आजकल हम इलाहाबाद आये हुए है अपने मायके पापा के पास।और हां आप लोग बिल्कुल भी confuse मत होइये कि हम इलाहाबाद कैसे पहुंच गए दिल्ली से एक हफ्ते के लिए हम यहाँ पापा और भैया के पास आये हुए है और ये पोस्ट हम इलाहाबाद से ही लिख रहे है।
हमारे पापा भी हमारी तरह ही बहुत ज्यादा कंप्यूटर सेवी नही है इसलिये उन्होने हमारे ब्लोग को पढा ही नही था तो कल सुबह हमने उन्हें अपना ब्लोग पढ़ाया और उन्हें पढ़कर अच्छा भी लगा और ये जो टाइटिल आप ने ऊपर पढा है वो उन्ही का दिया हुआ है।
तो अब इस के पीछे की कहानी भी बता देते है। दरअसल हम जब स्कूल मे पढ़ते थे तो हम पढने के सिवा हर काम करते थे वो चाहे बाटिक पेंटिंग सीखना हो या चाहे badminton खेलना हो या कुछ और कहने का मतलब पढाई से तो कोसों दूर रहते थे जिसकी वजह से सभी को लगता था कि अबकी तो ममता गयी पर हम पर हर बार भगवान् कुछ कृपा कर देते थे और हम पास भी हो जाते थे। और जब हम दसवी मे थे उस समय हमारे सिवा घर मे सभी को टेंशन था की हम पास होंगे या नही और सबसे बड़ी गड़बड़ ये थी की उन्ही दिनों हमारे मामाजी के बेटे की शादी पड़ी थी और सारे रिश्तेदार भी इलाहाबाद आये हुए थे और तभी सुबह के अखबार मे टेंथ का रिजल्ट भी निकल गया अब हर कोई हमारा रोल नम्बर मांगने लगा की लाओ तुम्हारा रिजल्ट देखे ,तब हमे भी डर लगने लगा था कि अगर लुढ़के तब तो बड़ी बदनामी होगी क्यूंकि हमारे घर मे कोई कभी फेल नही हुआ था और जब हमारा रोल नम्बर देखा जा रहा था तो पापा उठकर घर के बाहर वाले बरामदे मे चले गए क्यूंकि उन्हें डर था कि कहीं हम लुढ़क ही ना जाये पर हर बार की तरह इस बार भी भगवान् ने हम पर अपनी कृपा की और हम पास भी हो गए। फ़टाफ़ट बाहर जाकर हमने पापा और मम्मी के पाँव छुए और फिर सिविल लाइंस वाले हनुमान जी के दर्शन करने पहुंच गए । भाई भगवान् का शुक्रिया अदा करना तो बहुत ही जरुरी था।
पर हमारा ये ना पढने वाला सिलसिला बदस्तूर जारी रहा । दरअसल मे उस ज़माने मे लोग बहुत ज्यादा कैरियर के लिए सजग नही थे और खासकर के लडकियां ,और एम ए करते-करते तो हमारी शादी ही हो गयी थी। पर बाद मे भी कभी बहुत कुछ करने की इच्छा नही होती थी ,वो तो बहुत साल बाद हमने दिल्ली मे काम करना शुरू किया था।
और इतने साल बाद जो अब हमने ब्लॉग लिखना शुरू किया तो हमारे पापा को ब्लॉग पढ़कर ये ख़ुशी हुई की जो सबसे फिसड्डी थी वो अब कुछ लिखने लगी है। फिसड्डी इसलिये क्यूंकि बाक़ी सारे भाई-बहन पढने मे बहुत अच्छे थे। हमने आप लोगों के द्वारा भेजे गए कमेंट्स भी पापा को पढाये जिसे पढ़कर उन्हें और भी अच्छा लगा और उन्हें ये जानकार ख़ुशी हुई हम अब इस ब्लॉगर परिवार का हिस्सा बन गए है।
Thursday, May 31, 2007
फिसड्डी से नंबर वन
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Saturday, May 26, 2007
मैं चोर हूँ.
ये कोई पिक्चर का टाइटिल नही है और ना ही अमिताभ बच्चन की पिक्चर से लिया गया है ,ये तो कल रात आज तक न्यूज़ चैनल पर एक खबर दिखाई गयी थी जो उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले की थी जिसमे दो दस और बारह साल के बच्चों के पेट पर मैं चोर हूँ लिखा गया और उनके कपडे उतार कर सड़कों पर घुमाया जा रहा था । पर उन बच्चों को किसी ने भी बचाने की कोशिश नही की। हां कुछ लोग और शायद रिपोर्टर्स उन बच्चों की फोटो खीचते हुए दिख रहे थे पर क्या सिर्फ फोटो खींच कर अखबार या टी.वी.पर दिखाना ही उनका मकसद होता है?
क्या वो लोग उन बच्चों को इस तरह घुमाये जाने से रोक नही सकते थे?
कोई बी.एस.पी.के कोर्पोरेटर को दिखाया गया था ताम्बे के तार चोरी करने की ये सजा उन दो बच्चों को दी गयी थी। जैसा की न्यूज़ मे दिखाया गया की पहले उन बच्चों को करंट लगाया गया और फिर उनके कपडे उतार कर उनके पेट पर मैं चोर हूँ ये लिख दिया गया और फिर उतनी तपती धूप मे उन्हें सड़कों पर घुमाया जा रहा था। पर मजाल है की कोई उन्हें बचा लेता ।हां भीड़ ये तमाशा जरुर देख रही थी ।
वैसे उस कोर्पोरेटर को पुलिस ने गिरफ्तार तो कर लिया है पर वो तो यही कह रहे है की उस समय वो वहां मौजूद ही नही थे।पर क्या उन्हें इसकी सजा मिलेगी।
आज हम एक तरफ तो बच्चों को देश का भविष्य कहते है और दूसरी तरफ मासूम बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार करते है।
अगर बच्चों ने चोरी की है तो उसकी सजा उन्हें जरुर मिलनी चाहिऐ पर क्या इस तरह ?
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Labels: ख़बरों की खबर
Friday, May 25, 2007
रैली दे गोवा

जैसा की सभी जानते है की गोवा एक बहुत ही अच्छी जगह है और वहां हमेशा कुछ ना कुछ होता ही रहता है। ऐसा नही है की बाक़ी जगहों पर कुछ नही होता पर जैसे जब हम दिल्ली मे थे तो दूरी की वजह से कई बार हम लोग
इवेंट देखने नही जा पाते थे पर गोवा चुंकि छोटी जगह है और दूरियां ज्यादा नही है इसलिये आसानी होती है कहीं भी आने-जाने मे। अब दिल्ली मे भी विंटेज कार रैली होती थी पर हर बार जाना संभव नही होता था। शायद एक बार देखा है ।
रैली की शुरुआत मे पुलिस बैंड
हमारे लिए तो ये पहला अनुभव था किसी भी कार रैली को देखने का । इससे पहले तो सिर्फ टी.वी.मे ही कार रैली
देखी थी। पर सामने देखने का रोमांच ही कुछ और होता है। वैसे ये कार रैली november २००६ मे हुई थी जहाँ पर भारत के हर प्रांत के
लोग इस कार रैली मे हिस्सा लेने आये थे।इस रैली का फ्लैग ऑफ़ गोवा के मुख्य सचिव न किया था और इसमे करीब ४०-५० गाडियां जैसे मारुति एस्टीम,मारुति जिप्सी, फोर्ड फिएस्ता ,मित्सुबुशी लान्सर आदि गाडियां थी। सभी गाड़ियों अलग-अलग रंगों मे थी कोई एम.आर.एफ.के लाल रंग मे तो कोई जे.के.टायर के पीले रंग मे.तो कोई चेत्तिनाद के नीले रंग मे थी।
रैली की शुरुआत नारियल फोड़ कर की गयी थी। रोहित उर्स prayer करते हुए।
वैसे तो इसमे ज्यादातर आदमी ही हिस्सा ले रहे थे पर कुछ महिलाएं भी थी । जब गाडियां फ्लैग ऑफ़ के बाद ज़ूम-ज़ूम की आवाज के साथ निकलती थी तो मजा आ जाता था। चुंकि ये हमारा पहला अनुभव था और हम रैली मे भाग लेने वालों के नाम नही जानते है पर फोटो मे कुछ नामों को खीचने की कोशिश की है शायद आप लोग किसी को जानते हो।
और हां इस फोटो मे जो लडकी है वो स्पोर्ट्स चैनल की रिपोर्टर है नाम हमे मालूम नही है करनदीप से बात कर रही है।
इस रैली मे मित्सुबिशी lancer के चालक नरेन कुमार विजेता हुए थे।
ये फोटो मेरे बेटे ने खीची है।
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Thursday, May 24, 2007
डी एडिक्शन कैंप
अपडेट : हम माफ़ी चाहते है कि हमने पोस्ट लिखते हुए year नही लिखा था। दर असल हम अंडमान मे २००३ से २००६ तक रहे थे।
अंडमान मे रहते हुए भी हमे वही समस्या आयी की जब पतिदेव और बेटा स्कूल चले जाते थे तो हम क्या करें। और इसी लिए हमने वहां पता करना शुरू किया की हम किस तरह का जॉब ले सकते है क्यूंकि हम पार्ट टाइम् जॉब करना ही पसंद करते है। अब चाहे इसे हमारा आलसी पन कहिये या चाहे कुछ और। १५ अगस्त २००३ को वहां पर शाम को एल.जी अपने घर पर सबको चाय पर बुलाते है वही पर हमारी मुलाकात एक महिला से हुई जो की सोशल वर्क से जुडी थी और वही उनसे बात चीत मे पता चला की डी एडिक्शन कैंप शुरू हो रहा है और हम उसे ज्वाइन कर ले। पहले तो हमने सोचा कि हम ना करें क्यूंकि शराब पीने वालों से बात करना कोई आसान काम नही है और हमे डर भी लगता था और दुसरे अंडमान इतनी छोटी जगह है कि आपको लोग कहीं भी मिल सकते है और आपके घर तक भी आ सकते है । पर फिर ये भी ख़्याल आया कि अगर हमारी मदद से किसी का घर बन सकता है तो हमे इस challange को स्वीकार करना चाहिऐ। challange इसलिये क्यूंकि इससे पहले हमने ऐसा काम किया ही नही था।
शायद आप लोगों को मालूम ना हो पर अंडमान मे शराब पीने वालों की संख्या बहुत ही ज्यादा है और इस शराब की वजह से कितने ही घर बरबाद हो जाते है। रोज घरों मे झगडे -मार पीट होना आम है। ऐसा नही है की निम्न वर्ग के लोग ही शराब पीकर शोर गुल करते है वहां तो अच्छे -अच्छे पढे -लिखे लोग भी ऐसा ही करते है। उस समय के एल .जी प्रोफ.राम कापसे थे उन्होने पुलिस और सोशल वर्क से जुडे लोगों को लेकर वहां के गोविन्द बल्लभ पंत हॉस्पिटल मे डी एडिक्शन का एक ओ.पी.डी.खुलवाया । अब चुंकि अंडमान मे किसी को पता नही था कि लोगों को शराब की इस आदत से कैसे छुटकारा दिलाया जाये तो इसलिये उन्होने पुणे के मुक्तांगन से वहां के कुछ कोउन्स्लेर्स को बुलाया जिन्होंने करीब ४० लोगों को ट्रेनिंग दी जिसमे सभी कुछ सिखाया गया कि कैसे उनसे बात करनी है कैसे उन्हें इस शराब की लत से बाहर लाना है और कैसे उन्हें वापस सामान्य जीवन जीने के लिए प्रेरित करना है।
जब इस नशा मुक्ति अभियान की खबर अखबारों मे छपी तो बहुत सारे लोग कैंप मे शामिल होने के लिए रजिस्टर करवाने आने लगे। इसमे औरतें जो अपने पति की इस लत को ,मायें अपने बेटों को और बहुत सारे आदमी जो खुद इस शराब को छोड़ना चाहते थे। कुछ लोग तो ५ साल या ८ साल की उम्र से ही शराब पी रहे थे। दर असल मे वहां पर इतनी गरीबी नही है हर आदमी के पास या तो नारियल या सुपारी के बगीचे है ज़्यादातर लोग अपने मकानों मे रहते है और कुछ कोस्तल एरिया की वजह से भी और चुंकि वहां मनोरंजन के साधन भी सीमित थे और शराब सबसे आसान तरीका माना जाता है मनोरंजन का और गम को भुलाने का भी। पिछले कुछ सालों मे तो अंडमान बहुत ही बदल गया है वरना पहले तो वहां केबल टी.वी. भी नही था।
बहुत सारे लोगों मे से १५-२० लोगों को दस दिन के कैंप के लिए बुलाया गया और उनका सुबह से शाम तक का सारा कार्यक्रम बनाया गया कि कितने बजे उन्हें उठना है, कब खाना खाना है कब exercise करना है और बात-चीत का session भी जिसमे क्लाइंट जी हां हम लोग उन्हें पेशेंट नही क्लाइंट कहते थे अपनी इस आदत और अन्य बातों के बारे मे बात करते थे , आदि-आदि । दस दिन के कैंप के बाद एल.जी.और उनकी पत्नी सभी से मिले और उन्हें उज्जवल भविष्य कि शुभकामनायें दी। और इस तरह शुरुआत हुई नशा मुक्ति आंदोलन की ।
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Labels: अंडमान-निकोबार
Wednesday, May 23, 2007
उफ़ ये रीमिक्स
वैसे रीमिक्स का चलन कई साल पहले शुरू हो गया था पर आज कल तो कोई भी गाना हो चाहे नया या पुराना हर गाने का रीमिक्स सुनने और देखने को मिल जाएगा। पुराने गानों की तो ऐसी मटियामेट करते है की समझ नही आता की ऐसे रीमिक्स गाने बनाने वालों का करना चाहिऐ। एक से एक अच्छे गानों का जो बुरा हाल करते है की बस पूछिये मत। और उस पर डान्स ऐसा की जिसका कोई जवाब ही नही। आज कल तो कोई भी गाना हो डान्स एक ही स्टाइल का होता है। कई बार m.t.v.पर भी ऐसे गाने दिखाए जाते है।
सबसे पहले पर्दा है पर्दा से शुरुआत हुई या शायद उससे भी पहले क्यूंकि गुलशन कुमार के ज़माने से ये चल रहा है शुरू मे तो फिर भी थोडा बहुत गाने की इज्जत की जाती थी पर अब तो भगवन बचाए। मिसाल के तौर पर हम कुछ गानों का जिक्र यहाँ करना चाहेंगे -
१.एक लडकी को देखा तो ऐसा लगा।
२.बदन पे सितारे लपेटे हुए।
३.हम तो मुहब्बत करेगा।
और ऐसे ही अनेकों गाने जो गायकों के गाने के अंदाज से जाने जाते थे वो आज की पीढ़ी के लिए अब ऐसे बेद्गंगे डान्स की बदौलत जाने जाते है। अरे अगर डान्स विडियो बनाना ही है तो कुछ नया तो करो। आज के ये रीमिक्स गाने वाले मेहनत तो करना ही नही चाहते ।इनके लिए ये कितना आसान है की एक पुराना गाना लिया और डूम-डाम करके अपना गाना बना लिया । इनके सारे गाने एक से हो जाते है चाहे वो रोमांटिक गाना हो या sad song हो या फिर मस्ती भरा कोई गाना हो क्यूंकि डान्स मे हमेशा ८-१० लडकियां एक ही तरह के डान्स स्टेप करती दिखती है।
एक लडकी ...वाला गाना इतने सुन्दर तरीके से फिल्म मे दिखाया गया है और इस रीमिक्स विडियो मे एक लडकी की जगह १० लडकियां दिखा कर गा रहे है एक लडकी को देखा ...ये पता ही नही चलता है कि किस लडकी के लिए गा रहे है।
अब ऐसे रीमिक्स गायकों का क्या किया जाये?
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Labels: व्यंग्यात्मक
Tuesday, May 22, 2007
ब्लोगिंग के तीन महीने
आज पूरे तीन महीने हो गए है हमे ब्लोगिंग करते हुए ,हो सकता है आप लोगों को लगे कि भाई ये भी कोई इतनी बड़ी बात है की इस पर एक पोस्ट ही लिख दी जाये। तो जनाब हमारे जैसे इन्सान के लिए तो ये बहुत ही बड़ी बात है क्यूंकि ब्लोगिंग करने से पहले हमे कंप्यूटर पर काम करना बिल्कुल भी पसंद नही था या यूं कह लीजिये की हम बिल्कुल भी कंप्यूटर सेवी नही थे। हमारे घर मे बेटे और पतिदेव तो हमेशा ही कंप्यूटर पर काम करते थे। बेटे तो जब देखो तो कंप्यूटर पर और कुछ पूछो तो एक ही जवाब की नेट पर है कभी download चल रहा है तो कभी कोई पिक्चर देख रहे है । और तो और हमे भी कहते मम्मी आप भी नेट किया करिये इससे आप कोई भी जानकारी ले सकती है कुछ भी पढ़ सकती है।
१० साल पहले हमने ई.ग.न.उ। मे कंप्यूटर कोर्स भी ज्वाइन किया था पर कुछ दिन जाने के बाद छोड़ दिया क्यूंकि एक तो उसमे क्लास शनिवार और रविवार होती थी और वो दिन छुट्टी का होता था इसलिये ४-५ क्लास के बाद उसे छोड़ दिया था।और दुसरे हम बहुत देर तक कंप्यूटर पर काम नही कर पाते थे क्यूंकि आंखों पर जोर सा पड़ता था ,वैसे ये मात्र एक बहाना ही था ।
फिर कुछ साल बाद बेटों और पतिदेव के बहुत कहने पर हमने मेल करना सीखा और धीरे-धीरे लोगों को मेल भेजने लगे पर ये भी ज्यादा दिन नही चला और फिर हमने सबसे फ़ोन पर ही बात करना बेहतर समझा। क्यूंकि कई बार जब हम अपने आप कंप्यूटर पर कुछ भी सर्च करने की कोशिश करते तो हर बार कुछ ना कुछ गड़बड़ हो जाती मतलब हम कोई साईट खोलना चाहते तो कोई और साईट खुल जाती और हम खीज कर ग़ुस्से मे कंप्यूटर बंद कर देते थे।और ऐसा नही है की हम अब बिल्कुल expert हो गए है ,अभी भी कभी-कभी कुछ ना कुछ गड़बड़ हो ही जाती ह
गोवा मे भी पतिदेव और बेटे जब देखो नेट पर लगे रहते । और कई बार हमारे बेटे हमे बताते की फलां ब्लोग पर हमने ये पढा फलां ब्लोग पर ये देखा और कई बार हमे भी पढ़ाते थे। पर हम अपनी आदत से मजबूर थोडा सा ही पढ़कर कह देते की हां पढ़ लिया है।
एक दिन पतिदेव ने बताया की उन्हें एक महीने के लिए बाहर जाना है और वो चले भी गए। और फिर हम लोगों का बाहर घूमना -फिरना कम हो गया तो फिर हम बोरे होने लगे क्यूंकि बेटे तो हमेशा कि तरह कंप्यूटर पर ही व्यस्त रहते थे । ऐसे ही एक दिन हमने बेटों से पूछा कि हम क्या करें बडे बोर हो रहे है।
तो यूं ही हमारे बडे बेटे ने कहा की आप ब्लोग लिखना क्यों नही शुरू कर देती है।
हमने कहा कि हम और ब्लोग ?
तो बेटा बोला की इसमे क्या है । आप जो भी चाहे लिख सकती है। और आप तो टी.वी. बहुत देखती है उसी पर लिखना शुरू कर दीजिए।
फिर हमारे बेटों के कहने पर ही हमने ब्लोग लिखना शुरू किया। पर हमे लगता था कि ये भी हम कुछ दिन बाद छोड़ देंगे पर इस बार हम खुद ही गलत साबित हो गए. हालांकि शुरू के दिन बडे कठिन थे हम रोज कहते थे कि हम अब नही लिखेंगे तो बेटे कहते थे कि बस आप लिखती रहिए । फिर करीब बीस- पचीस दिन बाद पहली तिप्पडी उन्मुक्त जी की आयी जिससे कुछ हौसला बढ़ा फिर कुछ दिन बाद जीतू जी ने नारद पर और प्रतीक जी ने हिंदी ब्लोग पर रजिस्टर करवाने को कहा।
और धीरे-धीरे हम भी ब्लोगिंग के इस परिवार मे शामिल हो गए। हमे कभी भी नही लगता था कि हम इतना कुछ लिख पायेंगे पर आप सभी के कमेंट्स हमे लिखने के लिए प्रोत्साहित करते है।और हम तहेदिल से आप सबका शुक्रिया अदा करते है । ब्लोगिंग की बदौलत ही हम आप सब लोगों को और आप के विचारों को जान पाए है।
हमारे घर वालों और दोस्तो सबको आश्चर्य होता है कि ममता और ब्लोगिंग ? पर अब उन्हें कौन समझाए कि भाई ये तो एक नशा है या यूं कहे कि ये वो लड्डू है जो खाये वो भी खुश जो ना खाये वो भी खुश। अब तो जब तक एक पोस्ट ना लिख ले तब तक लगता है कि कुछ मिस्सिंग है। और जब कुछ कमेंट्स आ जाते है तो सोने पर सुहागा वाली बात हो जाती है।
समीर लाल जी,नाहर जी , मनीश जी, घुघुती जी ,जीतू जी , प्रतीक जी ,रत्ना जी, रंजू जी ,संजीव जी , संजीत जी , ज्ञानदत जी, अमित जी, अरुण जी ,अतुल जी,अनुराग जी,उन्मुक्त जी , तरुण जी,रवि जी,पुनीत जी,संजय जी, पंकज जी,धुरविरोधी जी,सुरेश जी ,शिरीष जी,देबाशीष जी , चंद्र्भूष्ण जी,सुनील जी,महाशक्ति जी ,प्रभाकर जी,रिंकू जी,चितरंजन जी,परमजीत जी,यूनुस जी,हरिराम जी,राजीव जी,अभय जी,आलोक जी,अनूप जी,मोहिंदर जी,शुहैब जी,सूचक जी,divine india ,बेनाम जी, विशेष जी ,आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया हमारी हौसला अफजाई का।
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Monday, May 21, 2007
गरमी से राहत
गोवा से दिल्ली आने के बाद गरमी से काफी हद तक राहत मिल गयी है। कल तो यहाँ पर बारिश भी हुई जिससे मौसम और भी सुहाना हो गया है। और फिर दिल्ली तो दिल्ली है। यहाँ पर भी गरमी तो है पर कम से कम उमस नही है जो गोवा मे बहुत ज्यादा थी ।
इस बार दिल्ली बहुत बदली हुई लग रही है। ना तो उतना पोलुशन और ना ही बहुत ज्यादा बसों की भागम भाग।ऐसा नही है कि बसें बिल्कुल ही गायब हो गयी है पर जैसे पहले हर सेकंड पर एक बस तेजी से जाती थी और ये लगता था की अब लड़ी की तब लड़ी।एअरपोर्ट से हमारे घर आने मे इससे पहले एक घंटा लगता था और अगर कहीँ ट्राफिक जाम मिल गया तो गए काम से। पर इस बार हम सिर्फ ४५ मिनट मे ही पहुंच गए । दिल्ली मे इतने ज्यादा फ्लाई ओवर बन जाने की वजह से भी अब समय कम लगता है वरना पहले हर रेड लाइट पर ३ मिनट तक रुकना पड़ता था जिससे बहुत समय लग जाता था।
और अब अगले कुछ दिनों तक हमारा डेरा यहीं दिल्ली मे रहेगा।
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Labels: सामाजिक
Sunday, May 20, 2007
उन्होने ख़ुदकुशी क्यों की ?
जब ८२ मे हमारी शादी हुई और हम पहली बार अपने पतिदेव के साथ नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरे थे तो हमे लेने मिस्टर ।ऎंड।मिसेस c आये थे । स्टेशन पर उन्होने हमारा बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया था । स्टेशन से हम लोग सीधे घर गए थे जहाँ उनकी तीन बहुत ही प्यारी बेटियों ने हमारा स्वागत किया। धीरे-धीरे उनके साथ हमारा बिल्कुल घर जैसा हो गया और उस अनजान शहर दिल्ली मे उन्होने हमे छोटी बहन की तरह अपना लिया था। ऐसा लगता था की एक मायका छोड़कर दुसरे मायके मे आ गए थे। इधर पतिदेव ऑफिस गए और उधर हम पहुच गए मिसेस c के घर और अगर हम नही गए तो वो आ जाती थी हमारे घर। पूरा-पूरा दिन हम लोग गप्प मारने मे बिता देते थे। समय कैसे बीत जाता था कुछ पता नही चलता था।
मिसेस c हम सब लोग उन्हें इसी नाम से बुलाते थे ।वो बहुत ज्यादा पढी-लिखी नही थी पर उनमे कुछ खास था कि जो भी उनसे एक बार मिल लेता था वो उन्हें भूल नही पाता था। उन्हें हर कोई जानता था चाहे वो सीनियर हो या जूनियर। मिसेस c एक बहुत ही सीधी-साधी सुलझी हुई महिला थी। अपने घर बच्चों के बिना वो ४ दिन भी नही रह पाती थी । अगर कभी उन्हें बच्चों के बिना गाँव जाना पडता तो वो परेशान हो जाती थी की बच्चे कैसे अकेले रहेंगे ,क्या खायेंगे इत्यादी।
हम लोग चार मंजिला बिल्डिंग मे रहते थे और उनका घर ground floor पर था इसलिये उन्ही के यहाँ बैठक जमा करती थी। दो-दो बजे रात तक हम सारे बैच मेट उनके यहाँ बैठते थे और मजाल है की उनके मुँह पर शिकन आ जाये उल्टे वो बहुत खुश होती थी। हम और वो दोनो बहुत मस्ती करते थे । उनकी बड़ी बेटियाँ स्कूल जाती थी और छोटी छे महीने की थी तो बस छोटी को लिया और निकल जाते थे शॉपिंग करने और पिक्चर देखने ।
करीब छे साल पहले २ अगस्त की शाम हम घर मे बच्चों के साथ पतिदेव के आने का इन्तजार कर रहे थे ।काफी देर हो गयी थी पतिदेव लौटे नही थे सो चिन्ता भी हो रही थी तभी phone की घंटी बजी तो हमने सोचा की पतिदेव का फ़ोन होगा ,कह रहे होंगे की थोड़ी देर मे पहुंचेंगे पर फ़ोन पर हम लोगों के एक बैच मेट सिंह साब बोल रहे थे। उन्होने बस इतना कहा की मिसेस c की डेथ हो गयी है। पहले तो हमे अपने कानो पर यकीन ही नही हुआ इसलिये दूबारा हमने कांपती आवाज मे पूछा की क्या तो उन्होने फिर कहा की मिसेस c ने ख़ुदकुशी कर ली है। इतना सुनते ही हम बिल्कुल काँपने लगे और आंसू अपने आप आंखो से गिरने लगे । हमे कुछ समझ नही आ रहा था की क्या करें। हमारे बच्चे हमे इस हालत मे देख कर हमे समझाने लगे । फिर हमे अपने एक और बैच मेट जो की जी . के मे रहते है उनसे बात की और रात करीब साढ़े नौ बजे हम लोग निकलने ही वाले थे की पतिदेव भी आ उन्हें और जैसे ही हमने उन्हें बताया उन्हें भी यकीन नही आया । फिर हम सब उनके घर गए और वहां जो देखा वो आज तक नही भूल पाए है।
वो लेटी हुई थी चेहरे पर शांति थी। वहां हर एक की जुबान पर एक ही सवाल था की उन्होने ऐसा क्यों किया और कैसे किया। बच्चों ने बताया की २ बजे खाना खाने के बाद सब लोग कमरे मे सोने गए तो वो भी बच्चों के साथ उनके ही कमरे मे सोने गयी उसके बाद शाम को जब उनकी बेटी उठी तो उसने उन्हें चारों ओर ढूँढा और जब पूजा के कमरे मे देखा तो दौड़कर चिल्लाते हुए बाहर भागी फिर अगल-बगल वाले आ गए और सभी सकते मे आ गए की ये क्या हुआ। उन्हों ने अपने ही दुपट्टे से फांसी लगा ली थी। उनकी एक पडोसी ने बताया की सुबह वो उनके घर आयी थी और एक बजे तक गप्प मारती रही पर उसे कहीं से भी ये अहसास नही हुआ की वो कुछ ऐसा कर लेंगी । हर एक की जुबान पर एक ही सवाल था की इतना बड़ा कदम उन्होने क्यों उठाया। और उन्होने एक suicide नोट भी छोड़ा था । सभी को ये लग रहा था की किसी ने उन्हें देखा क्यों नही जबकि पूजा वाले कमरे की खिड़की खुली हुई थी बस पर्दा पड़ा था।
हम सभी को आज तक ये समझ नही आया की ऐसा उन्होने क्यों किया क्यूंकि वो उनमे से नही थी जो हार मान ले।
उस समय उन्हें अपनी बेटियों की शादी की चिन्ता रहती थी पर आज उनकी बेटियों की शादी हो चुकी है और भगवान की दया से बेटियाँ अपने घर मे खुश है पर ये सब देखने के लिए वो नही रही।
उस दिन घुघुती जी की कविता कायर पढ़ कर मन बहुत विचलित हो गया था क्यूंकि उन्होने जो वर्णन किया था ठीक उसी तरह मिसेस c ने किया था। इसी वजह से कई दिन तक कुछ लिखने का मन भी नही किया । हम तो आज भी ये समझ नही पाते है की जिस घर और बच्चों के बिना वो रह नही पाती थी उन्हें छोड़कर जाने का उनका दिल कैसे किया। आज सब कुछ है बस मिसेस c नही है।
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Labels: सामाजिक
Monday, May 14, 2007
दास्ताने मोबाइल
ये बात उन दिनों की है जब हिंदुस्तान मे मोबाइल थोडा नया - नया सा था और बहुत महंगा भी होता था। ९६ -९७ मे मोबाइल से की गयी एक कॉल के १६ रूपये लगते थे और उस समय इनकमिंग और आउतगोइंग दोनो के लिए पैसा देना पड़ता था ।
उस समय हम लोग दिल्ली मे थे और हमारे बच्चे थोड़े बडे हो गए थे और हम टी।वी पर पिक्चर देख-देख उकता गए थे अरे उन दिनों हर पिक्चर मे हीरो तलवार लेकर विलन को मारने के लिए दौड़ता रहता था जिसे देख कर हम थक चुके थे। मिथुन और सनी देओल का जमाना था । तो हमने सोचा की बच्चे तो सुबह ही स्कूल चले जाते है और पतिदेव ऑफिस चले जाते है तो हम क्या करें घर मे पड़े-पड़े , इसलिये हमने एक फ्रीलान्सर के तौर पर एक कंपनी मे काम करना शुरू कर दिया ।हम भी रोज सुबह साढ़े नौ बजे जाते और दो बजे बच्चों के स्कूल से लौटने के समय तक वापस आ जाते थे। और अगर कुछ काम रह जाता था तो उसे घर ले आते थे।
धीरे-धीरे हम सभी का समय अच्छे से बीत रहा था और हमारा काम भी अच्छा चल रहा था । वैसे तो आमतौर पर हम दो बजे तक आ जाते थे पर जब बच्चों के स्कूल की छुट्टियाँ होती थी तो जरा मुश्किल होती थी क्यूंकि एक डर सा रहता था कि कहीँ कुछ हो ना जाये। उस समय बच्चे बडे तो थे पर इतने भी नही की हर चीज अपने आप संभाल ले। और गरमी की छुट्टियाँ हो तो और भी दिक्कत आ जाती थी तो हमने सोचा कि हमारे तो पैसे कहीं खर्च हो नही रहे है तो क्यों ना एक मोबाइल ही खरीद लिया जाये। सबने समझाया भी कि ये क्या बेवकूफी है पर हम भी कहां मानने वाले थे। हमने ये कहकर सबको चुप करा दिया कि जब बच्चे घर मे होते है तो हम काम मे ठीक से ध्यान नही दे पाते है। बस इसके बाद किसी ने भी कुछ नही कहा और हमने एक मोबाइल ले ही लिया।
वैसे ऑफिस मे फ़ोन तो था पर कई बार मिलता नही था। बच्चों को खास तौर पर कह रखा था कि अगर जरुरत हो तभी फ़ोन करना। एक दिन हम ऑफिस मे थे कि तभी हमारे बडे बेटे का फ़ोन आया कि "mom ड्राइंग रूम मे कोक की बोतल टूट गयी है ,हम लोग क्या करें। "
तो सबसे पहले हमने पूछा की तुम लोगों को चोट तो नही लगी।
और जब उसने कहा की नही तो हमने उसे समझाया की तुम लोग वहां से हट जाओ वरना कांच चुभ जाएगा । और ये भी कहा की जब महरी आएगी तो उससे साफ करवा लेना नहीं तो जब हम आएंगे तो साफ कर देंगे।
खैर जब हमारी बात यही ख़त्म हो गयी और हमने फ़ोन काटा तो सबने बच्चों के लिए चिन्ता जताई। पर तभी हम लोगों के साथ एक राम कुमार काम करते थे उन्होने हँसते हुए हमसे कहा कि मैडम जितने की कोक की बोतल नही आती उससे कहीँ ज्यादा पैसे तो आपने मोबाइल पर बात करने मे खर्च कर दिए। बस फिर क्या था जो होता वो यही कहता । पर उन्हें कौन समझाता कि बच्चों से बढ़कर तो कुछ नही है।
पर आज हालात इतने बदल गए है कि हर आदमी ही मोबाइल लिए हुए है और अगर कोई बिना मोबाइल के दिखता है तो कुछ अजीब लगता है।
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Labels: व्यंग्यात्मक, सामाजिक
Sunday, May 13, 2007
हम नही सुधरेंगे
ये बात कॉंग्रेस के लिए बिल्कुल सही बैठती है क्यूंकि उन लोगों के सिर से अभी भी राहुल का भूत नही उतरा है। उत्तर प्रदेश मे इतना बड़ा झटका खाने के बाद भी उनका हाल वही है। एक ज़माने मे उत्तर प्रदेश कॉंग्रेस और जनसंघ जो अब बी.जे.पी है का गढ़ होता था। खैर हमे उससे क्या।
हाँ तो हम बात कॉंग्रेस की कर रहे थे । कल अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि राहुल हिंदुस्तान का भावी प्रधान मंत्री है। ये बात तो कई बार कई कॉंग्रेस के नेता बोल चुके है। अरे भाई क्या और कोई नेता नही रह गया है अपने देश मे और खास कर कॉंग्रेस मे । ये लोग आख़िर कब तक यही राग अलापते रहेंगे ।
राहुल जो अभी राजनीति की ए.बी.सी सीख रहे है उन्हें देश की बागडोर सौपने की बात करना सुनकर बहुत अखरता है। ये सारे के सारे नेता बस चमचागीरी ही कर सकते है । देश और देश की जनता जाये चूल्हे मे।
Posted by mamta at 7:13 PM 0 comments Links to this post
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mothers day
आज समूचे विश्व मे मदर्स डे मनाया जा रहा है और मनाया भी क्यों ना जाये आख़िर माँ से बढ़कर दुनिया मे ना तो कोई है और ना ही होगा। माँ की महानता हम क्या हमारे देवी-देवता भी मानते थे वो चाहे कृष्ण है या राम हो या गणेश जी हो सभी मानते है। और तो और हमारी फिल्मों मे भी माँ का स्थान हमेशा ऊंचा ही दिखाया गया है और पुरानी फिल्मों मे एक गाना हमेशा माँ पर आधारित होता था , अनेकों गाने माँ के लिए बनाए गए है जैसे-
उसको नही देखा हमने कभी ,पर उसकी जरुरत क्या होगी
ए माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी.
माँ मुझे अपने आँचल मे छुपा ले गले से लगा ले
की और मेरे कोई नही
और ये माँ ही होती है जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है और बच्चों को मुसीबत से लड़ना भी सिखाती है। और हमे इस लायक बनाती है कि हम दुनिया और समाज मे रह सके। हम बच्चे चाहे जितनी गलती करे पर माँ हमेशा उन्हें माफ़ कर देती है। माँ को भगवान् ने इतना शक्तिशाली बनाया है कि अगर उसके बच्चे वो चाहे कहीँ भी हो अगर वो परेशान है तो उसे पता चल जाता है। ऐसा ही एक बार मेरे साथ भी हुआ और शायद बहुत लोगों के साथ भी ऐसा हुआ होगा । उन दिनों हम दिल्ली मे रहते थे हमारी और माँ की रोज ही फ़ोन पर बात होती थी । ऐसे ही एक दिन माँ ने फ़ोन किया और जैसे ही हमने हैलो बोला उन्होने झट से पूछा क्या हो गया हमने लाख कहा कि कुछ नही पर वो तब तक पूछती रही जब तक हमने उन्हें अपनी परेशानी का कारण नही बता दिया। कहने का मतलब है कि माँ तो बच्चों की आवाज भर से ही समझ जाती है कि बच्चे खुश है या दुःखी। और आज हम भी एक माँ है और इस बात को स्वीकारते है।
वो कहते है ना कि बच्चे को जन्म देना माँ का पुनर्जन्म होता है क्यूंकि अपने बच्चे मे उसे अपनी ही तस्वीर दिखती है। माँ और बच्चे का रिश्ता हर रिश्ते से ऊपर होता है वैसे आज के ज़माने मे ये परिभाषा कुछ बदल सी रही है।
जैसे बच्चे माँ के बिना अधूरे है ठीक उसी तरह माँ भी बच्चों के बिना अधूरी है। आज के दिन हमे दुःख भी हो रहा है क्यूंकि हमारी माँ हमे हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुकी है।
आज मदर्स डे के दिन हम सभी माँओं को इस दिन कि बधाई देते है।
Posted by mamta at 7:27 AM 9 comments Links to this post
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Saturday, May 12, 2007
सोनी की दुर्गेश नंदिनी
कई दिन हो गए दुर्गेश नंदिनी के बारे मे बात किये हुए इसलिये हम हाजिर है। जी हां इस सीरियल मे एक नया मोड़ या यूं कहें की पुराना मोड़ आ गया है अरे वही तीसरा शख्स सिकंदर । पहले तो अमित साद जो क्षितिज बने थे कुछ ठीक लग रहे थे पर अब कोई और इस किरदार को निभायेगा जो कुछ खास अच्छा नही लग रहा ह