Wednesday, March 21, 2007

भारत ने बरमूडा को २५७ रनों से हराकर वर्ल्ड रेकॉर्ड तो बना लिया पर क्या इस जीत को जीत माना जाना चाहिऐ .बरमूडा जिसका नाम इससे पहले ज्यादा लोग नहीं जानते थे उसके लिए तो भारत के साथ खेलना ही बहुत बड़ा अचिएवेमेंट है.चलिये सहवाग जो अभी तक खेल नही पा रहे थे उन्होने शतक तो बनाया ,और अपनी माँ कि बात रख ली जिन्होंने बांग्लादेश से हारने के बाद अपने नजफगढ़ के घर पर प्रदेर्शन करने वालों से कहा था कि मेरे बेटे पर विश्वास रक्खो और अगले ५-७ मैच के लिए अपनी जगह बना ली.अरे वीरू भाई अब ऐसे ही आगे भी खेलना ,माना हर बार शतक तो नही बना सकते पर कम से कम ५०-६० रन तो बना लेना। वैसे मैच देखने मे यूं तो एक तरफ़ा ही था पर बरमूडा के खिलाड़ियों के हँसते-मुस्कुराते चहरे और उनकी १५७ रनों कि पारी देखने मे मज़ा आया।
हम हिन्दुस्तानी लोग हर जीत पर खुश होते है अब देखना ये है कि क्या ये ख़ुशी बरकरार रहती है या नही,क्यूंकि अभी श्रीलंका जैसी वर्ल्ड क्लास टीम से खेलना बाक़ी है और उसे हराना ही इंडियन टीम का लक्ष्य होना चाहिऐ। वैसे भी ये आर या पार वाली स्थिति है।
इस बार के वर्ल्ड कप मे जो कुछ हो रह है वैसा पहले कभी नही हुआ था। पकिस्तान के कोच व्हुल्मर कि मृत्यु होना बहुत ही दुखद है .जहाँ तक मुझे याद है आज तक ऐसा कभी नही हुआ कि खेल के दौरान इतना बड़ा हादसा हो जाये पर जैसे कहते है कि the show must go on ठीक उसी तरह सारे मैच भी खेले जा रहे है।

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