Wednesday, November 14, 2007

ये अभी हाल ही मे रिलीज हुई पिक्चर का नाम है।वैसे हमने इसे हॉल मे नही बल्कि घर पर देखी है।क्यूंकि इससे पहले की हम इसे देखते ये पिक्चर हॉल से चली गयी। आज कल जहाँ नाच-गाने से भरपूर फिल्में बन रही है वहीं ये फिल्म धरातल से जुडी लगती है। इसकी कहानी पूरी तो नही पर हाँ थोडी सी बता देते है । इस फिल्म मे कहानी अभय देओल जो की एक इंजीनियर है और साथ-ही साथ एक लेखक भी है और जासूसी का शौक भी रखते है, उनके ही इर्द-गिर्द घूमती है कि किस तरह वो एक हत्या के मामले मे फंस जाते है।और किस तरह वो उससे बाहर निकलते है।

अभय देओल और गुल पनाग दोनो ने ही अच्छी एक्टिंग की है।गुल पनाग जो वैसे तो ज्यादा फिल्मों मे दिखाई नही देती है पर इसमे अभय देओल की पत्नी के रोल मे अच्छा काम किया है। और अभय देओल ( जिसकी हमने इससे पहले कोई भी पिक्चर नही देखी थी )ने अपने मार-धाड़ वाले भाइयों (सनी और बॉबी ) के बिल्कुल विपरीत रोल किया है। और काफी नैचुरल एक्टिंग की है। और बाक़ी के कलाकारों जैसे सारिका विनय पाठक,कुलभूषण खरबंदा, आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है।

वैसे ये पिक्चर ज्यादा नही चली है क्यूंकि ये ना तो पूरी तरह कमर्शियल पिक्चर है और ना ही आर्ट सिनेमा है। पर फिर भी देखने लायक है।क्यूंकि आज के दौर मे जहाँ बडे-बडे सेट लगाए बिना फिल्म ही नही बनती है वहां इस फिल्म मे एक भी सेट देखने को नही मिलता है। सारी शूटिंग राजस्थान की है। डायलॉग बहुत ही साधारण आम बोल-चाल वाली भाषा के है।

3 Comments:

  1. Lavanyam - Antarman said...
    ममता जी,नाम सुनकर ही फिल्म के बारे मेँ तरह तरह के विचार आते हैँ अच्छा हुआ आपने इतनी सुलझी हुई समीक्षा लिख दी -
    मीनाक्षी said...
    सरल सहज रूप में की गई समीक्षा को पढ़ कर लग रहा है कि अब हमें भी यह फिल्म डाउनलोड करके देखनी चाहिए.
    धन्यवाद...
    ????????????? ??????? ?? ???? ?????????? said...
    वाकई समीक्षा में जान है । दरअसल अच्छी समीक्षाएँ ही मनुष्य या कलाप्रेमी में कला के प्रति अनुराग या विराग जगाती हैं । मनुष्य को इस तरह से नियंत्रित करती है । समीक्षा कार्य सामाजिक नियंत्रण का कार्य भी है इस नाते एक सामाजिक सरोकार वाला कर्म भी है । आप इस कर्म में सिद्ध जान पड़ती है । क्या आप www.srijangatha.com पर कुछ कलात्मक सिनेमा को लेकर लिख सकती हैं । ई-मेल दीजिएगा । सादर

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