Saturday, March 31, 2007

नमस्कार दोस्तो ,हम दिन के लिए सपनों की नगरी मुम्बई गए थेइससे पहले जब हम गए थे तब मुम्बई को बोम्बे कहा जाता था आज से करीब १० साल पहलेगोवा से मुम्बई का सफ़र हमने कार से तय किया जो कि बहुत ही रोमांचक और अच्छा रहाबहुत सारे घाट पड़ते है जिनकी वजह से ही ड्राइव का मजा हैमुम्बई शहर कि भागदौड़ बिल्कुल पहले जैसी है हाँ अब गाड़ियों कि संख्या और इंसानों कि संख्या पहले से कई गुना ज्यादा हो गयी हैइतने सारे flyovers के बावजूद ट्राफिक रूक जाता है और इंच -इंच गाड़ी आगे बढती है वहां flyover पर रुके रुके हम ये भी सोच रहे थे कि जब अभी ये हाल है तो अगले १५ साल बाद मुम्बई का क्या हाल होगा ?

शहर का तो कोई ओर छोर ही नही है जहाँ तक नजर जाती है या तो बड़ी - बड़ी इमारतें दिखायी देती है या फिर लोग। मुम्बई मे आटो चलाने वाले काफी शरीफ है दिल्ली के आटो चलाने वालों के मुक़ाबले मे। आटो चालकों का व्यवहार जैसा १० साल पहले था अब भी बिल्कुल वैसा ही है यानी कि मीटर से चलते है और हमेशा खुले पैसे रखते है और तो और वो आपको एक रुपया भी वापस कर देते है जबकि दिल्ली मे मीटर से चलने के बावजूद आटो चालक कभी भी खुले पैसे वापस नही करते है।
हर मुम्बई जाने वाले कि तरह हम भी जुहू चौपाटी पर घूमने गए ,वहां समुद्र किनारे टहलते हुए भुट्टा खा कर जी प्रसन्न हो गया । यूं तो हर आदमी भागता रहता है पर यही तो माया नगरी मुम्बई है।

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