सरकार ने पहले ४ आई.आई.टी आंध्र प्रदेश,राजस्थान,बिहार,हिमाचल मे और एक आई.आई.एम.शिलोंग मे खोलने की बात कही थी। भारत के अलग -अलग शहरों मे अब और ४ नए आई.आई.टी. और ६ नए आई.आई.एम.खोले जायेंगे। ये ४ आई.आई.टी. --उड़ीसा,मध्य प्रदेश,गुजरात,और पंजाब मे और ६ आई.आई.एम.-- जम्मू-काश्मीर ,तमिल नाडू,झारखण्ड,छतीसगढ़ ,उत्तराखंड और हरियाणा है।
अभी लोग आई.आई.एम और आई.आई.टी. खुलने की खबर से खुश हो ही रहे थे कि कल शाम को आई.आई.एम.अहमदाबाद ने पी.जी.पी.के कोर्स की फीस भी बढ़ा दी। पहले जहाँ आई.आई.एम मे पढने वाले छात्र को दो साल की फीस साढ़े चार लाख देनी पड़ती थी वहीं अब ये फीस बढाकर ११.५ लाख कर दी गई है।पहले दोनों साल की फीस मे ज्यादा अन्तर नही था पहले साल दो लाख और दूसरे साल ढाई लाख होती थी। पर अब ११.५ लाख
की फीस मे पहले साल ५ लाख और दूसरे साल साढ़े ६ लाख फीस भरनी पड़ेगी।
अब आई.आई.एम.मे पढने के लिए तो आम तौर पर student लोन लेते ही है। और आई.आई.एम . से पास करने पर student को नौकरी भी खूब अच्छी यानी मोटी रकम वाली मिलती है। अब आजकल तो ५-१० लाख सालाना मिलना आम सी बात हो गई है। और कुछ लोगों को तो करोड़ की नौकरी मिलती है। इसीलिए आई.आई.एम को लगता है की जब उसके student को एक करोड़ और डेढ़ करोड़ की नौकरी मिल सकती है तब तो student आराम से अपनी फीस के लिए लिया हुआ लोन चुका ही सकता है तो फ़िर आई.आई.एम ही क्यों नुकसान मे रहे माने फीस क्यों ना बढ़ाई जाए।
अभी तो फिलहाल सिर्फ़ आई.आई.एम.अहमदाबाद ने ही फीस बढ़ाई है अब देखना है कि दूसरे आई.आई.एम.भी फीस बढ़ाते है या नही । और अगर बढ़ाते है तो कितनी ।
फीस बढ़ने से एक और खबर याद आ गई की दिल्ली के स्कूल भी फीस को ५० % बढ़ाने जा रहे है । अरे कमाल है पे कमीशन की रिपोर्ट आए और स्कूल वाले फीस ना बढायें।
Monday, March 31, 2008
आई.आई.एम. और दोगुनी फीस
Saturday, March 29, 2008
अंडमान मे रहते हुए जब मजबूरी का एहसास होता है.(१)
यूं तो अंडमान मे हमारा तीन साल का समय बहुत ही अच्छा बीता पर उन्ही तीन सालों मे हमारे मायके और ससुराल मे अच्छे काम भी हुए माने दीदी और ननद की लड़की की शादी हुई। और उन्ही तीन सालों मे हम लोगों के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजडी भी हुई ।
जून से नवम्बर का समय तो बस अंडमान घुमते हुए मजे मे निकल रहा था। नवम्बर मे दीदी बेटी की शादी मे दिल्ली आए और उसके बाद हम लोग करीब १० दिन दिल्ली रहकर वापिस अंडमान चले गए।अंडमान पहुँचने के एक हफ्ते बाद यानी २ दिसम्बर २००३ की शाम को दिल्ली से हमारी ननद का फ़ोन आया कि पापाजी (ससुरजी ) घर मे गिर गए है।और उनके पैर मे फ्रैक्चर हो गया है। वो लोग पापाजी की खूब देख भाल कर रहे थे।और चूँकि हमारी ननद और नन्दोई डॉक्टर है इसलिए हम लोगों को चिंता करने की कोई जरुरत नही थी। इसलिए हम लोग निश्चिंत थे ।
रोज हम लोग उनका हाल-चाल लेते थे और उनसे बात करते थे।पर अचानक १३ दिसम्बर को दिल्ली से फ़ोन आया कि पापाजी को हार्ट अटैक हुआ है । पापा की हालत काफ़ी ख़राब है और उन्हें हॉस्पिटल ले जा रहे है। उस समय पापाजी से बात की और ननद और नन्दोई से बात हुई ।और पतिदेव ने पापाजी से कहा कि वो कल दिल्ली पहुँच जायेंगे।पहले तय हुआ की हम सभी दिल्ली चले पर चूँकि बेटे का बोर्ड था इसलिए तय किया की पहले पतिदेव चले जाए बाद मे हम लोग जायेंगे।क्यूंकि उस समय हमे अंडमान गए हुए कुल छः महीने हुए थे और उस समय तक हम लोगों को घर नही मिला था इसलिए हम लोग सर्किट हाउस मे रह रहे थे।और बेटे के दसवीं के प्री -बोर्ड होने वाले थे।और ऐसे मे बेटे को बिल्कुल नई जगह पर अकेले छोड़ना ठीक नही लग रहा था।हालांकि बाद मे हमे उसे अकेले ही अंडमान छोड़कर दिल्ली आना पड़ा था।
इसी ऊहापोह मे टिकट लेने की सोची गई क्यूंकि १३ दिसम्बर को एक तो शनिवार था और दूसरे उस समय अंडमान मे सिर्फ़ सुबह ही फ्लाईट चलती थी और शाम को ट्रेवल एजेंट का ऑफिस जल्दी बंद हो जाता था।खैर ट्रेवल एजेंट को फ़ोन किया और पतिदेव के लिए टिकट बुक किया गया । नई जगह और इम्तिहान की सोच कर हम बेटे के साथ वहीं अंडमान मे रुक गए। और पतिदेव अगली सुबह यानी रविवार को दिल्ली चले गए।
और अंडमान मे रहते हुए भी मन नही लग रहा था और हम चाहकर भी दिल्ली नही जा पा रहे थे ।उसी मे बेटे ने प्री-बोर्ड के इम्तिहान दिए पर रिजल्ट स्कूल के मन मुताबिक नही था (५८ %) और इसलिए बेटे के स्कूल से भी बुलावा आ गया और वहां की प्रिंसिपल ने हमे बड़े प्यार से बहुत कुछ कहा और उसी प्यार भरे लहजे मे ये तक कह दिया कि आपके बेटे को जनवरी मे होने वाले प्री-बोर्ड मे कम से कम ६०-६५ % लाना है वरना उसे बोर्ड मे नही बैठने देंगे। (उस स्कूल मे दो प्री -बोर्ड होते थे) क्यूंकि उस स्कूल को उस साल ट्रोफी मिलने की उम्मीद थी (क्यूंकि पिछले दो सालों मे उनके दसवीं के सभी बच्चों का ६५ % से ऊपर रिजल्ट गया था । )और उन्हें ये डर था की कहीं हमारे बेटे की वजह से उन्हें ये ट्रॉफी ना खोनी पड़े।इसलिए हम माँ-बेटा जी-जान से पढ़ाई मे जुट गए थे।
दिल्ली मे पापाजी आई.सी.यू.मे भरती थे। दिल्ली से कभी ख़बर आती कि पापाजी की हालत सुधर रही है तो कभी फ़ोन पर बात करने पर पता चलता की उनकी तबियत पहले से ख़राब है।उन्हें वेंटिलेटर पर भी रक्खा गया जिससे उनकी हालत मे थोड़ा सुधार हुआ पर फ़िर धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती चली गई। और २८ दिसम्बर को दोपहर मे पतिदेव ने फ़ोन करके बताया कि पापाजी की तबियत और भी ज्यादा ख़राब हो गई है ।
इस २५-२६ दिनों मे अंडमान मे रहते हुए एक हम लोगों की मानसिक हालत भी डांवाडोल होती रहती थी।और इन २५ दिनों मे हमारा बेटा बहुत समझदार हो गया था।बजाय इसके की हम उसे हौसला दे वो ही हमे हौसला देता था। इसलिए २८ दिसम्बर को जब पापाजी की तबियत के बारे मे पता चला तो हमने बेटे को बताया की हमे दिल्ली जाना है और क्या तुम यहां अकेले रह लोगे तो उसके हाँ कहने पर हमने दिल्ली के लिए अपना टिकट २९ तारीख का बुक कराया ।जाड़े मे कई बार फ्लाईट लेट हो जाती थी और उस दिन भी ऐसा ही हुआ।२९ की सुबह अंडमान से तो हम चेन्नई समय पर पहुंचे पर चेन्नई से दिल्ली की फ्लाईट जिसे ११ बजे जाना था वो दोपहर २.३० बजे चेन्नई से रवाना हुई।चेन्नई एअरपोर्ट पर ही हमे ख़बर मिली की पापाजी हम सबको छोड़कर जा चुके है। और वो ४-५ घंटे चेन्नई मे काटना ऐसा लग रहा था मानो साल बीत गए हो।
ये कुछ ऐसी ट्रेजडी है जिसकी इस जीवन मे भरपाई हो पाना मुश्किल है। ऐसे ही समय मे मन ये सोचने पर मजबूर हो जाता था कि शायद अंडमान को इसी लिए काला पानी कहा जाता था।क्यूंकि वहां से कभी भी इमरजेंसी मे निकल पाना बहुत मुश्किल होता था।
Posted by mamta at 7:00 AM 12 comments Links to this post
Labels: andaman nicobar, delhi, अंडमान-निकोबार, दिल्ली., सामाजिक
Friday, March 28, 2008
ये कैसी सोसाइटी ....
मुम्बई मायानगरी की एक बड़ी ही दिल मे हलचल मचाने वाली न्यूज़ देखी।मुम्बई की एक ग्रुप हाऊसिंग सोसाईटी जहाँ सारे घरों मे हिंदू जैन परिवार रहते है उसी सोसाइटी मे एक मुस्लिम परिवार भी रहता है। पर सोसाइटी के लोगों ने इस मुस्लिम परिवार के घर का पानी और बिजली बंद कर रक्खी है। पिछले २ सालों से ये परिवार लालटेन और मोमबत्ती की रौशनी से अपने घर मे उजाला करता है। और मुनिस्पल्टी के नल से जरी कैन मे पानी भर-भर कर अपने घर लाता है।वो भी सीढियों के रास्ते क्यूंकि लिफ्ट मे तो उनको चलने की मनाही है। हफ्ते मे एक दिन वो अपने किसी दूसरे रिश्तेदार के घर जा कर परिवार के कपड़े धोते है।
इस मुस्लिम परिवार का कहना है कि बिजली-पानी के लिए उन्होंने १.२५ लाख का डिपॉजिट भी सोसाइटी को ९ महीने पहले दे दिया था पर आज तक ना तो पानी और ना ही बिजली उनके घर मे आई।
इस परिवार को सोसाइटी से बाहर करने के लिए भी बाकी दूसरे परिवार लगे हुए है और उन्हें उस सोसाइटी से चले जाने को कहते है।पर ये मुस्लिम परिवार सोसाइटी छोड़कर नही जाना चाहता है। क्यूंकि आख़िर उसने मकान खरीदा ही है रहने के लिए।
पिछले दो सालों से बर्दाश्त करते-करते अब इस परिवार की सहन शक्ति ख़त्म हो रही है। इस लिए इस परिवार ने माईनोर्टी कमीशन मे जाने की सोची है जिससे उन्हें उनका हक़ मिल सके।
क्या इस हाऊसिंग सोसाइटी मे रहने वालों की इंसानियत बिल्कुल ख़त्म हो गई है ।
Posted by mamta at 7:16 AM 13 comments Links to this post
Labels: mumbai, ख़बरों की खबर, मुम्बई, सामाजिक
Thursday, March 27, 2008
उच्चारण का फर्क
कई बार हमारे उच्चारण शब्द को बदल या तोड़ देते है और हमे पता ही नही चलता है। और उच्चारण का ये फर्क हमने यहां गोवा आकर ही जाना है। पहले तो सिर्फ़ सुनते थे की champagne को शैम्पेन कहा जाता है फ्रेंच मे । पर यहां आकर तो हम इस तरह के उच्चारण से रूबरू भी हुए ।जैसे यहां पर एम (M) ज्यादातर शब्दोंमे नाम के आख़िर मे होते है पर साथ ही M ज्यादातर शब्दों मे मूक होता है । टी (t) को त बोलते है ।यूं तो स को श और श को स तो बोलते सुना है च को स बोलते सुना है गोवा से पहले अंडमान मे जो हमारा कुक था वो च को श बोलता था मसलन शाय,शीनी वगैरा। पर यहां तो स को च और च को स बोलते है। ना को ण आदि। हो सकता है इनके शब्दों के ऐसे उच्चारण का कारण शायद पुर्तगीज के यहां बहुत समय तक रहने की वजह हो ।
गोवा मे इंग्लिश मे अधिकतर शब्दों के अंत मे एम (M) लगता है पर एम साइलेंट होता है। जैसे panjim,,bicholim,siolim,morjim, इत्यादी। अब आम हिन्दी भाषी होने के नाते हम लोग इनका उच्चारण पंजिम,बिचोलिम,सिओलिम,मोरजिम ही करते थे पर जब किसी लोकल goan से कहते सिओलिम तो वो कहते अच्छा सिओली। sanguem इसे यहां सांगे कहते है। इसी तरह nuvem को नेवे,quepem को केपे,velim को वेली,thivim को थीवी और भी बहुत से ऐसे शब्द है।
ये तो रहते-रहते अब कुछ-कुछ समझ आ गया है पर अभी भी बहुत से ऐसे शब्द है जिन्हें इंग्लिश,हिन्दी और कोंकणी मे अलग-अलग तरह से बोला जाता है।उच्चारण के फ़र्क की वजह से कई बार लोगों को समझाने मे बड़ी दिक्कत होती है।
पंजिम मे ही एक कालोनी है जिसका नाम fontainhas है । जब नए-नए थे तो ड्राईवर को कहा की फोंटेनास जाना है तो उसने पलट कर हमे पूछ ये कहाँ है ।
जब हमने कहा चलो रास्ता बताते है तो थोडी दूर जाने पर जैसे ही फोंटेनास के लिए मुड़े तो बोला ओह तो आप फोंतेना कह रही थी।
बड़ी जोर से गुस्सा भी आया और खीज भी हुई पर फ़िर समझते देर नही लगी कि उच्चारण का फर्क है।
गोवा मे ऊँची पहाड़ी जगह को altinho कहते है।शुरू मे हम लोग altinho को अल्टिनो बोलते तो यहां वाले फट से सुधार करके कहते अल्तीन । अब अल्तीन और अल्टिनो मे त और ट का फर्क है ना इसलिए तो लोगों को समझने मे दिक्कत होती थी बाद मे पता चला कि यहां टी शब्द तो है ही नही बल्कि टी को त बोलते है।
इसी तरह ना शब्द को कहीं-कहीं ण बोलते है। जैसे concona अब इसे हम जैसे लोग तो कनकोना बोलेंगे पर यहां कणकोण बोलते है।
फ्रेंच की तरह यहां भी चा को कुछ लोग चा तो कुछ शा बोलते है। अब यहां पर एक फोर्ट है chapora फोर्ट। अब इस फोर्ट तक जाने का जब रास्ता पूछने के लिए हम जिससे भी चपोरा बोलते वो हमे रास्ता दिखाते हुए कहते शपोरा बस थोडी दूर है।
चा को सा और सा को च का एक और उदाहरण हमारे घर मे भी है इंदुमती जो खाना बनाती है वो भी उल्टा ही बोलती है यानी स को च बोलती है। ऐसे ही एक दिन हम अपनी पोस्ट लिख रहे थे कि वो आई और बोली कुर्ची आई है। उसे कहाँ रक्खे। तो हमे समझ ही नही आया कि कुर्ची क्या बला है।अब हमारा ध्यान तो अपनी पोस्ट लिखने मे था इस लिए २-३ बार पूछने पर जब हमे नही समझ आया तो हमने कहा कि क्या कहाँ रखने को कह रही दिखाओ तो उसने कुर्सी की ओर इशारा किया । और ये सुनकर हम समझ नही पाये की हँसे या क्या करें।वो तो बाद मे पता चला की वो चा को सा और सा को चा बोलती है। चावल वो सावल औए इंग्लिश के rice को राईच कहती है।
अभी तो फिलहाल इतने ही शब्दों का पता चला है आगे अगर कुछ और नए शब्द और उच्चारण पता चलेंगे तो जरुर लिखेंगे।
नोट-- और हाँ अब तो हम भी अल्तीनो ,फोंतेना,सांगे,थीवी,शापोरा, और सियोली बोलने लगे है।
Posted by mamta at 10:20 AM 16 comments Links to this post
Wednesday, March 26, 2008
बचपन की कुछ पुरानी कविताएं
आज बस यूं ही मौसम को देख कर हमे भी एक बचपन की कुछ कविताएं याद आ गई।थोडी बेसिर पैर की है पर बचपन मे इन्हे जोर-जोर से बोलने मे बड़ा मजा आता था। वैसे ये पहली लाला जी वाली कविता तो हिन्दी की किताब मे सचित्र पढी थी।
लालाजी ने केला खाया
केला खाकर मुंह बिचकाया।
मुंह बिचकाकर तोंद फुलाई
तोंद फुलाकर छड़ी उठाई।
छड़ी उठाकर कदम बढ़ाया
कदम के नीचे छिलका आया ।
लालाजी गिरे धड़ाम से
बच्चों ने बजाई ताली।
चलिए एक और ऐसी ही छोटी सी मस्ती भरी कविता पढिये।
मोटू सेठ सड़क पर लेट
गाड़ी आई फट गया पेट
गाड़ी का नम्बर ट्वेन्टी एट (२८)
गाडी पहुँची इंडिया गेट
इंडिया गेट पर दो सिपाही
मोटू मल की करी पिटाई।
लगे हाथ इसे भी पढ़ लीजिये।
मोटे लाला पिलपिले
धम्म कुंयें मे गिर पडे
लुटिया हाथ से छूट गई
रस्सी खट से टूट गई।
Posted by mamta at 12:17 PM 11 comments Links to this post
Labels: allahabad, इलाहाबाद, यादों के झरोखों से, सामाजिक.
Tuesday, March 25, 2008
कहीं टीम इंडिया की लुटिया फ़िर ना डूब जाए
क्या आपको हमारी बात पर यकीन नही हो रहा है।लीजिये सारी जगह शोर मचा हुआ है। अरे अब ग्रेग के बाद गैरी जो आ गए है । बड़ी मुश्किल से तो टीम इंडिया गुरु ग्रेग के बताये हुए नुस्खों से बाहर निकल पायी और टीम इंडिया मे दुबारा भरोसा बनना शुरू हुआ पर लगता है बी.सी.सी.आई. से टीम इंडिया और भारतीय जनता की खुशी देखी नही जा रही है तभी तो एक नया कोच गैरी क्रिस्टन टीम के लिए रख लिया गया है।
एक ग्रेग को रख कर देखा और नतीजा जो हुआ वो सारा भारत क्या सारी दुनिया जानती है कि किस तरह टीम इंडिया विश्व कप मे हारी थी और वो भी बांगला देश के हाथों। पर शायद अभी भी बी.सी.सी.आई को कुछ और ही मंजूर है।तभी तो फ़िर एक बार नया विदेशी कोच लाया गया है। भाई जब भारतीय मैनेजर और कोच टीम इंडिया को सही राह दिखा रहे है तो फ़िर विदेशी कोच की क्या जरुरत है।पर बी.सी.सी.आई और पवार साब को कौन समझाए। पवार साब अपने मंत्रालय की बजाय क्रिकेट मे लगे रहते है।पर क्रिकेट की तरह अगर अपने मंत्रालय पर जरा ध्यान दे तो शायद ज्यादा बेहतर होगा। (क्या पता किसानों का कुछ भला ही हो जाएक्यूंकि लोन माफ़ी मे तो बहुत सारे गड़बड़ घोटाले है ऐसा सुनने मे आ रहा है। ) पर कहाँ बी.सी.सी.आई.मे जैसी पैसों की बारिश हो रही है उसके आगे मंत्रालय की भला क्या बिसात।
जब से टीम इंडिया बिना किसी विदेशी कोच के खेल रही है तब से कम से कम जीत तो रही है वरना तो टीम इंडिया और हार का साथ बिल्कुल फैविकोल के जोड़ जैसा हो गया था।छूटेगा नही जैसा ।इस बिना विदेशी कोच के दौर मे टीम इंडिया ने ना केवल बांगला देश बल्कि इंग्लैंड,पाकिस्तान,ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों को हराया बल्कि twenty-२० world कप भी जीता ।
पर बी.सी.सी.आई. उस कहावत पर अमल नही कर रही है कि दूध का जला छान्छ भी फूंक-फूंक कर पीता है। विदेशी कोच का जलवा तो जल्दी ही दिखने लगेगा भाई टेस्ट मैच जो शुरू हो रहा है।पर गनीमत है कि रोबिन सिंह और वेंकटेश प्रसाद को नही हटाया है ।इसलिए थोडी उम्मीद है की शायद जिस तरह पिछली बार लुटिया डूबी थी पर इस बार नही डूबेगी।
Posted by mamta at 12:38 PM 6 comments Links to this post
Labels: cricket, india, player, क्रिकेट, ख़बरों की खबर, भारत, व्यंग्यात्मक, सामाजिक
Monday, March 24, 2008
प्रकृति का सुंदर नजारा इन्द्र धनुष

आज हम कुछ ज्यादा लिखेंगे नही बस ये चंद फोटो लगा रहे है।कल शाम ५ बजे खूब जोरदार बारिश हुई थी और उस दौरान प्रकृति का ये नजारा देखने को मिला यानी की इन्द्र धनुष ।बारिश के पहले घने बादलों ने कुछ इस तरह से पंजिम को घेरना शुरू किया था ।
इसमे इन्द्र धनुष बारिश के बीच मे बनता हुआ दिख रहा है।

और इस फोटो मे बारिश के बाद खिली हुई धूप मे इन्द्र धनुष दिख रहा है।
बड़े सालों बाद इन्द्र धनुष देखने को मिला क्यूंकि दिल्ली की ऊँची-ऊँची इमारतों इन्द्र धनुष क्या आसमान भी ठीक तरह से नही दिखता है।
Posted by mamta at 10:29 AM 7 comments Links to this post
Labels: delhi, goa, nature, rainbow, इन्द्र धनुष, गोवा, दिल्ली, पंजिम, प्रकृति
Sunday, March 23, 2008
गोवा की होली की एक झलक

कहिये आप लोगों की होली कैसी रही।आशा है की आप लोगों ने भी खूब होली खेली होगी और मस्ती की होगी। भाई हमारी होली तो बढ़िया रही। और इस बार गोवा की होली का भी भरपूर मजा हमने उठाया। इस बार गोवा मे होली के अवसर पर गुलालोत्सव मनाया गया।२१ तारिख को पेपर मे ख़बर छपी थी की पंजिम के आजाद मैदान मे गुलालोत्सव मनाया जायेगा ९.३० से १२.३० । इसके लिए एक यात्रा पंजिम के महा लक्ष्मी मन्दिर से परम्परा गत तरीके से ९.३० बजे ढोल और ताशे बजाते और नाचते हुए आजाद मैदान जायेगी जहाँ पर गुलाल से होली खेली जायेगी।और १२.३० बजे कारों की रैली पूरे पंजिम शहर मे
निकाली जायेगी। दिल्ली मे इस तरह का सामुहिक आयोजन आम तौर पर कालोनी मे तो होता है पर शहर मे ऐसा आयोजन पहली बार सुना था। इसलिए सोचा की इस बार गोवा की होली का पूरा मजा लिया जाए। और हाँ इस आयोजन की ख़ास बात ये थी कि कोई भी किसी को जबरदस्ती रंग नही लगायेगा ।अगर कोई रंग लगवाना चाहता है तभी रंग लगाया जायेगा।और वहां पर औरकेस्त्रा पार्टी भी थी लोगों का मनोरंजन करने के लिए।
इस फोटो मे ये जो दो बच्चियां दिख रही है ये पूरी मस्ती मे ड्रम बजा रही थी।
वैसे गोवा मे पिछले साल भी हमने देखा था की यहां पर लोग ना तो गाड़ियों पर रंग या गुब्बारे मारते है और ना ही राह चलते आपको रंग लगाते है या कुछ उल-जुलूल हरकत करते है।पिछले साल पंजिम से कैलेंगुट की १३-१४ कि.मी.की ड्राइव मे आने-जाने मे कोई भी रंग डालने वाला नही दिखा था।
खैर इस साल सुबह साढ़े नौ बजे तो हम नही निकल पाये अरे इतना सारा खाना जो बनाना होता है। फ़िर ११ बजे सबसे पहले कुछ दोस्त हम लोगों के घर आए और फ़िर हम सभी अपने एक दोस्त के घर होली खेलने गए बिल्कुल
यू.पी.बिहार स्टाइल मे होली खेली यानी सिर्फ़ गुलाल नही रंगों से और पानी से होली खेली। और फ़िर रंगे-पुते कार मे चल पड़े आजाद मैदान की ओर गुलालोत्सव देखने। ।हालंकि वहां बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ नही थी पर फ़िर भी लोग नाचते-गाते दिखे । औरकेस्त्रा पार्टी के संगीत पर जनता पूरी मस्ती मे नाच रही थी।वहां जाने पर पता चला की मुख्य मंत्री भी वहां आने वाले है पर उन्हें देर हो रही थी और वहां औरकेस्त्रा पार्टी ने जो गाना गया वो था पिया तू अब तो आ जा ....। :) वहां थोडी देर रुक कर हम लोग dona paula गए। (ये वहीं जगह है जहाँ एक-दूजे के लिए फ़िल्म की शूटिंग हुई थी ) वैसे तो वहां पर आम दिनों की तरह टूरिस्ट की ही भीड़ थी बस कुछ लोग ही रंग मे रंगे हुए घूम रहे थे।और उन रंगे हुए लोगों मे हम लोग भी थे। :)
dona paula से लौटते-लौटते बारिश आ गई थी इसलिए बाकी और जगह घूमने और चक्कर लगाने का कार्यक्रम छोड़कर हम लोग घर आ गए और वैसे भी तब तक हम लोग थक भी चुके थे।और घर आकर नहाने और रंग छुड़ाने का बड़ा काम भी तो करना था।
Friday, March 21, 2008
टेसू के फूलों की होली
होली इस शब्द का जितना मजा बचपन मे लिया वो तो भुलाए नही भूलता है।होली का इंतजार होली के अगले दिन से ही शुरू हो जाता था ।अरे जिसने रंग ज्यादा लगाया या जिसको रंग कम लगा पाते थे उससे अगली होली मे निपटना जो होता था। :)
होली के आगमन का एहसास चिप्स की तैयारी से होता था। होली के हफ्तों पहले से मम्मी घर मे तरह-तरह की चिप्स बनाने लगती थी।अब उस ज़माने मे तो लोग घर की ही बनी स्वादिष्ट चिप्स खाते थे।होलिका दहन के दिन घर मे उपटन बनता और लगाया जाता और फ़िर होलिका मे डाला जाता इस विश्वास के साथ की सब बुराइयों का अंत हो।
हमेशा होली के एक दिन पहले दोपहर मे २ बजे से गुझिया बनने का कार्यक्रम शुरू होता था जो रात तक चलता था। साथ मे मठरी ,खुरमा भी बनाया जाता था।घर मे मम्मी के साथ हम सभी भाई-बहन मिल कर गुझिया बनवात
े थे और भइया कई बार गुझिया तलने का काम करते थे।(क्यूंकि पापा को नौकरों के हाथ की बनी गुझिया पसंद नही आती थी। )क्या जोश और उत्साह होता था। अगले दिन होली की सुबह मालपुआ बनता और उसके बाद खाना बनाने का काम शुरू होता जिसमे मम्मी कबाब और मीट बनाती और बाकी खाना नौकर बनाते जिसमे पूड़ी,कुम्ह्डे की सब्जी, बैगन की कलौंजी ,कटहल की सब्जी चने की दाल की पूरी,उरद की दाल की कचोडी,और पुलाव बनता।(पहले मायके मे फ़िर ससुराल और अब हम भी ये सब बनाते है )
इलाहाबाद मे जिस मुहल्ले मे हम लोग रहते थे वहां हर घर मे कम से कम चार लड़कियां तो थी ही और किसी-किसी घर मे तो ५- ६ लड़कियां भी होती थी। (वो पहले लड़कियों को मारने का ज्यादा चलन जो नही था ) । घर मे सुबह नाश्ते के साथ ही होली शुरू हो जाती ।घर मे बड़े से ड्रम मे रंग और साथ ही रंग की अलग-अलग बाल्टियां ,सूखे मुंह मे लगाने वाले रंगों के अलग से पैकेट होते ,अबीर,गुलाल,पिचकारी । और घर के आँगन मे एक बड़े से हंडे मे गरम पानी मे टेसू के फूल भिगाये जाते। और चूँकि उस ज़माने मे होली मे हमेशा सफ़ेद कपड़े पहन कर खेलने का रिवाज था तो टेसू के फूल का पीला रंग बहुत ही अच्छा खिलता था। पापा और मम्मी की तो टेसू से ही होली होती थी।
नाश्ते के बाद तो हम लोग जो घर से निकलते तो २ बजे के पहले वापिस नही आते ।सबसे पहले हम लोग हर घर मे एक-एक करके जाते और चाची और चाचा (तब अंकल आंटी नही कहते थे)और बड़े-बुजुर्गों को शराफत से रंग लगाते और फ़िर सब बच्चा पार्टी जिसमे लड़के और लड़कियां होते थे खूब धूम कर होली खेलते।और उन्ही रंगे हाथों से किसी घर मे गुझिया,तो किसी मे दही बड़े,तो कहीं समोसे खाते घुमते । और धीरे-धीरे इसी तरह हर घर मे खेलने के बाद हम लोगों की टोली बड़ी होती जाती । आख़िर मे हमारे घर पूरी टोली आती और आँगन मे इतनी धमा-चौकडी होती की सारी रंग की बाल्टियां कम पड़ जाती। क्यूंकि बाल्टी का ज्यादा रंग तो एक-दूसरे पर डालने और बचने मे जमीन पर ही गिर जाता था।और सबकी शक्लें भूत जैसी कोई हरा तो कोई लाल तो कोई बैगनी और सबके सिर तो अलग-अलग रंग के अबीर-गुलाल से भरे होते।और एक काम हम लोग करते थे सबकी पीठ पर छापे मारने का । और ऐसे मे कई बार लोगों से बदला भी पूरा हो जाता था (अरे मारने का ) । :)
खेलने के बाद सबसे मजा रंग छुड़ाने मे आता। आँगन मे साबुन और शीशा लेकर लाइन से हम सभी भाई-बहन बैठ कर रंग छुड़ाने मे जूटते और तब होली खेलने का असली मजा मिलता था जब रंग छुटते नही थे ।फ़िर भी किसी तरह नहा धोकर (आधे रंगे हुए ) नए कपड़े पहनते और एक बार फ़िर से खाने की टेबल पर सभी एक -दूसरे को गुलाल से टीका करते और शाम को फ़िर से लोगों के घर मिलने-जुलने का कार्यक्रम शुरू हो जाता था जो रात तक चलता था।
आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
नोट -- होली की एक और ख़ास बात होती थी पहले घर मे सबके कपड़े एक से होते थे। :)
क्यूं आपके यहां ऐसा नही था क्या।
तो अगले तीन दिनों तक छुट्टी अरे भाई होली है भाई होली है।
Posted by mamta at 8:21 AM 11 comments Links to this post
Labels: allahabad, इलाहाबाद, पिचकारी, यादों के झरोखों से, रंग
Thursday, March 20, 2008
आत्महत्या और शिक्षा प्रणाली
मार्च का महीना यानी दसवीं और बारहवीं के बोर्ड के इम्तिहान का समय । हर साल फरवरी और मार्च के महीने मे छात्र -छात्राओं द्वारा आत्महत्या की खबरें पढने -देखने को मिलती है। बच्चों के कोमल दिमागमे पढ़ाई के साथ-साथ मे बोर्ड और फ़ेल और पास होने को लेकर इतना भय रहता है की कई बार बच्चे ऐसी परिस्थितियों से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या का सहारा ले लेते है। ऐसे कदम उठाने मे बच्चे का कोई दोष नही होता है बल्कि माँ-बाप और स्कूल वाले ही उन्हें एक तरह से ऐसा करने को उकसाते है।
आज के समय मे जहाँ हर कोई ९० %और १०० %की बात करता है वहां ६०-७०और ८० % वालों की कोई पूछ नही है। पर क्या हमारी शिक्षा प्रणाली इसके लिए जिम्मेदार है।अभी दो-तीन दिन पहले संसद मे भी इस विषय पर चर्चा हुई थी और ये कहा जा रहा है कि इम्तिहान का सिस्टम ही खत्म कर देना चाहिए।पर क्या इमिहान ख़त्म कर देने से सब समस्या हल जायेगी।
खैर अगर हम अपने समय की बात करें तब तो हम लोगों के पास(यू.पी.बोर्ड मे ) ओप्शन होता था आर्टस और साईंस का और अपनी पसंद के विषय पढने का।कोई भी पाँच विषय लिए जा सकते थे। उस समय ये नही होता था की सोशल साईंस मे चारों विषय पढो (his.geo.civ.eco.) और उस समय यानी सत्तर के दशक मे तो ६० % आना ही बहुत बड़ी बात मानी जाती थी और लोग ७५ %पर टॉप भी कर जाते थे। हमारे समय मे रिजल्ट फर्स्ट डिविजन,गुड सेकंड क्लास,सेकंड डिविजन,थर्ड डिविजन होता था।और उस समय डिविजन पूछी जाती थी % नही। पर अब तो बच्चों का रिजल्ट % से जाना जाता है।
पर जब हमारा बेटा दसवीं मे पहुँचा तब समझ मे आया की दसवीं यानी सी.बी.एस.सी. बोर्ड क्या होता है। बेटे को १० विषय पढने पड़ते थे । सोशल साईंस के नाम पर चार अलग-अलग किताबें (his,geo,civ,eco)और साईंस के नाम पर तीन अलग-अलग किताबें (bio,chem,phy. )पढ़नी पड़ती थी। और हर किताब मे १५ से २० चैप्टर होते थे किसी किसी मे तो २५ चैप्टर होते थे । सभी को पढ़ना और याद रखना और फ़िर इम्तिहान देना कोई आसान नही था। history मे ७०-७० पन्ने के चैप्टर होते थे(ढेर सारी तारीखें और रेवोलुशन को याद रखना ) तो साईंस मे ढेरों दाइग्राम और maths तो लगता की जो कुछ बी.एस.सी.मे पढाया जाता था वही सब बेटा दसवीं मे पढ़ रहा था।साथ ही हिन्दी,इंग्लिश और एक और भाषा(second language) फ्रेंच,संस्कृत,या जर्मन भी पढ़नी पड़ती थी। बेटे की इतनी पढ़ाई देख कर लगता था की अगर हम बेटे की जगह होते तो शायद फ़ेल ही हो जाते। :)
और जब हमारा छोटा बेटा दसवीं क्लास मे पहुँचा (२००३-२००४ मे ) तो पढने तो उसे भी दस विषय थे पर second language का चक्कर नही था। पर छोटे बेटे का दसवीं का सिलेबस बड़े बेटे की तुलना मे बहुत कम हो गया था । छोटे की सोशल की चार किताबों की जगह अब एक किताब हो गई थी(सोशल मे चैप्टर छोटे हो गए थे। history मे बदलाव हो गया था , अब ढेर सारी तारीखों और रेवोलुशन की जगह आर्कियोलोजी पढ़ना पड़ता था)और साईंस की भी एक ही किताब हो गई थी।हिन्दी बहुत आसान हो गई थी।हाँ maths और इंग्लिश मे ज्यादा अन्तर नही आया था। पर मार्किंग स्कीम मे कुछ बदलाव आ गया था।
ऐसा नही था कि हम लोगों के समय मे बोर्ड का खौफ नही था पर तब माँ-बाप इतना ज्यादा बच्चों पर प्रेशर नही डालते थे।और ना ही % की इतनी मारा-मारी होती थी।जबकि उस समय छात्र-छात्राओं के पास बहुत ज्यादा ओप्शन नही होते थे की बारहवीं पास करने के बाद क्या करेंगे। ज्यादातर लोग इन्जीनिएरिंग या मेडिकल की परीक्षा देते थे और बी.ए -बी.एस.सी करते थे। पर आज वैसे हालत नही है आज बच्चों के पास बहु