बरसो रे ( अनलॉक २.० ) बारहवाँ दिन

बाबा रे इतनी ज़बरदस्त गरमी पड़ रही है कि कुछ पूछिये मत । बाहर मतलब बालकनी में निकलने में भी गरमी लगने लगी है ।

पिछले दो ढाई महीने से हम लोग रोज शाम को बालकनी में बैठकर कॉफ़ी वग़ैरा पीते थे पर इधर चार पाँच दिन से तो शाम को बाहर निकलने या बैठने का मन ही नहीं करता है ।

बाहर निकलते ही जैसे लू के थपेड़े मुँह पर लगते है ।

रोज सारे दिन बादल आते है छाते है और फिर हम सबमें बारिश की उम्मीद जगाते है और फिर टहल जाते है मतलब बिना बारिश किये ही बादल चले जाते है ।

और बादल आने से एक अजीब तरह की उमस भी हो जाती है जो और अधिक परेशान करती है ।

अब आज भी सुबह से बादल है और आंधी आने के भी आसार लग रहें है पर पता है शाम होते होते बादल उड जायेंगें । 😗



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