Friday, April 20, 2007

बारतांग भी पोर्ट ब्ल्येर से दो घंटे की दूरी पर है। वहां जाने के दो साधन है या तो आप बोट से जाये या फिर सड़क से। बोट से जाने मे ४से ५ घंटे लग जाते है जबकि अगर कार या बस से जाएँ तो २ घंटे मे पहुंच जाते है। सड़क का रास्ता इसलिये भी अच्छा है क्यूंकि इसमे जंगल पार करना पड़ता है और इसी जंगल के रास्ते मे जारवा भी मिलते है । जिरका टांग से काफिले की तरह जाना पड़ता है जिसमे सबसे आगे बस मे फॉरेस्ट गार्ड बैठता है और कारों मे भी गार्ड बैठता है जिससे जारवा कोई गाड़ी ना रोक सके। यूं तो अब जारवा पहले की तरह नही है कि देखते ही तीर मार दे पर अभी भी अगर वो गाड़ी रोक ले तो जरा मुश्किल हो जाती है । वैसे अब वो लोग कुछ-कुछ हिंदी भी समझ लेते है और कुछ छोटे-छोटे शब्द भी बोलते है जैसे पान ,बिस्किट , खाना , पैसा वगैरा। अब तो कई बार वो लोग जंगल से जड़ी-बूटी , सुपारी लाते है और दुकानों मे बेचते है और बिस्किट, पान वगैरा खरीदते है। जारवा लड़कियों को सजने का बहुत शौक़ होता है और उन्हें लाल,नीला रंग पसंद है कहने का मतलब है कि उन्हें bright colours पसंद आते है । ज्यादातर महिलाएं गले मे और सिर पर कुछ ना कुछ जरूर पहने रहती है। इनके बच्चे अलग-अलग तरह से अपने चेहरे को रंग कर रखते है।


पूरे एक घंटे लगते है जंगल ार करने मे और जैसे ही जंगल ख़त्म होता है क्रीक जाती है जिसे ferry के द्वारा पार करना होता है। पर कई बार यहाँ बहुत समय लग जाता है क्यूंकि वहां २ ferry ही चलती है। बारातांग भी बहुत ही छोटी सी जगह है । यहाँ पर p.w.d का एक छोटा सा गेस्ट हाउस है , वैसे पर्यटक लोग तो सुबह जाते है और शाम को पोर्ट ब्लैयेर वापस चले जाते है क्यूंकि वहां इतनी जगह ही नही है कि इतने लोग वहां ठहर सके।

सबसे पहले limestone caves देखने जाना चाहिऐ क्यूंकि दोपहर के बाद उसे बंद कर देते है। यूं तो केव छोटी सी है पर कई जगह उसमे कुछ प्रतिमाएँ सी बनी हुई नजर आती है। पहले बोट से करीब एक घंटे जाना पड़ता है फिर बोट से उतरकर पैदल जाना पड़ता है करीब बीस-तीस मिनट , हालांकि वहां तक जाने का रास्ता खेत -खलिहानों से होते हुए जाता है पर चुंकि वहां भी गरमी और बारिश दोनो होती है इसलिये छाता लेकर जाना चाहिऐ और पानी भी जरूर ले जाना चाहिऐ पीने के लिए।

mud volcano जो कि सुनामी के बाद फिर से जीवित हो गया था वो भी देखने लायक है। रास्ता तो ठीक -ठाक ही है पर ये थोडा ऊंचाई पर है क्यूंकि इससे पहले जब ये फटा था तो जमीन से काफी ऊपर हो गया है। एकदम किसी पहाड़ कि तरह ।


यहाँ पर बालुडेरा नाम का एक beach है जो सुनामी के पहले तो बहुत ही सुंदर था वहां पर cane से पानी के बीच मे जाने का रास्ता और बैठने के लिए कुर्सी बनी हुई थी और जहाँ बैठकर समुन्दर का मजा उठाया जा सकता था पर सुनामी मे वो सब बह गया । यहाँ पर हम सुनामी के बाद कि फोटो लगा रहे है क्यूंकि सुनामी के पहले वाली हमारी फोटो भी सुनामी मे बह गयी है। अब तो beach मे वो बात नही रही क्यूंकि बारातांग मे सुनामी ने इस beach को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था ।





2 Comments:

  1. Raviratlami said...
    चट्टानों के बेहतरीन फ़ोटो हैं. प्रकृति की सुंदर कलाकृति!
    Manish said...
    sunami ke pehle bhi baratang ke is volcano mein lava aur mitti ke halke halke bulbule nikalte the. Ab ye prakriya aur tez ho gayi hogi.

    Sundar chitra hai. mujhe yaad hai kiun chattanon tak pahunchte pahunchte hum sab passene se buri terah bheeg gaye the par boat se wahan tak wo bhi mangrove ke andar se ek sukhad anubhuti rahi thi.

    pics sundar hain par inhein medium size mein upload karein

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