Tuesday, September 30, 2008
कल ज्ञान जी ने अपनी पोस्ट मे जरदारी और पालिन का जिक्र किया और पी फैक्टर के बारे मे भी जिक्र किया था पर देखिए आज जरदारी के ख़िलाफ़ फतवा जारी हो गया । अब बेचारे जरदारी करें तो क्या करें ।
लाहौर की लाल मस्जिद के मौलाना अब्दुल गफ्फार ने जरदारी की इस तरह की बात को गैर इस्लामिक कहा है और साथ ही ये भी कहा है कि पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश के लिए ये शर्मनाक बात है । जिसमे जरदारी ने पालिन को gorgeous तो कहा ही साथ ये भी कह दिया कि अब उन्हें समझ आया कि सारा अमेरिका पालिन का दीवाना क्यूँ है । अब यही पर जरदारी रुक गए होते तो कुछ गड़बड़ नही होती पर जरदारी पालिन से कुछ अधिक ही प्रभावित हो गए थे इसीलिए तो उन्होंने पालिन से हाथ मिलाते हुए ये भी कह दिया कि (If he's (the aide) insisting, I might hug. )
अब देखें जरदारी के ख़िलाफ़ जारी किया गया फतवा वापिस लिया जाता है या नही ।
कल पितृ पक्ष के समापन के साथ आज से नवरात्र की शुरुआत हो रही है । तो इस पहले दिन की शुरुआत क्यूँ न माँ की स्तुति से की जाए ।
नवरात्र के साथ कितनी बातें याद आ जाती है जैसे कहीं नौ दिन तक लोग व्रत करते है तो कहीं डांडिया रास (गुजरात)खेलते है तो कहीं नवरात्र मे चौकी निकालने का चलन है (इलाहाबाद मे ) कहीं घर मे कलश मे जाऊ के बीज डाले जाते है और नौवें दिन हवन किया जाता है तो कहीं नौवें दिन कन्या पूजी जाती है और कहीं दुर्गा पूजा के (कोलकता )बड़े-बड़े मंडप सजते है । तो आप भी इन नौ दिन यानी नवरात्रों का आनंद उठाइए व्रत करिए डांडिया रास करिए । :)
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Monday, September 29, 2008
कल हमने ये फ़िल्म देखी और हमे अच्छी भी बहुत लगी तो सोचा कि आज इसी के बारे मे बात कर ली जाए । श्याम बेनेगल ने इस फ़िल्म को बनाया है । अब श्याम बेनेगल को तो आम तौर पर लोग बहुत ही संजीदा सिनेमा के लिए जानते है जैसे मंथन ,अंकुर,भूमिका जैसी फिल्में उन्होंने बनाई है । पर ये वेलकम टू सज्जनपुर उन सभी फिल्मों से अलग फ़िल्म है । इस फ़िल्म को कॉमेडी फ़िल्म कहना ग़लत है बल्कि इस फ़िल्म को सटायर विथ कॉमेडी कहना ज्यादा उचित होगा ।
इस फ़िल्म की कहानी एक छोटे से गाँव सज्जनपुर की है । और यहाँ रहने वाले लोगों जैसे महादेव कुशवाहा जो की एक पढालिखा नवजवान है और जो लेखक बनते-बनते गाँव वालों की चिट्ठी लिखने वाला बन जाता है । तो वहीं कमला है जो अपने पति का इंतजार कर रही है । और इसी गाँव की एक मौसी है जो अपनी बेटी की शादी के लिए परेशान है (किस तरह वो हम नही बता रहे है )तो इसी गाँव का गुंडा अपनी बीबी को चुनाव मे खड़ा करना चाहता है । इसके अलावा भी बहुत कुछ है श्याम बेनेगल ने अपने देश मे हो रही कई ताजा घटनाओं को बड़े ही दिलचस्प अंदाज मे दिखाया है ।
इस फ़िल्म के सभी कलाकारों जैसे श्रेयस तलपदे अमृता राव ,इला अरुण,दिव्या दत्ता ,ने तो बहुत ही अच्छी एक्टिंग की है पर साथ ही हर एक छोटे से छोटे कलाकार ने भी बहुत ही अच्छी एक्टिंग की है । वैसे आज के समय को देखते हुए श्याम बेनेगल ने इस फ़िल्म मे कुल ४ गीत डाले है वैसे गानों की कोई ख़ास जरुरत नही है पर इसका सीताराम सीताराम गाना तो हमें बहुत ही अधिक अच्छा लगा ।और हाँ इस फ़िल्म मे बोली गई भाषा बहुत ही मीठी है ।
वैसे इस फ़िल्म के लिए हमारा तो ये कहना है की जो लोग फ़िल्म नही देखते है या फिल्मों देखना ज्यादा पसंद नही करते है वो भी ये फ़िल्म अवश्य देखे . वो इसलिए कि एक तो इस फ़िल्म को देखने के बाद मन ख़राब नही होता है और दूसरे ये एक बहुत अच्छी फ़िल्म है । और सबसे बड़ी बात की फ़िल्म कही पर भी बोर नही करती है और फ़िल्म देखने के बाद सर मे कोई दर्द भी नही होता है । :)
लो इतनी बड़ी समीक्षा लिख दी और अभी भी सोच रहे है कि फ़िल्म देखे या न देखे । :)
Friday, September 26, 2008
आजकल ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम भारत मे टेस्ट मैच खेलने के लिए आई हुई है और सबसे अजीब बात ये है की ऑस्ट्रेलिया की टीम के असिस्टेंट कोच और कोई नही गुरु ग्रेग ही है । गुरु ग्रेग ने टीम इंडिया का जो हाल किया था उससे तो हम सभी वाकिफ है पर इस बार ऑस्ट्रेलिया की टीम के साथ गुरु ग्रेग को देख कर बड़ा ही अजीब लगा और हमारी भारतीय संस्कृति भी कितनी दिलदार है कि जिस ग्रेग ने टीम इंडिया का बेडा गर्क किया उसी का तिलक लगा कर स्वागत कर रहे है । यूँ तो आई.पी.एल.के दौरान भी गुरु ग्रेग दिखाई दिए थे । पर इस बार की बात कुछ अलग है ।
वैसे एक बात है जब भी ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आती है वहां का मीडिया कभी टीम इंडिया के खिलाडी तो कभी सेलेक्शन तो कभी सेलेक्टर्स को लेकर काफ़ी कुछ लिखना शुरू कर देता है।कुछ -कुछ divide and rule वाले formule पर आधारित । जैसे आज ही अखबार मे ख़बर छपी है कि कुंबले को धोनी को टेस्ट की कप्तानी सौंप देनी चाहिए ।क्यूंकि धोनी हर तरह के खेल की जिम्मेदारी उठाने मे सक्षम है ।अरे अभी तो टेस्ट मैच शुरू भी नही हुआ और उन लोगों ने अपनी पारी खेलनी शुरू भी कर दी। तो कभी तेंदुलकर और सौरव को लेकर की वो कितने महान खिलाडी है और अभी उन्हें और कितने सालों तक खेलना चाहिए वगैरा-वगैरा ।अरे भाई अपने देश और खिलाड़ियों की सोचो काहे को टीम इंडिया के पीछे पड़े रहते हो ।
अब गुरु ग्रेग ऑस्ट्रेलिया की टीम को टीम इंडिया की कमजोरियों से कितना फायदा करवाते है ये देखना है क्यूंकि गुरु ग्रेग को टीम इंडिया की वीकनेस और स्ट्रेंथ दोनों के बारे मे काफ़ी जानकारी तो होगी ही । अब तो अपनी टीम इंडिया को इस ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम को हराकर गुरु ग्रेग को करारा जवाब देना चाहिए ।
Thursday, September 25, 2008
जी हाँ १९८३ कि विश्व कप विजेता भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान कपिल देव अब territorial army के लेफ्टिनेंट कर्नल बन गए है । अगर आपने ये ख़बर नही पढ़ी है तो पूरी ख़बर यहाँ पर पढ़िये।
Labels: army, kapil dev, world cup, कपिल देव, भारतीय क्रिकेट टीम, विश्व विजेता, सेना
Monday, September 22, 2008
करीब ढाई महीने दिल्ली रहकर पिछले शनिवार वापिस गोवा आ गए । वैसे इस बार दिल्ली से गोवा का हवाई सफर भी जरा सफ्फरी मामला रहा । :) कैसे ? अरे बताते है ना ।
हर बार की तरह इस बार भी हमने jetlite की फ्लाईट बुक की थी पर इस बार का jetlite का अनुभव हर बार की तरह का नही था । एयर पोर्ट पर पहुँच कर जब चेक इन करने के लिए गए तो काउन्टर पर बैठी लड़की ने हमसे पूछा कि कौन सी सीट लेना पसंद करेंगे तो हमने विण्डो सीट कहा । और जब प्लेन मे पहुंचे तो विण्डो सीट को देख कर समझ नही आया कि आख़िर
उसने प्लेन मे सीट का ऑप्शन पूछा ही क्यूँ था। असल मे हुआ ये थे कि हमे A 10 सीट मिली थी जहाँ पर खिड़की थी ही नही। वैसे वहां इमरजेंसी एग्जिट भी नही लिखा था । तो सबसे पहले तो एयर होस्टेस को बुलाकर सीट बदलने के लिए कहा तो उसने कहा कि जब फ्लाईट टेक ऑफ़ करने लगेगी माने जब बोर्डिंग बंद हो जायेगी तब वो हमारी सीट change कर देगी । और जैसे ही प्लेन का दरवाजा बंद हुआ तो उसने हमें आगे की लाइन जो की पूरी खाली थी उस सीट पर शिफ्ट होने को क
हा । तो इस तरह सीट का मसला तो हल हो गया ।
अब जब जून मे हम गोवा से दिल्ली गए थे तब तो jetlite मे बैठते ही वेट टॉवेल दिया गया था फ़िर टॉफी फ़िर पानी,और खाना वगैरा सर्व किया गया था पर दिल्ली से वापसी मे jetlite मे फ्लाईट जब उड़ गई तब भी न तो टॉफी और न ही पानी वगैरा सर्व किया गया ।बल्कि एक अनौन्समेंट किया गया की कैफे काफ़ी डे की तरफ़ से खाने-पीने की चीजें उपलब्ध है आप उन्हें खरीद कर खा सकते है । और साथ ही एक scratch and win के बारे मे भी बताया । १५ मिनट बाद एयर होस्टेस ने scratch and win वाला card सभी यात्रियों को दिया । और हमने scratch कि
या तो उसमे लुईस क्वार्टज की एक घड़ी निकली जिसका दाम तो ३९९० लिखा था और जिसे एयर पोर्ट पर ५०० रूपये देकर लिया जा सकता था। (एक यही मन को सांत्वना देने के लिए था की चलो कम से कम ५०० रूपये मे घड़ी तो मिली । अब घड़ी कैसी है ये तो समय ही बतायेगा । ) :)
खैर जब एयर होस्टेस आई और हमसे ऑर्डर करने को कहा । तो ऑर्डर करने से पहले हमने उससे पूछा कि क्या अब इस फ्लाईट मे भी खाना वगैरा सर्व करना बंद कर दिया गया है। तो उसने हाँ कहा।
और जब हमने उससे पूछा कि ऐसा कब से हुआ तो उसने बताया कि ८ अगस्त से।
खैर हमने उससे सैंडविच और काफ़ी ली और काफ़ी पीते हुए सोचते रहे कि jetlite भी अब बाकी एयर लाईन्स (लो फेयर एयर लाईन्स ) की तरह ही हो गई है । हालाँकि अब तो कोई भी एयर लाईन्स लो फेयर की नही रह गई है । (वैसे अब कुछ लो फेयर एयर लाईन्स मे पानी फ्री मे देते है )
साढ़े पाँच हजार का टिकट है (जो अभी तक तो लो फेयर मे नही माना जाता था ) और एक छोटी बोतल पानी और चार टॉफी देने मे इनका भला कितना खरचा हो जायेगा । और हमने बैठे-बैठे एक मोटा सा हिसाब लगाया तो लगा की अधिक से अधिक २५-५० हजार का खरचा होगा अगर एक एयर लाईन्स की ५० फ्लाईट चल रही हो तो ।
पता नही हमारा हिसाब कितना ठीक है पर jetlite से यात्रा करने के बाद हम ये सोचने पर मजबूर हो गए कि जब हम दिल्ली से इलाहाबाद राजधानी से गए थे तो रेलवे ने १३०० रु के किराये मे पानी की बड़ी बोतल ,लंच(जिसमे सूप और ice-cream ),शाम की चाय -नाश्ता और डिनर भी सर्व किया था ।
तो ये तो था हमारी वापसी के सफर का वर्णन और वापसी मे प्लेन से ही २-४ फोटो खींची है जिन्हें यहाँ लगा रहे है . शुरू मे लौटकर २-४ दिन तो फुर्सत ही नही मिली कि ब्लॉग जगत खोला जाए और जब फुर्सत हुई तो कम्प्यूटर ने चलने से इनकार कर दिया । खैर अब आज से हमारे कम्पूटर जी का दिमाग भी ठीक हो गया है । :)
नोट -- हमारी इलाहाबाद यात्रा (६)वाली पोस्ट पर ज्ञान जी ने पूछा था की हमने दो हफ्ते लिखने मे क्यूँ लगाए थे तो वो इसलिए क्यूंकि हम उस समय अपनी इलाहाबाद यात्रा का पूरा वृत्तांत जो लिख रहे थे । :)
और इसीलिए इस बार एक हफ्ते मे ही लिख दिया । :)
Friday, September 12, 2008
इलाहाबाद यात्रा की यादें (६ )प्रयाग राज एक्सप्रेस से वापिस दिल्ली का सफर
14 comments Posted by mamta at 8:15 AMएक हफ्ते इलाहाबाद मे रहकर २९ अगस्त को हम इलाहाबाद से वापिस दिल्ली के लिए प्रयाग राज एक्सप्रेस जो रात ९.३० बजे चल कर सुबह ६.५० पर दिल्ली पहुँचती है उस से चले पर इस बार भी रास्ते मे कुछ न कुछ तो होना ही था । :) जब हम ट्रेन मे अपने कोच A-3 मे अपनी सीट पर पहुंचे तो देखा कि हमारी आधी से ज्यादा सीट पर खूब सारा सामान रखा है बैग और सूट केस वगैरा और नीचे जहाँ सामान रखते है वहां भी जगह खाली नही थी। गनीमत है कि हमारे पास एक छोटी सी अटैची और एक बैग ही था।तो सामने वाली बर्थ पर बैठी हुई महिला से पूछा कि क्या ये आपका सामान है तो उसने इनकार किया तभी एक और सज्जन ने लपक कर बताया कि ये उनका सामान है और चूँकि वो ५-६ लोग एक साथ है और सबकी सीट अलग-अलग है इसलिए यहाँ पर सबका सामान एक साथ रख दिया है । ये सुनकर खीज तो बहुत हुई पर फ़िर कुली से कहा कि इसे किसी तरह नीचे रख दो।
जैसे ही ट्रेन चलने को हुई कि उस ग्रुप मे से एक सज्जन खाने का एक पैकेट लेकर आए और उसे भी उसी सामान पर रख कर चला गए । ट्रेन ठीक समय ९.३० पर चल दी और ट्रेन चलने के १० मिनट बाद उस ग्रुप मे से एक सज्जन आए और खाने का पैकेट ले जाते हुए अपने ग्रुप के बाकी लोगों से बोले कि मैं खाना ला रहा हूँ। ये सुनकर तो हमे और भी खीज हुई कि खाना तो ले जा रहे है पर सामान हटाने की कोई जल्दी नही । तो हमने उन्हें रोक कर कहा कि जब आप खाना ले ही जा रहे है तो सामान भी लेते जाइए। तो बेचारे अचकचा कर बोले कि मैम अभी थोडी देर मे ले जाते है।तो हमने कहा कि ठीक है पर आप सामान को खिड़की से हटाकर रख दे क्यूंकि हम उधर बैठना चाहते है। खैर उन्होंने सामान शिफ्ट किया और खाना खाने चले गए।
पर जब १० बज गया और टी.टी. आकर टिकट चेक कर रहा था तब उनमे से एक सज्जन टी.टी.से कहने लगे कि सबकी सीट एक ही कोच मे कर दे।हम मन ही मन खुश हो रहे थे कि चलो अब तो ये सामान हटा लेंगे पर कहाँ ऐसी हमारी किस्मत। टी.टी. ये कह कर कि अभी थोडी देर बाद देखेंगे चला गया। सवा दस बजे फ़िर उनमे से एक को हमने बुलाया और उन्हें अपना सामान ले जाने को कहा तो उन्होंने बमुश्किल सामान तो हटाया पर एक बड़ा बैग और एक छोटा प्लास्टिक का पैकट हमारी सीट पर ये कहकर छोड़ दिया कि अभी १० मिनट मे ले जाते है।
इसी बीच मे ऊपर की बर्थ जिन सज्जन की थी उनकी जान-पहचान के लोग मिल गए और वो लोग हमारी और सामने वाली महिला की सीट पर बैठ कर गप्पे मारने लगे। और फ़िर हमारी और उस महिला की भी बात शुरू हुई आख़िर समय तो काटना ही था क्यूंकि एक तो सामान रक्खा था और उसपर से वो लोग सोने के मूड मे ही नही थे क्यूंकि सरकार और कोर्ट सबकी बातें जो उन्हें करनी थी। :)
१०.३० बजे हम दोनों महिलाओं के सब्र का बाँध टूट गया और चूँकि हम दोनों महिलाओं की नीचे की बर्थ थी इसलिए हम लोगों ने सीट पर चादर वगैरा बिछाना शुरू किया जिससे वो लोग गप्पें मारना बंद क
रके सोने जाएँ ।खैर एक बार फ़िर उन सज्जन को बैग ले जाने के लिए भी कहना पड़ा।और तब कहीं जाकर हम लोग सो पाये।
पर इस बार भगवान और रेलवे को हमारी यात्रा मे कुछ न कुछ गड़बड़ तो करनी ही थी। रात भर ट्रेन ठीक से चलती रही और गाजियाबाद जब क्रॉस किया तो लगा कि कहीं ट्रेन दिल्ली before time ना पहुँच जाए । पर ऐसे नसीब कहाँ थे गाजियाबाद से चली तो जैसे ही यमुना क्रॉस किया कि ट्रेन रुक ही गई ऐसा लग रहा था मानो दिल्ली कहीं दूर चली गई है। और ट्रेन मे बैठे-बैठे इतना कुढे कि बस पूछिए मत। खैर फ़िर २० मिनट का सफर ४० मिनट मे पूरा हुआ। माने झूलते-झूलते दिल्ली पहुंचे।
और इस तरह हमारी इलाहाबाद यात्रा पूरी हुई। :)
Thursday, September 11, 2008
ओफ हो पिछले एक हफ्ते से हर चैनल और यहाँ तक की अखबारें मे भी तरह-तरह की खबरें देखने और पढने को मिल रही थी । टी.वी.चैनल वालों ने तो प्रलय अरे नही- नही महाप्रलय ही ला दी थी।कि बुधवार को दुनिया मे प्रलय आ जायेगी और दुनिया नष्ट हो जायेगी । महाप्रलय की न्यूज़ के साथ-साथ यही न्यूज़ वाले ज्योतिषियों को भी लेकर आ गए थे कि कौन सी राशि वालों को क्या करना चाहिए ।कैसे अपना बचाव करे।क्या दान करें। और किस ग्रह -नक्षत्र का किस राशि का पर क्या असर पड़ेगा वगैरा-वगैरा।
पर परसों रात मे अचानक स्टार न्यूज़ ने इस संभावित महाप्रलय को महाप्रयोग कहना शुरू किया और दीपक चौरसिया वही आज तक वाले ने (अरे आपको पता नही कि दीपक अब आज तक पर नही बल्कि स्टार न्यूज़ पर दिखते है . :) ) लोगों को समझाना शुरू किया कि इससे घबराएं नही ये एक महा प्रयोग है वगैरा-वगैरा। और ये भी कि इस प्रयोग से जुड़ी खबरें वो और उनका चैनल लोगों तक पहुंचाते रहेंगे । अब सबसे तेज चैनल से आपको रक्खे आगे वाले चैनल मे जो आ गए है। :)
अरे भइया जब प्रलय आएगी तो न्यूज़ चैनल कौन देख रहा होगा। और जब प्रलय आनी होगी तो भला कौन उसे रोक सकता है।हम लोग तो छुटपन मे सुनते थे कि जब शिव जी अपनी तीसरी आँख खोलते है तभी प्रलय आती है और सृष्टि का विनाश होता है। एक आम और खासआदमी के जीवन मे तो रोज ही कोई न कोई प्रलय आती ही रहती है ।
अब जैसे अमिताभ बच्चन ने एम.एन.एस.से माफ़ी मांगी पर एम.एन.एस.का कहना है कि जया सार्वजनिक रूप से टी.वी.पर माफ़ी मांगे।क्यूंकि मराठी भाषा का अपमान टी.वी.पर हुआ था जिसे सब लोगों ने देखा था। तो वहीं शाह रुख खान को ख़ुद को दिल्ली वाला कहने पर बाल ठाकरे नाराज है।ये तो बड़ी ही आम बात है कि हम जहाँ पले-बढे होते है अपने को वहीं का बताते है। तो अंसल बंधुओं को जेल जाना पड़ेगा ( उपहार सिनेमा वाले ) क्यूंकि उनकी bail रिजेक्ट हो गई है।वहीं आरुशी के केस मे सी.बी.आई .के पास अभी तक कोई प्रूफ़ नही है कि आरुशी को किसने मारा और क्यूँ मारा। और दिल्ली की सड़कों पर तो रोज ही ब्लू लाइन बस अपना प्रलय ढाती रहती है। और ब्लू लाइन की ये प्रलय कितने परिवारों के जीवन भर के लिए महा प्रलय बन जाती है। बिहार मे आई प्रलय क्या किसी इस महाप्रलय से कम है।
और आज ११ सितम्बर है . आज का दिन अमेरिका के लिए किसी महाप्रलय से कम नही था जब w.t.c. को प्लेन से गिराया गया था। और उन परिवारों के लिए आज भी ये दिन महाप्रलय से कम नही है।
और अपने ब्लॉगिंग मे भी हर थोड़े दिन पर कोई न कोई प्रलय आ ही जाती है।
खैर टी.वी.generated महाप्रलय से हम सब बच गए । अब आशा करते है की ब्लॉगिंग मे आई प्रलय से भी हम जल्दी ही बच जायेंगे।
Tuesday, September 9, 2008

अब आपको जब इलाहाबाद घुमा ही रहे है तो क्यूँ न इलाहाबाद के बाजार और सिनेमा हॉल के बारे मे भी कुछ बता दें। जिस
से अगर कभी आप वहां जाए तो इसी बहाने हमें याद करेंगे. :)तो तैयार है न अपना पर्स लेकर बाजार घुमने के लिए। अब इलाहाबाद मे ३ बाजार ज्यादा मशहूर है कटरा ,चौक और सिविल लाईन्स ।
३०-४० साल पहले तो सिर्फ़ कटरा और चौक मे ही खूब भीड़ होती थी पर अब तो सिविल लाईन्स मे भी भीड़ बहुत होने लगी है। इस बार तो सिविल लाईन्स मे बहुत कुछ नया देखने को मिला जैसे अब सिविल लाईन्स मे भी बहुत सारे शो रूम खुल रहे है जैसे levis ,reebok ,koutons, t.n.g.बिग बाजार ,सालासार , ऐसे
ही कुछ और शो रूम ।पर कुछ चीजें सिविल लाईन्स मे बिल्कुल नही बदली है जैसे सांवल दास खन्ना की दुकान या बॉम्बे डाईंग की शॉप और न ही सिविल लाईन्स का सोफ्टी कार्नर बिल्कुल भी बदला है।और न ही वहां खड़ा होने वाला पुड़िया वाला (अरे वही मुरमुरे वाला ) :) हालांकि हमने वहां न तो सोफ्टी खाई और न ही पुडिया खाई। :(
कटरा और चौक तो जैसे ४० साल पहले थे वैसे ही अब भी है बस फर्क इतना लगा की कटरा की सभी दुकाने एक मंजिल की बजाय ३ मंजिला हो गई है। भीड़ और गाय-भैंसों का हाल भी वही है। जरा भी नही बदला है। हाँ कुछ दुकाने अब air conditioned जरुर हो गई है।क्या आपको राम जी लाल रतन प्रका
श की दुकान याद है बाप रे पहले जब कभी मम्मी के साथ वहां जाना पड़ जाता था तो हम सब कतराते थे वहां उस दुकान पर जाने से क्यूंकि एक तो गर्मी दूसरे बहुत देर लग जाती थी उनकी दुकान मे । पर इस बार देखा तो उनकी दुकान भी air conditioned हो गई है। और नेतराम की दुकान तो आप इस फोटो मे देख ही सकते है।इस दूकान की इमरती बहुत ही स्वादिष्ट होती है। पर हाँ इस बार कटरा मे नए तरह का रिक्शा भी देखा । इसमे अच्छी बात ये है की रिक्शे मे बैठी सवारी के
साथ-साथ रिक्शे वाला भी धूप और बारिश से बच सकता है।है ना stylo रिक्शा।
चौक के बारे मे क्या कहा जाए इसके बारे मे तो हर कोई जानता ही है। चौक का मतलब ही भीड़-भाड़ वाला बाजार होता है। वो चाहे किसी भी शहर का चौक का इलाका क्यूँ न हो। iskcon जाते हुए हम चौक से गुजरे थे बिल्कुल पहले की तरह ही आज भी कहीं भी ट्रैफिक जैम हो जाता है । और कोई भी रुकने को तैयार नहीं होता है फ़िर वो चाहे कार वाला हो या साइकिल या फ़िर रिक्शे वाला ही क्यूँ न हो। अब जैसे हम लोग मानसरोवर पिक्चर हॉल के सामने ट्रैफिक जैम मे फंस गए थे।ये फोटो उसी ट्रैफिक की है।
अब इलाहाबाद घूमियेगा
तो एक आध पिक्चर भी तो देखियेगा तो चलिए लगे हाथ कुछ पिक्चर हॉल के बारे मे भी बता दे।वैसे तो इलाहाबाद मे काफ़ी पिक्चर हॉल है और तकरीबन हर एरिया मे एक दो सिनेमा हॉल तो है सोफे। वैसे अब तो इलाहाबाद मे भी सिने प्लेक्स का चलन शुरू हो गया है और इसका टिकट भी दिल्ली की तरह बहुत महंगा नहीं है बस ५० रूपये का है. पर फ़िर भी कुछ सिनेमा हॉल है जो आज भी जैसे के तैसे है जिसे देख कर अच्छा भी लगा और ये सोचने पर मजबूर भी हुए कि अभी भी यहाँ बहुत कुछ बदला नहीं है।
iskcon जाते हुए रास्ते मे विशम्भर पिक्चर हॉल पड़ा तो ये देख कर आश्चर्य हुआ की अब वहां पिक्चर हॉल नही रह गया है बल्कि बैं
क और कुछ अन्य दुकाने और ऑफिस खुल गए है। और फ़िर पड़ा मानसरोवर सिनेमा हॉल जस का तस । आज भी वहां जनता स्टाल का टिकट ११ रूपये का है। लक्ष्मी टॉकीज को भला कैसे भूल सकते है कटरे का इकलौता सिनेमा हॉल जो था क्या आज भी है। न तो इसका रंग बदला और न ही रूप।कुछ ग़लत तो नही कहा न। :)
सिविल लाईन्स के दो पिक्चर हॉल प्लाजा और पैलेस है।ये दोनों सिविल लाईन्स मे होने
के कारण सबसे ज्यादा फिल्म इसी मे देखी है. और पैलेस पिक्चर हॉल की खासियत इस की बालकनी की बड़ी-बड़ी लाल सोफे नुमा सीट थी। प्लाजा तो खैर renovate होकर चल रहा है पर इस बार पता चला कि पैलेस बंद हो गया हैक्यूंकि एक दिन एक पिक्चर के शो के दौरान उसकी छत गिर गई थी और अब सुना है कि सिनेमा हॉल को थियेटर मे बदलने जा रहे है जिससे वहां नाटक वगैरा का मंचन हो सके।
अभी हाल ही मे नैनी मे भी एक नया सिने प्लेक्स खुला है जो सुना है अच्छा है।पहले तो नैनी जाना बहुत मुश्किल माना जाता था पर अब लगता है की नैनी उतना दूर नहीं है। खैर अब जब अगली बार इलाहाबाद जायेंगे तो पिक्चर देखेंगे। :)
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Monday, September 8, 2008
कल जया बच्चन ने मुंबई मे अभिषक बच्चन की फ़िल्म द्रोणा के लॉन्च के दौरान सारी बात चीत तो इंग्लिश मे की पर एक वाक्य जो हिन्दी मे बोला उससे बवाल खड़ा हो गया है।हालाँकि अगर जया बच्चन वो एक वाक्य न बोलती तो भी कोई ख़ास फर्क नही पड़ता जिसमे जया ने कहा की क्यूंकि वो यू.पी.से है इसलिये वो हिन्दी मे बोलेगी ।और अगर हिन्दी मे बोल ही दिया था तो भी उसका इतना ज्यादा असर नही पड़ना था जितना पड़ गया है।
उनके इस एक वाक्य ने शिवसेना और एम.एन.एस.को नाराज होने का मौका दे दिया । कितनी अजीब बात है की एक तरफ़ तो हम भारतीय होने का दावा करते है कि हम सब एक है और दूसरी तरफ़ भाषा और राज्य के आधार पर एक -दूसरे से अलग होते है। कहाँ गई अनेकता मे एकता वाली बात ?
ये विडम्बना ही है कि अब अपने ही देश मे हिन्दी बोलने पर पाबंदी लगती नजर आ रही है।
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Saturday, September 6, 2008

post थोडी लम्बी हो गई है इसलिए थोड़ा धैर्य से पढ़े। :)
आनंद भवन की थकान उतर गई हो तो चलिए आज स्वराज भवन घूमने चलते है। आनंद भवन की बिल्डिंग के साथ ही जुड़ी हुई है स्वराज भवन की बिल्डिंग। जहाँ तक हमे याद है ३०-३५ साल पहले स्वराज भवन मे orphanage था जहाँ सौ-दो सौ बच्चे रहा करते थे पर इस बार देखा तो स्वराज भवन को भी एक संग्रहालय (museum) बना दिया गया है। हो सकता है हमने पहले इसपर ध्यान न दिया हो। खैर स्वराज भवन देखने के लिए जब हम २८ तारीख को गए तो देखा बहुत सारे पुलिस वाले वहां मौजूद थे पूछने पर पता चला कि स्वराज भवन मे प्रवेश बंद है क्यूंकि राहुल गाँधी उस दिन इलाहाबाद आने वाले थे तो हम वापस घर आ गए ओर अगले दिन यानी २९ तारीख को फ़िर गए तब स्वराज भवन देखा।
जैसे ही गेट से अन्दर जाते है तो जो स
ड़क दिखती है वो गोलाकार है और सड़क के दोनों ओर दोनों तरफ़ अशोक के पेड़ लगे है। गेट से ही बीच मे बना एक बहुत बड़ा बगीचा दिखता है और इस बगीचे की हरी ,मखमली घास और उस के बाद पीले रंग की बिल्डिंग दिखाई देती है और यही पीली बिल्डिंग स्वराज भवन है। museum के देखने के लिए यहाँ भी टिकट लेना पड़ता है मात्र २ रूपये का । वैसे स्वराज भवन मे लाईट और साउंड शो भी होता है और उसका टिकट ५ रूपये का है. जो हमने नही देखा। जब हम टिकट लेने गए करीब पौने बारह बजे तो पहले तो उसने टिकट देने से मना किया क्यूंकि उसका कहना था कि ११.३० बजे के बाद टिकट सिर्फ़ शो के लिए ही मिलता है पर फ़िर न जाने क्या सोच कर उसने टिकट दे दिया।और हम चल दिए museum देखने। प
र यहाँ भी वही कि museum के अन्दर फोटो नही खींच सकते है। आनंद भवन की तरह स्वराज भवन मे कहीं भी कुछ भी नही लिखा है पर हाँ चूँकि हर कमरे मे फोटो लगी है इसलिए उससे ही अंदाज लगाया की जिसकी फोटो कमरे मे लगी है कमरा भी उसी का होगा। (शायद लाईट और साउंड मे बताते होंगे )
तो थोड़ा सा इतिहास इस स्वराज भवन के बारे मे भी बता दे.१९२० मे मोती लाल नेहरू जी ने इसे बनवाया था। आनंद भवन मे जाने से पहले स्वराज भवन मे ही मोती लाल नेहरू और उनका परिवार रहा करता था। और इसी स्वराज भवन मे इंदिरा गाँधी का जन्म हुआ था।इसी स्वराज भवन मे आजादी की लड़ाई के दौरन यहाँ के तहखाने मे बने एक कमरे मे स्वतंत्रता संग्रामियों की मीटिंग होती थी।इस भवन मे मोती लाल नेहरू,सरोजिनी नायडू,कमला नेहरू,और जवाहर लाल नेहरू के कमरे और उनका ऑफिस वगैरा देखने को मिलता है। और इसमे एक तरफ़ museum का ऑफिस वगैरा बना हुआ है।
जैसे ही हम टिकट लेकर अन्दर दाखिल हुए की बायीं ओर एक बग्घी जैसी गाड़ी दिखी वहां से २-३ सीढियां चढ़कर ऊपर जाने पर पहले एक छोटा सा कमरा आता है जहाँ जवाहर लाल नेहरू की कुछ पुरानी तस्वीरें लगी है ।जिनमे वो सरोजिनी नायडू और विजय लक्ष्मी पंडित वगैरा के साथ दिखते है। इस कमरे के बाद एक लम्बी सी गैलरी पड़ती है और इस गैलरी को पार कर के जैसे ही बाये वाले कमरे मे जाते है जो उस समय शायद उनका ऑफिस होता था और इस ऑफिस मे एक टेबल थी जिस पर उस समय इस्तेमाल किया जाने वाला टाइप राईटर ,कलम और कुछ किताबें रक्खी है।उससे आगे बढ़ने पर एक और छोटा कमरा आता है जहाँ दरवाजे के एक तरफ़ की दीवार पर मोती लाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू की पश्चिमी वेश-भूषा मे फोटो है तो दीवार के दूसरी तरफ़ भारतीय वेश-भूषा मे फोटो है।
इस दरवाजे से जैसे ही अन्दर जाते है की एक बड़ा हा हॉल आता है । दरवाजे से प्रवेश करते ही कमरे के एक कोने पर स्टैंड रक्खा दिख
ता है जिस पर छड़ी ,कोट और कैप टंगे हुए है । कमरे के बीच मे फायर प्लेस है जिस के ऊपर नेहरू जी के बचपन की फोटो जिसमे वो साइकिल चला रहे है लगी हुई है। फायर प्लेस के सामने एक टेबल और साथ मे ३-४ कुर्सियां रक्खी है। और दीवारों पर कुछ फोटो लगी है। और बाकी पूरा हॉल खाली था माने उसमे कुछ ज्यादा सामान नही था। एक study टेबल पर उनके दस्ताने,फोटो और कुछ किताबें रक्खी है।
आगे बढ़ने पर देखते है की बीच मे एक बड़ा सा आँगन या बारादरी सा बना है और इसके चारों ओर बाकी सारे कमरे बने हुए है । एक कमरे मे महात्मा गाँधी जी की फोटो लगी है। और इस कमरे मे उनका चरखा,और बिस्तर देखा जा सकता है।महात्मा गाँधी जी इसी कमरे मे ठहरते थे। इससे आगे जाने पर जो कमरा पड़ता है वहां इंदिरा गाँधी का जन्म हुआ था। इस कमरे मे कमला नेहरू की फोटो और bed ,टेबल वगैरा देखा जा सकता है। इस कमरे के बगल से एक सीढ़ी ऊपर जाती है और एक नीचे। ऊपर का रास्ता तो बंद था और नीचे हम गए नही।
उससे आगे जाने पर सरोजिनी नायडू का कमरा आता है जहाँ कमरे के एक कोनेमे बना पूजा घर दिखता है।सरोजिनी नायडू की बड़ी सी फोटो सामने की तरफ़ लगी है और उस कमरे मे उनका bed वगैरा रक्खा है। उससे आगे जाने पर एक और कमरा आता है जो मोती लाल जी का ऑफिस रहा होगा। मोती लाल नेहरू जी के इस कमरे मे मोती लाल नेहरू जी की अलग-अलग लोगों के साथ फोटो लगी है।जिसमे रवींद्र नाथ टैगोर ,महात्मा गाँधी के साथ फोटो है ।
यहाँ से आगे बढ़ने पर मोती लाल नेहरू का कमरा आता है और यहीं पर इनकी पहली कार की फोटो भी लगी है। जिसमे पूरा परिवार बैठा हुआ है। इस कमरे मे मोती लाल नेहरू का bed,रोक्किंग चेयर , law की किताबें,टेबल और चारों ओर दीवार पर फोटो लगी हुई है।
जैसे ही हम इस कमरे मे पहुंचे की एक आदमी ने हमे रोक कर पूछा कि आप अपने आप कैसे घूम रही है क्या आप पहले वाले ग्रुप मे नही थी। हमारे ना कहने पर उसने बताया कि वो गाइड है और आम तौर पर जब टिकट लेते है तो गाईड भी साथ हो लेता है। तो हमने उससे जानकारी के लिए पूछा कि जो सीढियां नीचे जा रही थी वहां क्या है तो उसने पूछाकि क्या आप नीचे नही गई और हमारे ना कहने पर वो बोला चलिए आपको दिखा देते है और जब सीढियां उतर कर तहखाने मे पहुंचे तो उसने बताया कि आजादी की लड़ाई के समय
यहाँ पर मीटिंग हुआ करती थी।और बड़े-बड़े निर्णय लिए जाते थे।
वापस ऊपर आकर हमने उससे पूछा कि पहले तो यहाँ पर orphanage होता था क्या अब नही है। तो उसने बताया कि है पर अब कम बच्चे रहते है ।ये सामने जो पीली बिल्डिंग दिख रही है वो अब orphanage है और उसके ठीक पीछे बाल भवन है।
वहां से बाहर निकल कर हमने कुछ फोटो खींचे और सोचने लगे कि museum कि जो एंट्री है वो एग्जिट होनी चाहिए और जो एग्जिट है यानी मोती लाल नेहरू का कमरा वहां से एंट्री होनी चाहिए। और बग्घी नुमा गाड़ी पर ख़त्म होना चाहिए क्यूंकि स्वरा
ज भवन तो मुख्य रूप से मोती लाल नेहरू जी का निवास था।ये तो महज हमारा ख़्याल है।
स्वराज भवन और आनंद भवन के बीच मे एक छोटा सा गेट है जिससे आप स्वराज भवन से आनंद भवन और आनंद भवन से स्वराज भवन आ-जा सकते है। और चाहे तो एक ही दिन मे दोनों देख भी सकते है। :)
Thursday, September 4, 2008

आनंद भवन के बारे मे तो हर कोई जानता है।आख़िर कार ये हमारे देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू जी का घर था। इलाहाबाद मे आनंद भवन और स्वराज भवन बहुत मशहूर है।तो इस बार हमने आनंद भवन और स्वराज भवन देखने का मन भी मनाया। करीब २५-३० साल बाद हम ने आनंद भवन देखा है क्यूंकि जब पढ़ते थे तब ही देखा था।असल मे पापा सुबह १० बजे नाश्ता करके सो जाते थे और इलाहाबाद मे सुबह १० बजे से एक बजे तक लाईट नही रहती है ( अभी से नही पिछ
ले ५-६ सालों से बिजली का यही हाल है ) तो अबकी बार इस तीन घंटे का समय हमने इलाहाबाद घूमकर बिताया।
आनंद भवन की सैर के पहले क्यूँ न थोड़ा सा इसके बारे मे बता दे । आनंद भवन १९२७ मे बना था और १९३१ मे मोती लाल नेहरू और उनका परिवार स्वराज भवन छोड़कर आनंद भवन मे रहने आए थे। १९७० मे इंदिरा गाँधी ने इ
से भारत सरकार को दे दिया था और बाद मे इस आनंद भवन को एक museum मे तब्दील कर दिया गया ।
है। और बीच मे खूब बड़ा सा गार्डन है।वैसे इस समय तो वहां फूल कुछ ख़ास नही खिले थे पर जाड़े मे जरुर बहुत सुंदर लगता होगा ।चारों ओर गार्डन है और बीच मे दोमंजिला भवन बना हुआ है
वन को घूमने के लिए सिर्फ़ ५ रूपये का टिकट है। और ये टिकट भी सिर्फ़ तब जब आप ऊपर की मंजिल को देखना चाहे वरना अगर आप सिर्फ़ निचली मंजिल पर घूमना चाहते है तो कोई टिकट नही लेना पड़ता है मतलब मुफ्त मे घूमिये और आनंद भवन का आनंद उठाइए। :) टिकट लेने जब जाते है तो टिकट खिड़की से जरा पहले जवाहर लाल नेहरू की वसीयत लिखी हुई है जिसे आप पढ़ सकते है।या यही वसीयत आगे फोटो गैलरी के पास भी लगी है।इसे आप
वहाँ भी पढ़ सकते है। (ये दोनोंफोटो गैलरी से
लिए गए है। )तो सबसे पहले दाहिने हाथ पर बने कमरे मे गए जहाँ जवाहर लाल नेहरू जी का सामान अलग-अलग शीशे के बक्सों मे रक्खा हुआ दिखाई देता है। जैसे एक बॉक्स मे नेहरू जी ने इंदिरा गाँधी को जो चिट्ठियां लिखी थी वो है तो एक बॉक्स मे उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया ब्लॉटिंग पेपर (जिसमे हैंडल की जगह एक चील जैसा पक्षी बना है ) तो एक अलमारी मे नेहरू जी के कपड़े और जैकेट वगैरा टंगी है। और एक बॉक्स मे चरखा भी रक्खा है।
उसके बाद दूसरे कमरे मे गए जिसके बाहर लिखा है यहाँ नेहरू जी रहते थे।यहाँ नेहरू जी और कमला नेह
रू की फोटो टंगी है। इसी कमरे मे एक bed, study table , वगैरा देखी जा सकती है। इस कमरे मे जाते हुए अचानक हमारी नजर वहां के बगीचे मे लगे एक पेड़ पर पड़ी और जब वहां मौजूद गार्ड से पेड़ का नाम पूछा तो उसने सागौन बताया । और इस कमरे से एक दरवाजा दूसरे कमरे मे जाता है और उस दूसरे कमरे मे रक्खी ड्रेसिंग टेबल यहाँ से देखी जा सकती है । (इसका राज बाद मे खुलेगा ) :)वहां से वापिस आकर बायीं ओर चले तो एक बड़ा कमरा पड़ा जहाँ जमीन पर गद्दे और मसनद रक्खे है और सफ़ेद खादी की चादर बिछी है ये वो कमरा था जहाँ उस समय कांग्रेस की मीटिंग होती थी जहाँ महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे। उससे आगे बढ़ने पर महात्मा गाँधी जी का कमरा आता है दीवार पर गाँधी जी की फोटो टंगी है कमरे मे एक bed है जिसपर खादी की चादर बिछी है और चरखा भी रक्खा है।गाँधी
जी जब भी आते थे तो इसी कमरे मे ठहरते थे। इस कमरे से आगे बढ़ने पर इंदिरा गाँधी का कमरा आता है। जहाँ उनकी किताबें फोटो और यहाँ से वही ड्रेसिंग टेबल दिखती है जो नेहरू जी के कमरे से दिखाई पड़ी थी। यहाँ ऊपर से आनंद भवन मे बना planetarium भी देखा जा सकता है। जिसे देखने के लिए २० रूपये का टिकट है।ऊपर की मंजिल घूमने के बाद निचली मंजिल पर घूमना शुरू किया तो पहले बैठक यानी ड्राइंग रूम ,dinning रूम पड़ा जहाँ उस जमाने का फर्निचर देखा जा सकता है । आगे बढ़ने पर किचन दिखता है जहाँ गुलाबी और हरे रंग के छोटे-छोटे कप -प्लेट और अन्य दू
सरे बर्तन देखे जा सकते है।
और ये जो चबूतरा है यहीं पर इंदिरा गाँधी और फिरोज गाँधी की शादी हुई थी । इनकी शादी की फोटो भी आप देख सकते है।
निचली मंजिल घूमने के बाद आगे जाने पर फोटो गैलरी भी देखी जा सकती है।गैलरी के शुरू मे जवाहर लाल नेहरू के बाबा गंगाधर नेहरू और उनके चाचा लोगों की फोटो लगी है। मोती लाल नेहरू कमला नेहरू और जवाहर लाल नेहरू की बचपन की फोटो देखी जा सकती है। साथ-साथ स्वतंत्रता आन्दोलन और उस समय के अन्य महान नेताओं की फोटो भी देखी जा सकती है। यहां पर आनंद भवन का एक मॉडल भी रक्खा हुआ है। गैलरी के अन्दर भी फोटो नही खींची जा सकती है पर बाहर खींच सकते है ।
चलिए आज बहुत घुमाई हो गई अब आराम कीजिये , स्वराज भवन कल घूमेंगे।





