Posts

लगता है हर कोई बीमार है

किसी भी हॉस्पिटल में चले जाओ तो वहाँ पर मौजूद मरीज़ों भीड़ देखकर लगता है जैसे हर कोई बीमार है । पहले तो सरकारी अस्पतालों में ही बहुत ज़्यादा मरीज़ों की भीड़ होती थी फिर वो चाहे एम्स हो या जी.बी.पंत हो कोई और सरकारी अस्पताल । और तब लोग उस भीड़ से बचने के लिये लोग प्राइवेट या स्पेशलाइजड हॉस्पिटल में जाते थे । पर अब तो ना केवल सरकारी बल्कि प्राइवेट ,स्पेशलाइजड ( फ़ाइव स्टार )अस्पतालों में भी बहुत भीड़ होती है । छोटे मोटे नर्सिंग होम और डिसपेंसरी का भी कुछ ऐसा ही हाल है । आजकल के फ़ाइव स्टार हॉस्पिटल में तो देसी विदेशी हर तरह के मरीज़ भरे होते है । और इन अस्पतालों में जहाँ पहले कुछ कम भीड़ होती थी पर अब ऐसा बिलकुल नहीं है । फिर चाहे अपोलो हो या मैक्स हो या फोरटिस ही क्यूँ ना हो । और तो और कार पार्क करने की जगह भी नही मिलती है । जितनी भीड़ और लोग अस्पताल के अन्दर उतने ही बाहर भी होते है । कई बार तो इनकी कैंटीन तक में बैठने की जगह नहीं मिलती है । अब लोग भी क्या करें सुबह से दोपहर तक का समय अस्पताल में ही बीत जाता है ।हर जगह लम्बी लाइन होती है ।कई बार तो एपाइंटमेंट के बाद भी अच्छा ख़ासा ट...

रिमझिम के तराने लेके आई बरसात

पुराना परन्तु कितना मीठा गीत । ग़लत तो नहीं कहा ना । एक समय था जब बारिश और सावन के मौसम पर आधारित गानों की भी हिन्दी फ़िल्मों में बहार सी होती थी जैसे ख़ुशी,ग़म ,मिलन,विरह ,छेड़छाड़, घर ,सहेलियाँ,झूला ,वग़ैरह पर खूब गाने बनते थे । पर अफ़सोस आजकल तो ऐसे गीतों का कुछ अकाल सा पड़ गया है । क्योंकि आज की दौड़ती भागती जिंदगी में ये सब कहीं खो सा रहा है । बरसात का मौसम आते ही जगह जगह पर पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ जाते थे । अब तो विरले ही पेड़ और पेड़ पर झूले नज़र आते है । झूले पर बारिश में भीगने का भी अपना ही मजा़ था । वो गाना तो याद ही होगा -- पड़ गये झूले सवन ऋतु आई रे ,पड़ गये झूले । सावन का मौसम और बारिश के आते ही रेडियो पर बरसात के गीतों की बारिश सी हो जाती थी । वैसे आज भी एफ.एम. गोल्ड पर ऐसे गीत सुने जा सकते है । इस मौसम में हमेशा बन्दनी फ़िल्म का गीत अब के बरस भेज भइया को बाबुल सुनकर आँखों में अपने आप ही आँसू आ जाते है । तो वहीं किशोर कुमार का इक लड़की भीगी भागी सी सुनकर मुस्कराहट आ जाती है । रिमझिम के तराने लेके आई बरसात गीत को सुनकर बारिश की मीठी सी अनुभूति होती थी पर आजक...

दिल्ली और ट्रैफ़िक जाम

दिल्ली में कब कहाँ और क्यूँ ट्रैफ़िक रूक जायेगा कहना बहुत मुश्किल है । लोग कहते है कि सोमवार को और शुक्रवार को सबसे ज़्यादा ट्रैफ़िक होता है क्योंकि दोनों दिन हफ़्ते के पहले और आख़िरी दिन होते है । बारिश हो तो ट्रैफ़िक जाम लग जाता है बारिश ना हो तब भी ट्रैफ़िक जाम लग जाता है । वजह हो या ना हो ट्रैफ़िक जाम हो ही जाता है । और सिर्फ़ सुबह -शाम ही ट्रैफ़िक जाम होगा ऐसा भी नहीं है । 😙 इस बीते सोमवार हम अपनी दोस्त के साथ वसंत कुंज से होते हुये ग्रेटर कैलाश जा रहे थे तो महिपालपुर बाई पास पर बहुत ज़्यादा ट्रैफ़िक मिला था और जो रास्ता दस - पन्द्रह मिनट का था उसे पार करने में चालीस मिनट लग गये थे । हमारी दोस्त का कहना था कि सोमवार को हमेशा बहुत ट्रैफ़िक होता है । इसलिये सोमवार को जाने से बचना चाहिये । हालाँकि हम अकसर जाते रहते है । पर कल जब हम फिर से वसंत कुंज के एक हॉस्पिटल जा रहे थे तो हम बहुत ही बुरे ट्रैफ़िक जाम में फँस गये थे । वैसे कल ना तो सोमवार और ना ही शुक्रवार था ना ही कोई ऑफ़िस टाइम था । जैसे ही हम चले तो ड्राइवर को बोला कि महिपालपुर बाई पास से चलना पर वो गुरूग्राम वाले रास्ते स...

यादें हमें क्यूँ अच्छी लगती है

कई बार क्या अकसर ऐसा होता है कि हम जब भी पुरानी बातें या समय याद करते है तो मन एक अजीब सी ख़ुशी से भर जाता है । और उस दौरान हम उस बीते हुये लम्हे को पुन: जी लेते है । ऐसा नहीं है कि बीते हुये समय में सब कुछ बिलकुल हमारी मनमर्ज़ी से हुआ होगा या कभी कुछ बुरा नहीं हुआ होगा पर फिर भी हमेशा पुराना समय और पुरानी बातें मन को ख़ुश कर देती है । हमें अच्छे से याद है जब हम छोटे थे तो हमारे बाबा अपने ज़माने की बातें करते थे तो हम लोगों को लगता था कि बाबूजी हमेशा पुरानी बातें ही क्यूँ करते है पर अब समझ आया कि बीते हुये दिन हमेशा दिल को ख़ुश करते है । अब ऐसा भी नही है कि वर्तमान में कुछ अच्छा नही हो रहा है पर ना जाने क्यूँ हम बार बार यादों में जाना पसंद करते है । वो शायद इसलिये क्योंकि उन यादों से हम अपने खोये हुये माँ पापा ,बचपन,स्कूल कॉलेज के मस्ती भरे दिन ,( जो शायद उस समय इतने मस्ती भरे नहीं लगते थे क्योंकि तब पढ़ाई का थोड़ा बहुत दबाव होता था ) सब को बार बार जीते है । पर हाँ कभी कभी पुरानी यादें मन को उदास और दुखी भी करती है । और आँखों को नम भी करती है । जब भी पुरानी फ़ोटो या वीडियो देखो...

ग़ायब होते गीत के विषय

आज सुबह सुबह मशहूर कवि और गीतकार गोपालदास नीरज के निधन की ख़बर पढ़ी , उनकी लिखी कवितायें और गीत भला कौन भुला सकता है । पहले जब दूरदर्शन पर कवि सम्मेलन होता था तो उनकी कविता पाठ से ही कवि सम्मेलन का समापन होता था । और उनका लिखा ये गीत जो एक ज़माने में विविध भारती पर खूब बजता था । ए भाई ज़रा देख के चलो आगे ही नहीं पीछे भी दायें ही नहीं बायें भी ऊपर ही नीचे भी ए भाई ना केवल ये गीत बल्कि इनके लिखे अन्य गीत भी बहुत ही लोकप्रिय थे । हर गीत एक से बढ़कर एक और जीवन का फ़लसफ़ा समझाते हुये । देव आनन्द की फ़िल्मों के पसंदीदा गीतकार थे । कारवाँ गुज़र गया ग़ुबार देखते रहे जैसे फूलों के रंग से ,दिल की क़लम से रंगीला रे ,तेरे रंग में यूँ रंगा है मेरा मन लिखे जो ख़त तुझे मेघा छाये आधी रात मेरा मन तेरा प्यासा अनायास ही मन में विचार आया कि अब तो ऐसे गीत और गीतकार ही नहीं रहे । आजकल की हिन्दी फ़िल्मों से बहुत सारे गीत के विषय ग़ायब से होते जा रहे है । जैसे रक्षाबंधन,होली ,दिवाली,देशभक्ति ,भाई-बहन,दोस्ती,और मॉं और पिता ,बच्चे और बचपन पर आधारित गीत तो आजकल विरले ही सुनने को मिलते है । हाँ ...

बारिश और लाल बिलौटी

लाल बिलौटी ( रेड लेडी बर्ड ) नाम तो सुना ही होगा और पकड़ी भी होंगीं । वैसे अब ये दिखती ही नहीं है पर पहले यानि जब हम लोग छोटे थे तब बारिश के बाद लाल बिलौटी खूब निकला करती थीं । ये बहुत ही मख़मली ,सुर्ख़ लाल रंग की और छोटी सी होती थी । जब इनको हाथ से छूते या उठाते थे तो ये अपने पंजे सिकोड़ लेती पर फिर थोड़े सेकेंड के बाद पंजे खोलती और बहुत ही धीरे धीरे चलती । जब ये अपने पंजे बंद करती तो हम लोग कुछ ऐसा कहते थे --- लाल बिलौटी पंजा खोल ,तेरी बग्घी आती होगी । 😊 और कई बार वो वाक़ई पंजे खोलकर चलने लगती । वो हमारे कहने पर नहीं पर जब हम उसे थोड़ी देर छूते नहीं थे तब वो चलती थी । ये बाद नें समझ आया । 😀 वैसे पहले हम लोग जब बारिश होती थी तो चाहे घर हो या स्कूल खूब नाव बनाते और चलाते थे । कॉपी में से धडाधड पन्ने फाड़ते और नाव बनाते । और जब कहीं नाव अटक जाती तो डंडी से उसे आगे खिसकाते । एक नाव डूब जाती तो दूसरी नाव बनाते थे । बाक़ायदा हम और हमारी दीदी में कॉमपटीशन भी होता था । और अकसर हमारी नाव डूब जाती थी क्योंकि अगर काग़ज़ की नाव ठीक से नहीं बनी हो तो डूब ही जाती है । कभी कभी घर पर बड़ी न...

आज भी अंधविश्वास

क्या आज भी लोगों पर देवी देवता आते है । पर गाँवों में तो शायद अब भी मानते है । पर शहर में रहने वाले भी इसे मानते है । ऐसा कल पता चला । दरअसल हमारी कामवाली दो तीन दिन से बीमार थी और छुट्टी पर थी । उसने बुखार ,चक्कर और हाथ पैर में दर्द ही बताया था । पर कल उसकी भाभी ने बताया कि उस पर देवता आ गये है । हमारे पूछने पर कि हर साल इसी समय सिर्फ़ उस पर ही देवता क्यूँ आते है । तो वो बोली कि गाँव में ऐसा कहते है कि बरसात के समय में लोगों पर देवता आ जाते है जिसकी वजह से चक्कर आते है और लोग बीमार पड़ते है । जहाँ तक हम अपनी कामवाली को जानते है वो ऐसा नासोचती है और ना ही मानती है । और झाडफूंक की बजाय डाक्टर को दिखा कर अपना इलाज करवाती है ।