चाय और हम

अधिकतर लोगों की सुबह की शुरूआत चाय से ही होती है । अब इसमें नया कुछ नही है। पर हाँ हमारा और चाय का बड़ा ही पुराना नाता है ।

जब हम छोटे थे तब तो हम कभी कभार ही चाय पीते थे पर जैसे जैसे हम बड़े होते गये वैसे वैसे हमारा चाय का शौक़ भी बढ़ने लगा पर उन्हीं दिनों हुई एक घटना ने जिसमें पूरी की पूरी गरम चाय हमारे पैरों पर गिर गई थी और हम बहुत जल गये थे तो डर से कुछ दिनों के लिये हमने चाय पीना छोड़ दिया था । पर ज़्यादा दिन तक हम चाय से अलग नहीं रह पाये और दोबारा चाय पीना शुरू कर दिया था । 😋

ख़ैर हम बड़े होते गये और हमारा चाय का शौक़ भी बढ़ता गया। वैसे हमारे घर में शाम चार बजे की चाय का समय बिलकुल निश्चित था क्योंकि पापा के आने के बाद परिवार के सब लोग एक साथ चाय पीते थे। और दुनिया भर की बातें होती थी । और इम्तिहान के दिनों मे पढ़ाई करते हुये घर के बने हुये आलू के चिप्स और चाय का सेवन अलग ही मजा देता था ।रात मे पढ़ाई के लिये जागने मे चाय बड़ी मदद करती थी । क्यूँ ग़लत तो नहीं कह रहे है ना ।

जब यूनिवर्सिटी पहुँचे तो हमारी चाय की साथी हमारी मम्मी बनी । हमारा और उनका चाय का साथ खूब चला । जिस दिन हमारी क्लास ग्यारह या बारह बजे होती थी तो चाय बनती और हम और मम्मी चुस्की लेकर चाय पीते और फिर हम यूनिवर्सिटी को चल देते थे । 😊

शादी हुई तो ससुराल मे भी हमारा चाय का ये शौक़ बरक़रार रहा क्योंकि वहाँ पर सुबह की चाय के बाद नाश्ते मे भी चाय होती थी और फिर एक बार ग्यारह बजे चाय पकौड़ी होती थी । और फिर शाम को चाय बनती और कई बार जब खाना बनाने वाली आती तो हम लोग फिर चाय पीते थे । कहने की ज़रूरत नहीं है कि हमारी ससुराल मे भी लोग चाय के बहुत शौक़ीन थे । 😋


बाद मे कुछ सालों के लिये हमारे पापा दिल्ली आ गये थे ,तब तो हमारा चाय का शौक़ अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था क्योंकि जब भी हम अपनी मम्मी के घर होते थे और जहॉं कोई सर्वेंट दिखा तो बस फट से हम लोग चाय की फ़रमाइश कर देते थे । भले थोड़ी देर पहले ही क्यूँ ना चाय पी हो ।

कई बार पापा कहते थे कि तुम माँ बेटी को तो बस चाय पीने का बहाना चाहिये । थक गई हो तब तो चाय चाहिये ही चाहिये ख़ुश हो तो चाय चाहिये ,घूम फिर कर या शॉपिंग करके आई हो तो चाय चाहिये । पर पापा के कहने का हमारे और मम्मी पर कुछ असर नही होता था । 😃
और मज़े की बात कि ये सारे बहाने आज भी होते है चाय पीने के । 😀

चाय अगर रात मे जागना हो मतलब अगर गप्पें मारनी हो और सुबह ट्रेन या प्लाइट पकड़नी हो तो चाय से अच्छा कोई साथी नहीं है।ऐसा हम लोग अकसर किया करते थे जब दीदी लोग दिल्ली आती थी और ज़िस दिन उन्हें वापिस जाना होता था तो हमलोग रतजगा ( मतलब सारी रात जागते थे ) करते थे । और फिर सुबह की चाय पिलाकर उनको रवाना करते थे । पर इसके उलट हमारी एक दीदी को अगर रात मे चाय पिला दो तो उन्हें तुरन्त नींद आ जाती है । सच में ऐसा भी होता है । 😃

ख़ैर अब तो ब्लैक टी,ग्रीन टी, का ज़माना आ गया है । हम भी अब सुबह ब्लैक टी और हमारे पतिदेव ग्रीन टी पीते है। पर ग्यारह बजे दिन मे और शाम चार बजे शाम की चाय (दूध वाली ) तो अभी भी पीते है । पर वैसे अब हमारा चाय पीना काफ़ी कम हो गया है पहले के मुक़ाबले । 😀

हमने तो याक के दूध से बनी नमक वाली चाय भी पी है , अरूनाचल प्रदेश की तवांग मौनेसट्री मे । 🙂

चलिये बहुत हो गई बातें अब हमें चहवास लग रही है मतलब हम चाय पीने जा रहे हैं । ☕️



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