
जी हाँ कल से गोवा मे भारत का ३८ वां अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह शुरू हुआ है। जिसमे देश-विदेश से कुल मिला कर करीब २०० फिल्में दिखाई जायेंगी। गोवा मे पिछले चार सालों से ईफ्फी का आयोजन होता आ रहा है और आगे भी गोवा मे ही ईफ्फी होगा क्यूंकि गोवा को ईफ्फी का स्थाई आयोजक बना दिया गया है। ।कल गोवा के कला अकेडमी मे हुए इस उदघाटन समारोह के मुख्य अतिथि शाह रुख खान थे।दक्षिण की हिरोइन प्रिया मणि ,प्रिय रंजन दास मुंशी,गोवा के मुख्य मंत्री,गोवा के मुख्य सचिव ,गोवा के मेयर ,फिल्म फेडरेशन की डाइरेक्टर, आदि लोग इस उदघाटन समारोह मे मौजूद थे।
पिछले की तरह इस साल नाच-गाना तो नही हुआ पर भाषण पिछले साल की तरह ही हुए। इस समारोह की शुरुआत मे सभी ने भाषण दिए। भाषण पर हम यहां प्रिय रंजन दास मुंशी के भाषण का जिक्र करना चाहेंगे।( बस जरा चूक हो गयी कि हम रेकॉर्ड नही कर पाए) जिसमे उन्होंने शुरुआत मे तो फिल्म समारोह पर बोला और फिर उन्होने मुख्य अतिथि शाह-रुख खान के बारे मे जो बोलना शुरू किया की रुकने का नाम ही नही लिया कि शाह रुख खान एक महान हस्ती है किंग खान है । और इन्होंने अपना कैरियर फौजी से शुरू किया और फिर फिल्मों मे खूब अच्छा काम किया जिनमे चक दे फिल्म भी है। आज के यूथ आइकोन है । के .बी.सी.के होस्ट रह चुके है।और तो और उन्होंने ये तक कह दिया कि चक दे फिल्म के बाद से भारत मे खेल के प्रति लोगों का प्रेम जाग गया है।मुंशी ने गोवा के मुख्य मंत्री से गोवा मे बड़ा ऑडिटोरियम बनवाने की सिफारिश की और शाह रुख से कहा कि उस ऑडिटोरियम के उदघाटन के लिए शाह रुख खान को आना होगा।और भी ना जाने क्या-क्या। ओह-हो इतने बडे भाषण को बताने का अभिप्राय है कि उन्हों ने अपने नाम के अनुरूप भाषण दिया । :)
और उसके बाद दीप जलाकर समारोह का उदघाटन किया गया।
कल की ओपनिंग फिल्म फ़ोर मंथ्स थ्री वीक्स ऎंड टू डेज थी जो की एक रोमानियन फिल्म थी जिसमे सत्तर के दशक की पृष्ठभूमि है । इसकी कहानी दो लड़कियां के इर्द-गिर्द घूमती है। ये दोनो लड़कियां रूम मेट है और एक डोरमेट्री मे रहती है।इस फिल्म मे अबोर्शन जो की सत्तर के दशक मे रोमानिया मे एक अपराध माना जाता था उस पर आधारित है। कान फिल्म समारोह २००७ मे इस फिल्म को गोल्डेन पाम अवार्ड मिला था। वैसे फिल्म ठीक थी । इस विषय पर भारत मे भी पहले फिल्में बन चुकी है जैसे अस्सी के दशक मे कुछ ऐसी फिल्में आई थी जैसे भ्रूण हत्या ।इस फिल्म की हिरोइन और डाइरेक्टर इस फोटो मे आप देख सकते है।
अब चूँकि ईफ्फी चल रहा है तो आजकल हम फिल्में देखने मे लगे है। आज तीन फिल्में जों हमने देखी है उसके बारे मे कल बताएँगे।
Saturday, November 24, 2007
ईफ्फी २००७ गोवा
Posted by mamta at 11:15 PM 10 comments Links to this post
Thursday, November 22, 2007
राखी के नाटक
नच बलिये जो कि स्टार प्लस पर आता है उसमे जब शो शुरू हुआ था तो दस जोडियाँ थी पर हर हफ्ते एक-एक जोड़ी बाहर होती गयी। और अब आख़िर चार जोडियाँ बची है । इस बार के नच बलिये मे राखी सावंत भी भाग ले रही है तो कुछ न कुछ तमाशा तो होना ही था। अब राखी सावंत हो और कोई बात न हो ऐसा कहाँ हो सकता है।
राखी सावंत पहले दिन से लोगों का ध्यान अपनी और करने के लिए हर बार कुछ करती है। पहले दिन तो उसने कश्मीरा(वैसे हम न तो कश्मीरा और न ही राखी को पसंद करते है ) के लिए कहा था कि वो नही चाहती है कि राखी शो मे आगे बढे। फिर हर बार नाचने के बाद भी वो कोई न कोई बात जरुर कहती है। यहां तक की एक बार शो के होस्ट हुसैन ने भी कहा था कि आप हर बार कहती है कि ऐसा आपने पहले कभी नही किया है। जबकि सभी जानते है कि वो एक डांसर है और काफी समय से स्टेज शो ( डांस) करती आ रही है और कुछ फिल्मों मे भी डांस किया है । पर फिर भी और हर बार एक नयी बात कहती है।
राखी सावंत जो पहले दिन से ही कुछ न कुछ नाटक करती आ रही है नच बलिये मे पहली बार ख़तरे मे आई है। अब राखी सावंत ख़तरे मे हो और वो कुछ न करे ऐसा कहाँ हो सकता है।तो शो मे बने रहने और जीतने के लिए राखी पहुंच गयी नागमाता के पास पूजा करने के लिए। वैसे तो राखी खुद दावा करती है कि वो गणपति और जीजस की भक्त है पर इस बार वो नागमाता के पास गयी है। राखी कुछ करे और हमारे न्यूज़ चैनल उसे न दिखाए ऐसा भी नही हो सकता है। और आज तक तो सबसे तेज चैनल है सो उसने सबसे पहले ये खबर भी दिखा दी। :)
अब देखना है कि राखी शो मे रहती है या बाहर होती है।
Posted by mamta at 12:36 PM 7 comments Links to this post
Labels: ख़बरों की खबर, मनोरंजन, व्यंग्यात्मक
Friday, November 16, 2007
बकरियों कच्चे-पक्के सब खा जाओ
बात उन दिनों की है जब हम लोग इलाहाबाद के म्योराबाद मोहल्ले मे रहते थे यही कोई चालीस -बयालीस साल पहले । तब का म्योराबाद आज के म्योराबाद जैसा नही था । उन दिनों वहां इतनी ज्यादा घनी आबादी नही थी। ज्यादातर ईसाइयों के घर थे और कुछ घर दूसरे लोगों के थे। अब चूँकि उन दिनों आबादी कम थी इसलिए पेड़-पौधे ज्यादा हुआ करते थे।और म्योराबाद मोहल्ला बहुत ही छोटा हुआ करता था बस जहाँ मुम्फोर्ड गंज ख़त्म वहां से सड़क पार करते ही म्योराबाद शुरू हो जाता था।हर घर के आगे बड़ा सा दालान होता था। सारे घर लाइन से बने थे और आगे की लाइन के पीछे एक औए लाइन मे घर बने होते थे। जिनमे खेलने मे बड़ा मजा आता था।
हम लोगों के घर से कोई दस कदम की दूरी पर एक परिवार रहता था जिसमे दक्कू ,टेरी ,टेरी कि पत्नी बीना आंटी उनके माता-पिता और और दक्कू की दादी रहती थी। दादी यूं तो बहुत अच्छी थी पर हम बच्चों से जरा गुस्सा रहती थी क्यूंकि हम सब उन्हें बहुत तंग जो करते थे।कभी आईस -पाईस खेलते तो उनके घर के बरामदे मे छिप जाते तो कभी उनके दालान से कूद कर भागते थे।अगर कभी हम लोग दादी की नजर मे आ जाते तो शामत ही आ जाती थी। हर किसी की मम्मी से वो शिक़ायत करती थी की हम बच्चे उन्हें परेशान करते है और दिन मे उन्हें आराम नही करने देते है। मम्मी लोग हम लोगों को मना करती थी पर हम सब मानते कहाँ थे।
द्क्कू के घर मे बेर के पेड़ थे।जो मौसम मे खूब फलते थे। और जिन्हें तोड़ने मे हम सब को खूब मजा आता था। दिन मे जब सब लोग सो जाते थे तो हम बच्चों की टोली मतलब हम, पुतुल ,चीनू और रीना उनके घर मे लगे बेर चुराने जाते थे। हम सब पूरी सावधानी बरतते थे की दादी को हम लोगों की आहट न मिले पर चूँकि बेर के पेड़ बड़े-बड़े थे और हाथ से तो हम लोग तोड़ नही पाते थे तो छोटे-छोटे पत्थर मारते थे और उन पत्थरों से फल तो कम टूटते थे पर उन पत्थरों की आवाज से दादी जरुर उठ जाती थी और जो चिल्लाना शुरू करती थी कि बकरियों कच्चे-पक्के सब खा जाओ। और ये कहते हुए छड़ी लेकर बाहर आती थी हम लोगों की पिटाई करने के लिए पर हम सब भी कहाँ उनके हाथ आते थे। :)
बेर तोड़ने का सिलसिला चलता रहा और दादी का हम लोगों को बकरी कहना और छड़ी लेकर हम लोगों को दौडाना भी चलता रहा ।मम्मी कहती कि खरीद कर खाओ पर हम लोग बाज नही आते थे। क्यूंकि जो मजा पेड़ से तोड़ कर चुपके से खाने मे आता था वो भला खरीद कर खाने मे कहाँ।
Posted by mamta at 11:38 AM 9 comments Links to this post
Labels: यादों के झरोखों से
Wednesday, November 14, 2007
मुझे बोलना आता है।
कहीं आप लोग ये तो नही सोच रहे है कि ये हम अपने बारे मे कह रहे है , अरे नही ये हमारे नही ये तो राहुल गाँधी के शब्द है जो उन्होने हाल ही मे अपने उत्तर प्रदेश के दौरे मे कहे थे।जहाँ उन्होने अपनी पार्टी को कैसे मजबूत करे और किस तरह से दुबारा से उत्तर प्रदेश मे तथा अन्य राज्यों मे कैसे उनकी पार्टी अपनी पकड़ बना सके।अब राहुल गाँधी को बोलना आता है या नही उससे भला किसी को क्या फर्क पड़ता है ।
जब राहुल गाँधी को वाकई मे बोलना नही आता था तब भी लोग उनके बिना कुछ कहे ही सब कुछ समझ लेते थे तो भाई अब तो माशा अल्लाह बोलना भी आ गया है। और इसका तो वो अब दावा भी कर रहे है।
जब से राहुल गाँधी की पदोन्नति हुई है तब से तो उनके मिजाज भी कुछ बदल गए है। और बदले भी क्यों न आख़िर इतनी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी का भार जो उनके कन्धों पर डाल दिया गया है।
पर भाई बोलने से ये बेहतर नही है कि आपका काम बोले।
Posted by mamta at 5:34 PM 7 comments Links to this post
Labels: ख़बरों की खबर
मनोरमा सिक्स फ़ीट अंडर
ये अभी हाल ही मे रिलीज हुई पिक्चर का नाम है।वैसे हमने इसे हॉल मे नही बल्कि घर पर देखी है।क्यूंकि इससे पहले की हम इसे देखते ये पिक्चर हॉल से चली गयी। आज कल जहाँ नाच-गाने से भरपूर फिल्में बन रही है वहीं ये फिल्म धरातल से जुडी लगती है। इसकी कहानी पूरी तो नही पर हाँ थोडी सी बता देते है । इस फिल्म मे कहानी अभय देओल जो की एक इंजीनियर है और साथ-ही साथ एक लेखक भी है और जासूसी का शौक भी रखते है, उनके ही इर्द-गिर्द घूमती है कि किस तरह वो एक हत्या के मामले मे फंस जाते है।और किस तरह वो उससे बाहर निकलते है।
अभय देओल और गुल पनाग दोनो ने ही अच्छी एक्टिंग की है।गुल पनाग जो वैसे तो ज्यादा फिल्मों मे दिखाई नही देती है पर इसमे अभय देओल की पत्नी के रोल मे अच्छा काम किया है। और अभय देओल ( जिसकी हमने इससे पहले कोई भी पिक्चर नही देखी थी )ने अपने मार-धाड़ वाले भाइयों (सनी और बॉबी ) के बिल्कुल विपरीत रोल किया है। और काफी नैचुरल एक्टिंग की है। और बाक़ी के कलाकारों जैसे सारिका विनय पाठक,कुलभूषण खरबंदा, आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है।
वैसे ये पिक्चर ज्यादा नही चली है क्यूंकि ये ना तो पूरी तरह कमर्शियल पिक्चर है और ना ही आर्ट सिनेमा है। पर फिर भी देखने लायक है।क्यूंकि आज के दौर मे जहाँ बडे-बडे सेट लगाए बिना फिल्म ही नही बनती है वहां इस फिल्म मे एक भी सेट देखने को नही मिलता है। सारी शूटिंग राजस्थान की है। डायलॉग बहुत ही साधारण आम बोल-चाल वाली भाषा के है।
Posted by mamta at 10:20 AM 3 comments Links to this post
Tuesday, November 13, 2007
वाह रे ड्रेस
जरा इस ड्रेस पर गौर फरमाइए।कहिये कैसी लगी ये ड्रेस। :)
ये सारी ड्रेस चोकलेट से बनी है। और हाँ इन्हें देखने के लिए क्लिक करना न भूले।
Posted by mamta at 11:06 AM 9 comments Links to this post
Labels: ख़बरों की खबर, व्यंग्यात्मक, सामाजिक
Thursday, November 8, 2007
गोवा की दिवाली कुछ अलग सी .....

गोवा मे आज दिवाली मनाई जा रही है जबकि शायद बाक़ी सारे देश मे दिवाली कल यानी ९ नवम्बर को मनाई जायेगी। अब चूँकि हम यू.पी.के है तो जाहिर तौर पर आज हम छोटी दिवाली और कल यानी ९ को हम भी बड़ी दिवाली मनाएंगे। यहां गोवा मे दिवाली मनाने का अंदाज उत्तर भारत से बिल्कुल भिन्न है। जैसे उत्तर भारत मे दिवाली भगवान राम के वनवास से अयोध्या वापिस आने की ख़ुशी मे मनाई जाती है पर यहां भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस के वध की ख़ुशी मे मनाई जाती है। हम लोग राम की पूजा करते है तो यहां पर कृष्ण की पूजा होती है।
जिस तरह दशहरे मे रावण को जलाया जाता है ठीक उसी तरह यहां गोवा मे दिवाली मे नरकासुर को जलाया जाता है।नरकासुर जलाने का चलन तो हमने यहीं पर देखा है। बडे-बडे नरकासुर बनाए जाते है और भोर मे यानी की सुबह ४ बजे इन्हें जलाया जाता है।नरकासुर जलाने का कारण है बुराई पर अच्छाई की जीत या अँधेरे पर रौशनी की जीत। चलिए थोडी इसकी कहानी भी बता देते है। जैसा की नाम से ही पता लग रहा है कि नरकासुर नरक के असुरों का राजा था।और इस नरकासुर ने १६ हजार गन्धर्व रानियों को कैद कर रखा था ।इन रानियों ने भगवान कृष्ण की पूजा की और उनसे प्रार्थना की कि नरकासुर की कैद से भगवान उन्हें मुक्ति दिलाएं। तब भगवान कृष्ण ने नरकासुर से युद्ध किया और युद्ध मे कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से नरकासुर का सिर धड़ से अलग करके औरतों को नरकासुर की कैद से मुक्ति दिलाई ।नरकासुर की कैद से मुक्त होने की ख़ुशी मे इन औरतों ने अपने घर के बाहर मिटटी के दिए जलाये जो ये दर्शाते है की किस तरह अँधेरे पर रौशनी की जीत होती है।और इसीलिए यहां गोवा मे नरकासुर को जलाते है। और जलाने के बाद घर मे प्रवेश करने से पहले एक जंगली फल कर्री (karrit)को आदमी पैरों से कुचलते है और फिर गुड खाते है तब घर मे प्रवेश करते है। और तो और यहां पर नरकासुर बनाने की प्रतियोगिता भी होती है। हर ताल्लुके मे ये प्रतियोगिता होती है। वैसे कल शाम यहां पर जबरदस्त बारिश होने से थोडा रंग मे भंग जरुर हो गया है पर लोगों के उत्साह मे कोई कमी नही आई है।
जैसे उत्तर भारत मे गणेश -लक्ष्मी दोनो की पूजा दिवाली के दिन की जाती है यहां पर सिर्फ लक्ष्मी की पूजा करते है। और इसीलिए यहां मिटटी के गणेश -लक्ष्मी एक तरह के नही मिलते है।और गणेश- लक्ष्मी ढूंढ़ना किसी खजाने को ढूंढ़ना से कम नही होता है और उस पर भी या तो लकडी के या फिर मैटल के मिलते है। अब ये मत कहिये कि चांदी के गणेश -लक्ष्मी की पूजा क्यों नही करते है। तो वो क्या है ना कि हमेशा से मिटटी के ही गणेश -लक्ष्मी की पूजा जो करते आये है।
और हाँ यहां पर बडे-बडे कंडील लगाने का भी खूब चलन है । सड़कों पर दुकानों के बाहर और घरों मे तरह-तरह के कंडील लगे हुए दिखते है।जो रात मे बडे ही खूबसूरत लगते है। कंडील से याद आया की हमे शॉपिंग करने जाना है । अच्छा तो अब हम जा रहे है अपनी बाक़ी बची हुई शॉपिंग करने अरे भाई कल दिवाली जो है।
आप सभी को दीपावली की शुभकामनाएं।
Posted by mamta at 12:07 PM 15 comments Links to this post
Wednesday, November 7, 2007
ये भी एक खबर है ...
कल यहां गोवा के लोकल अखबार मे ये खबर छपी थी।पर कल हम इसे अपने ब्लोग पर नही लगा पाए थे इसलिए आज इसे पोस्ट कर रहे है। यूं तो ये बड़ी ही अजीबोगरीब खबर है पर फिर भी हमने सोचा की आप लोगों तक इसे पहुंचाया जाये।
Posted by mamta at 12:01 PM 7 comments Links to this post
Labels: ख़बरों की खबर, व्यंग्यात्मक
Sunday, November 4, 2007
जेनरेशन गैप
कुछ अजीब सा विषय है ना पर ये जेनरेशन गैप हर पीढ़ी मे होता है।बस हमारा देखने का नजरिया अलग होता है।
आख़िर ये जेनरेशन गैप है क्या बला ?
आम तौर पर माना जाये तो ये दो पीढ़ी के बीच मे आने वाला फर्क है या यूं कहें की हर बात मे, सोच मे ,आचार -विचार मे ,बातचीत के तरीके मे ,व्यवहार मे अंतर होने को जेनरेशन गैप कह सकते है।हमेशा नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को और पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को यही कहकर चुप करा देती है कि जेनरेशन गैप है।वो चाहे हम लोगों का जमाना रहा हो या फिर आज हमारे बच्चों का जमाना ही क्यों ना हो। ऐसा हम अपने अनुभव के आधार पर कह रहे है । पर हमेशा नयी पीढ़ी को ही क्यों दोष दिया जाता है कि नयी पीढ़ी या आजकल के बच्चे तमीज-तहजीब खो चुके है। उनमे छोटे-बडों का फर्क समझने की बुद्धि नही है। जबकि हम सभी उस नयी पीढ़ी वाले दौर से गुजर चुके है। पर क्या हम सबने अपने बडे-बुजुर्गों से कभी भी ऐसी बातें नही कही या करी है ? और क्या इन सबसे बडे-बुजुर्गों के साथ संबंधों या रिश्तों मे फर्क आ गया था।जब तब नही आया तो अब हम बच्चों को क्यों ये कहकर अहसास दिलाते है ।
ये तो सोचने वाली बात है की जो बात हम अपने दौर मे सही मानते थे अब हम उसे गलत क्यों मानते है सिर्फ इसलिए की हमारी नयी पीढ़ी हमारे बच्चे आज के ज़माने के है और उनका सोचने-समझने का नजरिया हमसे भिन्न है।
हमारे ख्याल से ये जेनरेशन गैप एक मिथ्या है ।किसी भी वार्तालाप को ख़त्म करने का ये अचूक अस्त्र है। क्यूंकि इसके बाद कुछ कहने-सुनने की गुंजाइश ही नही रहती है। हम सभी यानी कि नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी दोनो ही सवालों का जवाब देने से बचने के लिए इस शब्द को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते है।
आपका क्या विचार है ?
Posted by mamta at 7:25 PM 9 comments Links to this post
Labels: सामाजिक
Saturday, November 3, 2007
बैरेन आइलैंड

barren island जैसा की नाम से ही लग रहा है कि ये एक ऐसा द्वीप होगा जहाँ जनजीवन नही होगा। और बिल्कुल ऐसा ही है । barren island हिंदुस्तान का एकमात्र जीवित ज्वालामुखी है जो अंडमान मे है। ।ये द्वीप पोर्ट ब्लेयर से १३०-१३५ कि .मी.की दूरी पर है। और यहां भी जाने के लिए बोट से ही जाना पड़ता है। अब का तो पता नही कि ये ज्वालामुखी जीवित है या नही पर २००५ मे करीब ९-१० साल बाद ये जीवित हो गया था मतलब ज्वालामुखी फट गया था।
शुरू मे जब ये ज्वालामुखी ज्यादा तीव्र था तब तो कम पर बाद मे इसे भी एक पर्यटन स्थल बना दिया गया था क्यूंकि ये भी जिंदगी मे बार-बार कहॉ देखने को मिलता है। कभी-कभी तो वहां बडे शिप भी ले जाये जाते थे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इस ज्वालामुखी को देख सकें।और इसके अलावा छोटी बोट barren island जाने के लिए फीनिक्स बे jetty से रात नौ बजे जाती थी और बिल्कुल सुबह तीन बजे इस द्वीप के पास पहुंचती थी। रात मे बोट इसलिये जाती थी क्यूंकि सुबह यानी भोर मे सिर्फ तीन से पांच बजे तक ही लावा दिखता था क्यूंकि अँधेरे मे लाल-पीला लावा साफ तौर पर देखा जा सकता था। और जैसे ही उजाला हो जाता है सिर्फ धुँआ -धुँआ सा ही दिखता है ।
अब चुंकि हम लोग उन दिनों अंडमान मे थे और क्यूंकि धीरे-धीरे ये ज्वालामुखी शांत हो रहा था। तो एक दिन हम लोगों ने भी सोचा कि चलो भाई अब जब अंडमान मे है तो इस ज्वालामुखी को भी देख लिया जाये। वो क्या है ना की हमे समुद्री यात्रा रास नही आती है और सुनामी के बाद तो मन मे एक डर सा बैठ गया था पर फिर भी हिम्मत करके हम तैयार हो गए। बस फिर क्या था तय हुआ की शोंपेन बोट से चलने का तय हुआ ।सो हम लोग और कुछ हम लोगों के मित्र और उनके परिवार वाले पहुंच गए रात नौ बजे फ़िनिक्क्ष् बे jetty पर barren island जाने के लिए। बोट पर ही खाने का इंतजाम था । हमारे सिवा हर कोई बोट पर खुश था और हम बिचारे नौसिया और वोमितिंग से परेशान। खाना खाना तो दूर हम तो बस cabin मे लेटे रहे । हालांकि हम लोगों के साथ एक डाक्टर साब भी थे पर sea- sickness जब शुरू हो जाती है तो कोई भी दवा काम नही आती है।वैसे हम ने भी एवोमिन खाई हुई थी पर जैसे ही बोट चली कि सब दवा बेअसर हो गयी। खैर हम पर तो दवा बेअसर थी पर बाक़ी सभी लोगों ने डॉक्टर साब कि दवा खाई थी और मस्त थे।
करीब शायद बारह बजे के आस-पास सभी लोग सो गए और अचानक ही शिप के कैप्टन की आवाज आयी की गुड मोर्निंग ! हमारा शिप barren island के पास पहुंच रहा है।आप अपने बायें ओर की खिड़की से बाहर की ओर देखिए तो आप लोगों को ज्वालामुखी दिखाई देगा।हर होई हडबडा कर उठ गया और खिड़की के बाहर देखने लगा।बाहर देखा तो अदभुत सा नजर था , बाहर बिल्कुल अँधेरा था और लाल-लाल लावा जलता हुआ दिख रहा था। अभी खिड़की से हम लोग देख ही रहे थे कि कैप्टन की फिर से आवाज आई कि पूरी तरह से ज्वालामुखी देखने के लिए आप सभी लोगऊपर डेक पर पहुँचिये।
कैप्टन की आवाज सुनते ही हर कोई फ़टाफ़ट उठ गया और घडी देखी तो सुबह के तीन बज रहे थे। और सब अपने-अपने कैमरा संभाले ऊपर डेक पर पहुंच गए आख़िर फोटो जो खींचनी थी। पर डेक पर खड़ा होना आसान नही था क्यूंकि डेक पर हवा बहुत थी और लहरें भी बहुत तेज थी। और साथ ही हम लोगों की बोट छोटी होने के वजह से ख़ूब जोर-जोर से हिल रही थी।बडे शिप को द्वीप के और नजदीक ले जाया जाता था पर चूँकि हम लोगों की बोट छोटी थी इसलिए बोट को थोडा पहले ही रोक लिया गया था । इतनी हिलती हुई बोट मे हम लोगों को ये समझ नही आ रहा था कि ज्वालामुखी देखें कि फोटो खींचे कि अपने आप को संभाले। खैर हम महिलाएं तो बोट के बीच मे बने हुए सपोर्ट के साथ खड़ी हो गयी और बेटे ने कुछ फोटो खींचे। पर फोटो बहुत साफ नही आये क्यूंकि बोट बहुत ज्यादा हिल रही थी और संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो रहा था।
और वो दो घंटे तीन से पांच बजे का समय कैसे गुजर गया पता ही नही चला पर जैसे ही बोट ने पोर्ट ब्ल्येर के लिए वापसी का रुख किया कि बोट पर मौजूद हर किसी की तबियत खराब होना शुरू हो गयी क्यूंकि एक तो हल्पा और दुसरे बिल्कुल सुबह उठने से सब का बुरा हाल था । पर सबसे मजेदार की लौटने मे हमे कोई तकलीफ नही हुई क्यूंकि हम तो रात मे ही अपना कोटा जो पूरा कर चुके थे। :)
Posted by mamta at 11:00 AM 11 comments Links to this post
Labels: अंडमान-निकोबार

