यादोंके झरोखों से...जब हमने खाना बनाया

यूं तो ये बहुत पुरानी बात है पर आज भी इस बात को याद कर हंसी आ जाती है।हम यही कोई छे-सात साल के रहे होंगे। घर मे हमेशा नौकर रहते थे तो इसलिये काम करने की कभी जरूरत ही नही पड़ती थी और जब नौकर छुट्टी जाता था (हर साल गरमी मे कम से कम एक महीने के लिए ) तो मम्मी और जिज्जी लोग किचन संभल लेती थी। देखा छोटे होने का फायदा है ना ,और वैसे भी हम इतने छोटे थे कि किचन मे जाने और खाना बनाने का सवाल ही नही उठता था। हालांकि पापा को हम मे से किसी का भी किचन मे जाना पसंद नही था। यहां तक की मम्मी का भी पर गरमी मे इससे बचने का कोई उपाय भी तो नही था।

उन दिनों मम्मी के कान मे बहुत तकलीफ रहती थी तो डाक्टर ने कहा था की ऑपरेशन करना जरूरी है और इसके लिए कुछ दिन मम्मी को हॉस्पिटल मे रहना पड़ेगा। अब जब डाक्टर ने कह दिया कि ऑपरेशन के बिना कान का दर्द ठीक होना मुश्किल है तो पापा भी तैयार हो गए। यूं तो उस समय मेडिकल कालेज के प्राइवेट वार्ड मे ख़ूब अच्छा और बड़ा कमरा जिसमे छोटा सा बरामदा और किचन भी होता था , पापा ने मम्मी के लिए ऐसा ही एक प्राइवेट वार्ड ले लिया था और वो प्राइवेट वार्ड हम लोगों का सेकेंड होम मतलब घर ही हो गया था। आधे से ज्यादा समय हम लोग वहीँ रहते थे।

ऑपरेशन हो गया तो ये हुआ कि अब तो कुछ दिन मे घर चले जायेंगे पर मम्मी को ऑपरेशन के बाद भी परेशानी हो रही थी तो डाक्टर ने कुछ और दिन हॉस्पिटल मे रुकने को कहा। ऐसे ही एक दिन की बात है सभी लोग हॉस्पिटल गए हुए थे और हमारा नौकर भी । आम तौर पर नौकर हॉस्पिटल से घर जल्दी आ जाता था पर उस दिन कोई भी घर नही लौटा था। घर मे हम और हमसे बड़ी दीदी गुड्डी जो की हमसे दो साल बड़ी है ही थे और शायद रात के सात-आठ बज रहे थे और हम लोगों को भूख भी लग रही थी तो हम दोनो ने सोचा की जब तक सब लोग आते है क्यों ना हम दोनो ही खाना बना ले। और हम दोनो ने ये तय किया कि चावल और दाल बना लेते है क्यूंकि हम दोनो को लगा कि सबसे आसान यही होता है।पर हमे क्या मालूम था कि खाना बनाना कोई बच्चों का खेल नही है। उन दिनों खाना चूल्हे पर ही बनता था सो हम दोनो बहने चूल्हा जलाने लगे पर हम लोग चूल्हा ही नही जला पा रहे थे,हम लोग चूल्हा जलाने के लिए चूल्हे मे अखबार पे अखबार डालते जा रहे थे । आख़िर मे किसी तरह चूल्हा तो जला पर ख़ूब धुँआ हो रहा था जिसकी वजह से हम दोनो कि आंखों से पानी गिर रहा था और हमे लग रहा था की खाना बनाना कोई बच्चों का खेल नही है और ये भी की खाना बनाना किसी मुसीबत से भी कम नही है। और ऐसे ही आँसू बहाते हुए हमने गुड्डी से कहा कि खाना बनाना इतना मुश्किल काम है तो मैं तो किसी ऐसे आदमी से शादी करूंगी जो मुझे रोज होटल मे खाना खिलाये और मुझे खाना ना बनाना पड़े। और गुड्डी सिर हिला-हिला कर मेरी बात का समर्थन कर रही थी।तभी बडे जोर से हंसने कि आवाज आयी तो पीछे मुड़ कर देखा तो पापा और जिज्जी लोग खडे थे। हम दोनो खाना बनाने और अपनी बातों मे इतने मशगूल थे कि हमे पता ही नही चला कि कब पापा लोग आ गए थे।

और उस समय की कही बात सच हो गयी है।

Comments

notepad said…
और उस समय की कही बात सच हो गयी है।
********

तो क्या हम यह समझे कि आपने रोज़ होटल मे खना खिलाने वाला पति पा लिया है । या पति होटल ही का मालिक है :)
मैं भी सुजाताजी वाली बात ही पूछने वाला था पर ब्लॉगर की मेहरबानी से उन्होने पहले पूछ लिया। :)

कभी हमने भी खाना बनाने की कोशिश की थी।
RC Mishra said…
खाना-बनाना, बहुत ही सरल कार्य है। हम सालों से बना रहे हैं, कभी कोई मुश्किल नही आयी :)।
Udan Tashtari said…
और उस समय की कही बात सच हो गयी है।

---बतायें?? सुजाता जी कुछ पूछ रहीं हैं.

-वैसे ऐसे ही पुराने संस्मरण खूब सुनाईये. खाना तो बनाना नहीं है...खूब लिखते जायें. हमें तो खाना भी बनाना है, बीच बीच में पढ़ते रहेंगे. :)
mamta said…
सुजाता जी,नाहर जी ,बिल्कुल नही हमारे पति किसी होटल के मालिक नही है । पर हाँ हम होटल मे खाना तो जरूर खाते है ।
और हाँ अब तो हमने भी पाक कला मे कुछ महारत हासिल कर ली है वो कैसे तो हम आगे कभी जिक्र करेंगे।

मिश्रा जी ये जानकार अच्छा लगा की आपको खाना बनाना सरल कार्य लगता है ।

समीर जी ब्लॉगिंग शुरू ही इसीलिये की है।
Shrish said…
शीर्षक से ऐसा प्रतीत होता है जैसे आप कभी खाना नहीं बनातीं। :)

संस्मरण मजेदार रहा।

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