Sunday, August 26, 2007

ससुराल

ये ससुराल शब्द बहुत सारे संबंध अपने अन्दर समाये हुए है ठीक उसी तरह जैसे मायका शब्द अपने अन्दर संबंधों को सहेज कर रखता है।मायके मे माँ,पिता,भाई, भाभी और बहन होते है तो ससुराल मे सास,ससुर,ननद,देवर,जेठ,जेठानी होते है। और शायद इन्हीं सबसे एक भरा-पूरा घर बनता है।वो चाहे मायका हो या चाहे ससुराल हो।

ससुराल नाम से ही लोगों को एक अजीब सी भावना महसूस होती है और इस भावना को और कुछ नही इसे बस मन मे चल रहे मिले-जुले भाव या शायद डर ही कहना चाहिऐ। हर लडकी जिसकी शादी होती है वो इन भावनाओं से जरुर गुजरती है कि पता नही उसके ससुराल वाले कैसे होंगे। वो वहां एडजस्ट कर पाएगी या नही। सास और ननद से उसकी निभेगी या नही और ऐसे ही तमाम सवाल मन मे उठते रहते है। और ऐसे मे शादी के समय जो रिश्तेदार आते है वो कई बार लडकी को बहुत सारी हिदायतें देते है कि बिटिया ठीक से रहनाबडों का आदर करनाकभी पलट कर जवाब मत देना वगैरा-वगैरापर कई बार तो कुछ लोग ससुराल के नाम पर बहुत डराते भी है कि देखों फलानी की लडकी के साथ ऐसा हो गया तो ढमाकी की लडकी के साथ ससुराल वालों ने बड़ा अत्याचार किया वगैरा-वगैरा । आज भी और पहले भी ससुराल मे होने वाले अत्याचारों के भी सैकडो उदाहरण मिल जायेंगे। पर साथ ही अच्छे उदाहरण भी मिलते है।

तो चलिए आज हम आपको अपनी ससुराल का एक किस्सा सुनाते है। ये किस्सा शादी के समय का ही है। वो क्या है ना हमने पहले भी अपनी एक पोस्ट मे लिखा था कि पहले हमे खाना बनाना नही आता था । पर जब शादी तै हुई तो हमने कुछ खास-खास व्यंजन मम्मी से बनाने सीखे ,अब खास इसलिये क्यूंकि इतने बडे होने पर सादा दाल-चावल कैसे बनाते है, ये हमे आ गया था।पर तब भी हर चीज बनाने मे expert नही थे।पर यहां हम ये बता दे कि अब हम काफी expert हो गए है।पापा को हमेशा रहता था की लडकियां किचन मे काम ना करें क्यूंकि बाद मे अपने घर मे तो हर लडकी को काम करना ही पड़ता है। जबकि मम्मी हम लोगों को यदा कदा खाना बनाना सीखने को कहती रहती थी।खैर हमे तो छोटे होने का भी फायदा था। पर शादी के समय मम्मी को लग रहा था की बिटिया को खाना -वाना तो ज्यादा बनाना आता नही है पता नही ससुराल मे कैसे करेगी। यहां हम ये भी बताना चाहते है कि हमारी ससुराल मे भी नौकर-चाकर थे तो इसलिये मम्मी कि चिन्ता निरर्थक थी। पर फिर भी माँ तो माँ ही होती है।

खैर शादी के बाद जब बिदाई हो रही थी तो हमारी मम्मी और मौसी ने सोचा कि हमारी सास को इस बारे मे बता देना चाहिऐ। तो मम्मी और मौसी ने हमारी सास से कहा कि उन्हें कुछ बात करनी है। तो अम्माजी (सास)ने सोचा कि पता नही क्या बात हो गयी है।

तो हमारी मौसी ने बात शुरू की कि वो ममता को खाना बनाना ठीक से नही आता है।

तो अम्माजी ने कहा कोई बात नही।

तब मम्मी ने कहा की वो दरअसल ममता चूंकि घर मे सबसे छोटी है और घर मे हमेशा नौकर-चाकर रहे है तो इसलिये ममता ने कभी काम नही किया है।

तो अम्माजी ने मुस्कराते हुए कहा (ये मम्मी ने बताया था) की आप चिन्ता ना करे उसे लखनऊ या दिल्ली मे भी काम नही करना पड़ेगा।

अम्माजी के इतना कहने पर हमारी मम्मी और मौसी आश्वस्त हो गयी । और हम बिदाई के बाद ससुराल पहुंच गए। सारी रस्मों के बाद बहु के खाना बनाने की रस्म आयी तो अम्माजी ने कहा कि बहुरानी (वो हमे इसी तरह बुलाती थी)तुम्हे गुलगुले बनाने है। अब थोडा संकोच और ज्यादा डर कि अगर हमने गुलगुले बनाए और गड़बड़ हो गए तो क्या होगा। पर अब बनाना तो था ही सो जैसे ही हम रसोई मे गए तो हम बिल्कुल चौंक गए क्यूंकि अम्माजी ने सारे गुलगुले बना रखे थे और हमसे बस एक गुलगुला बनवाया और फिर हमे सबको परोसने के लिए कहा। और ये देख कर हमारा मन अपनी अम्माजी के लिए आदर ,श्रद्धा ,और प्यार से भर गया। तो ऐसा था हमारा ससुराल की रसोई मे पहला दिन

अरे अभी किस्सा खत्म नही हुआ है । कुछ दिन ससुराल मे रहने के बाद जब हम दिल्ली के लिए चलने लगे क्यूंकि हमारे पतिदेव दिल्ली मे थे तो हमारे आश्चर्य की सीमा नही रही जब अम्माजी ने एक नौकर भी हमारे साथ भेजा क्यूंकि अम्माजी को हमारी मम्मी और मौसी की कही बात याद थी की ममता ने कभी किचन मे काम नही किया है। तो भला एकदम से दिल्ली मे जाते-जाते ही कैसे खाना बनाएगी।हमने बहुत कहा की हम थोडा बहुत खाना बना लेते है और बाक़ी सीख जायेंगे । पर उन्होंने हमारी नही सुनी और उस नौकर को हमारे साथ दिल्ली भेज दिया ये कह कर की घर का नौकर है तुम लोगों को कोई परेशानी नही होगी। हालांकि हमारे पतिदेव ने एक नेपाली नौकर रखा हुआ था (उन दिनों दिल्ली मे काम करने के लिए नेपाली बहुत मिलते थे) पर अम्माजी का ये कहना था कि दिन भर घर मे बहुरानी अकेले रहेगी तो अनजान नौकर घर मे रहना ठीक नही है। इसलिये उन्होंने घर के ही एक नौकर को हमारे साथ भेज दिया था जिसपर हम लोग विश्वास भी कर सकें क्यूंकि दिल्ली मे तब भी काम करने वालों का भरोसा नही किया जा सकता था। ऐसी थी हमारी अम्माजी (सास)।

धीरे-धीरे हमने खाना बनाना सीखा । कैसे वो फिर कभी !


8 Comments:

  1. Mired Mirage said...
    वाह! सास हों तो ऐसीं !
    घुघूती बासूती
    Gyandutt Pandey said...
    मुझे तो गुलगुले की याद हो आई. जमाना हो गया खाये!
    Sanjeet Tripathi said...
    बधाई कि आपको किस्से-कहानियों वाली सास ना मिली!!
    Lavanyam -Antarman said...
    Mamta ji,
    AApki Saas ji ki soojh bojh ki baat bahut achchee lageen. Unka naam bhee likhiyega.

    age khana kaise banana seekha aapne, us post ka intezaar rahega.

    Lavanya
    दीपक भारतदीप said...
    बहुत हृदय स्पर्शी रचना है
    दीपक भारतदीप
    Shastri JC Philip said...
    आपसी संबंधों का आपने यह जो चित्र खीचा है यह बहुतों को प्रभावित करेगा. समाज को एक बेहतर जगह बनाने के लिये इस तरह के लेखों का योगदान बहुत है -- शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info
    उन्मुक्त said...
    मान गये, क्या सास हैं।
    yunus said...
    ममता जी
    आपने नये सामूहिक रेडियो ब्‍लॉग रेडियोनामा में अपनी दिलचस्‍पी दिखाई थी ।
    उसकी तैयारियां जारी हैं ।
    अगर आप रेडियोनामा का हिस्‍सा बनना चाहती हैं तो कृपया मेरे ईमेल आई डी
    yunus.radiojockey@gmail.com पर मेल कीजिए
    ताकि आपको आमंत्रण भेजकर सामूहिक ब्‍लॉग का
    हिस्‍सेदार बनाया जा सके ।
    आपके प्रोफाइल पर ई मेल आई डी होता तो मैं कब का निमंत्रण भेज चुका होता
    इस निमंत्रण को आपको स्‍वीकार करना है
    बस इसके बाद आप रेडियोनामा पर अपने आई डी से ही
    पोस्‍ट कर पायेंगी ।

    यूनुस

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