टी.वी.सीरियल की एक बात बहुत अच्छी है कि इसमे दर्शक कुछ भी मिस नही करता है क्यूंकि आप जब भी देखना शुरू करें लगता है कहानी अभी वहीं की वहीं है हाँ बस खलनायक और खलनायिका के जुल्म जरुर बढ़ गए होते है। वो चाहे क्यूंकि ......हो या कहानी घर....हो सलोनी हो...या दुल्हन ...या फ़िर छूना है आस्मान ही क्यों ना हो। अभी कल ही हमने कई दिनों बाद जी टी.वी.देखा तो दुल्हन सीरियल मे कहानी तो कुछ ख़ास नही बढ़ी थी पर हाँ पुनर्जन्म का किस्सा देखने को मिला और हमे हमारी पोस्ट लिखने का विषय भी मिला।
टी.वी.के सीरियल मे भी फिल्मी दांव-पेंच देखने को मिलते है। अब जब टी.वी.मे जब नाच-गाना सब कुछ फिल्मी स्टाइल का होने लगा है तो भला पुनर्जम का विषय कैसे छूट जाता। अभी तक तो फिल्मों मे ही पुनर्जन्म दिखाया जाता था पर अब तो टी.वी.के सीरियल मे भी पुनर्जन्म की कहानी दिखाने का चलन होने जा रहा है।पुनर्जन्म पर बनी फिल्में जैसे सुभाष घई की कर्ज और अभी हाल ही मे बनी फरहा खान की ओम शान्ति ओम काफी चली है।
अभी तक एकता कपूर के सीरियल मे तथा दूसरे सीरियल मे नायक या नायिका अपने दुश्मन( जो की आम तौर पर घर वाले ही होते है) से बदला लेने के लिए चेहरे बदल लेते थे ।कई बार तो एक्सीडेंट मे मर भी जाते है पर फ़िर चेहरे बदल कर बदला लेने आ जाते है। पर एक बात है कि हीरो या हेरोइन ही चेहरे बदलते है बदला लेने के लिए कभी खलनायक या खलनायिका नही।अब चेहरे बदलने का तरीका हुआ पुराना इसलिए अब पुनर्जन्म का चक्कर शुरू होने जा रहा है। जी टी.वी.पर आने वाले सीरियल बनूँ मैं तेरी दुल्हन मे सीरियल की खलनायिका (यानी हीरो की बहन) ने हीरो और हिरोइन दोनों को मार दिया है और अब वो दोनों पुनर्जन्म लेकर खलनायिका से बदला लेने आ गए है।
दुल्हन से पहले एकता कपूर के एक सीरियल शायद काजल मे भी पुनर्जन्म को दिखाया गया था । और इस दुल्हन सीरियल की कहानी को भगवान कृष्ण के जन्म की तरह दिखाया है बस फर्क इतना है की एक तो बच्चा जेल मे नही पैदा होता है और दूसरा इसमे बच्चे को उसका पिता वासुदेव जी की तरह बारिश मे यशोदा जी के घर छोड़ने नही जाता है।बल्कि अस्पताल मे ही बच्चे बदल देता है।
नोट-- अब आजकल तो ब्लॉगिंग के नशे के बाद टी.वी.देखना बहुत कम हो गया है।पर फ़िर भी हम टी.वी.देखते तो रहते है ।
Friday, February 29, 2008
पुनर्जन्म का चक्कर अब टी.वी.सीरियल मे भी
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Thursday, February 28, 2008
बेलिबास योगा ( गुरु और रूप अनेक )
योगा जिसे भारत मे सदियों से ऋषि मुनि और साधू संत लोग करते आए है आज देश विदेश मे मशहूर हो रहा है।माना जाता है कि आज कल की भाग दौड़ भरी जिंदगी मे योगा करने से लोग स्वस्थ रहते है।योगा करने के लिए खुले माहौल जैसे बगीचे मे ,नदी या समुन्दर किनारे को सबसे अच्छा माना जाता रहा है।
आज कल योगा बहुत ही ज्यादा प्रचलित हो रहा है । हर कोई योग गुरु बन रहा है। २०-२५ साल पहले दूरदर्शन पर भी योगा दिखाया जाता था जिसमे गुरु (सरदारी लाल सहगल) के दो शिष्य एक महिला और एक पुरूष उनके बताये हुए आसान करते थे।और गुरु बताते थे कि किस तरह से आसन करना है और किस आसन से कौन से रोग ठीक होते है वगैरा -वगैरा।
कुछ समय बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी और डॉली जी का कार्यक्रम दूरदर्शन पर आना शुरू हुआ जिसमे डॉली जी लोगों की समस्याएँ पढ़ती थी और धीरेन्द्र ब्रह्मचारी उनका जवाब देते थे और योग के विभिन्न आसान बताते थे।
श्री श्री रवि शंकर जी भी योगा और मेडिटेशन और सुदर्शन क्रिया पर जोर देते है। ना केवल देशी बल्कि विदेशी लोग भी बड़ी संख्या मे इनके भक्त है।इनके एक-एक शिविर मे २५ से ३० हजार लोग आते है।
और एक योग गुरु भरत ठाकुर ने भी योगा करने के अलग-अलग फायदे बताये। कुछ दिन तक आज तक या शायद किसी और चैनल पर दिन मे ३-४ बार भारत ठाकुर लोगों को योगा सिखाते हुए दिखाते थे।कभी-कभी भरत ठाकुर के साथ कोई शिष्य या शिष्या भी योग करते हुए दिखाई जाती थी।
और आज के सबसे बड़े योग गुरु बाबा रामदेव जिन्होंने योगा को घर-घर पहुंचाया। बाबा राम देव ना केवल टी.वी.पर योगा सिखाते है बल्कि देश -विदेश मे भी अपने योगा शिविर लगाते है।बाबा रामदेव ख़ुद तो योग आसान करके दिखाते है और साथ मे उनके दो शिष्य भी योग आसन करते है और रामदेव के साथ-साथ हजारों कि संख्या मे जनता भी योग करती है। कुछ घर पर तो कुछ उनके द्वारा आयोजित शिविर मे।
और आज कल शिल्पा शेट्टी भी योग गुरु बन गई है ।अब योग गुरु है तो शिल्पा ने योगा की डी.वी.डी.बाजार मे ला दी है। अब इस डी.वी.डी को निकालकर शिल्पा ने लोगों का भला किया या अपना ये तो पता नही।
योगा ना केवल अपने देश मे बल्कि विदेशों मे भी खूब प्रचलित हो रहा है।विदेशों मे भी नित्य नए गुरु पैदा हो रहे है जो अपने हिसाब से योगा मे modification करते रहते है।हाल ही मे अमेरिका के एक अमरीकी योग गुरु का कहना है कि बेलिबास योगा व्यक्ति को ज्यादा लाभ पहुंचाता है क्यूंकि बेलिबास योगा करने मे व्यक्ति का ध्यान पूरी तरह से योगा मे लगता है।
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Wednesday, February 27, 2008
सुनामी से हुई बर्बादी और हम
सुनामी के दिन करीब चार-पांच घंटे बाद जब पानी उतर गया तो बाक़ी दूसरे लोगों की तरह हम लोग भी अपने घर की ओर गए ।घर जाते हुए मन मे एक अजीब सा डर था की पता नही घर का क्या हाल होगा। और जब हम लोग अपने घर पहुंचे तो घर की हालत देख कर सकते मे आ गए , कलेजा मुँह को आ गया।घर का सारा सामान तितर-बितर हो गया था। किचन का सामान जैसे मिक्सी,जूसर का एक पार्ट गार्डन मे तो दूसरा पार्ट दरवाजे पर। और डाइनिंग टेबल का सामान जैसे मैट्स ,स्पून ,अचार और जैम की बोत्तले सब बाहर बगीचे मे ।फ्रिज तो पूरा अप साईड डाउन माने उल्टा पड़ा हुआ था। लौंदरी बैग कपडों के साथ बाहर कीचड मे। ड्राइंग रूम का समान जैसेसोफा सेट वगैरा तो उलट-पलट गए थे। छोटे-छोटे सजावटी सामान इधर-उधर बिखरे पड़े थे।पतिदेव का ऑफिस का बैग बहकर दूर चला गया था । हमारे एक गणेश जी की मूर्ति ड्राइंग रूम से बहकर हमारे घर की सीढियों पर आ गयी थी।जिन्हें हमने उठाकर गाड़ी मे रख लिया था।
पूरा घर काले रंग के कीचड और पत्तियों से भरा पड़ा था । चूँकि हमारे पैर मे चोट थी इसलिए हम तो अन्दर नही गए हमारे पतिदेव और बेटे ने घर मे जाकर ऊपर की मंजिल से धीरे-धीरे जितना सामान अटैचियों मे भर सकते थे भर कर नीचे गाड़ी मे लाये।हमारे किचन का तो ऐसा हाल था कि लगा ही नही रहा था कि वहां कोई सामान भी था। अलमारी मे से डिब्बे गायब,बर्तन गायब। जो बर्तन अलमारी के ऊपर के खाने मे रहते थे वो किचन की जमीन मे काले रंग के कीचड मे लथपथ थे।कोई भी सामान अपनी जगह पर नही था।(ये हमारे घर की फोटो है इस फोटो मे जाली के दरवाजे के ऊपर की तरफ़ जो हरा-हरा दिखाई दे रहा है सुनामी का पानी उतने ऊपर तक आया था )और फ़िर अगले तीन-चार दिन घर की सफ़ाई करवाने और सामान खोजने मे लगे रहे थे। 
सामान निकालने के बाद गाड़ी का ख़्याल आया और जब गैराज की तरफ़ गए तो देखा की सुनामी के पानी ने गैराज का दरवाजा तोड़ दिया था और गैराज मे खड़ी हमारी जिप्सी पानी मे पूरी डूब गई थी।और साईड मे जो किताबों की अलमारी थोडी सी दिख रही है किताबों से भरी थी और दीवार मे फिक्स थी पर पानी के तेज बहाव के कारण पड़ोसी के घर से बहकर हमारे घर आ गई थी।
सुनामी के छः दिन पहले ही हम इलाहबाद और दिल्ली जाकर वापिस अंडमान लौटे थे।हमेशा हम नेतराम की दूकान की एक किलो इमारती ले जाते थे पर उस बार हम दो किलो इमारती ले गए थे .(हमारी सेहत का राज ही ये है ) हरी की दुकान के समोसे ,इलाहबाद की सेंवई और मम्मी के हाथ की बनी बढियां और अचार (सिर्फ़ हमारे खाने पीने के बैग का वजन १७-१८ किलो था )। पर वो कहते है ना की नसीब से ज्यादा इंसान के हिस्से कुछ नही आता। और हमारे साथ भी वही हुआ। चूँकि हमने सारा सामान किचन मे रक्खा था इसलिए सुनामी मे सब बरबाद हो गया।उसके अगले तीन-चार दिनों मे हम लोगों ने धीरे-धीरे सारा सामान घर से बाहर निकाला और बाद मे सारा सामान दिल्ली भेजा। क्यूंकि एक तो हम लोग अपने दोस्त के घर रह रहे थे और दूसरे की अगर कभी अंडमान से भागना पड़े तो ,क्यूंकि वहां भूकंप के बहुत झटके आते रहते थे और अंडमान मे ये ख़बर उड़ती रहती थी की अंडमान डूब जायेगा।क्यूंकि वहां के जो हालात थे शुरू के दिनों मे उन्हें देख कर तो यही लगता था। भूकंप के झटकों से सड़कें ऊपर-नीचे हो गई थी। हर जगह समुन्दर को रोकने वाली दीवार ढह गई थी। हर तरफ पानी घरों और सड़कों पर नजर आता था। और ये हालात और हालत सुधरते -सुधरते महीनों लग गए थे।
(ये फोटो मरीना पार्क की है। )
अपने घर से निकल कर हम लोगों ने गाड़ी से एक चक्कर पोर्ट ब्लेयर का लगाया और चारों ओर हुई तबाही को देख
कर दिल एक अजीब सी भावना से भर गया।बस गनीमत ये थी की पोर्ट ब्लेयर मे माल का नुकसान हुआ था जान का नही. कहीं मारुति कार नारियल के पेड़ पर तो कहीं कार पार्क की रेलिंग पर। हम लोगों की कालोनी रहने वाले एक साहब की कार तो पानी के साथ बहकर sea bed तक पहुँच गई थी।मरीना पार्क की रेलिंग टूट गई थी और स्पीड बोट ,पैडल बोट सब सड़क पर आ गई थी।(ये सिप्पी घाट के एक घर की फोटो है जो सुनामी के महीनों बाद भी इसी हालत मे था । )
कोर्बईन् कोव जो की एकलौता beach है पोर्ट ब्लेयर मे उसका तो ये हाल था की वहां समुन्दर का पानी सड़क पर ही आ गया था। पूरी सड़क पर रेत ही रेत थी।और सुनामी के बाद भी पानी का लेवल बढ़ गया थ। हाई टाईद मे कोर्बईन् कोव पर पानी सड़क पर आ जाना बड़ी आम बात हो गई थी।
खैर भागने की नौबत तो नही आई और कुछ दिन बाद हम लोगों को घर भी मिल गया तो दिल्ली से सारा सामान वापस मंगाया गया।घर मिलने पर मम्मी को सबसे ज्यादा चिंता थी कि समुन्दर तो वहां नही है तो हमने कहा कि अब समुन्दर के सामने रहने का हमारा शौक पूरा हो गया है। इस बार हमारा घर पोर्ट ब्लेयर की सबसे ऊँची जगह पर है।जहाँ से समुन्दर दिखता तो है पर कोई खतरा नही है।
हमारी सुनामी का अंत दिसम्बर जनवरी मे नही हुआ बल्कि मई मे जाकर हमारी सुनामी ख़त्म हुई।
ये सभी फोटो एक हफ्ते बाद ली गई थी ।
सुनामी से जुड़े पिछले लेख।
२६ दिसम्बर की वो सुबह
सुनामी ना पहले कभी सुना और ना देखा
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Tuesday, February 26, 2008
बजट लो जी फ़िर आ गया
ये फरवरी के आखिरी दिन बजट के लिए ही बने है। हर साल १५ फरवरी बीतते -बीतते हर तरफ़ सिर्फ़ बजट का ही शोर रह जाता है कि इस साल शायद बजट मे जनता के लिए कुछ जबरदस्त होगा पर बजट पेश होने के बाद वही ढाक के तीन पात।यानी ना तो आम आदमी और ना ही ख़ास आदमी खुश हो पाता है।आम आदमी ताउम्र सिर्फ़ इसी आस मे बिता देता है कि इस बार ना सही अगले साल का बजट जरुर कुछ अच्छा होगा।वो कहते है ना उम्मीद पर दुनिया कायम है।
पहले यानी जब पढ़ते थे तब बजट से कोई ख़ास वास्ता नही रहा , हाँ हमेशा ये जरुर सुनते रहे कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही।शादी के बाद भी कुछ ऐसा ही सुनने को मिलता रहा कि इस साल इन्कम टैक्स मे छूट बढेगी या नही। एक्स्साइज ड्यूटी घटेगी या बढेगी। घरेलू चीजों, दवाओं के दामों मे कटौती या बढौती।रेल किराया और हवाई जहाज का किराया बढेगा या वही रहेगा।कौन -कौन सी चीजों पर सबसिडी मिलेगी। घर खर्च पर बजट से क्या असर होगा। लोक सभा मे बजट आने के बाद घर का बजट जरुर गड़बड़ा जाता है।
उफ़ बाबा हर साल यही होता है जहाँ फरवरी आई हर कोई अपने हिसाब से सोचने लगता है । पर वित्त मंत्री वो चाहे मनमोहन सिंह रहे हो या विश्वनाथ प्रताप सिंह रहे हो या यशवंत सिंह रहे हो या फ़िर पिछले चार साल पुराने वित्त मंत्री चिदंबरम ही क्यों ना हो, उन्हें आम आदमी की कोई ख़ास चिंता रहती है,ऐसा कुछ नजर नही आता है। हर बजट के पहले कहा जाता है कि ये आम आदमी के लिए बनाया गया है पर जब बजट लोक सभा मे पेश होता है तो पता चलता है कि आम आदमी तो बेचारा बजट के नीचे ही दब गया ।
होम लोन पर अगर ब्याज घटाते है तो इन्कम टैक्स बढ़ा देते है । कभी गैस सिलिंडर का दाम बढ़ाते है तो दो-चार रूपये घरेलू सामान पर घटा कर कहते है कि आम आदमी के हित मे बजट पेश हुआ है ।दिनों दिन बढ़ती महंगाई और आम आदमी जिसे भगवान ने कुछ ख़ास ही मिटटी का बनाया है कि वो सब कुछ झेल जाता है।चलिए इस बार देखें की २९ फरवरी को वित्त मंत्री चिदंबरम जी क्या करते है।जनता की उम्मीद पर पानी फेरते है या .....खरे उतरते है।
पर जरा आम आदमी से तो पूछो कि क्या वाकई बजट से वो खुश है।
अरे आज तो लालू जी रेल बजट पेश करने वाले है।
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Monday, February 25, 2008
जब चोट लगती है तभी साइकिल चलानी आती है.
बात उन दिनों की है जब हम सातवीं क्लास मे पढ़ते थे ।उन दिनों इलाहबाद मे तो यूं भी साइकिल सेस्कूल जाने
का बड़ा रिवाज था ।(वैसे तो आज भी बच्चे साइकिल से स्कूल से जाते है ) लड़का हो या लड़की ज्यादातर बच्चे साइकिल से ही स्कूल जाते थे। हमारे घर मे भी दीदी लोग साइकिल से स्कूल जाती थी पर चूँकि हम सबसे छोटे थे इसलिए हमने साइकिल चलाना जरा देर मे सीखा।
अब सीखने के लिए साइकिल तो हमे शाम को ही मिलती थे दीदी लोगों के स्कूल से आने के बाद।शुरू मे कुछ दिन तो भइया और हमारी दीदी ने हमे साइकिल चलाना सिखाया की कैसे पैडल पर पैर रखकर कैंची चलते है और किस तरह सीट पर बैठते है और साइकिल का हैंडल हमेशा सीधा रखना चाहिए और सबसे ख़ास हिदायत कि कभी भी दोनों ब्रेक एक् साथ मत लगाना । शुरू मे दो-तीन दिन जब हम साइकिल चलाते तो भइया या दीदी पीछे से कैरियर पकड़े रहते और हम पीछे देखते रहते की उन लोगों ने साइकिल पकड़ रखी है।और हमे चलाते हुए ये विश्वास रहता की अगर हमारी साइकिल गिरेगी तो भैया या दीदी हमे गिरने से बचा लेंगे।दीदी हमेशा कहती कि सामने देखा करो पीछे नही। खैर पाँच-छः दिन बाद हम जब साइकिल चला रहे थे तो हमे पता ही नही चला की दीदी ने साइकिल का कैरियर कब छोड़ दिया और हमने बड़े आराम से अपने मोहल्ले मे साइकिल चलाई। और उस दिन हमे यकीन हो गया की अब तो हमे साइकिल चलानी आ गई है। और अब हम बिना किसी की मदद के चला सकते है।
घर मे सभी ने ये हिदायत दी कि साइकिल चलाते हुए कभी भी भीड़-भाड़ या गाय-बकरी देख कर घबडाना नही चाहिए। और ये भी कहा की साइकिल चलाते हुए हमेशा सामने देखना चाहिए पैडल या पीछे की ओर नही।(क्यूंकि जब साइकिल सीखते है तो ध्यान पैडल पर ज्यादा रहता है. )करीब एक हफ्ते या दस दिन तक हमारी साइकिल क्लास चली। उसके बाद जब हमे जरा विश्वास हो गया की अब तो हम साइकिल चलने मे निपुण हो गए है तो एक दिन शाम को हम बिना किसी को बताये चुपचाप साइकिल लेकर निकल गए पर अभी साइकिल चलाना शुरू ही किया था की अचानक हम अपना संतुलन खो बैठे और साइकिल समेत नीचे गिर पड़े। पहले तो झट से उठे और चारों ओर देखा की कोई देख तो नही रहा है। तभी हमारी नजर घुटने और कोहनी पर गई और बस हमारा रोना शुरू क्यूंकि हमारे घुटने और कोहनी से खून निकल रहा था।
खैर साइकिल को लेकर आंसू बहाते हुए हम घर आए । घर मे सबने हमे रोते हुए देख कर कहा कि ममता अब तुम पूरी तरह से साइकिल चलाना सीख गई हो। क्यूंकि जब तक चोट नही लगती है तब तक साइकिल चलानी नही आती है।और वाकई उसके बाद हमने बाकायदा साइकिल चलाना शुरू किया और फ़िर हमारे लिए हीरो साइकिल खरीदी गई और हम भी बड़ी शान से बारहवीं क्लास तक साइकिल से ही स्कूल जाते रहे।
साइकिल क्या जीवन मे भी जब चोट लगती है तब हम बहुत कुछ सीखते है।
कुछ ज्यादा ही दार्शनिक बात हो गई। :)
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Sunday, February 24, 2008
बन्दर का नाच
आज रविवार है ना तो सोचा क्यों ना बचपन की कुछ याद ही ताजा कर ली जाए। जी हाँ आज हम आप सबको अपने सबके बचपन के उन दिनों मे ले जाने की कोशिश कर रहे है जब मनोरंजन के लिए यही सब कुछ होता था। अक्सर रविवार के दिन साँप,भालू,बन्दर वाले आते थे । जहाँ भालू और बन्दर वाले भालू और बन्दर का नाच दिखाते थे वहीं साँप वाले साँप और नेवले की लड़ाई दिखाते थे और पता नही कितने तरह के साँप दिखाते थे।
इसे देख कर लगा कि आज भी इतने सालों बाद कुछ भी नही बदला है। बदला तो बस इतना कि बन्दर वाला अब ५-१० रूपये की जगह सौ रूपये मांगता है। हमने १०० तो नही ५० रूपये दिए थे।और साथ मे केले और बिस्कुट दिए थे।
नोट-- और हाँ कुछ खा-पीकर देखियेगा क्यूंकि सुना है सुबह-सुबह बन्दर (हनुमान जी का नही )का नाम लेने से दिन भर कुछ खाने को नही मिलता है। :)
यूं तो ये विडियो हमने पिछले साल आगरा से फतेहपुर सीकरी जाते हुए हाईवे पर बनाया था।आप विडियो देखिये ।
नोट-- हम भी इस बात को ठीक नही समझते है। पर सिर्फ़ ये दिखाने के लिए ये विडियो लगाया है कि पचास साल बाद भी हम वहीं के वहीं है।
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Saturday, February 23, 2008
दो सौवी पोस्ट जरा एक नजर
आज ये हमारी दो सौवी पोस्ट है ।यकीन नही हो रहा है । इतनी सारी पोस्ट लिखने की हिम्मत और हौसला आप लोगों से ही मिला है।जब हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तो रोमन हिन्दी मे लिखते थे। और इसीलिए शुरू की चार पोस्ट रोमन मे है और उसके बाद हमे हिन्दी राईटिंग टूल के बारे मे पता चला था।और तब पांचवी पोस्ट से हमने हिन्दी मे लिखना शुरू किया था।
पहले हम कुछ तरह से लिखते थे जरा गौर फरमाये।
Friday, February 23, 2007
Sony ki Durgesh nandini
kya kamal ka serial banaya hai , ichcha hoti hai ki director se ye poonchne ki ,ki aise bachche kahan hote hai. serial ne to ma aur bete ke rishte ki dhajjiyian hi uda di hai. mana ki aaj kal bachche paise ke peeche bhagte hai par jo launguage use ki gayi hai wo to meri samajh ke bahar hai. bete apne father ko buddha aur mother ko budhiya bolte hai.aur jaisa atyachar bete aur beti apni ma ke saath kar rahe hai wo to hamein aurangjeb ki yaad dilata hai.saare log overacting karte lagte hai. is serial ne to beti ko bhi nahin baksha, usse bhi property ka lalachi dikhaya hai jabki normally beti apna hissa nahin leti hai. chalo ek baar ko maan bhi le ki subko poroperty ka lalch hai per usse itna vibhats na dikhakar thoda hulke andaaj main bhi dikha sakte hai.
jis tarah se bete apni ma ho almari main bane chor darwaze ke peeche bane kamre main band rakhte hai,wo sub dikhakar director aakhir kya dikhana chahate hai,aise serials chote bachchon ke dimag par galat asar karte haiaur jo log zara bhi aise bigde dimag wale hai ye serial unnhe uksa sakta hai aisa hi kuch galat kaam karne ko.(ma,papa ko satane ka)
Posted by mamta at 3:58 PM
और आज हम जो भी थोड़ा बहुत लिख रहे है उसमे इस ब्लॉगर परिवार का बहुत बड़ा हाथ है क्यूंकि अगर आप लोग समय-समय पर हमारा मार्गदर्शन नही करते तो शायद हम यहां तक नही पहुँच पाते मतलब कब का ब्लॉगिंग को छोड़ कर भाग चुके होते।
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Friday, February 22, 2008
क्रिकेटर बिकते है बोलो खरीदोगे...
क्या ज़माना आ गया है की अब क्रिकेट खिलाडियों की बोली लगाई जा रही है।पहले कहानियो मे और इतिहास मे पढने को मिलता था की इंसानों की बोली लगाई जाती थी।जानवरों की बोली तो आज भी लगती है।समय बदला और अब क्रिकेट खिलाडियों की बोली लगाने का सिस्टम शुरू हुआ है।पहले लोग हाट-बाजार और सड़क चौराहे पर बोली लगाते थेअब बाकायदा बड़े होटल मे बढ़िया टेबल और पूरी शान-शौकत और खाने-पीने के बीच बोली लगाने (नीलामी की तरह) का सिलसिला शुरू हुआ है।
आई.पी.एल.ने ये नया फंडा शुरू किया है बोली लगाने का। पहले तो टीम के लिए बोली लगाई गई और अब खिलाडियों के लिए बोली लगाई गई।एक-एक टीम सौ साढ़े तीन सौ करोड़ मे बिकी है। और अब खिलाडी भी करोड़ों मे बिक रहे है। बिकने वाले खिलाडी और खरीद दार दोनों हाथों से दौलत समेटने मे लगे है।हर खिलाडी की कीमत करोडों मे मापी जा रही है।पर तब भी दादा यानी सौरभ गांगुली खुश नही नजर आ रहे है क्यूंकि उनकी कीमत धोनी से कम जो है।
अब खिलाडी की कीमत आलू -प्याज के जैसी हो गई . जैसे आलू-प्याज १० रूपये किलो बिकता है तो क्रिकेटर २-४ -6करोड़ मे । पर इन दो-चार करोड़ से भी अपने यहां के खिलाडी संतुष्ट नही क्यूंकि अब उन्हें खेल की जगह पैसा जो दिखाई दे रहा है। अब सौरभ गांगुली को ही देख लीजिये उन्हें जितना मिल रहा है उससे संतुष्ट नही है क्यूंकि उन्हें भी ६ करोड़ की कीमत चाहिए क्यूंकि धोनी की कीमत ६ करोड़ जो लगाई गई है। और तो और शाह रुख खान जिनकी कोलकता टीम के दादा कप्तान है उन्होंने सौरभ को धोनी से ज्यादा कीमत देने का भरोसा भी दिया है।(अब शाह रुख खान तो अपने डिश के विज्ञापन मे भी कहते है की संतुष्ट मत रहो और विश् करो । लगता है सौरभ ने ये विज्ञापन देखा है :) इसीलिए और विश् कर रहे है। अब जहाँ सौरभ को आइकोनिक प्लेयर बना दिया गया और उनकी कीमत फिक्स हो गई वहीँ धोनी अनमोल रहे क्यूंकि आईकोनिक प्लेयर जो नही थे । और इसीलिए चेन्नई के विजय माल्या ने उन्हें ६ करोड़ मे खरीदा।
अभी तो सिर्फ़ सौरभ ने कहा है अभी तेंदुलकर और द्रविड़ भी शायद अपनी कीमत धोनी से ज्यादा करने की मांग करेंगे। :)
Thursday, February 21, 2008
पहला जन्मदिन यानी ३६५ दिन ब्लॉगिंग के
आज यानी २१ फरवरी के दिन ही हमने ब्लॉगिंग की दुनिया मे जन्म लिया था ,अरे मतलब आज ही के दिन इसी समय हमने अपनी पहली पोस्ट लिखी थी।आज पूरा एक साल हो गया हमे ब्लॉगिंग करते हुए। जिस तरह से एक बच्चा अपने पैदा होने के साथ ही सीखना शुरू करता है ठीक उसी तरह हमने भी इस ब्लॉगिंग की दुनिया मे आकर बहुत कुछ सीखा है। हमारी शुरूआती दिनों की पोस्ट कुछ ऐसी ही थी जैसे जब बच्चा चलना सीखता है तो उसके कदम डगमगाते है पर धीरे-धीरे चलना सीख ही जाता है और इसी तरहडगमगाते हुए हमने भी ब्लॉगिंग के तीन महीने पूरे किए थे।
अपने इस एक साल की ब्लॉगिंग का सबसे ज्यादा श्रेय हमारे दोनों बेटों को है जिन्होंने हमे एक तरह से जबरदस्ती ठोक-ठोक कर ब्लॉगिंग करना सिखाया।और अभी भी जब भी कोई गड़बड़ होती है तो हम बेटों से ही पूछ कर ठीक करते है।पतिदेव तो हमसे कहते-कहते थक गए थे कि हम भी कंप्यूटर सीख ले।खैर अब सभी खुश है।
इस एक साल मे आप सबने अपनी टिप्पणियों से जिस तरह से हमारी हौसला अफजाई की है उसके लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। क्यूंकि जिस तरह इंसान को जिंदा रहने के लिए साँस लेने की जरुरत होती है उसी तरह ब्लॉगिंग मे ब्लॉगर को टिप्पणियों की जरुरत है। ये टिप्पणियां ना केवल हौसला बढाती है बल्कि गलतियों की ओर भी ध्यान दिलवाती है।
अभी हाल ही मे संजय जी ने अपनी एक टिप्पणी मे लिखा था की हमारे नाम के साथ tv क्यों लगा है।तो संजय जी वो इसलिए क्यूंकि जब हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तब हमने सिर्फ़ टी.वी सीरियल के बारे मे ही लिखने की सोची थी और इसीलिए हमारे ब्लॉग का नाम mamtatv है। पर धीरे -धीरे आप लोगों की टिप्पणियों की वजह से हमने भी ब्लॉगिंग करना कुछ सीख ही लिया है ।
इस एक साल के सफर मे हम रेडियोनामा से भी जुड़े और अपना एक और ब्लॉग सवा सेर शौपर भी शुरू किया। इसी एक साल के सफर के दौरान हमारे ब्लॉग को अवार्ड के लिए भी चुना गया।
आप सबके साथ और सहयोग के बिना इस एक साल के सफर को पूरा करना मुश्किल ही नही नामुमकिन भी था। एक बार फ़िर से आप सभी का तहे दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद और शुक्रिया ।
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Wednesday, February 20, 2008
अनचाहे मेहमान और हम
दिल्ली मे रहते हुए मेहमानों से दूर रहना मुश्किल ही होता है। गाहे-बगाहे लोग आ ही जाते और फ़िर अपनी खातिरदारी भी करवाते है आप चाहे या ना चाहे।अब अपने भारत मे तो मेहमान को भगवान का रूप ही माना जाता है मेजबान माने या ना माने ।कई बार तो ऐसे मेहमान आते कि लगता ओह बाबा ये कब जायेंगे।दिल्ली मे रहते हुए ऐसे लोगों मतलब मेहमानों से बहुत वास्ता पड़ता था।
ये तो हम सभी जानते है कि दिल्ली मे जितनी गर्मी पड़ती है उतनी ही ठंड भी पड़ती है।दिल्ली मे सर्दियों मे नल का पानी इतना बर्फीला ठंडा होता ह