Wednesday, February 11, 2009

आम तौर पर हम कभी किसी टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया नही करते है भले ही कोई चाहे टिप्पणी मे प्रशंसा हो या बुराई .और न ही कभी कुछ ऐसा लिखते है जिसमे कहीं भी महिला या पुरूष के लिए कुछ अलग माप दंड होता है । हम जो भी लिखते है बस अपने मन के भाव लिखते है ।

आज अभी-अभी जैसे ही अपने ब्लॉग पर आई टिप्पणी देखी और उसमे अरविन्द जी की टिप्पणी पढ़कर मन बहुत दुखी हो गया । कल हमारी dev d यानी bold and beautiful पर लिखी समीक्षा पर अरविन्द जी की टिप्पणी जिसे हम नीचे वैसे ही लगा रहे है
क्या यह फिल्म महिलाओं को सिर्फ़ इसलिए अच्छी लग रही है की उनकी विभीषिकाओं को यह मुखर करती है और पुरूष को नकारा साबित करती है -केवल पुरूष ही इमोशनल अत्याचारी है ? यह नारी एंगल को उभारती एक चालाक कोशिश है -पर कुछ दृश्य सचमुच सौन्दर्यबोध का कबाडा कर देते हैं पोर्नो को भीमात करते हैं !


पढ़कर ये सोचने लगे कि हमने उसमे ऐसा क्या और कहाँ लिखा जिससे उन्हें ये पुरूष विरोधी लग गई ।

अगर एक महिला होने के नाते हमें फ़िल्म पसंद आई तो उसमे हमारी ऐसी भावना कहाँ से उजागर हो गई ।

क्या फ़िल्म को सिर्फ़ एक फ़िल्म के तौर पर नही देखा जा सकता है ।

23 Comments:

  1. कुश said...
    अरे आप ही ने तो लिखा था.. की आपने फिल्म ओपन माइंड से देखी.. फिर टिप्पणियो को भी ओपन माइंड से लीजिए.. इसके लिए मन खराब मत करिए.. फ़ीम मुझे भी तो बहुत पसंद आई है.. मैं महिला तो हू नही :)

    रही बात अरविंद जी की तो मैं समझता हू वे एक समझदार और व्यापक सोच के धनी है.. शायद उन्होने किसी और सन्दर्भ में टिप्पणी की हो. बात करने से मसले सुलझ जाते है..

    आपके लिए यही कहूँगा.. ओपन माइंडेड रहिए..
    अविनाश वाचस्पति said...
    और आप तो सभी के लिए ममता बनाए रखिए।
    खुले दिमाग से सोचिए

    आप देखेंगी कि

    सभी शैतान भाग गए हैं

    चाहे वे विचार हों

    या साकार .......
    Rachna Singh said...
    ममता मेने ये फ़िल्म नहीं देखी और देखुगी भी नहीं तो एंगल क्या हैं इस पर कमेन्ट देना सम्भव नहीं हैं .
    हाँ अरविन्द के कमेन्ट पर ये जरुरु कहना चाहुगी की वक्त लगेगा अभी जब लोग हम को आप को या कहे नारी को एक "समझदार व्यक्तित्व " की परिभाषा मे देखेगे . नारी हो कर आप को कुछ पसदं आया और आपने उस पर अपनी मोहर लगा दी अब अगर आप को ये ना बताया जाये की आप नारी हैं और पसंद नापसंद करना आप का अधिकार ही नहीं हैं तो फिर "पुरूष" आप से बेहतर कैसे साबित होगा .

    सबसे अच्छी बात हैं की आप को जो बात ग़लत लगी आपने मुखरता से उसका विरोध दर्ज करा दिया .
    आप लिखे जो आप को अच्छा लगता हैं , आप देखे जो आप को अच्छा लगता हैं और आप प्रतिक्रिया दे .
    नीरज गोस्वामी said...
    ममता जी आप कहाँ की बात ले बैठीं...आप ने फ़िल्म देखी अपने विचार दिए बात ख़तम...अब कौन उसे किस तरह से ले रहा है ये सोच कर परेशां मत होईये...ऐसे ही अपने अनुभव बांटते रहिये....

    नीरज
    डॉ .अनुराग said...
    हर व्यक्ति की पसंद नापसंद निजी होती है ओर उसके अपने कारण होते है ...परेशान न हो ....लिखती रहे
    Nirmla Kapila said...
    mamtaji aisi baaton ko sahaj le ye to chalta hi rahata hai ham kisi ki soch ko kahan badal sakte hai aap likhti rahen
    mehek said...
    mamtaji aap to bas apne mann ki likhe,humbhi rachanaji se sehmt hai.
    विनय said...
    माफ़ी दे दीजिए, आत्मा शान्त हो जायेगी!


    ---
    ग़ज़लों के खिलते गुलाब
    P.N. Subramanian said...
    ममतामयी ममता को क्या हो गया. अभी कुछ दिनों पहले एक दीप्ती जी हैं, उनके ब्लॉग पर उन्होंने कह दिया था कि स्लम डॉग में ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है जिसके लिए उसे ऑस्कर से नवाजा जाए. एक सज्जन थे जो बिफर गए और न जाने क्या क्या कह डाले हरेक का अपना अपना नज़रिया होता है.इन बातों से विचलित नहीं होना चाहिए.
    विनीत कुमार said...
    ममताजी, सच कहूं अरविंदजी को फिल्म के जिस एंगरृल से परेशनी है, मुझे उसी की वजह से फिल्म अच्छी लगी, कुछ लोग होते ही है कि फिल्म में सति अनसुईया का टच देखना चाहते हैं,आप बेकार में बर्ट हो रही हैं
    अभिषेक ओझा said...
    अपनी-अपनी पसंद ! हमें तो बहुत अच्छी लगी.
    Parul said...
    यह नारी एंगल को उभारती एक चालाक कोशिश है..mamta lagta hai film dekhni padegi ab:)))
    विनीता यशस्वी said...
    Aapne jo mahsus kiya wo likha...

    sub ka apna nazriya hota hai dekhne aur sochne ka...

    isliye aap bus likhti rahiye...
    seema gupta said...
    " हा हा हा हा हा यहाँ तो फ़िल्म की मुफ्त में ही इतनी publicity हो गयी....सब की आपनी अपनी राय और पसंद है...इसमे परेशान होने जैसी कोई बात नही होनी चाहिए ...ममता जी मेरी अपनी राय है की अरविन्द जी ने दस में से 9 बार तो आपको प्रोत्साहित भी किया होगा आपके लेखो को पढ़कर अगर एक बार उनके विचार और आपके विचार नही मिले तो परेशान ना हो....आप लिखे जो आपका दिल चाहे.....ये तो अपने विचारो और भावनाओ को बांटने का एक मंच है लकिन हर बार हमारे लेखन को सब स्वीकारेंगे ये तो मुमकिन नही है ना " so be happy and keep writing.

    Regards
    Suresh Chiplunkar said...
    टिप्पणियों को निरपेक्ष भाव से लीजिये… "जो मिले वह अच्छा" के दृष्टिकोण से… काहे दिल पर लेती हैं… अरविन्द जी भी अपनी सफ़ाई देने आते ही होंगे… और हाँ @ विनीत जी, "सती अनुसुईया" का उल्लेख गैरजरूरी था…
    Udan Tashtari said...
    अरविन्द जी का उद्देश्य आपको आहत करना कतई न रहा होगा, इतना मैं कह सकता हूँ, जितना मैं उनको जानता हूँ, उस आधार पर.

    आप मन में कोई मलाल न लायें, लिखते रहें. शुभकामनाऐं.
    सुजाता said...
    अभी स्लम्डॉग की ही बारी नही आई और आपने देव डी के लिए मन मे उत्सुकता पैदा कर दी है।अनुराग जी की बात से सहमत हूँ कि एक ही चीज़ को देखने का एंगल हर एक का अलग अलग होता है।
    इसलिए आप भी हर्ट न हों,अरविन्द जी ने अपना एंगल बताया आपने अपना।
    बाकी फिल्म देख आऊँ फिर कहूंगी।
    रंजना [रंजू भाटिया] said...
    ममता जी मैंने अभी पिक्चर देखि नहीं है ..पर इतने कमेंट्स और पोस्ट के बाद लगता है देखनी पड़ेगी ..मैं भी सबके साथ यही कहूँगी की सबके अपने विचार होते हैं अपने नजरिये से सब हर चीज को देखते हैं ..अरविन्द जी ने अपनी बात कही है अपने नजरिये से ..
    राज भाटिय़ा said...
    अरे ममता जी सभी आप की बहुत इज्जत करते है, फ़िर अब तो यह ब्लांग एक परिवार की तरह से है, मै अरविन्द जी को काफ़ी समय से पढ रहा हूं, सच मै बहुत अच्छे इंसान है, ओर फ़िर टिपण्णियों मै जरुरी नही हम सब हां हां या फ़िर तारीफ़ ही करे,टिपण्णियो का मतलब यही है की एक परिवार मै सभी सदस्य अपनी अपनी राय दे, इस लिये इस बात को ज्याद गहराई से ना ले, अरे कई बार मेने भी नाकारतम टिपण्णिया दी है, इस मे बुरा मानने जेसी या किसी नारी को नीचा दिखाने जेसी कोई बात नही, उन्होने अपने विचार रखे है, इस लिये यहा हम सब बराबर है.चलिये अब गुस्सा थुक दे.
    धन्यवाद
    ब्लॉग पत्रकार said...
    आज कल क्या करें लोग हाथ धोकर आलू छीलते नज़र आ रहे हैं आप तो जारी रखिए
    प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...
    जहाँ तक मैं समझता हूँ यह किसी बात को अपने कहने का एक तरीका मात्र है जी ..... वैसे भी नारी या नारियों से जुड़े मुद्दों पर बहुत आसानी से प्रतिक्रिया करने से बेहतर होगा कि धैर्य से चिंतन मनन किया जाए !!
    जहाँ तक मैं समझता हूँ कि जब तक विचार और अभिव्यक्ति सीधे सीधे आक्षेप न बन जाए तब तक उन पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए !!!
    उन्मुक्त said...
    उड़न तश्तरी के समीर जी की टिप्पणी को मेरी भी टिप्पणी समझी जाय।

    विचारों को खुले रूप में लेना चाहिये। कम से कम अरविन्द जी आपके चिट्ठे पर आये और टिप्पणी तो की। मेरे विचार से इस टिप्पणी एक स्वस्थ चर्चा के रूप में लेना चाहिये।
    कंचन सिंह चौहान said...
    जितना मैने आपको पढ़ा है और बहुत दिनो से पढ़ रही हूँ, मुझे कभी ये नही लगा कि आप बहुत बड़ी नारी सशक्तिकरण का झंडा ले कर चलने वाली या पुरुषों का विरोध करने वाली हों। आप जो भी लिखती हैं बस लिखने के लिये लिखती हैं। फिल्म खेर मैने देखी नही है....! पर हाँ इस बात से मैं भी थोड़ा इत्तेफाक़ रखती हूँ कि जरूरी नही कि हम जो बी लिखते हैं एक महिला या पुरुष के रूप में लिखते हैं, हमारे विचार स्वतंत्र भी हो सकते हैं।

    आप यूँ ही लिखती रहें.....! दलगत राजनीतियों से दूर आपका लिखना हमें अच्छा लगता है।

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