Tuesday, April 24, 2007

आज के अखबार मे खबर थी कि अब से कक्षा १० के विद्यार्थियों को ये विकल्प दिया जाएगा कि यदि वो चाहे तो दसवी की परीक्षा दे या चाहे तो सीधे बारहवी की परीक्षा दे । दो साल के समय मे विद्यार्थी जब चाहे मतलब अपनी तैयारी के हिसाब से परीक्षा दे सकता है। ये कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिये किया जा रहा है जिससे बच्चों पर ज्यादा बोझ ना पडे । पर हमारे ख़्याल से ऐसा करने से बच्चों मे पढने के प्रति रूचि कम भी हो सकती है क्यूंकि उन्हें ये लगेगा कि अभी तो दो साल का समय है बाद मे पढ़ लेंगे। जिन बच्चों को पढना होता है वो वैसे भी पढ़ लेते है।

बोर्ड का हौवा ख़त्म करने और बच्चों मे anxiety को कम करने के लिए ये किया जा रहा है। पर क्या ये ठीक है ?
हमे लगता है कि थोड़ी बहुत anxiety होना भी अच्छा होता है क्यूंकि anxiety एक ह्यूमन नेचेर है जिसका इन्सान मे होना बहुत जरूरी है। बच्चों मे anxiety को कम किया जा सकता है अगर अभिभावक चाहे तो क्यूंकि बच्चों से ज्यादा तो माँ-बाप मे anxiety होती है कि उनके बच्चे का कितना परसेंट आएगा। और देखा जाये तो एक तरह से माँ-बाप ही बच्चों पर ज्यादा दबाव बनाते है।

जब हमारा बड़ा बेटा १०वि का इम्तहान दे रहा था उस समय हिस्ट्री के एक-एक chaptar कम से कम ३०-४० पन्ने के होते थे साथ ही जिओग्रफी ,सिविक्स ,और इकॉनोमिक्स की अलग-अलग किताबें होती थी और वही छोटे बेटे के समय मे हिस्ट्री विषय को बिल्कुल ही बदल दिया गया मतलब आसान कर दिया गया। पहले हिस्ट्री मे indian ,modern ,medival सब पढ़ते थे वही बाद मे हिस्ट्री मे कुछ ८-१० chapter (१० पन्ने हर chapter के)और जिओग्रफी ,सिविक्स, इकॉनोमिक्स सब एक ही किताब मे था। कहने का मतलब है की अभी २-३- साल पहले से ही बोर्ड का हौवा ख़त्म करने का प्रयत्न किया जा रहा है ।

अगर इसी तरह बोर्ड धीरे -धीरे इतना आसान होता जाएगा तो इससे बच्चो मे प्रतिस्पर्धा की भावना भी ख़त्म हो सकती है। यूं तो अब ये भी फैसला किया जा रहा है कि किसी भी बच्चे को फेल नही किया जाएगा । पर ऐसा करके बच्चों को हम मेहनत ना करने का संदेश देंगे क्यूंकि जब बच्चे को ये डर ही नही होगा कि वो फेल भी हो सकता है तो उसे पढने के लिए कहना भी माँ-बाप के लिए मुश्किल हो जाएगा।

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