Tuesday, February 17, 2009
अरे क्या आपने कभी भी ऐसा नही किया है ? आश्चर्य ! पर हमने तो बचपन मे ऐसा खूब किया है । हम लोग जब भी इलाहाबाद से बनारस ,लखनऊ ,कानपुर वगैरा जाते तो गंगा जी मे खासकर सिक्के जरुर फेंकते थे । क्यों फेंकते थे इसका कुछ ख़ास कारण था या नही पर गंगा जी मे सिक्के डालने का मतलब कुछ-कुछ दान करने से ही रहा होगा ।
कार से ज्यादा ट्रेन से सिक्का फेंकने मे मजा आता था ।चलती कार से सिक्का फेंकने पर कई बार सिक्का सड़क पर ही गिर जाता था इसलिए कभी-कभी जब गंगा जी के पुल से जा रहे होते तो पापा कार को धीमी करवा देते थे जिससे गंगा जी मे सिक्का डाला जा सके । पर इसमे उतना मजा नही आता था । पर फ़िर भी सिक्का डाले बिना नही रहते थे ।:)
चलती ट्रेन से सिक्के फेंकने मे बड़ा मजा आता था ।उसमे हम लोग आपस मे competition भी करते थे कि किसका सिक्का बिना टकराए एक बार मे ही गंगा जी मे चला गया ।जैसे इलाहाबाद के नजदीक पहुँचने पर जब फाफामऊ आने वाला होता था तो हम मम्मी से जल्दी-जल्दी सिक्के लेकर खिड़की पर बैठ जाते (अब उस जमाने मे a.c. मे नही चलते थे :) )और जैसे ही ट्रेन पुल पर से गुजरती होती तो सिक्के को गंगा जी मे डालते । अगर सिक्का पुल से टकराता तो ठन्न्न की आवाज होती और इससे पहले की पुल ख़त्म हो फटाफट दुबारा मम्मी से सिक्का लेकर गंगा जी मे डालते थे ।
उस जमाने मे तो ट्रेन के सेकंड और first क्लास कम्पार्टमेंट मे चलने मे जो मजा आता था वो आजकल के a.c कम्पार्टमेंट मे कहाँ । :)
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उफ इलाहाबाद । हाय इलाहाबाद ।
Regards
और हमारे परिचित गोताखोर मित्र गंगा की तलहटी से सिक्के हासिल भी कर लेते ।
हाँ, मज़ा तो बहुत आता था,
पर बाद में मैंने इसका विरोध करना शुरु कर दिया,
कारण किसी पोस्ट के लिये लम्बित है ।
बचपन याद करवा दिया आपने...शुक्रिया...
नीरज
हम तो आज भी डालते हैं। किसी भी बहती नदी के पुल से गुज़रे तो गाड़ी रोक कर सिक्का डालते हैं और एक काल्पनिक पुण्य का भागी बनने की अनुभूति मन को शांत कर देती है.....
इसका कुछ अर्थ नहीं है, पर ऐसा करना अच्छा लगता है...
याद आता है जब पुल से ट्रेन गुजरती थी तो माँ हाथ में सिक्का पकड़ा देतीं थीं हम निशाना साध कर फेंकते थे कि कहीं सिक्का पुल के लेंटर से टकरा कर कहीं इधर उधर न गिर जाए...........हमको फ़िर से बचपन में पहुँचाने के लिए धन्यवाद्.
- लावण्या