इधर कई दिनों से हम यही सोच रहे है की बेटी होना आशीर्वाद है या अभिशाप ।अक्सर हम ऐसी बातें पढ़ते और सुनते है जहाँ बेटी का होना अभिशाप माना जाता है।ये आज से नही सदियों से चला आ रहा है। पुराने जमाने मे ज्यादा पीछे नही जाते है पर ५० साल पहले भी बेटियों के पैदा होने पर घरों मे ख़ुशी कम औए मातम ज्यादा मनाया जाता था।हर घर मे बेटे की चाहत होती क्यूंकि बडे-बुजर्गों का मानना था कि वंश तो बेटे से ही चलता है और बेटियाँ तो पराया धन होती है।
हमेशा से बेटी के जन्म पर शोक मनाया जाता रहा है जबकि बेटी के पैदा होने पर हमेशा ही ये भी कहा जाता है कि लक्ष्मी आई है।पर बेटे के पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है। और बेटे को हमेशा घी का लड्डू माना जाता रहा है।क्यों ये तो सभी जानते है।ऐसा पहले सुनते थे कि राजस्थान मे बेटी पैदा होने पर मार दी जाती थी। पर अब तो राजस्थान क्या सारे देश मे ही बेटियों की बड़ी ही निर्ममता से हत्या कर दी जाती है।कुछ की पैदा होने पर और कुछ की पैदा होने के पहले ही यानी गर्भ मे ही।
पर क्या आज समय बदला है या वही घिसी-पिटी परंपरा चली आ रही है।कुछ तो बदलाव आया है पर अभी भी लोगों की बेटियों के प्रति धारणा पूरी तरह से बदलने मे बहुत वक्त लगेगा। और इस बदलाव का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है अविनाश जी का बेटियों का ब्लॉग।
अभी हाल ही मे अविनाश जी ने बेटियों का ब्लॉग बनाया है जहाँ लोग अपने-अपने अनुभव बाँटते है। जिनमे ज्यादातर सुखद अनुभव ही होते है। जो की एक सुखद शुरुआत है।इस ब्लॉग पर लोगों के अनुभव पढ़कर लगता है कि बेटी होना कोई गुनाह नही है।
पर साथ ही इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता कि आज भी लोग बेटी की हत्या करने मे जरा भी संकोच नही करते है। ये सिर्फ इंसान की सोच है ऐसे लाखों उदाहरण देखने को मिल जायेंगे। और शायद इसी वजह से आज अपने ही देश के कुछ राज्यों मे लड़कियां कम और लडके ज्यादा हो गए है।
आख़िर बेटी को क्यों पैदा होने नही देना है ?
अगर बेटियाँ नही होंगी तो क्या ये सृष्टि का अपमान नही होगा।
आख़िर हम कब बदलेंगे ?
हम चार बेटियाँ है अपने मम्मी-पापा की और हमें गर्व है कि हम बेटी है।
हाँ और एक बात हम अंत मे कहना चाहेंगे कि यहां हमारा मकसद बेटों को नालायक घोषित करना नही है क्यूंकि हमारे भी दो बेटे है । पर बेटी और बेटे मे अंतर करना कहीं से भी तर्क संगत नही है।
Thursday, January 31, 2008
बेटियाँ आशीर्वाद या अभिशाप (१)
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Wednesday, January 30, 2008
आगे-आगे शहंशाह पीछे- पीछे बादशाह
शाह रुख खान हिन्दी फिल्मी दुनिया के बादशाह है तो अमिताभ बच्चन इसी हिन्दी फिल्मी दुनिया के शहंशाह है। और शहंशाह तो वो पिछले १५-२० सालों से है। अब बेचारे शाह रुख खान आख़िर कब तक बादशाह बने रहेंगे और फिर शाह रुख करे तो क्या करें शहंशाह बनने के लिए।अब शहंशाह बनने का नुस्खा तो उन्होने हाल ही मे हुए एन.डी.टी.वी.के इन्डियन ऑफ़ द ईयर अवार्ड समारोह मे बॉस रजनी कान्त से पूछा था। और रजनीकांत ने उन्हें नुस्खा बताया भी था।
अब जब आज तक ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स प्रिन्स ही है किंग नही बने :) अरे क्यूंकि क्वीन ने अभी तक गद्दी नही छोडी है। तो शाह रुख पता नही शहंशाह कभी बन भी पायेंगे या नही ये कहना मुश्किल है।
अब शाह रुख पिछले ४-५ सालों से जाने-अन्जाने अमिताभ बच्चन के पदचिन्हों पर चल रहे है। वो चाहे फिल्में हो या फिर विज्ञापन ही क्यों ना हों। अब डॉन फिल्म इसका जीता जागता सबूत है। आज कल तो कुछ विज्ञापन जिनमे पहले अमिताभ बच्चन आते थे अब उनमे शाह रुख खान नजर आते है।
और अभी हाल ही मे शाह रुख खान को इस साल का फ्रांस का सर्वोच्च पुरस्कार दिया गया जबकि पिछले साल यही अवार्ड अमिताभ बच्चन को दिया गया था।
अब चूँकि गाहे-बगाहे शाह रुख अमिताभ के रास्ते पर चल ही रहे है तो भविष्य मे वो भी कुछ स्कूल ,महाविद्यालय,या संस्थान खोलने पर विचार करेंगे। अब उनकी बहु आने तो अभी बहुत समय है पर फिर भी ..... ।क्यूंकि शाह रुख की दोस्ती भी अमिताभ बच्चन की तरह राजनीति से जुडे कुछ लोगों से तो है ही।
अब देखना है कि शाह रुख राजनीति और इस क्षेत्र मे कदम कब रखते है।
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Tuesday, January 29, 2008
गुलाबी जाड़ा और वाईन टेस्टिंग

अब गोवा जैसी जगह मे भी जब ठंड पड़ने लगे ,सर्द हवा चलने लगे , मौसम का मिजाज कुछ बदला-बदला सा हो तो गोवा मे रहने का मजा ही कुछ और है।आजकल गोवा का तापमान १५ डिग्री सेल्सियस चल रहा है गोवा के इस गुलाबी जाड़े की वजहसे दिल्ली मे ना रहने की कमी खल नही रही है क्यूंकि पिछले ४-५ सालों सेदिल्ली से बाहर ही रह रहे है।इसलिए ठंड से वास्ता जो नही पड़ रहा है।और ऐसे मौसम में वाईन फेस्टिवल का होना । :)
गोवा टूरिज्म द्वारा पिछले साल की तरह इस साल भी आइनोक्स जो की गोवा का मल्टीप्लेक्स है वहां ४ दिनों
(२४-२७ जनवरी ) के लिए वाईन टेस्टिंग फेस्टिवल मनाया गया। इस फेस्टिवल मे विभिन्न प्रकार की वाईन के अलावा खाने का भी खूब बढिया इंतजाम होता है।और साथ ही साथ मनोरंजन का भी पूरा इंतजाम होता है। जिसमे शास्त्रीय संगीत,फियूज्न ,western और rock music, वगैरा का शो होता है। यहां बस खाओ-पीओ और मौज करो वाला माहौल रहता है।
वाईन टेस्टिंग के लिए एक अलग जगह पर इंतजाम रहता है जहाँ वाईन टेस्ट कराने के पहले वाईन के बारे मे भी जानकारी दी जाती है की वाईन कैसे बनाते है,वाईन कहाँ पर बनती है,और किस तरह के खाने के साथ ज्यादा अच्छी लगती है वगैरा -वगैरा। और हाँ ये भी बताया जाता है की वाईन की बोतल को हमेशा ५० डिग्री के एंगल पर लिटा कर रखना चाहिऐ।
यहां इस वाईन टेस्टिंग मे ३-४ तरह की वाईन जैसे वाईट वाईन,रेड वाईन,और स्ट्राबेरी से बनी वाईन(अब सबके नाम तो हमें याद नही है।) को टेस्ट कराया जाता है। वाईन टेस्ट करने के पहले चीज या बिस्कुट खिलाते है जिससे वाईन का सही टेस्ट मिल सके।और एक वाईन पीने के बाद और दूसरी वाईन पीने के पहले पानी पीने को कहते है जिससे दो वाईन का टेस्ट मिल ना जाये। और वाईन के टेस्ट का पूरा मजा लिया जा सके।
अब गोवा जैसी जगह मे इस तरह के आयोजन होना और ऐसे आयोजन देख पाना यहीं पर संभव है। इसके दो कारण है। एक तो यहां पर दूरियां कम है और हर जगह आसानी से पहुंचा जा सकता है। दूसरा छोटी जगह होने से हर चीज पता भी चल जाती है।
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Monday, January 28, 2008
ऐश्वर्या बच्चन कन्या महाविद्यालय
कल अमिताभ बच्चन ने अपनी बहु अब नाम तो हम सभी जानते है ऐश्वर्या के नाम से बाराबंकी के दौलतपुर मे ऐश्वर्या बच्चन कन्या महाविद्यालय खोलने की घोषणा की और इसके लिए पूरा बच्चन परिवार मुम्बई से बाराबंकी गया जहाँ बड़ी ही धूम-धाम से इस की घोषणा की गयी। अब बच्चन परिवार हो और अमर सिंह और मुलायम सिंह ना हो ऐसा भला कहाँ हो सकता है। और कल से बेहतर दिन तो शायद हो ही नही सकता था अरे भाई कल अमर सिंह का जन्मदिन जो था। :)
वैसे तो कन्या महाविद्यालय खोलने का उनका विचार बहुत ही नेक है। और इसमे कोई दो राय भी नही है। अभी हाल ही मे अमिताभ बच्चन ने पटना की दो छोटी बच्चियों को जिन्हें उनके माँ-बाप ने छोड़ दिया था उनकी पढाई वगैरा का खर्चा भी उठाने की घोषणा की थी।
क्या अच्छा हो अगर अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंश राय बच्चन जी के नाम से भी कोई संस्थान शुरू करें क्यूंकि उत्तर प्रदेश मे अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है।
कल ऐश्वर्या के नाम से महाविद्यालय खुला और आज अमर सिंह ने भी अपने नए बंगले का नाम ऐश्वर्या रख लिया।
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Sunday, January 27, 2008
शूटिंग ..उफ़ तौबा
यहां शूटिंग का मतलब गन शूटिंग नही है बल्कि फिल्म की शूटिंग है।वो क्या है ना कि हम जबसे गोवा आये है अक्सर हम अपने पतिदेव से कहते रहें है की यहां पर हमें किसी फिल्म की शूटिंग होती हुई नही दिखाई पड़ती है जबकि आज कल तो आधे से ज्यादा फिल्मों (और विज्ञापनों ) मे गोवा नजर आता है पर हमें कभी शूटिंग देखने को नही मिलती है।
ऐसा नही है कि हम ने पहले कभी शूटिंग नही देखी।पर क्या करें दिल है कि मानता नही। :) (शूटिंग देखे बिना) अरे भाई सत्तर के दशक मे जब पहली बार हम बम्बई घूमने गए थे तब बम्बई तो बहुत घूमे थे पर कोई शूटिंग नही देख पाए थे ।बस प्राण से मिले थे जो उस समय किसी घर मे आत्माराम नाम की फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। पर जब तक हम लोग वहां पहुंचे , शूटिंग ख़त्म हो गयी थी और उस समय प्राण ने कहा था की शूटिंग से ज्यादा बोरिंग कुछ नही होता है क्यूंकि एक shot के लिए कई-कई बार रीटेक होते है।उस समय तो चूँकि हमने शूटिंग देखी नही थी तो उनकी बात समझ नही आई थी।
अब भला ये भी कोई बात हुई की हर फिल्म मे गोवा दिखाई दे और हम एक अदद शूटिंग भी ना देखें। वैसे एक-आध बार जब भी पंजिम मे शूटिंग होती दिखी तो हम देख ही नही पाए ।
कारण अरे ना तो पतिदेव को औए ना ही बेटों को इसमे जरा भी मजा आता है।क्यूंकि नब्बे के दशक मे जब हम लोग मनाली घूमने गए थे तो वहां शूटिंग देखी थी जिसमे हिरोइन को बचाने के लिए हीरो को ऊपर से कूदना था । पहले तो ढेर के ढेर गद्दे लगाए गए फिर गत्ते के डिब्बे लगाए गए जिससे की हीरो जब कूदे तो उसे चोट ना लगे। और ये सब होने मे काफी वक्त निकल गया। और जब सब तैयारी हो गयी तो उस हीरो ने ऊपर से कूदने मे इतना ज्यादा समय लगा दिया था कि हम सभी बोर हो गए थे।पर तब भी हमारा फिल्म शूटिंग देखने का जज़्बा कम नही हुआ था।
खैर वापिस आते है गोवा मे शूटिंग की बात पर।हम जब भी beach पर जाते तो सोचते की काश कोई फिल्म की शूटिंग देखने को मिल जाये। और पिछले शनिवार को हम लोगों ने मोरजिम beach घूमने का प्रोग्राम बनाया।चलिए लगे हाथ इस beach के बारे मे भी थोडा बता देते है।मोरजिम beach पंजिम से ३० की. मी. की दूरी पर है। इस beach पर और दूसरे beaches की तुलना मे ज्यादा शांति रहती है। यहां पर देसी कम विदेशी पर्यटक ही ज्यादा दिखाई देते है जो या तो सन बाथ या मड बाथ लेते दिखते है।beach पर वहां उस एरिया के लड़के क्रिकेट खेलते हुए भी दिखते है। beach तो अच्छा है पर थोडा खतरनाक भी है। एक तो पानी काफी पीछे और घुटनों तक ही रहता है जिसकी वजह से लोग बहुत अन्दर चले जाते है ये सोचकर की पानी ज्यादा गहरा नही है। और दूसरे पानी मे जगह-जगह गड्ढे भी है । और जब हम मोरजिम beach पर पहुंचे तो वहां beach पर किसी फिल्म की शूटिंग चल रही थी और कोई गाना फिल्माया जा रहा था।शूटिंग होती देख हम खुश हो गए और उस ओर चल दिए जहाँ शूटिंग हो रही थी। पर वहां जाकर पता चला की वहां किसी दक्षिण भारतीय गाने की शूटिंग चल रही थी।औरचूँकि उन कलाकारों को भी हम नही पहचानते थे। इसलिए हमारा जोश कुछ ठंडा हो गया। अब चूँकि beach पर हम लोग थे ही तो शूटिंग होती भी देख ही रहे थे।
पर बाप रे एक लाइन को शूट करने मे जिसमे सारे कलाकार एक जीप मे बैठ कर beach पर चक्कर लगाते है उस एक लाइन और एक shot को फिल्माने मे उन लोगों ने तीन घंटे लगा दिएजबकि मुश्किल से वो shot कोई एक-आधे मिनट का रहा होगा ।।हर दस मिनट पर जोर से गाने की वो लाइन बजती और जीप मे बैठे कलाकार हाथ हिलाते हुए एक चक्कर लगाते। और उस दिन के बाद शूटिंग देखने का हमारा हौसला कम क्या अब ना के बराबर हो गया है।
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Saturday, January 26, 2008
गोवा के गणतंत्र दिवस की कुछ झलकियाँ

आज २६ जनवरी है यानी गणतंत्र दिवस । आज सारा भारत वर्ष ५९ गणतंत्र दिवस मना रहा है।गोवा मे भी गणतंत्र दिवस जोर-शोर से मनाया जा रहा है।इस परेड को देखने के लिए गोवा के गवर्नर के अलावा के गोवा के मुख्यमंत्री,मुख्य सचिव,मंत्रिगन ,और आम जनता पंजी के कम्पाल मैदान मे एकत्रित हुई. गोवा के गवर्नर एस.सी. जमीर ने परेड का निरीक्षण किया।और उसके बाद परेड की सलामी ली जिसमे सेना के तीनों बल (थल,वायु,जल सेना ),पुलिस,एन.सी.सी.तथा स्कूल के बच्चेने भाग लिया। सलामी के बाद गवर्नर ने लोगों को पदक प्रदान किये। और उसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमे करीब डेढ़ हजार से ज्यादा बच्चों ने भाग लिया
।
कार्यक्रम शुरू होने के पहले तिरंगे रंग के गुब्बारे भी उडाये गए।
इस कार्यक्रम का हमने विडियो बनाने की कोशिश तो की है पर विडियो ज्यादा साफ नही आया है। इसलिए हम यहां पर कुछ फोटो ही लगा रहे है।बाद मे विडियो अपलोड करेंगे।
इस फोटो मे बच्चों ने देश मे फ़ैल रहे आतंक को दिखाया गया है।
साढ़े पांच सौ स्पेशल चिल्ड्रेन ने इस कार्यक्रमको प्रस्तुत किया जिसमे इन बच्चों ने तीन गानों पर डांस किया था। 
गोवा के बाल भवन के करीब छः सौ बच्चों ने पहले तीन रंगों के झंडे लेकर नन्हा-मुन्ना राही हूँ की धुन पर मार्च
किया फिर विभिन्न राज्यों जैसे कश्मीर,पंजाब,राजस्थान ,गुजरात,आसाम,और गोवा के लोक नृत्य पारंपरिक वेश भूषा मे पेश किये। इस डांस की खासियत ये थी कि एक राज्य
का नृत्य ख़त्म होने के साथ ही दूसरे राज्य का संगीत बजने लगता था और उस संगीत के साथ उस राज्य की पारंपरिक वेश भूषा मे बच्चे प्रवेश करते और उस राज्य का लोक नृत्य प्रस्तुत करते थे।आप इस दाहिने वाली फोटो मे देख सकते है जिसमे राजस्थान के बाद गुजरात का लोकनृत्य प्रस्तुत करने के लिए बच्चे आ रहे है।
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Thursday, January 24, 2008
डी एडिक्शन कैंप (ना कहना सीखो )
इधर कई दिनों से डी एडिक्शन पर लिखना छूट सा गया था पर आज अजित जी की पोस्ट ने हमे वापिस इस विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया।हमने पहले भी लिखा है कि कोई पीना क्यों शुरू करता है। अंडमान मे जब हम लोग हॉस्पिटल मे लोगों की काउन्सेलिंग करते थे तो इस बात का ध्यान रखते थे कि जो भी क्लाइंट (मरीज ) है उसे हम लोगों से अपनी बात कहने मे कोई भी हिचकिचाहट नही होनी चाहिऐ क्यूंकि अगर वो शराब पीना छोड़ना चाहता है तभी हम लोग उसकी मदद कर सकते है और इसके लिए उसे हमे सही-सही जानकारी देनी होगी।इसके लिए हम सभी काउंसलर क्लाइंट के साथ कई सेशन करते थे । शुरुआत कुछ ऐसे होती थी।
काउन्सेलर सबसे पहली बात जो क्लाइंट से पूछते थे कि आपने पीना क्यों शुरू किया ?
जिसका जवाब हर कोई अलग-अलग देता था जैसे किसी ने दोस्तों के साथ तो किसी ने झगडे की वजह से वगैरा-वगैरा।
और दूसरी बात जो पूछते थे कि आपने पीना कब शुरू किया ?
इसका जवाब भी हर कोई अलग-अलग देता जैसे किसी ने ५ साल की उम्र से तो किसी ने ८ साल की उम्र से वगैरा-वगैरा ।
उसके बाद काउंसलर क्लाइंट के परिवार की जानकारी लेता जिससे उसके शराब पीने के कारण का सही-सही पता चल सके।
उसके बाद जो बात सबसे अहम होती है वो पूछी जाती थी कि तुमने शराब कैसे पी ?
और इसका बड़ा ही सीधा सा जवाब होता कि गिलास से पी।
और यही पर काउंसलर उससे एक और बात पूछता कि क्या किसी ने गिलास तुम्हारे मुँह से लगाया था या तुमने गिलास खुद उठाया था।
इस पर कई बार क्लाइंट कहते कि भला कोई क्यों गिलास मेरे मुँह से लगायेगा मैंने खुद ही गिलास उठाया और पिया था।
और यहीं से काउंसलर का काम शुरू होता था उसको ये अहसास दिलाने का कि अगर वो चाहे तो गिलास नही भी उठा सकता था ,शराब नही भी पी सकता था।
काउंसलर उससे एक और बात पूछता की क्या अगर शराब की जगह गिलास मे चाय या शरबत होता और उसका दोस्त उसे पीने के लिए कहेगा तो वो पिएगा या नही।
तो झट से उनका जवाब होता था की नही।
तब काउंसलर उससे कहता की जिस तरह आप चाय या और शरबत को पीने के लिए मना कर सकते हो उसी तरह शराब को भी ना कह सकते हो।
और यही पर सेशन ख़त्म हो जाता था और काउंसलर क्लाइंट को इस पर सोचने और ना कहना सीखने की आदत डालने को कहते थे ।
कुछ ज्यादा लम्बा सेशन हो गया है । :)
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Wednesday, January 23, 2008
कुएं मे शेर
क्या आपको यकीन नही आ रहा है की कुएं मे शेर भी हो सकता है तो लीजिये सबूत हाजिर है। :)
अब बताइये कुएं और शेर से कुछ याद आया की नही। जी हाँ आप ने बिल्कुल सही समझा हम चालाक खरगोश और शेर की कहानी की ही बात कर रहे है ।
बचपन मे तो केवल कहानी मे पढ़ा था और अपने बच्चों को भी ये कहानी कई बार सुनाई थी पर शेर को कुएं मे देखने का मौका पहली बार लगा।
कुछ पुलिस वाले दिखेंगे जो उस खरगोश को ढूंढ रहे है जिसने इस शेर को कुएं मे गिराया है। :)
नोट - इस शेर को कहाँ और किस खरगोश ने गिराया ये तो हम नही जानते है क्यूंकि इस की फोटो खींचने के लिए हम कैमरा लेने जो चले गए थे।
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Tuesday, January 22, 2008
बुल फाईट (कौन बड़ा जानवर है)
बुल फाईट एक ऐसा खेल है जो इंसान और (जानवर)सांड के बीच मे खेला जाता है।या फिर दो सांडों की लड़ाई भी कराई जाती है। इस बुल फाईट के खेल को देख कर ये समझना मुश्किल हो जाता है की आदमी बड़ा जानवर है या सांड। भारत मे तो इस खेल के दोनों रुप प्रचलित है।
बुल फाईटका खेल स्पेन,फ़्रांस,लैटिन अमेरिका,पुर्तगाल मे तो बहुत ही जोर-शोर से होता है जहाँ कई लोग इस खेल मे भाग लेते है ।इन जगहों पर स्टेडियम मे बाकायदा लोग अपने-अपने बुल लेकर भी आते है।कई बार लोग स्टेडियम मे बुल पर बैठकर प्रवेश करते है पर कई बार बुल उन्हें गिरा भी देता है। कई जगहों पर तो पारंपरिक वेश-भूषा मे लोग बुलफाईट करते है। जहाँ बुल को एक लाल कपड़ा दिखाकर उकसाया जाता है और उसका ध्यान कपडे की ओर खींचा जाता हैऔर जब यही बुल बिगड़ जाता है तो खेलने वाले के जान के लाले पड़ जाते है। जैसा की इस विडियो मे दिखाया गया है।
अपने भारत देश मे भी बुल फाईट बहुत प्रचलित है । तमिल नाडू मे जल्ली कट्टू नाम से ये खेल जाना जाता है। इस जल्ली कट्टू मे सांड को लोगों के बीच मे खुला छोड़ दिया जाता है और वो लोगों यानी जनता के बीच मे भागता है और जनता उसे काबू मे करने की कोशिश करती है।इस खेल मे जान का ख़तरा होता है पर फिर भी लोग इसे खेलने से डरते नही है। ।कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर प्रतिबंध लगाया था पर बाद मे सुप्रीम कोर्ट ने ये प्रतिबंध हटा लिया था। और प्रतिबंध हटाने के चंद रोज बाद ही इस जल्ली-कट्टू खेल के दौरान एक सत्तर साल के व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी। हालांकि वो व्यक्ति जनता के बीच मे खड़ा होकर ये खेल देख रहा था । हो सकता है इस खेल मे जितना खेलने वाले को रोमांच होता है उतना ही रोमांच इसे देखने वाले को भी होता होगा ।इसीलिए लोग जान की परवाह ना करते हुए इस खेल को खेलते और देखते है।
तमिल नाडू की तरह ही यहां गोवा मे भी बुल फाईट बहुत प्रचलित है। गोवा मे तो बिना किसी सुरक्षा के इंतजाम के बिल्कुल खुले मैदान मे ही बुल फाईट कराई जाती है।और अक्सर यहां के अखबारों मे ऐसी ही बुल फाईट की खबरें निकलती रहती है।पेटा (peta) और दूसरे एन.जी.ओ.इस खेल के खिलाफ आवाज उठाते है पर उससे बुल फाईट के खेल पर कोई असर नही पड़ता है। और तो और यहां गोवा मे तो सरकार बुल फाईट को लीगल ही करने की सोच रही है।
अंत मे जल्ली कट्टू का ये विडियो देखिए जो हमें कुछ सोचने पर मजबूर करता है।
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Friday, January 18, 2008
तारे आस्मां मे
ये खबर तो कल शाम को ही आज तक ने दिखाई थी और आज सुबह जी न्यूज़ और आज तक दोनों चैनल पर ये खबर आ रही थी।तो सोचा आप लोगों तक भी ये खबर पहुंचाई जाये। खबर ये है की दर्शील जिसने तारे जमीं पर मे ईशान की भूमिका निभाई थी उसे अभी हाल ही मे हुए स्टार स्क्रीन अवार्डस मे बेस्ट चाइल्ड ऐक्टर और स्पेशल ज्यूरी अवार्ड का खिताब दिया गया है पर दर्शील का कहना है कि चूँकि वो तारे जमीं पर फिल्म का हीरो है इसलिए उसे बेस्ट ऐक्टर अवार्ड दिया जाना चाहिऐ ना की बेस्ट चाइल्ड ऐक्टर का।
दर्शील ने तो यहां तक कह दिया है कि वो ऐसे किसी भी अवार्ड कार्यक्रम मे नही जाएगा जहाँ उसे बतौर चाइल्ड ऐक्टर अवार्ड दिया जाएगा।उसका कहना है कि अवार्ड देना है तो बेस्ट ऐक्टर का दो और नोमिनेशन भी बेस्ट ऐक्टर की श्रेणी मे होना चाहिऐ ना की एक अलग बाल कलाकार की श्रेणी मे ।अभी तक तो शाह रुख खान ही कहते थे आई एम द बेस्ट और अब दर्शील भी यही कह रहे है की वो ही बेस्ट है।
अवार्ड से एक और अवार्ड भारत रत्न भी आजकल बहुत चर्चा मे है। अडवानी जी ने अटल बिहारी बाजपेई के नाम की सिफारिश की तो मायावती ने कांशी राम के नाम की तो किसी ने ज्योति बासु तो किसी ने करुना निधि के लिए भारत रत्न दिए जाने की माँग की।मानो भारत रत्न ना हो कोई लड्डू हो कि भाई हमे दे दो ।भारत रत्न इससे पहले तो बस जब किसी को मिलता था तब खबरों से लोगों को पता चलता था कि फलां को भारत रत्न मिला है। पर अब तो बाकायदा लोग नाम सुझाते है और सुझाए हुए नाम की पैरवी भी करते है।
एक चैनल तो बाकायदा कुछ लोगों जैसे सचिन तेंदुलकर ,एम,एफ,हुसैन ,रतन टाटा,जैसे नामों को दिखा कर पूछ रहा है कि इनमे से आप किसे भारत रत्न चुनेंगे। एस,एम,एस के जरिये वोट देकर आप भारत रत्न चुन सकते है।
इतने सारे नाम तो सुझाए गए पर ये क्या सबसे तगडे सोनिया गांधी के नाम को लोग कैसे भूल गए।ये सारे नेता कहाँ सो गए है। आख़िर सोनिया गाँधी ने प्रधान मंत्री पद का त्याग किया था।और सबसे मजबूत और सही उम्मीदवार तो भारत रत्न की वही हो सकती है।
क्या हमने कुछ गलत कहा ?
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