गुलाल देख ली और अब पोस्ट हाजिर है आप लोगों के लिए

जैसा कि हमने अपनी पिछली पोस्ट मे कहा था सो कल हमने गुलाल देख ली । फ़िल्म तो अच्छी है ,और फ़िल्म मे यूनिवर्सिटी और स्टेट लेवल की राजनीति दिखाई गई है पर गाली कुछ ज्यादा बोली गई है । हालाँकि इस फ़िल्म मे काफ़ी मार-पीट और खून-खराबा है पर फ़िर भी फ़िल्म देखने के बाद भी सिर मे कोई भारीपन नही महसूस होता है । ये शायद अनुराग कश्यप के डायरेक्शन का कमाल है । इस फ़िल्म मे भी राम लीला को बीच-बीच मे कहानी के साथ जोड़ा गया है बिल्कुल delhi 6 की तरह फ़िल्म के पहले सीन की शुरुआत के.के से होती है और आखिरी सीन की ...... से


फ़िल्म की शुरुआत मे एक सीधा सा लड़का दिलीप सिंह law करने के लिए जयपुर कॉलेज - यूनिवर्सिटी मे admission लेता है और वो रहने के लिए एक जगह कमरा किराये पर लेता है जहाँ उसकी मुलाकात रानाजय से होती है ।और जब दिलीप हॉस्टल मे वार्डन से मिलने जाता है तो हॉस्टल मे दादा टाइप लड़के कैसे पहले दिन ही उसकी रैगिंग करते है (बुरी तरह)और जब रानाजय को पता चलता है तो वो उसके साथ उन लड़कों की पिटाई करने जाता है पर .... । और फ़िर किस तरह चाहते हुए भी दिलीप राजनीति मे आता हैऔर जनरल सेक्रेटरी का इलेक्शन जीत जाता हैऔर फ़िर कैसे सारे हालात बदल जाते है किस तरह एक सीधे लड़के का जीवन फंस जाता है इस politics के चक्कर मे

यूँ student politics पर पहले भी फिल्में बनी है पर इसमे politics के साथ-साथ राजपूताना के अलग राज्य की मांग को भी दिखाया गया हैराजा और रजवाडों को दिखाया गया हैकिस तरह इलेक्शन जीतने के लिए क्या-क्या घपले किए जाते है और कैसे बाद मे अपने ही विरोधी के साथ लोग मिल जाते हैये अच्छा दिखाया गया हैपूरी फ़िल्म कहीं भी रुकती नही है

कुछ डाइलोग जैसे - जब कुछ नही है करने को तो law कर लोवैसे ७०-८० के दशक मे ऐसा कहा भी जाता था और होता भी था । :) और उस ज़माने मे यूनिवर्सिटी मे नेता टाइप लोग law ही किया करते थे जिससे वो लोग यूनिवर्सिटी मे भी रह सके और इलेक्शन भी लड़ सके
और दीवार के सीन मेरे पास माँ है का एक अलग ही नजारा देखने को मिलता हैऔर जो brain wash दिखाया गया उसके बारे मे पहली बार ८० मे हमने अपने कजिन जो कि उस समय मोती लाल इंजीनियरिंग कॉलेज इलाहाबाद मे पढता था ,सुना था

इस फ़िल्म मे एक्टिंग किसने सबसे अच्छी की है ,कहना मुश्किल है क्योंकि हर छोटे-बड़े कलाकार ने बेहतरीन अभिनय किया है फ़िर वो चाहे के.के.मेनन हो या आदित्य श्रीवास्तव हो या अभिमन्यु सिंह , या फ़िर नया हीरो राज सिंह चौधरी या फ़िर भाटी के रोल मे दीपक दोब्रियाल ही क्यों होयहाँ तक की जेसी रंधावा जो की एक मॉडल है उसने कम बोलते हुए सिर्फ़ आंखों से expreesion दिए हैमाही गिल और किरण के रोल मे आयेशा मोहन ने भी अच्छा अभिनय किया है . और सबसे अच्छे लगे पियूष मिश्रा जिन्होंने के.के.मेनन के बड़े भाई पृथ्वी का रोल किया हैफ़िल्म मे उनका किरदार भी बहुत अहम् हैमेनन और श्रीवास्तव राजपूत बनकर गजब के लगे है

सिर्फ़ शब्दों मे कहें तो गुलाल मतलब politics ,पॉवर ,और पैसा है

इस फ़िल्म के गानों के बोल बहुत असाधारण से लगे और आखिरी गीत वो दुनिया भी बहुत पसंद आयाइस गीत के एक-एक शब्द आज के समय मे बिल्कुल फिट बैठते हैऔर इस गीत की आखिरी लाइन और आखिरी सीन का फिल्माया जाना एक सवाल और जवाब छोड़ता हैतारीफ करनी होगी पियूष मिश्रा की जिन्हने इन गीतों को लिखा ,संगीतबद्ध किया और गाया भी हैवैसे ये गीत कुछ-कुछ प्यासा के गीत से इंस्पायर्ड है । तो आप भी सुनिए ये गीत ।

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Comments

Tarun said…
बहुत कुछ बता दिया, आजकल मूवी देखना बंद सा हो गया है। वक्त मिलने पर कई फिल्मों के लिये वक्त निकालना है।
चलिए अच्छा हुआ आपने सब बता दिया अब यूँ समझिये कि हमने फिल्म ही देख लिया
वैसे आप से बहुत कुछ जाना है इस फिल्म के बारे में। कभी अवसर होने पर देखते हैं इसे भी।
अछि समीक्षा रही. अब पिक्चर क्यों देखें. आभार.
Arvind Mishra said…
अरे मैं कल एक कन्फ्यूजन के चलते सपत्नीक एक दूसरी फिल्म देख बैठा -ढूंढते रह जाओगे ! ऐसे ही थी ! गया था गुलाल देखने -चलिए अपने भरपाई कर दी .,शुक्रिया !
mehek said…
samiksha aur geet dono pasand aaye.
शनिवार क़ी रात को दूसरी बार देख ली गुलाल...
Unknown said…
mujhe achhi lagi film lekin bahut zyada hinsa hai...
nirdeshak ek alag leek par chal rehe hain...aane wale samay mein inse kuch achhi film ki ummid ki ja sakti hai..
Rachna Singh said…
yaar kitni picture daekhti ho tum hadd haen !!!
Rachna Singh said…
This comment has been removed by the author.
mamta said…
tarun जी ,दिनेश जी , पलायनम जी , सुब्रमनियम जी ,अरविन्द जी फ़िल्म देख लीजियेगा । अच्छी है ।

अरे रचना फिल्में देखना मेरा बड़ा पुराना शौक है । और फ़िर यहाँ और कोई काम भी नही है न । :)
film dekhi sameeksha bhi daal thi thi blog par...!

film itni achchhi lagi ki dobaara koi film dekhne ka man hi nahi ho raha..han Gulal hi dobaar dekhne ko mil jaye to zarur dekh le.n

aur ye geet sach bahut hi achchha lagta hai..aur anta hote hote bahut badi philosophy de jaata hai

ek baat aur film sambandhi post ke mamale ma lag raha hai mera aur aap ka dimaag ek hi tarah ka chal raha hai..pahale Delhi-6, fir arambh hai prachanda...! aur ab ye duniya..! mai aaj is gaane par alag se ek post likhne waali thi.. :) :)

kepp it up :)
Abhishek Ojha said…
क्या कोइन्सिडेन्स है... हमने भी कल ही देखी ! 'आरंभ है प्रचंड' भी मुझे अच्छा लगा.
mamta said…
अरे कंचन पता नही हमने कैसे तुम्हारी post मिस कर दी । चलो आज पढ़ते है ।
बहुत अच्छी फिल्म समीझा लिखी है आपने .
जब कुछ नही है करने को तो लाँ कर लो, जब समय मिले देखने का तो गुलाल देख लो .
Shiv said…
हमारे लिए बढ़िया जानकारी....कोशिश करता हूँ कि जल्दी देख लूं.
Manish Kumar said…
Maine bhi pichchle hafte ye film dekhi. sashakt abhinay tha kalakaaron ka aur piyush mishra ki to jitni tareef ki jaye utni kam hai.
शोक तो हमे भी बहुत है फ़िल्मो का लेकिन सभी फ़िलमे नही देखते, ओर फ़िर बच्चो के संग सिर्फ़ अच्छी फ़िलमे ही देखते है, गाली गलोच, ओर मार पीट की फ़िलमे बच्चो को दिखा कर बच्चो से क्या उंम्मीद होगी ? इस लिये साल मै एक दो ही फ़िल्मे लेकिन अच्छी ही, वरना बीच मै या पहले १० मिन्ट की देख कर बन्द, गुलाल हमारी कसोटी पर खरी नही उतरी आप का धन्यवाद हमे बचा लिया इस बेकार फ़िलम से.
चलिये, शायद कभी देख पाये तो!

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