Tuesday, May 1, 2007

हट बे




अरे
-अरे गलत मत समझिये ,ये तो अंडमान के एक द्वीप का नाम है । ये अंडमान से करीब आठ घंटे की दूरी पर है । वहां जाने के लिए स्पीड बोट और शिप से जा सकते है। स्पीड बोट तो रोज सुबह साढे छे बजे जाती है ,वैसे तो बडे शिप जो निकोबार जाते है वो भी कई बार हट बे से होते हुए जाते है ।अगर sea sickness नही महसूस होती है तो बोट की यात्रा का आप भरपूर मजा उठा सकते है।कहते है की रास्ते मे dolphin भी दिखती है पर हमे कभी नही दिखी थी। अन्यथा हैलिकॉप्टर से भी वहां जाया जा सकता है । हैलिकॉप्टर से आधे घंटे मे पहुंच जाते है। हट बे भी अंडमान का एक छोट सा ही द्वीप है ये द्वीप सीधी सड़क जैसा है और सड़क के साथ-साथ समुन्द्र ।

यहाँ का butler beach गोल्डन sand beach है मतलब वहां की बालू का रंग सुनहरा सा है। beach तो हर जगह की तरह ये भी बहुत अच्छा है पर यहाँ के beach पर कभी-कभी मगरमच्छ भी आ जाते है। इसलिये वहां थोडा सचेत रहना चाहिऐ।

हट बे मे एक कुदरती झरना भी है बिल्कुल जंगल के अन्दर पर है खूबसूरत। हम तो वहां सुनामी के पहले ही गए थे क्यूंकि सुनामी के बाद तो हमे समुद्री यात्रा करने मे डर लगने लगा था क्यूंकि जब मौसम खराब होता है तो हल्पा की वजह से शिप या बोट बहुत जोर-जोर से हिचकोले लेते है। पर अगर अक्तूबर से मार्च के बीच मे जाये तो झरने का मजा उठाया जा सकता हैजहाँ पर हम लोग अपनी गाड़ी छोड़ते है वहां पर हाथी भी होता है जहाँ आप हाथी की सवारी भी कर सकते है ।एक छोटे और पतले से लकड़ी के पुल को पार करके झरने तक पहुँचते है। पर वहां बरसात के दिनों मे तो बिल्कुल ही नही जाना चाहिऐ क्यूंकि वहां जोंक बहुत होते है और वो चिपक जाते है और फिर उन्हें खीच-खीच कर निकलना पड़ता है जो काफी कष्ट्दायी होता है। और झरने का पानी बहुत मटमैला दिखता है। बरसात की वजह से झरने तक पहुंचना भी मुश्किल होता है क्यूंकि फिसलने का भी डर रहता है।

हट बे मे लाइट हाउस के ऊपर से चढ़कर देखने पर समुन्द्र का विस्तृत रुप देखने को मिलता है। पर लाइट हाउस की करीब सौ सीढियाँ चढ़ना पड़ता है वो भी नंगे पैर और टॉप पर पहुँचने के लिए लोहे की एकदम पतली सीढ़ी से चढ़ना पड़ता है वो भी अपने आप मे एक अनुभव है. पर उससे उतरना थोडा मुश्किल लगता है क्यूंकि उतरने के लिए घूम कर उतरना पड़ता है। पर ऊपर पहुंच कर जो नजारा दिखाता है वो सारी थकान मिटा देता है।

सुनामी से यहाँ पर काफी नुकसान हुआ था क्यूंकि एक तो ये फ़्लैट एरिया है और दूसरा समुन्द्र सड़क के साथ-साथ है और लोग उसी दीवार के साथ घर और दुकाने बना कर रहते थे। और आज तक वहां पर भूकंप के झटके आते रहते है।

9 Comments:

  1. चंद्रभूषण said...
    acchi report hai. wahan ke ped-paudhon, pashu-pakshiyon ke baare me bhi batayen.
    Sagar Chand Nahar said...
    फोटो कहाँ है? फोटो के बिना इस तरह के वर्णन में मजा नहीं आता।
    mamta said...
    नाहर जी फोटो लगा दी है। उस समय अपलोड नही हो पा रही थी।
    ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...
    "अन फोल्डमेण्ट ऑफ कियेटिविटि" आपके ब्लॉग से वह मूर्त सत्य प्रत्यक्ष होता दीख रहा है. जो लिखा जाना होता है, वह आस-पास ही होता है. दृष्टि के परिमार्जन भर की ही आवश्यकता होती है. एक्सिलेण्ट!
    Udan Tashtari said...
    अब सही लगा हट बे का सचित्र विवरण. बहुत बढ़िया. बोट से कितना समय लगा?
    Shrish said...
    बहुत रुचिकर वर्णन, हट बे के बारे में जानना सुखद रहा।
    mamta said...
    समीर जी बोट से और शिप से जाने मे करीब ७-८ घंटे लगते है।
    Manish said...
    badhiya jaankaari.is jagah hum log nahin gaye the.
    chitranjan agrawal said...
    ममता जी आपका लेख बहु‍त ही अच्‍छा लगा, आपकी लेखन शैली मेने पहली बार पढी अच्‍छी लगी विवरण देने का तरीका पढ कर ऐसा लगा कि हम स्‍वयं ही वहां पर मौजूद होंा आग्रह है कि इस प्रकार के अन्‍य विवरण एवं आलेख आप आगे भी लिखती रहें शुभकामनाओं सहित

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