Tuesday, July 31, 2007

कुछ बातें सीरियल की....

आज कई दिनों बाद हम टी.वी.पर आने वाले कुछ सीरियल की बात करने जा रहे है। अरे-अरे आप भागिये मत । इतना डरने की जरुरत भी नही है। असल मे वो क्या है ना कि आजकल न्यूज़ देखना भी उतना ही दुखदायी होता जा रहा है जितना कि टी.वी.सीरियल। अब टी.वी.सीरियल की बात हो और बालाजी का नाम ना आये तो ये तो संसार का आठवां आश्चर्य हो जाएगा आख़िर एकता कपूर टी.वी.जगत की पहली सोप क्वीन (अरे साबुन नही सीरियल की)जो मानी जाती है। पर आज हम एकता कपूर के सीरियल की बात नही करेंगे। वो क्या है ना कि बीच मे कुछ दिनों के लिए हमने सीरियल से ब्रेक ले लिया था पर आजकल फिर से हम सीरियल देखने लगे है।


ओह्हो आप बड़ी जल्दी घबरा जाते है कि अगर एकता की नही तो फिर आख़िर हम किसकी बात करने जा रहे है। तो जनाब जैसा की हमने एक बार पहले भी कहा था कि सोनी पर आने वाला सीरियल विरूद्व बहुत अच्छा है और एक बार फिर हम आपसे कहते है कि विरूद्व बहुत अच्छा सीरियल है। कम से कम सास -बहू की तरह उबाऊ और खीचाऊ सीरियल नही है। जितनी दमदार कहानी है उतनी ही दमदार सारे कलाकारों की एक्टिंग भी है। वो चाहे स्मृति इरानी हो या विक्रम गोखले हो या सुशांत सिंह या फिर दूसरे नए कलाकार। और संगीत भी कमाल का है। कहीँ से कुछ भी मिसिंग नही लगता है। अब देखना ना देखना तो आपके हाथ है।



अच्छे संगीत से एक और सीरियल जो कि सहारा वन पर आता है वो याद आ गया। घर एक सपना जिसे अजय सिन्हा ने बनाया है। और इस सीरियल की कहानी तो बिल्कुल ही नयी है। चलिये हम आपको थोड़ी सी कहानी बता देते है। इस मे हीरो और हिरोइन शादी मे मिलते है।और उन दोनो की शादी हो जाती है। कितनी बोरिंग सी कहानी है। पर नही जनाब यहीं तो कहानी मे ट्विस्ट है । दरअसल इसमे हीरो का दोस्त है जिसकी शादी पटना मे होती है और वहीँ शादी मे हीरो हिरोइन के साथ फ्लर्ट करता है।जैसा कि आम तौर पर शादियों मे होता है। इसमे हिरोइन के पिता बिहार के नेता है। और जीजा थोडा गुंडा टाईप है।बारात वापसी से पहले जीजा हीरो की हिरोइन के साथ जबरदस्ती शादी करवा देते है ये कहते हुए कि फ्लर्ट(प्यार)किया है तो शादी भी करनी पडेगी। और फिर परिस्थितियां कैसे-कैसे मोड़ लेती है।ये सब दिखाया गया है। इस सीरियल के भी सारे कलाकारों ने और खास कर के जो हिरोइन का जीजा बना है उसने गजब की एक्टिंग की है। डायलोग बहुत अच्छे है कुछ डायलोग तो ऐसे है जो हम आम घरों मे बोलते है।हिमानी शिवपुरी ने माँ के किरदार मे बहुत जान डाली है। बहुत शो बाजी नही है। पर फिर भी सीरियल देखते हुए कहीं भी बोरियत नही महसूस होती है।


उप्स ये तो काफी बड़ी पोस्ट हो गयी है ।तो बस अब यहीं पर हम खत्म करते है। अरे नौ बज रहे है तो अब हम जा रहे है अपने सीरियल देखने ।

बिना टिकट यात्रा

आज सुबह -सुबह ज्ञानदत्त जी की पोस्ट पढ़कर हमे अपनी जिंदगी की पहली और आख़िरी बिना टिकट यात्रा याद आ गयी। पहली और आख़िरी इस लिए लिख रहे है क्यूंकि हम लोगों ने कभी भी बिना टिकट यात्रा नही की थी ।ना तो उससे पहले और ना ही कभी उसके बाद। यूं तो रेलगाडी के सफ़र के साथ ढेरों यादें है। पर बिना टिकट यात्रा का अपना ही मजा है अगर पकड़े ना जाएँ तो।वरना ......

ये बात तो काफी पुरानी है।गरमी की छुट्टियाँ हुई थी और हम सब भाई- बहन बच्चों सहित इलाहाबाद मे इकट्ठा थे बस हमारी मिर्जापुर वाली दीदी इलाहाबाद नही पहुंची थी क्यूंकि वो कुछ बीमार थी । तो हम सब ने की चलो अगर वो बीमार है और इलाहाबाद नही आ पा रही है तो क्या हम लोग ही मिर्जापुर हो आते है।अब इलाहाबाद से मिर्जापुर है ही कितनी दूर। बस इतना सोचना था कि फ़टाफ़ट मम्मी-पापा को हम लोगों ने अपना मिर्जापुर जाने का प्रोग्राम बताया और इससे पहले कोई कुछ कहे हम बहनेऔर भाभी मय बच्चों के चल दिए मिर्जापुर। हम सब छोटे-बडे मिलाकर दस लोग थे. बस भईया अपने किसी काम की वजह से नही जा पाए थे। शायद एक -डेढ़ घंटे मे हम लोग मिर्जापुर पहुंच गए।और दीदी के घर ख़ूब मस्ती हुई

जब हम लोग वापिस इलाहाबाद लौटने लगे तो हम लोगों ने अपनी बहन को भी साथ चलने को कहा। पहले तो वो तैयार नही हो रही थी पर फिर हम सबके जोर देने पर वो तैयार हो गयी। अब चुंकि वो अचानक तैयार हुई तो जाहिर है की पैकिंग मे थोडा समय तो लगेगा ही। तो पैकिंग करते-करते और घर से निकलते हुए हम लोगों को थोड़ी देर हो गयी। जैसे ही स्टेशन पहुंचे तो देखा की ट्रेन बिल्कुल जाने के लिए तैयार थी और चुंकि हम लोगों के साथ बच्चे भी थे तो ये सोचा गया की ट्रेन मे चढ़ जाते है । जब रास्ते मे कोई टी.टी.आयेगा तो उससे टिकट बनवा लेंगे। पर उस डेढ़ घंटे के सफ़र मे ना तो कोई टी.टी.आया और ना ही हम लोगों का टिकट बना। और सारा रास्ता यूं ही बीत गया और जब इलाहाबाद आने लगा तो हम लोगों को थोड़ी चिन्ता होने लगी की अगर टी.टी. ने पकडा तब तो बड़ी मुसीबत हो जायेगी और अगर घर मे पापा लोगों को पता चलेगा तो डांट पडेगी सो अलग।

पर उस समय सबसे बड़ा सवाल ये था की स्टेशन से कैसे बाहर निकला जायेट्रेन से उतर कर ये सोचा गया कि हम सभी अलग-अलग छोटे-छोटे ग्रुप मे स्टेशन से बाहर निकलेंगे और गेट पर टी. टी .को टिकट आगे है या टिकट पीछे है ये कहकर सब लोग बाहर निकलेंगेतो बस सबसे पहले हमारी मिर्जापुर वाली दीदी क्यूंकि वो बीमार थी एक बच्चे के साथ बाहर निकली ये कहकर की टिकट पीछे हैहम सभी धीरे-धीरे मन ही मन डरते हुए और बाहर से बिल्कुल निडर भाव से चलते हुए टिकट आगे है टिकट पीछे है ऐसा कहते हुए एक के बाद एक स्टेशन के गेट के बाहर निकलते गएऔर बाहर निकल कर पार्किंग मे जहाँ गाड़ी खडी थी वहां पहुंचकर पहले चैन की सांस लेते थे कि चलो बच गए और फिर जोरदार ठहाका लगते थे


पार्किंग मे खडे-खडे हम सब देख रहे थे कि जिज्जी को टी.टी.ने रोक लिया हैइसलिये ड्राइवर को हम लोगों ने कहा कि गाड़ी स्टार्ट कर के रखो और जैसे ही जिज्जी आएगी फौरन चल देनासबसे आख़िर मे हमारी जिज्जी थी पर जब उन्होने कहा कि टिकट तो आगे जो लोग गए है उनके पास थाऔर जैसे ही जिज्जी ने कहा की टिकट तो आगे वालों के पास थाये सुनते ही टी.टी.को थोडा शक हुआ कि जरूर कुछ गड़बड़ है

तो टी.टी.ने उनसे कहा की पहले वाले तो ये कहकर गए कि टिकट पीछे है और अब आप कह रही है की टिकट आगे है

तो जिज्जी ने बड़ी ही स्मार्टनेस से कहा कि अरे क्या उन लोगों ने टिकट नही दिया
तो टी.टी.ने कहा नही
इस पर जिज्जी बोली कि अच्छा मैं उन लोगों से टिकट लेकर आती हूँ
वो टी.टी.कुछ सीधा था इसलिये उसने जिज्जी को बाहर हम लोगों के पास टिकट लेने के लिए आने दिया

और उसके बाद क्या हुआ होगा ये तो आप अंदाजा ही लगा सकते हैअरे हम सभी सिर पर पैर रख कर भागे मतलब कार से भागेजैसे ही कार चली हम सभी ठहाका मार कर हंस पडेयूं तो हम लोग कार से भाग रहे थे पर फिर भी पीछे मुड़-मुड़ कर देखते जा रहे थे कि कहीं कोई पीछा तो नही कर रहा हैऔर घर पहुंच कर जब हम लोगों ने पापा-मम्मी और भैय्या को बिना टिकट यात्रा और स्टेशन से बाहर निकलने का किस्सा सुनाया तो वो डांट पडी कि कुछ पूछिये मतऔर पापा ने हम सबको ये ताकीद दी की आइन्दा ट्रेन भले ही छूट जाये पर बिना टिकट यात्रा कभी नही करना



Monday, July 30, 2007

क्या हिंदी मे बात करना गलत है?

अब इस शीर्षक देख कर तो हर हिन्दुस्तानी यही कहेगा कि लो जी ये भी कोई पूछने की बात है। अब हम भारत वासी हिंदी नही बोलेंगे तो और क्या बोलेंगे। भाई जब चीनी लोग चीनी भाषा बोलते है और रशिया के लोग रशियन तो भला हम लोग हिंदी क्यूं नही बोल सकते है। अब ये तो हम लोग सोचते है की हिंदी हमारी मातृभाषा है पर शायद दूसरे देश के लोग ऐसा नही सोचते है। वैसे इसमे उनकी गलती भी नही है क्यूंकि हमारे हिंदुस्तान मे आजकल क्या हमेशा से ही अंग्रेजी को ज्यादा महत्त्व दिया जाता रहा है।और अब तो इंग्लिश के बिना गुजारा ही नही होता है। चाहे वो कॉलेज हो या कोई दफ्तर या कोई बड़ा उत्सव हो या चाहे कोई पार्टी हर जगह सिर्फ इंग्लिश का ही बोलबाला है। हमारे बडे-बडे नेता हो या चाहे अभिनेता हो हिंदी बोलने मे उन्हें परेशानी लगती है की पता नही अगला व्यक्ति उनकी बात समझेगा या नही। यूं तो bollywood हिंदी फिल्मों के लिए जाना जाता है पर हमारे अभिनेता और अभिनेत्रियाँ हिंदी बोलने से कतराते है। दर्जनों उदाहरण मिल जायेंगे।

हम हिंदुस्तानियों की एक बहुत ही अच्छी आदत है की हम दूसरों का बहुत ख़्याल करते है मसलन अगर कोई हिन्दुस्तानी किसी दूसरे देश मे जाता है तो वो हमेशा इंग्लिश बोलता है क्यूंकि इंग्लिश आजकल युनिवर्सल लेंगुएज जो बन गयी है।कई बार कई जगहों पर तो अगर आप हिंदी मे कुछ पूछिये तो लोगों के चेहरे पर एक शुन्य ( blank) सा भाव दिखता है। पर इसके ठीक उलट जब भी कोई विदेशी चाहे वो किसी भी देश का हो फ़्रांस का हो या फिर चीन,जापान,रशिया ,थाईलैंड आदि का पर वो अपनी ही भाषा मे बात करता है चाहे वो बड़ा नेता हो या कोई आम नागरिक या कोई सुंदरी जो किसी सौंदर्य प्रतियोगिता मे ही क्यूं ना भाग ले रही हो।सब अपनी भाषा मे बोलते है भले ही उसे बात करने के लिए interpreter की मदद ही क्यूं ना लेनी पडे। पर हम भारतीय अपनी मातृभाषा हिंदी का प्रयोग दूसरे क्या अपने ही देश मे करने मे संकोच करते है।

कल के हिंदुस्तान टाइम्स अखबार मे एक ऐसी ही खबर छपी थी । जैसा की हम सभी जानते है कि आजकल भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड के दौरे पर गयी है। अब हर रोज मैच के बाद कुछ खिलाडी पत्रकारों से बात करते है वैसे ये कोई नई बात नही है।परसों के खेल मे चुंकि गेंदबाजों ने अच्छा प्रदर्शन किया था तो इसलिये पत्रकार लोग गेंदबाजों से बात करना चाहते थे । पर लक्ष्मण मुखातिब हुए मीडिया से जो शायद ब्रिटिश मीडिया को रास नही आया । भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाडी वी.वी.एस.लक्ष्मण पत्रकारों से बात कर रहे थे।जब लक्ष्मण किसी सवाल का जवाब हिंदी मे दे रहे थे तो उसे सुनने की बजाए ब्रिटिश पत्रकारो ने अपने-अपने माइक हटा लिए और एक-एक कर के बाहर चले गए। जो की बहुत ही बुरा और शर्मनाक है । इससे कुछ सवाल हमारे मन मे उठे है

क्या लक्ष्मण का हिंदी मे बात करना गलत था?
क्या हिंदी मे सवाल का जवाब देना कोई अपराध है ?
लक्ष्मण की जगह अगर कोई दूसरे देश का खिलाडी अपनी भाषा मे बोल रहा होता तो क्या तब भी ये ब्रिटिश पत्रकार ऐसा ही करते ?

Saturday, July 28, 2007

तनहा टूटहूँ टूं

क्या आप ने कभी ताश के खेल जैसे कोट पीस या तीन-दो-पांच मे चीटिंग की है।
क्या कभी चीटिंग नही की है।
वैसे यकीन तो नही आता है पर मान लेते है। तो चलिये इसी बात पर हम आपको एक और अपने बचपन से जुडी बात बताते है। जब हम छोटे थे उस समय आज की तरह ढेरों मनोरंजन के साधन नही होते थे। एक रेडियो होता था जिस पर विविध भारती और सीलोन सुना जाता था । और या तो पिक्चर देखने या किसी होटल मे खाना खाने जाया जाता था। पर छुट्टियों मे या यूं भी कभी -कभी ताश भी खेला जाता था। आम तौर पर तो कोट पीस वगैरा ही खेला जाता था पर दिवाली मे फ्लश अरे वही तीन पत्ती या पपलू खेला जाता था।

हमारे बाबूजी (बाबा )को ताशखेलने का बहुत शौक़ था ,बाबूजी को क्या एक तरह से हम सभी को ताश खेलने मे बड़ा मजा आता था। कोट पीस मे चार लोग खेलते है ।दो-दो लोग पार्टनर बन कर एक टीम बन जाते थे। और हर टीम जीतने के सारे हथकंडे अपनाती थी।ताश के पत्तों मे spade (हुकुम )heart (पान ) diamond (ईट) club(चिड़ी) आप सब तो जानते ही होंगे ।जिसमे एक टीम पत्ते बांटती है तो दूसरी टीम trump बोलती हैजो टीम trump बोलती है उसे सात हाथ बनाने पड़ते थेजो टीम trump बोल कर लगातार पूरे सात हाथ बना ले और पत्ते बांटने वाली टीम कोई भी हाथ ना बना पाए तो फिर उस पत्ते बांटने वली (पीसने)टीम पर कोट हो जाता थापर अगर trump बोलने वाली टीम सात हाथ नही बना पाती थी तो फिर उसकी पीस हो जाती थीमतलब उसे पत्ते बांटने पड़ते थे

हम लोगों मे से जो भी बाबूजी का पार्टनर बनता था उसकी टीम जीत जाती थी क्यूंकि बाबूजी चाल चलते समय तरह-तरह के हिंट दिया करते थे।और सबसे मजेदार बात की हर बार हिंट को अलग -अलग अंदाज मे देते थे । जैसे अगर पान trump है और उनके पास हार्ट (पान) का सिर्फ एक पत्ता है तो चाल चलने के पहले वो अपने पार्टनर को हिंट देते तनहा टूटहूँ टूं कुछ ऐसा कह कर बताते थे जिसका मतलब होता था की अब उनके पास trump का दूसरा पत्ता नही है। अगर उन्हें क्लब (चिड़ी)की चाल चलवानी होती थी तो वो कहते थे की उड़-उड़ और उनका पार्टनर हम मे से जो भी होता वो समझ जाता था की क्लब की चाल चलनी है।इतना ही नही अगर बाबूजी को diamond (ईट ) की चाल चलवानी होती थी अपने पार्टनर से कहने लगते की घर बनाओ घरअगर उनके पास spade के अच्छे पत्ते होते तो कहते थे की डरो मत सब ठीक हैतो वही कई बार हार्ट (पान) के लिए कहने लगते की पान खाना अच्छी बात नही हैबस इतना सुनते ही उनका पार्टनर फौरन पान की चाल चाल देता थाकई बार तो चाल चलते हुए पत्ते ख़ूब जोर-जोर से पटकते थे जिसका मतलब होता था की फिर से उसी पत्ते की चाल चलो

पर खुदा ना खास्ता अगर उनका पार्टनर उनके दिए हुए हिंट से चाल नही चलता था तो वो अपने पार्टनर की ख़ूब खबर लेते थेपर कई बार ऐसा भी होता था की जैसे spade का उनके पास एक ही पत्ता है और उन्होने कहा तनहा टूटहूँ टूं पर फिर भी उनके पार्टनर ने दुबारा spade की चाल चाल दी तब तो पार्टनर की खैर नहीअगर जीत गए तो ठीक और अगर हार गए तो सारी गलती पार्टनर की

शुरू मे तो हम लोग कई बार समझ नही पाते थे पर बाद मे हम लोग उनके इस तरह से अपने पार्टनर को हिंट देने पर जब उन्हें कहते थे तो बाबूजी कहते की हमने कोई हिंट थोड़े ही दिया हैपर फिर भी हम लोगों को बाबूजी के साथ ताश खेलने मे ख़ूब मजा आता था


Wednesday, July 25, 2007

दोहरा मापदंड क्यों ?

आज का दिन यानी की पच्चीस जुलाई को दो बिल्कुल विरोधी घटनाएं हुई है और दोनो घटनाएं हमारे देश की दो महिलाओं से जुडी है। एक मे महिला को उच्च सम्मान मिला तो दूसरे मे महिला को वो सम्मान नही मिला जिसकी वो हकदार है।

पहली महिला जिन्हे उच्च सम्मान मिला वो प्रतिभा पाटिल है जो शायद भारत की पहली महिला गवर्नर थी और वही प्रतिभा पाटिल आज भारत की पहली महिला राष्ट्रपति बनी और जिन्होंने आज राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण की है। ये हमारे देश के लिए गौरव की बात है।

और दूसरी महिला है किरण बेदी जो की देश की पहली महिला I.P.S.थी पर आज उन्हें दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नही बनाया गया बल्कि उनकी जगह वाई .एस .ददवाल को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बनाया गया जबकि किरण बेदी ददवाल से दो साल सीनियर भी है। जो शायद शर्म की बात है।

इस तरह का दोहरा मापदंड रखने का क्या कारण है ?

Tuesday, July 24, 2007

एक बार फिर घूम आये ताज महल




ताज महल यूं तो हम सभी ताज महल के बारे मे जानते है। पर फिर भी आज हमने सोचा की क्यों ना ताज महल के बारे मे ही कुछ लिखा जाये । वो क्या है ना कि अभी हाल ही हम हमारी दीदी और बच्चे आगरा गए थे ताज महल देखने। ऐसा नही है कि हम पहली बार ताज महल देखने गए थे। इससे पहले भी कई बार हम ताज महल देख चुके है पर हर बार जब भी जाते है कुछ नया ही देखने को मिलता है। जैसे पहले तो कार बिल्कुल ताज महल के गेट तक जाती थी पर अबकी देखा कि सब कार ताज महल से करीब आधा कि.मी.पहले ही रोक दी जाती है और फिर वहां से बैटरी चालित बस से ताज महल के गेट तक जाना पड़ता है। क्यूंकि ये सुप्रीम कोर्ट का आर्डर है ताज महल को प्रदुषण से बचाने के लिए।बस गेट पर टिकट खरीदिये और चल दीजिए ताज महल देखने। तो हम लोगों ने भी अपनी कार पार्किंग मे छोडी और चल दिए बैटरी चालित बस से ताज महल के गेट पर ,वहां से टिकट लेकर जैसे ही सिक्यूरिटी चेक करा कर आगे बढ़े कि एक गाइड ने पूछा कि गाइड चाहिऐ क्या।

यूं तो हम सभी जानते है कि शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज महल के लिए ताज महल बनवाया था जो उनकी मुहब्बत की निशानी है। ताज महल सफ़ेद मार्बल से बनाया गया है पर क्या आप जानते है और अगर जानते भी है तो भी हम बता देते है कि ये सारा मार्बल शाहजहाँ ने खुद खरीदा नही था बल्कि राजस्थान के राजा ने उन्हें उपहार स्वरूप भेट किया था। खैर गाइड के पूछने पर हम लोगों ने सोचा की चलो इस बार गाइड के साथ-साथ ताज महल के बारे मे क्यों ना जान जाये। ऐसा सोचकर उस गाइड को साथ लिया और चल दिए चान्दिनी रात मे घूमने के लिए अरे मतलब चिलचिलाती धूप मे। हम लोग थोडा धीरे-धीरे चलते हुए फोटो ले रहे थे तभी गाइड ने कहा कि हम लोग थोडा तेज चले और वहां शेड मे खडे हो जाएँ तो वो हमे ताज महल के बारे मे बतायेगा। अब जब गाइड लिया था तो उसकी बात भी माननी थी सो हम लोग पेड़ कि छांव मे खडे मुख्य गए तो उसने बताना शुरू किया कि ताज महल के चार दरवाजे है। अकबरी गेट ,फतेहपुरी गेट,लेबर कॉलोनी गेट (जहाँ ताज महल बनाने वाले मजदूर रहते थे )और ईस्टर्न गेट । फिर उसने चारों ओर बनी एक सी ईमारत को दिखा कर बताया कि ये सराय की तरह है जहाँ बाहर से लोग आकर ठहरते थे।






मुख्य द्वार पर बने गुम्बद की ओर इशारा करते हुए कहा की ये देखने मे तो ग्यारह लग रहे है पर असल मे ये बाईस है क्यूंकि दरवाजे के दूसरी ओर भी ग्यारह बने हुए है।यहां से जैसे ही हम लोग मुख्य दरवाजे के अन्दर दाखिल हुए की गाइड ने हम लोगों को रोककर बताया की अगर सामने दिख रहे ताज महल को देखते हुए आगे की तरफ चलते है तो ऐसा लगता है की ताज महल पीछे जा रहा है। और अगर ताज महल को देखते हुए पीछे की तरफ चलते है तो ताज महल पास आता लगता है। अब जब गाइड ने ऐसा कहा तो जाहिर सी बात है की हम लोगों ने भी चलकर देखा और ये महसूस किया की ताज महल पास आता और दूर जाता लगा। ये कोई भ्रम था या कुछ और ये हम नही कह सकते है।ये फोटो मुख्य द्वार से खीची गयी है।



जब यहां से थोडा और आगे बढ़े तो गाइड ने एक बेंच दिखाई जहाँ बैठकर लोग फोटो खीचते और खीचाते है। और गाइड ने बताया की इस बेंच को प्रिंसेस डायना के नाम से जोडा गया है क्यूंकि जब वो भारत आयी थी तो उसने वहां दो घंटे तक फोटो खीचवायी थी। वहां से थोडा और आगे बढने पर उसने बताया की वहां पर सोलह बगीचे और चौव्वन फव्वारे है और ये सारे फव्वारे एक लाईन मे बने है।और जब हमने देखा तो पाया की वाकई मे सारे फव्वारे बिल्कुल एक सीध मे है।पर आश्चर्य की बात कि एक भी फव्वारा चल नही रहा था और जब गाइड से इसका कारण पूछा तो उसने कहा कि चूंकि अभी दो दिन पहले सफ़ाई हुई है इसीलिये नही चल रहा है। वैसे इससे पहले जब हम ताज महल देखने गए थे तो लोगों को फव्वारे के पानी मे पैर डालते देखा था जो ठीक नही था।

गाइड ने ताजमहल की बाउंड्री वाल को दिखाकर बताया की वो १३० फ़ीट उँची है । और ताज के ऊपर जो ब्रास लगा है उसकी ऊंचाई ३० फ़ीट है हालांकि वो देखने मे ज्यादा ऊंचा नही लगता है। फिर वहां से बाईस सीढियाँ (बिल्कुल खडी-खडी सीढियाँ )चढ़कर ऊपर पहुंचे तो वहां ताज के चारों ओर जो पिलर है उन्हें दिखाकर कर उसने बताया की ये पिलर थोड़े बाहर की ओर झुके हुए है जिससे अगर कभी कुछ हो जैसे भूकंप वगैरा तो ये पिलर बाहर की ओर गिरे जिससे ताज महल को कोई नुकसान ना हो। ताज महल के अन्दर अब तो सिर्फ शाहजहाँ और मुमताज महल की कब्र की रिप्लिका ही देखी जा सकती है क्यूंकि पहले जिन सीढ़ियों से नीचे जाकर उनकी कब्र देखी जाती थी वो सीढियाँ अब बंद कर दी गयी है। यूं तो बाहर बडे-बडे शब्दों मे लिखा है की ताज महल के अन्दर फोटो खीचना मना है पर लोग फोटो खीचने से कहॉ बाज आते है। अन्दर गाइड ने एक दीवार पर बने फूल को दिखाकर कहा ही बायीं ओर जहाँ उस फूल को सीधा बनाया गया है वहां तो ॐ लिखा लगता है और दाईं ओर जहाँ फूल को उल्टा बनाया है वहां अल्लाह लिखा हुआ लगता है।

ताज महल से बाहर निकल कर हम लोग पीछे की ओर गए जहाँ हम ऐसा कह सकते है की कभी यमुना बहती थी पर अब तो यमुना बस नाम की ही रह गयी है। यहां पर गाइड ने बताया की शाह जहाँ एक काला ताज महल भी बनवाना चाहता था पर औरंगजेब ने इसे रूपये की बर्बादी समझा । ताज महल के एक ओर मस्जिद है तो दूसरी ओर गेस्ट हाउस। ताज महल से जब बाहर के मुख्य द्वार की तरफ देखे तो बहुत ही सुन्दर नजारा दिखता है। जैसा की इस फोटो मे आप देख सकते है।

और हाँ उस गाइड का नाम राजू गाइड है और वो गाइड होने के साथ-साथ फोटो भी अच्छी खीचता है।

Friday, July 20, 2007

पापा

परिवार मे माता-पिता दोनो का समान स्थान होता है क्यूंकि अगर माँ घर बार संभालती है तो वो पिता ही है जिनकी वजह से हम बच्चों को सब सुख-आराम मिलते हैपिताजी,बाबूजी,पापा,ये सारे संबोधन हमे ये अहसास दिलाते है कि हमारे सिर के ऊपर उनका प्यार भरा हाथ है और हमे किसी भी बात की चिन्ता या फिक्र करने की कोई जरूरत नही है क्यूंकि जो भी चिन्ता या फिक्र है उसे पापा के पास से होकर गुजरना पड़ता है और हम बच्चों तक सिर्फ और सिर्फ खुशियाँ ही पहुंचती हैहमे अच्छी तरह से याद है कई बार लोग पापा से कहते थे कि भई तुम्हारे तो चार-चार लडकियां है कैसे करोगे तो पापा हमेशा हंस कर कहते थे कि जब भगवान् ने चार बेटियाँ दी है तो भगवान् ने कुछ सोचकर ही हमे चार बेटियाँ दी होंगीऔर उनका ऐसा जवाब सुनकर लोग चुप हो जाते थेक्यूंकि साठ के दशक मे चार-चार लडकियां का होना बहुत ख़ुशी की बात नही मानी जाती थीवैसे तो साठ के दशक मे क्या आज भी बेटियों को बोझ से ज्यादा कुछ नही समझा जाता हैआज भी लोग बेटियों की हत्या कर रहे है

बचपन से आज तक हम सभी भाई-बहन पापा से हमेशा ही ख़ूब बातेंकरते रहे है। हमे कभी याद नही है की पापा ने हम लोगों को कभी जोर से कुछ कहा हो। हाँ हम पाँचों मे से अगर कोई गलती करता था या है तो पापा उसे प्यार से समझा देते है। हमने कभी भी पापा को बहुत ग़ुस्से मे नही देखा है । हाँ मम्मी जब हम लोगों मे से कोई भी गलती करता था तो उसे समझाती थी और कभी-कभी डांटती भी थी। हम सभी भई-बहनों की आदत थी की जैसे ही पापा शाम को घर आते थे हम सब शाम की चाय पीने के बाद उनके कमरे मे एक साथ बैठकर गप्प मारा करते थे। जहाँ पापा अपने दिनभर के किस्सेसुनाते थे और हम सब अपनी स्कूल की बातें । ना तो पापा ने और ना ही मम्मी ने कभी ऐसा कहा की पापा थके हुए है अभी जाओ पापा को आराम करने दो बल्कि किसी दिन हम पाँचों मे से कोई उस बैठक मे ना हो तो पापा परेशान हो जाते थे की क्या बात है।और ये शाम की चाय और गप्प की आदत हम लोगों की अभी तक बनी हुई है। अपने घर मे भी हमने वही system रक्खा है जब हमारे पतिदेव घर आते है तो हम सब शाम की चाय एक साथ पीते है और गप्प मारते है.



पापा ने हम बच्चों से कभी भी दूरी बनाकर नही रक्खी और हम बच्चों ने भी कभी पापा को ऐसा मौका नही दिया जिससे उन्हें कोई दुःख हो। हम सभी भाई-बहनों को बिल्कुल छूट थी ,हम अपनी मर्जी से जो चाहे कर सकते थे ,जहाँ चाहे जा सकते थे । पापा को हम सभी पर पूरा विश्वास था और हम सबने का वो विश्वास कभी टूटने नही दिया। ऐसा ही एक किस्सा उस समय का है जब हमारी शादी तै की जा रही थी और हम मन ही मन थोडा डर रहे थे हालांकि ये डर बिल्कुल बेमानी था पर फिर भी एक दिन सुबह-सुबह जब पापा ऑफिस मे बैठे थे तो हम पहुंच गए उनके पास और उन्हें अपने मन का डर बताया जिसे सुनकर पापा ने हमे समझाया की इस तरह डरने वाली कोई बात नही है क्यूंकि लड़का मतलब हमारे पतिदेव और ससुराल वाले बहुत अच्छे है। और ये जरूरी नही है की अगर किसी के साथ बुरा हुआ है तो वहां शादी ही ना की जाये। और उन्होने प्यार से हमारे सिर पर हाथ फेरा और कहा की अब सब चिन्ता अपने दिमाग से निकाल दो। और आज हम अपने परिवार ,अपने पति और बच्चों के साथ बहुत खुश है।

आज मम्मी को गए हुए दो साल हो गए है पर अब पापा मम्मी की तरह ही हर तीज-त्यौहार पर हम सबको शगुन भेजते है। मई २००७ मे जब हम इलाहाबाद गए थे तो मम्मी की कमी तो बहुत थी पर पापा ने उस कमी को पूरा किया ।हम सबको अपने पापा पर गर्व है

Wednesday, July 18, 2007

टिप्पणियों का महत्त्व

ये चिठ्ठा जगत भी अजीब जगह है ये वो जगह है जहाँ हर कोई अपने मन की बात बेख़ौफ़ होकर लिख सकता है । जहाँ कोई भी अपना ब्लौग बना सकता है और उसपर हर रोज किसी भी विषय पर अपने विचार अपनी पोस्ट के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर सकता है। पर अपने विचार लिखकर पोस्ट कर देने मात्र से ही कुछ नही होता है। अगर कोई भी उसे पढ़ेगा नही तो फिर लिखने का क्या फायदा।और अगर किसे ने पोस्ट पढी और बस चुपचाप बिना कुछ कहे मतलब बिना टिप्पणी किये चला जाता है तो फिर उस पोस्ट को लिखने वाले को ये कैसे पता चलेगा की वो जो कुछ भी लिख रहा है वो लोगों को कैसा लग रहा है। लोग उसके लिखे को पसंद करते है या नही।क्यूंकि टिप्पणी ही एकमात्र ऐसा जरिया है जिसमे आप चिठ्ठा लिखने वाले की तारीफ (अगर मन हो तो ) कर सकते है और लिखने वाले की बुराई भी कर सकते हैपर यकीन मानिए ये टिप्पणियां ही लिखने वाले का हौसला बनाए रखती है इसका हमने अपनी ब्लॉगिंग के तीन महीने जिक्र भी किया था की उन शुरूआती दिनों मे उन्मुक्त जी की पहली टिप्पणी ने हमारी किस तरह से हौसला अफजाई करी थी



यूं जो भी इस चिठ्ठा जगत मे अपने चिठ्ठे लिखते है वो चाहे किसी भी साईट पर हो हमेशा ये जरूरदेखते है की किसी ने उसकी लिखी पोस्ट परटिप्पणी करी है या नही ,या कितने लोगों ने उसकी लिखी पोस्ट को पढा है । जो लोग पिछले कुछ सालों से चिठ्ठे लिख रहे है हो सकता भी एक इन बातों से कोई फर्क ना पड़ता हो ।पर अगर पोस्ट पर कोई टिप्पणी ना हो तो ये अफ़सोस होता है और ये भी लगता है की शायद हमने जो लिखा है वो इस लायक ही नही था की उस पर कोई टिप्पणी करें।ऐसा भी कई बार हमारे साथ हुआ है मतलब हमारी कुछ पोस्ट पर कोई टिप्पणी ही नही हैऔर अब जब आप लोगों द्वारा हमारी पोस्ट परटिप्पणी की जाती है तो ये हमारी खुशनसीबी है की हम जो कुछ भी लिखते है उसे आप लोग पढ़ते है और उस पर टिप्पणी भी करते हैआप सबकी जर्रानवाजी का शुक्रिया



हमारे जैसे नए चिट्ठाकारों को तो ऐसी टिप्पणियों का ही सहारा होता हैपर कई बार टिप्पणी पढ़कर दुःखी भी होते है जैसे एक बार हमने जब टेस्टिंग-टेस्टिंग की पोस्ट डाली थी क्यूंकि उस समय हमारे ब्लॉग मे कुछ प्रॉब्लम रही थी जिसे टेस्ट करने के लिए ही हमने वो टेस्टिंग वाली पोस्ट डाली थीतो कई लोगों ने टिप्पणी की थी ,काफी मजेदार टिप्पणियां थी पर एक टिप्पणी मे शायद दस बार हिट लेने का अच्छा तरीका हैये लिखा थाजिसे पढ़कर हमे बहुत दुःख हुआ था क्यूंकि एक तो हम बिल्कुल नए थे और दूसरे हमे इस सबके बारे ज्यादा पता नही थाक्यूंकि वो पोस्ट हमने हिट के लिए नही पोस्ट किया था बल्कि हमारे ब्लॉग मे कुछ प्रॉब्लम रही थीऔर इस प्रॉब्लम को चेक करने के लिए ही हमने टेस्टिंग-टेस्टिंग वाली पहली पोस्ट डाली थीऔर ये पढ़कर की हमने पोस्ट हिट के लिए लिखा है हमने कुछ ग़ुस्से और दुःख मे अपनी वो पोस्ट ही हटा दी और एक और पोस्ट सिर्फ एक लाईन टेस्टिंग-टेस्टिंग नाम की पोस्ट लिखीऔर इस एक लाईन की पोस्ट पर समीर जी की टिप्पणी थीउस समय तो हमने पोस्ट हटा दी पर बाद मे हमे इस पोस्ट को हटाने का बड़ा दुःख हुआ ,क्यूंकि ये तो बाद मे समझ आया की हर पोस्ट और उसपर की गयी टिप्पणी का कितना महत्त्व है



ओह्हो अभी भी नही समझे ,अरे भाई आप सबकी टिप्पणियों की बदौलत हमने भी सौ नम्बर पा लिए है