Tuesday, July 10, 2007

गरमी की छुट्टियाँ जिंदगी मे एक अलग ही मायने रखती है। हम चाहे किसी भी उम्र के हो पर गरमी की छुट्टियों का बड़ी बेसब्री से इन्तजार करते है। जब हम छोटे थे तो गरमी की छुट्टियों का बहुत इन्तजार करते थे क्यूंकि इन्ही छुट्टियों मे हम नानी के घर फ़ैजाबाद जाते थे .और अगर नानी के घर नही गए तो या तो कोई ना कोई मौसी या मामा इलाहाबाद आ जाते थे या फिर हम लोग जाते थे। और जहाँ सारे मौसी-मामा के परिवार इकट्ठा हुए और सबके बच्चे तो किसी और की जरूरत ही नही रहती थी अरे मतलब कम से कम पांच बच्चे तो होते ही थे। और हमारी मम्मी सात भाई-बहन थे तो आप अंदाजा लगा ही सकते है। पर जो भी हो उतने सारे लोगों मे जो मौज-मस्ती और लड़ाई -झगडे होते थे की मम्मी और मौसी लोग कई बार परेशान हो जाती थी और कई बार हम लोग को कहा जाता था की अगर तुम लोग झगड़ा करा करोगे तो हम लोग एक साथ नही आया करेंगे। बस उन के इतना कहते ही हम सब बिल्कुल अच्छे बच्चों की तरह मिल जाते थे.पर ज्यादा देर नही। हमारी और छोटी मौसी की बेटी नंदा जो हमसे दो साल छोटी थी ,हम दोनो का आपस मे ख़ूब युद्घ होता था और दोस्ती भी बहुत रहती थी। अब युद्घ तो नही होता है पर दोस्ती आज भी है।


ऐसा नही था की तब गरमी कम पड़ती थी तब ना तो a.c.था और ना ही टी.वी.और कंप्यूटर पर तब हम लोग दिन मे ताश खेला करते थे और हम लड़कियों का तो मम्मी लोगों की साड़ी पहनना ही पसंदीदा काम होता था। जहाँ मम्मी की आंख लगी अरे मतलब की सोई , की चुपके से साड़ी निकाल कर हम सब तैयार।

ताश खेलना तो कई बार मुश्किल हो जाता था क्यूंकि हर कोई खेलना चाहता था पर कोट पीस मे तो सिर्फ चार लोग ही खेलते थे और अगर बडे खेल रहे हो और छोटों को ना खिलायें तो भी मुसीबत। नानी हम सब छोटे बच्चों को अपने पास बुलाकर कहानी सुनाया करती जिससे की और लोगों को हम लोग तंग ना करें। पर कहानी मे भी कई बार लफड़ा हो जाता था क्यूंकि अगर हम लोग नानी से दिन मे कहानी सुनाने को कहते तो नानी बडे प्यार से हम बच्चों को ये कहकर टाल देती कि अगर दिन मे कहानी सुनोगे तो मामा घर का रास्ता भूल जायेंगे ।

jeep मे अयोध्या घूमने जाना आज भी याद है उस समय अयोध्या मे आज की तरह के हालात नही थे आराम से जाओ घूमो और भगवान के दर्शन करो।नानी के यहां सत्तू पीने और खाने का भी बड़ा रिवाज था वो कहती थी की सत्तू ठंडक देता है और लू से भी बचाता हैगरमी मे खाने की बात हो और आम का जिक्र ना आये ऐसा तो हो ही नही सकताऔर आम भी बाजार के नही नाना के बगीचों के आम और बहुत बार तो हम लोग खुद बाग़ मे जाकर आम तोड़ते थेकई बार क्या बचपन मे तो अक्सर ही कच्चे आम खाने से दाने हो जाते थेपर कच्चे आम खाने से बाज नही आते थे


गरमी की रात मे सभी लोग छत पर अन्ताक्षरी खेला करते थे और अन्ताक्षरी एक ऐसा खेल है जिसे हर कोई चाहे वो बड़ा हो या बच्चा खेल सकता था। बहुत बार मौसी और मामी ,मामा भी खेलते थे पर वो लोग आपस मे बात करना ज्यादा पसंद करते थे तब हमे लगता था की आख़िर मम्मी लोग इतनी क्या बातें करते है पर बाद मे माने अब जब हम सब की शादी हो गयी है और अब हम सब भाई-बहन जब भी मिलते है तो बातें करना ज्यादा अच्छा लगता है।और गरमी की छुट्टियाँ किस तरह बीत जाती पता ही नही चलता था

5 Comments:

  1. Lavanyam -Antarman said...
    Mamta ji,
    Bahut achcha laga apke Nanihal ka ye Sansmaran padh ker -- Kaafi chahtee hoon , ki ye tippni , Angrezi mei kar rahee hoon.
    Sa -sneh,
    - Lavanya
    Udan Tashtari said...
    बढ़िया संस्मरण है. सभी के साथ इस तरह की ढ़ेरों यादें जुड़ी होती है जो वक्त वक्त पर याद आती हैं. शब्द रुप दे दिया, अच्छा लगा.
    Shrish said...
    अच्छा संस्मरण है। बीता वक्त लौट के नहीं आता, बस यादें रह जाती हैं।
    ratna said...
    ननिहाल यानि सुन्दर सपना।
    उन्मुक्त said...
    बचपन के दिन भी क्या दिन थे।

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