हिन्दी मीडियम

हम इरफ़ान खान की मूवी हिन्दी मीडियम की बात नहीं कर रहे है बल्कि असल मे हिन्दी मीडियम मे पढ़ने वालों की बात कर रहे है। साठ सत्तर के दशक मे इंग्लिश बोलना बड़े शान की बात मानी जाती थी ।

वैसे अब ये बात उतना मायने भी नहीं रखती है पर हाँ साठ और सत्तरके दशक मे ये बात बहुत मायने रखती थी । क्योंकि उस समय ज़्यादातर स्कूल हिन्दी मीडियम के होते थे । हालाँकि पढ़ाई अच्छी होती थी । पर कॉनवेंट मे पढ़ने वालों की इंग्लिश पर पकड़ बहुत अच्छी होती थी । सब खूब फ़र्राटे दार इंग्लिश बोला करती थी । अख़बार मे भी कई बार लड़के और लड़की की शादी के विज्ञापन में ख़ासकर मोटे मोटे अक्षरों मे कॉनवेंट एजुकेटेड लिखा होता था । 😋


अब तो ख़ैर सभी बच्चे इंग्लिश स्कूल मे पढ़ते है और अब ये हालत है कि बच्चों को इंग्लिश तो खूब बढ़िया लिखनी पढ़नी आती है पर हिन्दी लिखना पढ़ना मुश्किल होता है।

अभी हाल ही मे हुई दो बातें हमारी इस पोस्ट को लिखने की वजह है। पहली वजह है तक़रीबन पॉंच छः दिन पहले हमारी एक दोस्त ने एक पोस्ट हिन्दी मे लिखी थी जिसपर किसी ने कमेंट करा था कि आजकल लडकियां हिन्दी नही पढ़ती है। और दूसरी वजह हमारी सोसाइटी मे रहने वाली हमारी दोस्त से कल हुई बात इस पोस्ट को लिखने की वजह है। हमारी दोस्त का कहना था कि उनके साथ पढ़ने वाली कुछ लड़कियाँ इंग्लिश तो बहुत अच्छी बोलती थी पर बाक़ी विषयों मे थोड़ा कम अच्छी थी ।

वैसे साठ सत्तर के दशक मे इंग्लिश स्कूल या कॉनवेंट स्कूल कम होते थे एक शहर मे बस दो चार । और जो होते थे वहॉं पर हर कोई अपने बच्चों को नही भेजता था । इसके कुछ कारण थे जिसमें सबसे पहला जो हम सोचते है वो ये कि उस ज़माने मे हर घर परिवार मे कम से कम पाँच बच्चे तो होते ही थे । और उस समय इंग्लिश या कॉनवेंट स्कूलों की फ़ीस उस ज़माने के हिसाब से बहुत होती थी । और बड़े बुज़ुर्ग लोग बच्चों को कॉनवेंट स्कूल मे पढ़ाना अच्छा नही मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि वहाँ पढ़ने से बच्चे बिगड़ जायेंगे ।

सबसे बड़ी बात उस समय सरकारी और प्राइवेट स्कूल काफ़ी अच्छे हुआ करते थे। फ़ीस भी कम हुआ करती थी। अब जिस स्कूल मे हम पढ़ते थे वो हिन्दी मीडियम स्कूल था पर पढ़ाई मे सबसे अच्छा और नम्बर वन था । ( वैसे अब हमारे स्कूल मे हिन्दी और इंग्लिश दोनों मीडियम मे पढ़ाई होती है ) मतलब हमारे डी.पी.स्कूल मे तो पढ़ाई और ख़ासकर विज्ञान मतलब साइंस की पढ़ाई इतनी अच्छी होती थी कि कॉनवेंट की लड़कियाँ हमारे स्कूल मे साइंस पढ़ने के लिये आती थीं । कहने का मतलब है कि ये ज़रूरी नही है कि कानवेंट मे पढ़ाई अच्छी ही होती है।

पर हाँ कानवेंट और दूसरे स्कूल मे पढ़ने वालों मे एक अन्तर ये था कि कॉनवेंट मे पढ़ने वालों की इंग्लिश बोलने की क्षमता दूसरों से बेहतर होती थी । और जहाँ दो कॉनवेंट मे पढ़ने वाले मिल जाते है तो ऐसा लगता था मानो इंग्लिश की बाढ़ सी आ गई हो और वो लोग बाक़ी लोगों से अपने को अलग मानती थी । ऐसा नही है कि दूसरे स्कूल मे पढ़ने वाले इंग्लिश नही बोलते थे पर कई बार ये पता होते हुये भी कि वो सही बोल रहे है फिर भी इंग्लिश बोलने मे हिचकिचाते थे।

कभी कभी हमारे साथ भी हुआ है कि हम किसी पार्टी मे गये और वहाँ इंग्लिश बोलने वालों के बीच मे पड़ जाते थे तो कभी कभी दिक़्क़त होती थी क्योंकि हिन्दी आते हुये भी लोग हिन्दी नही बोलते है। जबकि हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है । पर हिन्दी मे बोलना या बात करना अपनी बेइज़्ज़ती समझते है।

ख़ैर आजकल तो हर स्कूल और हर घर परिवार इंग्लिश बोलने और पढ़ने पढ़ाने पर ज़ोर देता है। अब तो घर मे भी लोग हिन्दी की बजाय इंग्लिश मे ही बच्चों से बात करते है। अब ये कहना ग़लत नहीं होगा कि आजकल तो बच्चे पैदा होने के साथ ही इंगलिश बोलना शुरू कर देते है । 😊

ये तो हम सभी जानते और मानते है कि इंग्लिश अब यूनिवर्सल भाषा हो गई है ।

जहाँ तक हम जानते है ये सिर्फ़ हिन्दी भाषा के साथ ही समस्या है क्योंकि बाक़ी दूसरी भाषा वाले बाहर चाहे सिर्फ़ इंग्लिश बोले पर घर पर अपनी क्षेत्रीय भाषा ही बोलते है पर अफ़सोस हम हिन्दी भाषी ऐसा नहीं करते है ।

आपका क्या विचार है ।















Comments

Popular posts from this blog

जीवन का कोई मूल्य नहीं

क्या चमगादड़ सिर के बाल नोच सकता है ?

सूर्य ग्रहण तब और आज ( अनलॉक २.० ) चौदहवाँ दिन