इसमे हम जो भी लिख रहे है वो किसी का मजाक नही बना रहे है बस इतने सालों मे जो हमने महसूस किया है वो ही लिख रहे है।
बचपन से हमारी माँ ने सिखाया है कि कभी भी किसी को तू-तडाक करके बात नही करनी चाहिऐ हमेशा आप,हम और तुम करके बात करनी चाहिऐ और हमने भी अपने बच्चों को यही सिखाया है। पर हिंदी के ये शब्द यूं तो हर कोई बोलता है पर कौन बोल रहा है और किसको बोल रहा है इससे बहुत फर्क पड़ता है।जैसे बनारस मे हमारे बाबा के यहाँ हमेशा अयिली -गयिली , हमरा-तुम्हरा वाली मीठी भाषा का प्रयोग होता रहा है।
जब हम लोग छोटे थे और आज भी हम बातचीत मे हम -तुम शब्द ही इस्तेमाल करते है । शादी के बाद जब हम दिल्ली आये तो वहां पर हम-तुम कि बजाए लोग मै-तू बोलते थे पर हमसे मै-तू बोला ही नही जाता था। और हमारे इस हम-तुम की भाषा सुनकर लोग पूछते थे कि क्या आप u.p. से है। दिल्ली मे कई लोगों को ये कहते सुना है तू खाना खा ले ? हमारे बच्चे कई बार कहते थे कि इस तरह बोलने पर स्कूल मे लोग समझ नही पाते है इसलिये वो लोग स्कूल मे और अपने दोस्तो मे मै-तू करके ही बात करते है। पर घर मे नही बोलते है।
दिल्ली के बाद जब हम अंडमान पहुंचे तो भाषा बिल्कुल ही बदल गयी अरे -अरे हमारी नही वहां रहने वालो की। वहां पर हर कोई जाता है आता है या आएगा -जाएगा बोलते है। जैसे मैडम खाना खायेगा ? साब ऑफिस जाता ?जबकि हम लोग कहते है साब ऑफिस जा रहे है। पर अंडमान मे जब भी कोई कहीँ जा रहा होता है तो वो लोग एक बात हमेशा बोलते है जा के आना । पर हमारे दुर्योधन (कुक )बोलते थे मैडम जा के आयेगा।
और यहाँ गोवा मे तो और भी बदल गयी। यहाँ पर छोटे-बडे मे कोई फर्क नही है इसलिये हर कोई एक दुसरे को तू या तेरे को बोलता है। यूं तो इंग्लिश मे भी किसी दुसरे को संबोधित करने के लिए you शब्द का इस्तेमाल होता है।
शुरू मे तो कई बार हमे ग़ुस्सा भी आ जाता था ,जैसे जब हमारे इस घर मे काम हो रहा था तो एक दिन हमे
कोन्ट्रेक्टेर का आदमी tiles दिखने के लिए लाया जब हमने उससे कहा कि ये वो tile नही है तो वो बोला तेरे को दिखाने को लाया तुने जो पसंद किया था वो दुकान मे नही है। ये सुनकर बहुत ग़ुस्सा आया और अजीब भी लगा की यहाँ लोग कैसे बात करते है, क्यूंकि इस तरह से तो आज तक किसी ने बात नही की थी। पर अब हम अपने ग़ुस्से पर काबू कर लेते है। पर अब भी कभी-कभी ग़ुस्सा आ जाता है अब चाहे आप इसे कुछ भी समझे।
Sunday, April 29, 2007
तुम,तुम्हे,तुझे,तेरे को,तू,
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Saturday, April 28, 2007
स्पीड पोस्ट की माया
दिसम्बर महीने मे इन्जीनरिंग के फॉर्म भरे जाते है और इसमे ये भी लिखा होता है कि फॉर्म को या तो स्पीड पोस्ट से भेजे या रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजे। चुंकि आज कल हम लोग गोवा मे है इसलिये हमारे छोटे बेटे ने भी यहाँ गोवा मे बैंक से फॉर्म लिया और भरा और उसे स्पीड पोस्ट से दिल्ली भेज दिया और हम लोग निश्चिंत हो गए क्यूंकि आख़िरी तारीख से करीब बीस दिन पहले फॉर्म जो भेज दिया था।
धीरे -धीरे समय बीतने लगा और मार्च आ गया पर उसका admit card नही आया तो हमने बेटे से पूछा कि उस पर पता तो सही लिखा था ना इस पर वो बोला कि पता तो उसमे पहले से ही लिखा होता है। जब अप्रैल भी आ गयी और उसका admit card नही आया तो हम लोगों ने दिल्ली मे पता लगवाने की कोशिश शुरू कि भाई आख़िर माजरा क्या है। और ये सुनकर कि हमारे बेटे का फॉर्म वहां पहुंचा ही नही है हम लोग थोडा सकते मे आ गए क्यूंकि समय बहुत कम बचा था ।
खैर दिल्ली मे सम्बंधित अधिकारियों ने कहा कि आप लोग फॉर्म की फोटो कापी हो तो वो दे दें तो दूसरा admit card बन जाएगा पर इसके लिए उन्हें स्पीड पोस्ट की ओरिजनल कापी चाहिऐ थी क्यूंकि जो फोटो कापी थी उसमे कुछ क्लियर नही था । खैर जैसे-तैसे हम लोगों ने उसे भेजा और बेटे का admit card लिया।
पर अब तक ये समझ नही आया कि आख़िर फॉर्म गया कहॉ ? क्यूंकि कॉलेज वाले कहते है कि उन्हें फॉर्म मिला ही नही और स्पीड पोस्ट वाले कहते है कि हमने तो फॉर्म भेज दिया है । गलती चाहे जिसकी हो पर इसमे परेशानी तो बच्चे और अभिभावक को ही होती है।
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Friday, April 27, 2007
महात्मा गाँधी

K.Gopinathan द्वारा खींची गयी यह फोटो आज के The Hindu मे छपी है। इस पर आप क्या कुछ कहना चाहेंगे?
(चित्र यहाँ से ली है)
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कुलफी और चाट
पहले अंडमान और अब गोवा ,इन दोनो जगहों पर वैसे तो खाने की ज्यादातर चीजें मिल जाती है पर इलाहाबाद और दिल्ली की चाट और मिठाई और लखनऊ की कुलफी नही मिलती। अब ये मत पूछिये की हम इलाहाबाद कब पहुंचे अरे भाई इलाहाबाद हमारा मायका है और लखनऊ हमारी ससुराल और दिल्ली शादी के बाद हमारा घर ।
अंडमान मे जो तीन साल रहे तो चाट और कुलफी का स्वाद एक तरह से भूल ही जाते अगर बीच -बीच मे हम दिल्ली ,इलाहाबाद और लखनऊ ना आते -जाते रहते। इलाहाबाद के सिविल लाएईन की चाट का कोई जवाब नही क्यूंकि जैसी खालिस आलू की कुरकुरी टिक्की वहां बनती है वैसी तो दिल्ली मे भी नही बनती। दिल्ली की टिक्की मे दाल को भरते है जो वैसे तो खाने मे अच्छी होती है पर यहाँ पर तो ना सादी और ना दाल वाली अच्छी टिक्की मिलती है।
अंडमान मे गोलगप्पे जिसे वहां लोग पुच्का कहते है मिलते तो बहुत थे पर कभी खाने की इच्छा नही हुई क्यूंकि उनका गोलगप्पे का पानी देखकर ही कभी मन नही हुआ क्यूंकि पानी से ही सबसे ज्यादा इन्फेक्शन का खतरा होता है। दिल्ली के ऍम .ब्लॉक मार्केट मे तो गोलगप्पे का पानी भी मिनेरल वाटर से बनाते है। गोवा मे भी गोलगप्पे और टिक्की तो मिलती है पर वो बात नही है । गोवा मे मीरामार beach के पास ही सारे चाट वाले होते है। खानेवालों की भीड़ भी काफी होती है और हम भी कई बार वहां जाते है चाट खाने पर ...
मिठाई तो भाई इलाहाबाद के नेतराम की इमारती और सुलाकी की सोहन पपडी और बालुशाही का क्या कहना । मिठाई की बात मे हम लखनऊ का मलाई पान कैसे भूल सकते है जो की सिवाय लखनऊ के कहीँ और नही मिलता है।और बनारस का चमचम जो अब पहले जितना अच्छा नही रह गया है। वैसे दिल्ली मे तो अब हर तरह की मिठाई मिलती है और होती भी बहुत अच्छी है जैसे नाथू के यहाँ छेने से बनी मिठाई सीतारानी बहुत ही स्वादिष्ट होती है।
बहुत सालों तक तो लखनऊ के प्रकाश की कुलफी ही अच्छी होती थी और अभी भी है पर अब दिल्ली मे g.k..१.मे अनुपमा और नाथू की कुलफी भी कुछ कम नही होती है।
अब ये मत कहियेगा की अगर अंडमान और गोवा मे अच्छी चाट नही मिलती तो घर मे भी तो बना कर खा सकते है ,वो तो हम करते ही थे पर जो मजा सड़क पर खडे होकर चाट खाने का है वो घर मे थोड़े ही मिलता है।
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Thursday, April 26, 2007
ज़ी के सात फेरे
आज हम आपसे ज़ी पर आने वाले सीरियल सात फेरे की बात कर रहे है जिसमे कहानी घूम घूम कर एक ही जगह आ जाती है। ऐसा लगता है सलोनी बेचारी को सिर्फ मुसीबतों का सामना ही करना लिखा है। हर समय रोने के अलावा जैसे कुछ काम ही नही रहा है। कहानी को ख़त्म करने की बजाये इतना तगड़ा मोड़ देते है की दर्शक बेचारे समझ ही नही पाते है। कुछ दिन पहले चांदनी ने सलोनी के ससुराल वालों के घर और बिजनेस पर कब्जा कर लिया और उन्हें घर से बाहर निकाल दिया पर शायद अगर सलोनी ना होती तो उसके परिवार वाले इस मुसीबत का सामना नही कर पाते क्यूंकि सीरियल की हिरोइन सबसे अकलमंद है। कावेरी तो शायद बदलेगी ही नही क्यूंकि अगर वो सीधी हो जायेगी तो क्लेश कौन करेगा।
दुल्हन नाम के सीरियल मे विद्या जो एक अनपढ़ है जब शादी के बाद वो शहर आयी थी तो हमे लगा था की शायद कोई उसे पढने के लिए प्रेरित करेगा पर ऐसा कुछ नही हुआ । चले अब हम उम्मीद करते है की सागर ठीक होकर उसे पढने के लिए प्रेरित करेगा। पर अगर कहीँ ऑपरेशन के बाद सागर की याददाश्त चली गयी तो क्या होगा , ऐसा होने की अधिक उम्मीद है वरना सीरियल ख़त्म करना पड़ेगा।
क़सम से की बानी को अब नए अवतार मे दिखाया जा रहा है और लीजिये इसमे भी रोनित रॉय आ गए ,लगता है एकता को सीरियल के लिए लड़कियां तो नयी मिल जाती है पर आदमी नही तभी तो करीब-करीब हर सीरियल मे रोनित रॉय नजर आ जाते है। इस बार तो बानी बदला लेने आयी है देखते है क्या करती है। रोनित का इतना untidy लुक देखकर गन्दा लगा ।
ममता नाम से भी ज़ी पर एक सीरियल आता है जिसे हमने कभी -कभार ही देखा है पर जितना देखा उससे ये महसूस किया की आख़िर इसे कौन पसंद करता होगा क्यूंकि ना तो सीरियल मे कोई कहानी है (ये तो सभी सीरियल के लिए कह सकते है ) और ना ही कुछ नयापन है। बीच मे सुना था की ये ख़त्म हो रहा है पर अभी कल यूं ही जब ज़ी चलाया तो इस सीरियल को देखा । सारे कलाकार बिल्कुल पुराने -धुराने से लग रहे थे । ना आवाज मे कुछ दम ना acting मे कोई दम। ये सिर्फ ५ मिनेट ही देखा था उससे आगे देखने की ना तो हममे हिम्मत थी और ना ही चाहत थी।
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feed मे बदलाव
हमने अपने ब्लोग की r.s.s. feed बदल दी है उसका नया (अंतर्जाल पता )address है http://feeds.feedburner.com/mamtatv
आप से अनुरोध है कृपया अपने रीडर मे इसे अपडेट कर ले।
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Wednesday, April 25, 2007
अफ्तारनुन सिएस्टा
दिल्ली मे पिछले २० सालों से रहते हुए कभी भी बाजार जाने और खरीदारी करने की आदत सी थी पर जब अंडमान गए तो अपनी इस आदत को बदलना पड़ा । वहां जाकर समझ आया कि अफ्तारनुन सिएस्टा क्या है। भाई हम ठहरे दिल्ली वाले जब मन हुआ बाजार चले गए .क्यूंकि दिल्ली मे अफ्तारनुन सिएस्ता जैसा कुछ नही है, सो हम आराम से तैयार होकर करीब १२ बजे जब खरीदारी करने बाजार पहुंचे तो चोंक गए क्यूंकि या तो दुकाने बंद हो गयी थी या बंद हो रही थी। जब हमने अपने ड्राइवर से इसका कारण पूछा तो वो बडे ही शान्त भाव से बोला कि मैडम यहाँ पर तो ऐसे ही है । १२ बजे सब दुकाने बंद हो जाती है और फिर ३ बजे दोपहर मे खुलती है। अब तो आप ३ बजे के बाद ही सामान ले पाएंगी । ये सुनकर ड्राइवर से जब हमने पूछा कि तुमने पहले क्यों नही बताया तो वो बोला कि मैंने समझा कि आप बस घूमने जा रही है।
चूंकि अंडमान मे सुबह जल्दी होती है और १२ बजे तक सूरज अपनी चरम सीमा पर होता है और कुछ कोस्तेल एरिया कि वजह से भी ,वहां सभी दुकाने साढे आठ सुबह खुल जाती है ,दोपहर मे १२ से ३ बंद रहती है और फिर ३ बजे के बाद रात ९ बजे तक खुली रहती है। वहां ऑफिस भी साढे आठ बजे से शुरू होता है जबकि दिल्ली और बाकी जगहों मे साढे नौ बजे ऑफिस शुरू होता है।
शुरू -शुरू मे बहुत दिक्कत आयी , एक -दो बार ऐसा भी हुआ कि दवा कि जरुरत है पर दुकाने बंद । पर फिर धीरे-धीरे हमने वहां के समय के साथ अपने को ढाल लिया। सुबह -सुबह बाजार जाना बाद मे अच्छा भी लगने लगा क्यूंकि इससे गरमी और धूप से बच जाते थे। पतिदेव का जल्दी ऑफिस जाना भी बाद मे ठीक लगने लगा क्यूंकि सारे ऑफिस साढे पांच बजे बंद भी हो जाते थे । हाँ अगर कोई मीटिंग है तो बात अलग है।
अंडमान जाकर हम लोगों की पारिवारिक जिंदगी बहुत बदल गयी थी । दिल्ली मे तो जो एक बार घर से निकले तो फिर आठ बजे शाम से पहले लौटना होता ही नही था , कुछ तो दूरियों की वजह से और कुछ ट्राफिक जाम की वजह से पर पोर्ट ब्लैयेर तो मुश्किल से पांच किलोमीटर मे पूरा शहर है। तो आप अंदाजा लगा ही सकते है कि वहां कहीँ भी आने-जाने मे अधिक से अधिक १०-१५ मिनेट लगते थे। हर चीज और हर जगह बस हाथ भर की दूरी पर थी चाहे वो एअरपोर्ट हो या फिर बाजार हो।
और अब गोवा मे भी अफ्तारनुन सिएस्टा का बहुत प्रचलन है।
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Tuesday, April 24, 2007
ख़बरों की खबर बोर्ड का हौवा ख़त्म करने की कोशिश
आज के अखबार मे खबर थी कि अब से कक्षा १० के विद्यार्थियों को ये विकल्प दिया जाएगा कि यदि वो चाहे तो दसवी की परीक्षा दे या चाहे तो सीधे बारहवी की परीक्षा दे । दो साल के समय मे विद्यार्थी जब चाहे मतलब अपनी तैयारी के हिसाब से परीक्षा दे सकता है। ये कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिये किया जा रहा है जिससे बच्चों पर ज्यादा बोझ ना पडे । पर हमारे ख़्याल से ऐसा करने से बच्चों मे पढने के प्रति रूचि कम भी हो सकती है क्यूंकि उन्हें ये लगेगा कि अभी तो दो साल का समय है बाद मे पढ़ लेंगे। जिन बच्चों को पढना होता है वो वैसे भी पढ़ लेते है।
बोर्ड का हौवा ख़त्म करने और बच्चों मे anxiety को कम करने के लिए ये किया जा रहा है। पर क्या ये ठीक है ?
हमे लगता है कि थोड़ी बहुत anxiety होना भी अच्छा होता है क्यूंकि anxiety एक ह्यूमन नेचेर है जिसका इन्सान मे होना बहुत जरूरी है। बच्चों मे anxiety को कम किया जा सकता है अगर अभिभावक चाहे तो क्यूंकि बच्चों से ज्यादा तो माँ-बाप मे anxiety होती है कि उनके बच्चे का कितना परसेंट आएगा। और देखा जाये तो एक तरह से माँ-बाप ही बच्चों पर ज्यादा दबाव बनाते है।
जब हमारा बड़ा बेटा १०वि का इम्तहान दे रहा था उस समय हिस्ट्री के एक-एक chaptar कम से कम ३०-४० पन्ने के होते थे साथ ही जिओग्रफी ,सिविक्स ,और इकॉनोमिक्स की अलग-अलग किताबें होती थी और वही छोटे बेटे के समय मे हिस्ट्री विषय को बिल्कुल ही बदल दिया गया मतलब आसान कर दिया गया। पहले हिस्ट्री मे indian ,modern ,medival सब पढ़ते थे वही बाद मे हिस्ट्री मे कुछ ८-१० chapter (१० पन्ने हर chapter के)और जिओग्रफी ,सिविक्स, इकॉनोमिक्स सब एक ही किताब मे था। कहने का मतलब है की अभी २-३- साल पहले से ही बोर्ड का हौवा ख़त्म करने का प्रयत्न किया जा रहा है ।
अगर इसी तरह बोर्ड धीरे -धीरे इतना आसान होता जाएगा तो इससे बच्चो मे प्रतिस्पर्धा की भावना भी ख़त्म हो सकती है। यूं तो अब ये भी फैसला किया जा रहा है कि किसी भी बच्चे को फेल नही किया जाएगा । पर ऐसा करके बच्चों को हम मेहनत ना करने का संदेश देंगे क्यूंकि जब बच्चे को ये डर ही नही होगा कि वो फेल भी हो सकता है तो उसे पढने के लिए कहना भी माँ-बाप के लिए मुश्किल हो जाएगा।
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Sunday, April 22, 2007
हाय ये न्यूज़ चैनल
भाई हम तो समझ ही नही पा रहे है की हम इन t.v.चैनल वालों का क्या करें।ना चाहते हुए भी हमे ये सब देखना पड़ा ,एक n.d.t.v.(जो कम से कम और ख़बरों को भी दिखा रहा था ) को छोड़कर सारे हिंदी चैनल अभी भी अभी-एश की खबर देने मे लगे है। अरे भाई अब तो बक्शो। कल बिदाई ऐसे दिखा रहे थे मानो कोई नेशनल इवेंट हो और तारीफ़ करनी होगी इन रिपोर्टर्स की जो पिछले ३-४ दिन से प्रतीक्षा, जलसा और ला मेर पर डटे हुए थे पर मजाल है जो उन्हें किसी की झलक भी मिल जाये। पर तब भी ना तो किसी के चेहरे पर शिकन और ना ही जोश मे कमी।यहाँ तक कि सुरक्षा गार्ड से धक्के भी खाए पर वही डटे रहे । हर बात का जिक्र ऐसे करते है मानो वही मौजूद हो। उन लोगों की गाड़ी के पीछे ऐसे भाग रहे थे की बस।सबसे कमाल कि बात कि ये चैनल पर बिदाई गीत भी बजाये जा रहे थे जैसे कि डोली वही से जा रही हो। पर ये सिलसिला यही ख़त्म नही हो गया । सहारा समय के प्रस्तुत कर्ता ने तो ये सवाल भी पूछ लिया की क्या मीडिया उनकी शादी मे ज्यादा हस्तक्षेप (interfere) कर रहा है ? अरे ये भी कोई पूछने की बात है।
कोई चैनल ये दिखा कर कि बिदाई के समय एश के चेहरे पर दुःख के भाव है ये बताने मे गर्व महसूस कर रहा था तो दूसरा चैनल ये बताने मे लगा था कि एश ने कौन सी साड़ी पहनी है। सम्वाददाता पूरे भाव विभोर होकर बताते है कि उन्होने अपनी माँ या नानी कि नही बल्कि शादी के लिए खास खरीदी गयी साड़ी पहनी है। भाई इसमे नई क्या बात है । हर दुल्हन शादी मे नयी साड़ी ही पहनती है।
सोचा था कि चलो शादी हो गयी अब तो अभी-एश का पीछा छोडेंगे पर नही जनाब अब वो तिरुपति जा रहे है तो उसी को दिखाने मे लग गए।और हाल ये है कि मीडिया को तिरुपति मंदिर से २१ किमी पहले ही रोका जा रहा है पर अभी भी इन्हें ये समझ नही आ रहा है । अब शाम से यही चर्चा शुरू कर देंगे कि क्या बच्चन परिवार का ऐसा करना ठीक था?
मंदिर मे उनके लिए सारे श्रधालुओं को दर्शन करने से रोक दिया जाना, कहॉ का इंसाफ़ है?
मीडिया यही रूक जाये तो गनीमत समझिये ,कहीँ ऐसा ना हो कि उनके honeymoon पर भी ये अपनी खबरें दिखाते रहे ।
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Saturday, April 21, 2007
धो डाला
कल के वर्ल्ड कप मुक़ाबले मे ऑस्ट्रेलिया ने न्यूजीलैंड को २१५ रनों से हराकर एक बार फिर ये साबित कर दिया कि वो दुनिया की सबसे बेहतरीन टीम है और इसमे कोई शक भी नही है। जिस तरह से कल के मैच मे ऑस्ट्रलिया ने न्यूजीलैंड को हराया वो काबिले तारीफ है। इसे कहते है टीम और देश के लिए खेलना। जब भी खेलते है पूरी जान लड़ा देते है । हर मैच को जीतना ही उनका लक्ष्य होता है और इसमे बुराई भी क्या है आख़िर खेल तो हर कोई जीतने के लिए ही खेलता है। और इसे ही कहते है धो डाला ।
ऑस्ट्रेलियी खिलाडी चाहे जैसे भी हो (व्यवहार )पर जब वो खेलते है तो उनका जोश और होश देखने लायक होता है ,काश हमारी टीम मे भी ऐसा जोश होता तो शायद आज टीम इंडिया वर्ल्ड कप से बाहर नही होती। पर अपने यहाँ तो भगवान ही मालिक है।
टीम इंडिया से एक और बात याद आयी कल बांग्लादेश के लिए जो टीम चुनी गयी उसमे सचिन और सौरव नही है। इस खबर पर न्यूज़ चैनल वाले अब सबसे ये पूछने मे लगे है कि क्या सचिन और सौरव को टीम मे नही लेने का फैसला सही है । अभी दो दिन पहले तक सारे न्यूज़ चैनल पर यही चर्चा हो रही थी कि उन्हें टीम मे रखा जाये या नही। और अब जब टीम मे नही रखा गया है , तो भी यही चर्चा कर रहे है कि ये सही है या गलत। लगता है इन्हें किसी भी पल चैन नही है।
कल तक हर चैनल अपनी टीम बना रहा था और सभी ने सचिन को टीम मे नही रखा था तो फिर अब इतनी चर्चा क्यों ?
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Friday, April 20, 2007
अंडमान निकोबार (बारतांग )
बारतांग भी पोर्ट ब्ल्येर से दो घंटे की दूरी पर है। वहां जाने के दो साधन है या तो आप बोट से जाये या फिर सड़क से। बोट से जाने मे ४से ५ घंटे लग जाते है जबकि अगर कार या बस से जाएँ तो २ घंटे मे पहुंच जाते है। सड़क का रास्ता इसलिये भी अच्छा है क्यूंकि इसमे जंगल पार करना पड़ता है और इसी जंगल के रास्ते मे जारवा भी मिलते है । जिरका टांग से काफिले की तरह जाना पड़ता है जिसमे सबसे आगे बस मे फॉरेस्ट गार्ड बैठता है और कारों मे भी गार्ड बैठता है जिससे जारवा कोई गाड़ी ना रोक सके। यूं तो अब जारवा पहले की तरह नही है कि देखते ही तीर मार दे पर अभी भी अगर वो गाड़ी रोक ले तो जरा मुश्किल हो जाती है । वैसे अब वो लोग कुछ-कुछ हिंदी भी समझ लेते है और कुछ छोटे-छोटे शब्द भी बोलते है जैसे पान ,बिस्किट , खाना , पैसा वगैरा। अब तो कई बार वो लोग जंगल से जड़ी-बूटी , सुपारी लाते है और दुकानों मे बेचते है और बिस्किट, पान वगैरा खरीदते है। जारवा लड़कियों को सजने का बहुत शौक़ होता है और उन्हें लाल,नीला रंग पसंद है कहने का मतलब है कि उन्हें bright colours पसंद आते है । ज्यादातर महिलाएं गले मे और सिर पर कुछ ना कुछ जरूर पहने रहती है। इनके बच्चे अलग-अलग तरह से अपने चेहरे को रंग कर रखते है।

पूरे एक घंटे लगते है जंगल पार करने मे और जैसे ही जंगल ख़त्म होता है क्रीक आ जाती है जिसे ferry के द्वारा पार करना होता है। पर कई बार यहाँ बहुत समय लग जाता है क्यूंकि वहां २ ferry ही चलती है। बारातांग भी बहुत ही छोटी सी जगह है । यहाँ पर p.w.d का एक छोटा सा गेस्ट हाउस है , वैसे पर्यटक लोग तो सुबह जाते है और शाम को पोर्ट ब्लैयेर वापस चले जाते है क्यूंकि वहां इतनी जगह ही नही है कि इतने लोग वहां ठहर सके।

सबसे पहले limestone caves देखने जाना चाहिऐ क्यूंकि दोपहर के बाद उसे बंद कर देते है। यूं तो केव छोटी सी है पर कई जगह उसमे कुछ प्रतिमाएँ सी बनी हुई नजर आती है। पहले बोट से करीब एक घंटे जाना पड़ता है फिर बोट से उतरकर पैदल जाना पड़ता है करीब बीस-तीस मिनट , हालांकि वहां तक जाने का रास्ता खेत -खलिहानों से होते हुए जाता है पर चुंकि वहां भी गरमी और बारिश दोनो होती है इसलिये छाता लेकर जाना चाहिऐ और पानी भी जरूर ले जाना चाहिऐ पीने के लिए।
mud volcano जो कि सुनामी के बाद फिर से जीवित हो गया था वो भी देखने लायक है। रास्ता तो ठीक -ठाक ही है पर ये थोडा ऊंचाई पर है क्यूंकि इससे पहले जब ये फटा था तो जमीन से काफी ऊपर हो गया है। एकदम किसी पहाड़ कि तरह ।
यहाँ पर बालुडेरा नाम का एक beach है जो सुनामी के पहले तो बहुत ही सुंदर था वहां पर cane से पानी के बीच मे जाने का रास्ता और बैठने के लिए कुर्सी बनी हुई थी और जहाँ बैठकर समुन्दर का मजा उठाया जा सकता था पर सुनामी मे वो सब बह गया । यहाँ पर हम सुनामी के बाद कि फोटो लगा रहे है क्यूंकि सुनामी के पहले वाली हमारी फोटो भी सुनामी मे बह गयी है। अब तो beach मे वो बात नही रही क्यूंकि बारातांग मे सुनामी ने इस beach को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था ।
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ख़बरों की खबर जान्हवी का ट्विस्ट
आज सुबह जब हमने न्यूज़ देखने के लिए आज तक चलाया तो उस पर और अन्य चेन्नलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ मे यही खबर दिखायी जा रही है की जान्हवी ने अभिषेक पर क्या -क्या आरोप लगाए है । और आज तक तो जैसा वो दावा करता है कि वो सबसे आगे रहता है तो बस उस चैनल पर सिर्फ यही खबर पिछले एक घंटे से दिखायी जा रही है। अभी तक तो शादी की खबरें दिखा-दिखा कर परेशान किये हुए थे उस पर ये खबर। और जान्हवी से बात करना और दुनिया भर के बकवास सवाल पूछना , आख़िर ये लोग ये क्यों नही समझते कि आज कल लोग कई बार मीडिया के द्वारा मशहूर होना चाहते है और ये जान्हवी प्रकरण उसी का सबूत है। आज का पूरा दिन तब तक सिर्फ इसी खबर को दिखायेंगे जब तक कि शादी ना शुरू है जाये।
अभी तो अमर सिंह और अमिताभ से भी ये सवाल पूछेंगे कि जान्हवी के बयान मे कितनी सच्चाई है ?
क्या वाकई मे अभिषेक ने उससे शादी का वादा किया था ?
अरे भाई जब पुलिस ने ही उसकी रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया तो फिर इतना बढावा किस लिए? आज तक ने तो जैसे एश्वर्या की तारीफ़ का ठेका ही उठा लिया है माना कि वो सुन्दर है , जिस दिन से शादी तै हुई है रोज कम से कम आधे घंटा तारीफ़ करने मे बिताते है।
खैर हम कर भी क्या सकते है ज्यादा से ज्यादा न्यूज़ नही देखेंगे ,यही ना। क्यूंकि आज का दिन तो सारे चैनल इसी शादी मे व्यस्त रहेंगे ।
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Thursday, April 19, 2007
सोनी के ....
लीजिये हम फिर से हाजिर है दुर्गेश नंदिनी को लेकर । पैसे के लिए बेटे और बहु किस हद तक जा सकते है और दुर्गेश कैसे हर मुसीबत को दूर करतीहै ये इसमे देखा जा सकता है। दुर्गेश हर जगह सही समय पर पहुंच जाती बिल्कुल spider वूमन की तरह एक पल मे ऑफिस तो एक पल मे घर पहुंच जाती है। कमाल की फुर्ती है और मजाल है जो चेहरे पर शिकन आ जाये। पर छोटे- छोटे बच्चों का अपने माँ-बाप पर निगरानी रखना कुछ अच्छा नही लगता है।
सोनी पर ही जीते हैं जिसके लिए आता है जो अभी तक बहुत अच्छा चल रहा है और अपनी कहानी से भटका नही है। यूं तो इसमे सब कुछ अच्छा है सिर्फ एक बुआ (अदिरा )को छोड़कर, पर कम से कम इसमे वो सास -बहु की खिट-खिट नही है। वैसे बुआ ने गड़बड़ करने मे कोई कसर नही छोडी है।
सबसे कमाल का तो एक लडकी अनजानी सी है जिसमे पिछले हफ्ते लगा की चलो अब तो हीरो -हिरोइन मिल गए और अब पूरा परिवार हंसी-ख़ुशी रहेगा पर नही फिर से एक नयी लडकी का किरदार इसमे जोड़ दिया , इसे आगे बढ़ाने के लिए।
सबकी बात हो और बाबूजी की ना हो ऐसा कैसे कर सकते है। हम बात थोड़ी ख़ुशी थोड़े गम की कर रहे है जिसमे एक गुजराती परिवार को दिखाया गया है और इसकी खासियत ये है कि इस सीरियल मे ना तो सास अपनी बहुयों को तंग करती है और ना ही बहुएं अपनी सास को खरी- खोटी सुनाती है बल्कि इसके उलट इसमे सास बहु मे बहुत अच्छा तालमेल और प्यार दिखाया है । वैसे इसमे बाबूजी से जरूर बहुओं की थोड़ी -बहुत तकरार चलती है पर सास हमेशा अपनी बहुओं का ही पक्ष लेती है। जो बालाजी के सीरियल से बिल्कुल उल्टा है ।
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द ब्रित्तो
नाम कुछ अजीब है पर गोवा मे इस नाम का एक रेस्तारेंट समुन्दर किनारे बना है जहाँ अगर शाम को जाया जाये तो बहुत अच्छा लगता है वो इसलिये क्यूंकि आजकल गोवा मे बहुत गरमी पड़ रही है वैसे तो पर्यटक घूमते ही है पर बेहतर है की दिन की बजाए शाम को जाये। यहाँ पर भी माँसाहारी खाना जैसे sea food platter (जिसमे क्रेब को prawn मे stuff करते है) और chicken platter काफी अच्छा होता है और साथ ही साथ शाकाहारी भोजन मे भरवा मशरूम बहुत अच्छा होता है ।
britto मे खाने के साथ साथ आप आतिश बाजी का भी मजा उठा सकते है क्यूंकि अक्सर समुन्दर के किनारे होटल वाले आतिश बाजी करते है । और खाने के बाद आप समुद्र तट पर टहलने का आनंद भी उठा सकते है जो सेहत के लिए भी अच्छा होता है । खाना ,समुन्दर का किनारा ,और आतिश बाजी आपकी शाम को हसीन बनाते है ।
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Labels: goa, गोवा मे खाने की जगह
Wednesday, April 18, 2007
testing हिट के लिए नही था
हिट लेना हमारा मकसद नही था पर क्यूंकि उस समय हम अपनी ब्लोग पर कुछ बदलाव कर रहे थे और हमारे कंप्यूटर की स्क्रीन पर सब कुछ उल्टा पुल्टा दिख रहा था इसलिये ये देखने के लिए किया था कि कहीँ और लोगो को तो ब्लोग पढने मे दिक्कत नही आ रही है और आप सबकी बहुमूल्य टिप्पणियों की बदौलत हमे ये पता भी चल गया इसके लिए आप सबका धन्यवाद ।
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Tuesday, April 17, 2007
दुर्योधन
क्या हुआ ये नाम सुनकर चौंक गए , घबराइये मत हम यहाँ कोई महाभारत नही सुनाने जा रहे है। ये नाम यूं तो आम तौर पर सुनाई नही देता है खासकर उत्तर भारत मे पर, अंडमान मे हम कह सकते है कि ये नाम बहुत आम है, वैसे ३ दुर्योधन नाम के व्यक्तियों से हमारा सामना हुआ। पहली बार ये नाम हमने p.w.d.मे काम करने वाले plumber का सुना तो सुनकर यकीन ही नही हुआ कि कोई दुर्योधन नाम भी रख सकता है।
पर जब हमने दूसरी बार ये नाम अपने पतिदेव के ऑफिस मे काम करने वाले एक आदमी का सुना तो लगा की लो एक और दुर्योधन मिल गया । उन दिनों हम घर मे काम करने के लिए आदमी खोज रहे थे वैसे आपको शायद यकीन नही होगा कि अंडमान मे servant मिलना किसी खजाने के मिलने से कम नही है क्यूंकि वहां ज़्यादातर लोगों के पास या तो नारियल के बाग़ है सुपारी के बाग़ और काफी लोग खेती भी करते है। चुंकि वहां के लोगों खाना बहुत सादा है चावल और मछली, मतलब ना तो उन्हें काम की जरुरत है और ना वो करना चाहते है। और अगर काम करते भी है तो उन्हें पक्की नौकरी चाहिऐ होती है अगर नौकरी दिला सकते है तो आपको काम करने वाले मिल सकते है। खैर करीब २ महीने की जद्दोजहद के बाद एक आदमी मिल ही गया, अब इसे इत्तेफाक कहिये या हमारी किस्मत की उसका नाम भी दुर्योधन था। पर ये दुर्योधन खाना बहुत अच्छा बनता था बिल्कुल उसी तरह जैसे वो दुर्योधन युद्घ करता था। अब ये मत पूछिये की खाने और युद्घ का क्या संबंध? है भाई खाना बनाना भी किसी युद्घ से कम नही होता है।
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Labels: अंडमान-निकोबार
Monday, April 16, 2007
ख़बरों की खबर २ :एक और किस्सा शिल्पा का
शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गेरे जो किसी एड्स जागरूकता कार्यक्रम के लिए दिल्ली गए थे, आज सुबह से हर न्यूज़ चैनल सिर्फ यही दिखा रहा है की गेरे ने शिल्पा के साथ क्या किया . हर कोई अपने हिसाब से न्यूज़ को बढ़ा - चढा कर दिखा रहा है की गेरे ने किस तरह शिल्पा के साथ बदतमीजी की या जोर जबरदस्ती की , ऐसा लगता है मानो और कोई न्यूज़ ही ना रह गयी हो। हर चैनल पर या तो ये सवाल पूछा जा रहा है की क्या गेरे को माफ़ी मांगनी चाहिऐ या क्या जो कुछ गेरे ने किया वो सही था या गलत ? मजाल है की आप कोई और न्यूज़ देख ले। इसमे सही या गलत का फैसला करना बड़ा मुश्किल है क्यूंकि २ संस्कृति के लोग है एक पश्चिमी सभ्यता जहाँ इसे बुरा नही माना जाता है.और हमारी हिंदुस्तानी सभ्यता जहाँ इसे बुरा मानते है। वैसे आजकल हमारे हिंदुस्तान मे भी लोग (फिल्मी लोग और hi-fi लोग )एक -दुसरे से मिलते है। क्यों कि वो ये दिखने की कोशिश कर रहे थे की छूने और किस करने से एड्स नही फैलता है । हांलाकि जैसा कि शिल्पा ने कहा कि जरा कुछ ज्यादा ही हो गया था।
Posted by mamta at 8:58 PM