Tuesday, August 14, 2007



रॉस एंड स्मिथ किन्ही दो लोगों के नाम नही है बल्कि अंडमान के उत्तर के आख़िरी कोने मे बसे दिगलीपुर के दो बहुत ही छोटे खूबसूरत और नायाब से द्वीपों के नाम है । दिगलीपुर को अंडमान का आख़िरी कोना इसलिये कहा है क्यूंकि इसके आगे सड़क ख़त्म हो जाती है और दूर तक अपार समुन्द्र ही दिखता है।रॉस एंड स्मिथ के बारे मे लिखने से पहले कुछ बातें दिगलीपुर की भी बता दे। दिगलीपुर पोर्ट ब्लेयर से अगर सड़क के रास्ते जाएँ तो २९० कि.मी.की दूरी पर है। पर अगर समुन्द्र के रास्ते जाएँ तो १८० या १९० की.मी. की दूरी पर है। चाहे किसी भी रास्ते जाएँ यहां पहुँचने मे समय बहुत लगता है। सड़क के रास्ते जाने मे करीब १४-से १५ घंटे लगते है। वैसे हम तो हमेशा ही कार से गए है क्यूंकि एक तो हमे sea sickness होती है और दूसरे ड्राइविंग का यहां अपना ही मजा है ।ये रास्ता अच्छा और बुरा दोनों है। अच्छा इसलिये क्यूंकि यहां के ऊँचे-नीचे रास्ते,जंगल और जंगल मे विभिन्न प्रकार की चिड़ियों की आवाजें और चारों ओर फैली हरियाली दूर-दूर तक खाली सड़क बस बीच-बीच मे अंडमान ट्रांसपोर्ट की बसें और प्राइवेट बसें दिखती है अरे कहने का मतलब है कि गाड़ी चलाने मे कोई टेंशन नही रहता है। पर रास्ता बुरा इसलिये है क्यूंकि बारिश मे सड़कें खराब हो जाती है और ये तो हम सभी जानते है की अंडमान मे कितनी अधिक बारिश होती है। पर बारिश मे भी इस रास्ते मे गाड़ी चलाने मजा आता है।


आम तौर पर जब भी दिगलीपुर जाते है तो या तो मायाबंदर या फिर रंगत मे रुकते हुए जाते है । वैसे इन दोनो जगहों पर रुकना जरूरी नही है। कई लोग रंगत मे भी रुकते थे। यूं तो रंगत मे कुछ खास देखने को नही है पर सीजन मे turtle nesting देखने के लिए भी लोग रंगत मे रुकते है। पर हम लोग हमेशा मायाबंदर रुकते थे क्यूंकि १२ घंटे की यात्रा के बाद हम तो थक जाते थे। इसलिये रात मे मायाबंदर रूक कर अगली सुबह सूर्योदय देख कर दिगलीपुर के लिए जाते थे।मायाबंदर से दिगलीपुर केवल सत्तर कि.मी. है। पर ये सत्तर की.मी. की दूरी तय करने मे दो-ढाई घंटे लग जाते थे। जैसे ही मायाबंदर से बाहर निकलते है की ऑस्टिन ब्रिज आ जाता है। ये वही ब्रिज है जो २६ दिसंबर २००४ के भूकंप मे क्रैक कर गया था और इसका एक पिलर थोडा अपनी जगह से हिल गया था , जिसकी वजह से काफी समय तक इस ब्रिज पर बसें और कार वगैरा नही जाती थी। जिससे लोगों को बहुत परेशानी होती थी।( चूंकि ब्रिज बनने मे थोडा समय लग गया था ) ऑस्टिन ब्रिज पार करते ही फॉरेस्ट की चेक पोस्ट पड़ती है। यहां पर एंट्री करवाने के बाद ही दिगलीपुर के लिए जाते है। यही ऑस्टिन ब्रिज है।



रास्ते मे बहुत ही छोटी-छोटी सी बस्तियां पड़ती है जहाँ पर हमेशा लोग आराम से बैठे नजर आते है । और जब भी हम लोगों की कार या कोई और कार निकलती , तो लोग देखने लगते , वो इसलिये क्यूंकि तब भी और आज भी लोकल लोग या तो बस से या फिर बोट से ही दिगलीपुर जाते है। रास्ते मे बेहद खूबसूरत मंजर दिखाई पड़ता रहता है।जैसे कभी कोई सांप सड़क पर नजर आता है तो कभी गोई (salt water crocodile ) ,कभी हाथी तो कभी कभार हिरन भी दिख जाते है। सड़क के किनारे लोग बस के इंतज़ार मे बैठे या खड़े दिखते है। और ऐसे ही हरियाली भरे रास्ते से होते हुए दिगलीपुर पहुंच जाते है।

यूं तो दिगलीपुर भी अंडमान के बाक़ी द्वीपों की तरह ही शांत है पर यहां की एक खास बात है वो ये कि क्यूंकि दिगलीपुर थोड़ी ऊंचाई पर स्थित है इसीलिये पूरे अंडमान और निकोबार मे सिर्फ दिगलीपुर मे ही ठंड पड़ती है। दिसम्बर और जनवरी मे यहां सुबह के समय इतनी ठंड होती है की शाल पहनने की जरूरत होती है।यहां ठंड पड़ने की वजह से सिर्फ दिगलीपुर मे ही फूल गोभी की खेती होती है। और हाँ यहां कोहरा भी पड़ता है। क्यूं अजीब लगा ना सुनकर ।

दिगलीपुर मे ठहरने के लिए दो गेस्ट हाउस है। एक तो सी.पी.डब्लू .डी.का और दूसरा अंडमान पर्यटन विभाग का turtle resort जो दिगलीपुर से आगे जाकर करीब १२ की.मी.की दूरी पर है। जैसा की इसके नाम से ही पता चलता है की यहां पर भी turtle देखने को मिलते है अरे गेस्ट हाउस मे नही समुन्द्र मे, बशर्ते आप दिसम्बर से फरवरी के महीने मे जायेंगे तो। ये resort भी थोडा ऊंचाई पर है और चूंकि यहां बहुत ज्यादा लोग नही जाते है इसलिये ये आम तौर पर खाली रहता है पर फिर भी पहले से बुकिंग करवा कर जाना चाहिऐ। इसी गेस्ट हाउस के रास्ते मे जाते हुए एरिअल बे पड़ता है जहाँ से डोंगी (नाव)मे बैठकर रॉस एंड स्मिथ जाना पड़ता है।रॉस एंड स्मिथ जाने के लिए सुबह-सुबह का समय अच्छा रहता है क्यूंकि बाद मे धूप बहुत तेज हो जाती है। और लहरें भी तेज हो जाती है।

तो हम लोगों ने भी एरिअल बे से एक डोंगी ली और वहां सीढ़ियों से नीचे उतरकर डोंगी मे जैसे ही बैठने लगे की डोंगी एक तरफ को झुक सी गयी हम तो बहुत डर गए पर डोंगी वाला बोला कि मैडम डरिये मत कुछ नही होगा । खैर एक-एक कर हम सभी डोंगी मे सवार होकर हल्पाते हुए (मतलब डोंगी उँची-उँची लहरों पर उछलती हुई)रॉस एंड स्मिथ की ओर बढने लगे। बीच-बीच मे डोंगी मे पानी भर जाता था तो डोंगीवाला तो बडे ही निश्चिंत भाव से डिब्बे से पानी भर-भर के बाहर फेंक देता था।और एरिअल बे से २०-२५ मिनट लगते है।द्वीप पर पहुंच कर डोंगी बिल्कुल किनारे नही लगती है क्यूंकि वरना डोंगी के बालू मे फ़सने का डर रहता है. इसलिये डोंगी से पानी मे कूदकर जाना पड़ता है और इसी तरह वापिस आने के लिए भी पानी मे जाकर ही डोंगी मे चढ़ना पड़ता है।

डोंगी मे जाते-जाते जैसे- जैसे हम इन द्वीपों के पास पहुँचने लगते है तो एक अदभूत सा नजारा दिखता है की कैसे दो बेहद छोटे से द्वीप सफ़ेद रेत से जुडे हुए है।चारों ओर समुन्द्र और बीच मे दो द्वीप और इन्हें जोड़ता हुआ सफ़ेद चाँदी सा चमकता रेत । और पानी इतना साफ कि क्या कहें। पानी और द्वीप दोनो ही बहुत साफ क्यूंकि एक तो वहां ज्यादा लोग जो नही जाते है। और दूसरे वहां कोई खाने-पीने की दुकान नही है।इसलिये जब भी जाएँ अपने साथ खाना पानी जरूर ले जाएँ पर खाने के बाद कूडा वहां नही फेकना चाहिऐ वरना इस द्वीप की सुन्दरता नष्ट होने मे जरा भी समय नही लगेगा। हाँ सीजन मे पर्यटन विभाग की ओर से कैम्पिंग की व्यवस्था होती है अगर कोई करना चाहे तो।

बीच की रेत से ही एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक जा सकते है। इन दोनो द्वीपों पर फॉरेस्ट के लोग रहते है जिससे कोई जंगल को नुकसान ना पहुँचाये।जंगल मे आप घूम सकते है पर अनुमति लेनी पड़ती है।जंगल मे जाकर बहुत अच्छा लगता है क्यूंकि वहां धूप नही लगती है। और एक बात दोनो ओर से समुन्द्र से घिरे होने के कारण यहां दिन मे एक बार ऐसा समय आता है जब दोनो ओर से समुन्द्र का पानी ऊपर आ जाता है और ऐसा महसूस होता है मानो हम समुन्द्र के बीचों-बीच खड़े हो। और यहीं पर turtle nesting के लिए भी घेरा बनाया जाता है। जहाँ कछुए आते है और अंडे देते है। और ये जगह कछुओं के लिए बहुत अच्छी मानते है क्यूंकि दोनो ओर समुन्द्र जो है।

इन द्वीपों पर दो-चार घंटे बिता कर हम लोग वापिस हल्पाते हुए एरिअल बे लौट आये और गेस्ट हाउस जाकर खाना खाकर जो सोये की बस। वो क्या है ना की समुन्द्र के पानी से थकान बहुत होती है। लो भला ये भी कोई बताने की बात है ये तो आप सभी जानते है।

दिगलीपुर मे रॉस एंड स्मिथ के अलावा और भी दो-तीन बीच है जैसे राम नगर बीच ,कालीपुर .और लामिये बीच है। और एक और खास बात दिगलीपुर की यहां पर अंडमान की एकमात्र नदी कल्पोंग बहती है और इसी नदी पर अंडमान का पहला ह्य्द्रोएलेक्ट्रिक पॉवर प्रोजेक्ट भी है।यहां पर भी अनुमति लेकर ही जाया जा सकता है। इसके अलावा यहां पर saddle peak भी है जहाँ लोग ट्रेक्किंग के लिए जाते है। वैसे ट्रेक्किंग के लिए हम कभी नही गए क्यूंकि जंगल और जंगल मे सांप और अन्य जानवरों से हम डरते जो है।


अंडमान के बाद अब अगली बार से हम निकोबार के बारे मे लिखेंगे।

7 Comments:

  1. Sanjeeva Tiwari said...
    ममता जी धन्‍यवाद,

    बहुत ही अच्‍छी जानकारी दी है आपने, प्रकृति जीवेत हो उठी, ऐसा लगा जैसे हम स्‍वयं वहां विचरण कर रहे हों । आपकी अभिव्‍यक्ति कला लाजवाब है पुन: धन्‍यवाद

    “आरंभ” संजीव का हिन्‍दी चिट्ठा
    Manish said...
    अंडमान में हमारी यात्रा रंगत तक जा कर ही ख़त्म हो गई थी। रॉस एवम् स्मिथ के बारे में सुना भर था। आपके इतने अच्छे विवरण से जान भी लिया। निकोबार के यात्रा विवरण का इंतज़ार रहेगा।
    Gyandutt Pandey said...
    ट्रेवलॉग बहुत कम हैं हिन्दी ब्लॉगरी में और आपकी पोस्टें उस वैक्यूम को अच्छी तरह भरती हैं.
    Udan Tashtari said...
    वाह, आपके साथ यात्रा करना भी दिलचस्प अनुभव रहा. अंडमान तो बड़ी रोचकता के साथ मनीष भाई घूमा लाये थे और बाकी आप. बहुत आभार.
    sunita (shanoo) said...
    अरे ममता जी एसा लगा की हम भी साथ ही आपके निकट बैठे है अरे भई गाड़ी थौडी धीरे चलाया किजिये कभी-कभी तो एसा लगा जैसे की बस अभी टकरायेगी...वैसे मज़ा आ गया आपके साथ दिगलीपुर घूम के...:)

    सुनीता(शानू)
    Sanjeet Tripathi said...
    वाह!!
    मनीष भाई के साथ घुम चुके हैं पर फ़िर से आपके साथ इन और ऐसे इलाकों को घुमने मे अच्छा लगा!!
    शुक्रिया, इंतज़ार रहेगा अगली कड़ी का!!
    उन्मुक्त said...
    जितना मजा पढ़ने में आया उससे ज्याद वीडियो देखने में। कौन हसीना के लिये गाना गा रहा था :-)

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