Monday, January 19, 2009

आजकल हर तरफ़ जाड़ा छाया हुआ है दिल्ली यू.पी. बिहार हो या चाहे अमेरिका ,लन्दन या कनाडा ही क्यूँ हो पर हमारे यहाँ ..... । कभी-कभी कोस्टल एरिया मे रहने का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है :) क्योंकि आम तौर पर ऐसी जगहों पर सारे साल गरमी के जैसा ही मौसम रहता है ।गोवा मे जाड़े का अनुभव बस - दिन सुबह-सुबह होने वाले कोहरे को देख कर ही होता हैऔर सूरज देवता के बजे के बाद उगने से पता चलता है की गोवा मे जाड़ा गया हैऔर या फ़िर वाईन टेस्टिंग फेस्टिवल से :) अब आज कल जहाँ आधे से ज्यादा भारत देश मे ठण्ड पड़ रही है वहीं गोवा मे अभी २ -३ दिन पहले जनवरी का सबसे गर्म दिन हुआ था । :( :)

जाडे के कुछ नफे (ज्यादा)और नुक्सान (कम) है ।अब नफ़ा ये है कि इस जाड़े के मौसम मे एक तरफ़ जहाँ मूंगफली और अमरुद खाने का मजा है वहीं दूसरी तरफ़ घुघरी खाने का भी अपना अलग ही मजा है :) तो जाड़े का नुकसान है कि नल का पानी भी बिल्कुल बरफीला ठंडा हो जाता है और रजाई से बाहर निकलने पर दांत भी किटकिटाने लगते हैअब यहाँ चूँकि जाड़ा पड़ता नही है तो इसलिए यहाँ पर जाड़े के नफे-नुकसान से कोई फर्क नही पड़ता है:)

हो सकता है आप को लगे कि लो भाई यहाँ अपनी तो जाड़े के मारे मुसीबत है और एक ये है जिन्हें जाड़े की कमी महसूस हो रही हैअब क्या करें इंसान की फितरत ही ऐसी है जो नही है उसे ही पाने की ख्वाहिश होती हैऔर हम भी उसी फितरत के मालिक है :)

तो चलिए कुछ पुरानी बातें याद करके मन को खुश कर लिया जाए ।

आह वो भी क्या दिन थे (और इलाहाबाद की मूंगफली भी क्या गज़ब की दानेदार मूंगफली होती है) जब इलाहाबाद मे हम सब बहनें रजाई मे घुसकर मूंगफली खाने का कोम्पतीशन किया करते थेएक पूरा अखबार रजाई पर फैलाया जाता था और फ़िर मूंगफली का पूरा पैकेट उसमे पलट दिया जाता था और साथ मे होती थी नमक ,हरी धनिया और मिर्चे की चटनी फ़िर शुरू होता था मूंगफली खाने का कोम्पतीशनऔर सबसे मजे की बात की छिलका अलग नही रखते थे क्यूंकि आख़िर मे जब मूंगफली खत्म होने लगती थी तब ही तो असली मजा आता था उसमे से मूंगफली ढूँढने का और खाने का :)
और हाँ अगर आपने ऐसा मूंगफली खाने का कोम्पतीशन नही किया है तो करके देखिये यकीन जानिए बड़ा मजा आता हैयहाँ ना तो रजाई और ना ही वैसी मूंगफली मिलती है हाँ आज कल कभी कभार कच्ची मूंगफली सब्जी मंडी मे मिल जाती है (और फ़िर ख़ुद भूनो या उबालो और तब खाओउफ़ इतने मे तो सारा मजा ही खत्म हो जाता है)पर उसमे वो भुनी हुई मूंगफली का स्वाद कहाँ

भूनने से याद आया जब तक हम लोग दिल्ली मे थे तो जब बेटों की जाड़े की छुट्टियों होती थी तो हम लोग अक्सर लखनऊ ( हमारी ससुराल ) जाते थेऔर लखनऊ मे जाड़े के दिनों मे शाम को अंगीठी जलाई जाती थी और सब लोग उसके चारों ओर बैठ कर हाथ तापते थेअब अगर खाली हाथ ही तापा जाया तो फ़िर अंगीठी जलाने का भला क्या फायदा:)
अम्माजी (हमारी सास ) उसमे हरी मटर और आलू वगैरा भूनती थी और वहीं गरम-गरम भुना आलू और मटर खाने मे जो मजा और स्वाद आता था वो भला यहाँ कहाँ मिले । (वैसे इस एक महीने यहाँ हरी मटर जरुर मिल जाती है और हम निमोना और मटर की पूड़ी खा लेते है । :)


अब आख़िर हम ठहरे इलाहाबादी तो भला इलाहाबाद के पेड़े यानी अमरुद को कैसे भूल सकते है :)
पिछले कुछ सालों से दिल्ली से बाहर रहने के कारण इलाहाबाद के अमरूदों से भी वंचित हैअब दिल्ली मे तो इलाहाबाद से अमरुद जाते थे (हालाँकि उनका स्वाद कुछ अलग हो जाता था )पर यहाँ तक आते-आते तो अमरुद गल ही जाते है

अब जाड़ा ना सही जाड़े की यादें ही सही:)

17 Comments:

  1. रंजना [रंजू भाटिया] said...
    यहाँ तो कल से बारिश है और ठण्ड तो है ही ..खूब याद किया आपने जाडे को और मूंगफली .अमरुद को :)
    Nirmla Kapila said...
    are kuchh din ki chhuti le kar aajaao bhakra dam ki jheel me jaade kaa anand lenge
    Vidhu said...
    अन्दाजें ब्यान मुमफली ..हमतो ना मिले गर जान दे दें...मटर पिंड खजूर, आलू ..वह क्या बात है आपकी और हमारी पसंद मिल गई...आमीन
    जितेन्द़ भगत said...
    सुखद वि‍वरण।
    seema gupta said...
    " ओह क्या क्या नही है यहाँ आज मूंगफली और अमरुद वाह वाह.."

    Regards
    डॉ .अनुराग said...
    जाडे का मजा कुछ ओर है....मूंगफली का भी.....
    Manisha said...
    मजा आ गया, बचपन याद आ गया। हमारे यहां भी यही सब होता था।

    मनीषा
    mehek said...
    yaadon ke mausam se rubaru hona bahut achha laga,hamare yaha to thandi se pareshan hai hum:(
    दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
    चलिए आप को जाड़ा याद आया। बेटी मुंबई से कोटा आ रही है। फिर दिल्ली। डर लगता है कि कहीं लापरवाही कर गई तो बीमार न हो ले।
    Amit said...
    ye bhi khub rahi.....
    Gyan Dutt Pandey said...
    यहां तो जाड़ा - कुहासा झेल रहे हैं, पर मूंगफली का मजा न ले पाये!
    कल देखते हैं।
    P.N. Subramanian said...
    गोआ के बारिश का मज़ा तो इलाहाबाद में नहीं मिलेगा. वैसे ठंड का मज़ा सही में कुछ और ही है. सुंदर पोस्ट. आभार.
    लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...
    बडी शिद्दत से याद किया है
    मधुर यादोँ को
    ममता जी आपने
    अब ये भी बता देँ कि
    "निमोना " क्या होता है ?
    हमेँ पता ही नहीँ !
    संगीता पुरी said...
    सच में बचपन की याद दिला दी.....अब कहां रह गया है यह माहौल।
    नीरज गोस्वामी said...
    इसी जाड़े को याद करता जयपुर गया और पूरा एक महीना वहां बिता के आया...खोपोली आप के गोया जैसा ही समझो...आप जो गोवा में मिस कर रहीं हैं हम वो हर साल खोपोली में करते हैं...सर्दी का आनंद सिर्फ़ और सिर्फ़ उत्तर भारत वाले ही जान सकते हैं...
    नीरज
    mamta said...
    पहले तो आप सभी का टिप्पणियों के लिए शुक्रिया ।
    निर्मला जी आपने बुलाया है तो हम अवश्य जाड़े का मजा लेने आयेंगे । :)
    लावण्या जी हम सोच रहे है कि कल-परसों मे क्यों न दाल रोटी चावल पर निमोना की रेसिपी पोस्ट कर दे ।
    सुब्रमनियन जी आपने ठीक कहा है कि गोवा कि जैसी बारिश इलाहाबाद या दिल्ली मे नही मिल सकती है ।खुश रहने के लिए ये भी अच्छा है । :)
    Dr Prabhat Tandon said...
    हाँ लेकिन वक्त के साथ मूँगफ़ली का मजा जाता गया , जाडॆ नाम के हैं लेकिन जाडा नही , मूगफ़ली है लेकिन स्वाद नही , बीते दिनों की यादों मे सब को सामिल कराने के लिये धन्यवाद !! यह घुघरी क्या है ?

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