खेलने वाले खिलाड़ी को टीम इंडिया के इनाम दिख रहे है पर् हारने पर टीम इंडिया क्या उनके घरवालों को भी लोग नही छोड़ते है ।क्यूंकि क्रिकेट से हर कोई अपने को जुडा हुआ महसूस करता हैपर् क्या किसी और खेल के खिलाड़ियों के अच्छा ना खेलने पर् लोग उनके घरवालों को या खिलाड़ियों को परेशान करते है


जब टीम इंडिया के हर खिलाड़ी को बी.सी.सी.आई. ने और हर राज्य सरकार ने इनाम कि घोषणा की तो हॉकी की टीम ने भूख हड़ताल की बात करी। और क्रिकेट और हॉकी के साथ सौतेला व्यवहार करने की बात भी कही।



अभी दो-तीन दिन पहले ही शतरंज मे विश्वनाथन आनंद दूसरी बार world चैम्पियन बने है और उन्होने ये कहा है की अब जब वो भारत आएंगे तो वो ये देखना चाहते है की यहां भारत मे उनका किस तरह से स्वागत किया जाता है।पर् शायद आनंद ये भूल गए है की जब वो पहली बार world चैम्पियन बने थे तो सारे देश ने उनका स्वागत किया था ।



पंकज आडवाणी चार बार billiards के world champion रह चुके है। और अभी हाल ही मे कर्नाटक सरकार ने उन्हें एकलव्य पुरस्कार देने की घोषणा की थी पर् पंकज ने ये कहकर अवार्ड लेने से इनकार कर दिया की जब उन्हें राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड और अर्जुन अवार्ड मिल चुका है और अब ये अवार्ड too little and too late।


गोल्फ खेलने वाले जीव मिल्खा सिंह को भी इस बात से शिक़ायत है की आख़िर टीम इंडिया को इतने इनाम क्यों दिए जा रहे है।यूं उनका कहना सही भी है कि हॉकी को बढावा दिया जाना चाहिऐ। क्यूंकि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है।


पर् यहां सबसे बड़ा सवाल ये है की क्या पैसा ही सब कुछ है। क्रिकेट जिसे शायद हर अमीर और गरीब व्यक्ति वो चाहे गली-मोहल्ले मे रहता हो या चाहे आलिशान महल मे रहता हो वो क्रिकेट खेल सकता है।अच्छे से अच्छे और महंगे से महंगे बल्ले से भी क्रिकेट खेला जा सकता है और सस्ते से बल्ले से भी। पर् क्या कोई आम आदमी गोल्फ या billiards खेल सकता है।

Tuesday, October 2, 2007

भाई इसे कहते है विज्ञान की तरक्की। क्या कभी किसी ने सपने मे भी सोचा था की कभी पारदर्शी मेढक भी होगा। हम तो हमेशा से मोटी खाल वाला भूरा -हरा सा मेढक देखते आये है। पर आज के समय मे कुछ भी असंभव नही है फिर भला पारदर्शी मेढक होना भी कहॉ असंभव है।जो दुनिया मे कोई सोच नही सकता उसे जापानियों ने कर दिखाया।

पारदर्शी मेढक बनाने जैसा अनूठा कारनामा जापान के शोध कर्ता मसयुकी सुमिदा (masayuki sumida) ने कर दिया है। और ऐसे पारदर्शी मेढक क्यों बनाए तो इसके लिए उनका कहना है की जो विद्यार्थी जीव विज्ञान पढते है और जिन्हे जीवों मे विभिन्न ओर्गंस को समझने के लिए मेढक का dissection करना पड़ता है क्यूंकि स्कूल मे dissection की शरुआत मेढक और केंचुए से ही कराई जाती है ।


अब कम से कम जापान मे मेढक को चीर-फाड़ करने की जरुरत नही है क्यूंकि अब उसकी ऊपर की खाल इतनी पतली है की अगर उसे लाइट के सामने रखे तो उसके शरीर के सारे ओर्गंस देखे जा सकते है। और ये भी देखा जा सकता है की किस तरह के बदलाव इन tadpoles मे आते है जब ये मेढक बनते है। जिससे मेढक के ओर्गंस को समझना भी आसान और शायद कुछ हद तक दिलचस्प भी होगा।

काश तीस साल पहले ऐसे मेढक होते तो हमारी दीदी को अपनी जीव विज्ञान की क्लास के लिए ब्रिजवासी (हम लोगों का सेवक)को हर समय मेढक पकड़ने के लिए दौड़ना ना पड़ता। :)