छब्बीस दिसम्बर २००४ यानि सुनामी

हर साल छब्बीस दिसम्बर आने पर सुनामी याद आ ही जाती है । और छब्बीस दिसम्बर की वो सुबह जब समुद्र की लहरों ने सब कुछ बदल दिया था । आज चौदह साल बाद भी सुनामी की बात करते हुये मेरे रोंगटे से खड़े हो जाते है क्योंकि उस दिन जो इतना तीव्र भूकम्प आया था और जब उसके बाद समुंदर ने अपना रौद्र रूप दिखाया था उसे भला कैसे भूल सकते है । आज भी जब उस दिन की बात करते है तो जैसे वो पूरा मंज़र आँखों के सामने घूम जाता है ।

रविवार की सुबह छ: बजे हम लोग सो रहे थे जब बहुत तेज़ भूकम्प आया तो पहले तो समझने में समय लगा कि फिर देखा कि अलमारी, दरवाज़े सब धड़ धड़ करके हिल रहे है तो झट से उठे और बेटे को आवाज़ लगाई कि जल्दी उठो भागो भूकम्प आया है ।

अंडमान के पोर्ट ब्लेयर में हम लोग दुमंज़िला ( डुप्लेक्स ) घर में रहते थे और चूँकि ऊपर की मंज़िल पर हम लोगों के कमरे थे तो सीढ़ी से नीचे भागते हुये सँभलना पड़ रहा था क्योंकि सीढ़ी इतनी ज़ोर ज़ोर से हिल रही थी कि जैसे राजधानी ट्रेन चल रही हो । और जैसे ही हम सीढ़ी से उतरे तो गिर पड़े क्योंकि ज़मीन तो और ज़ोर से हिल रही थी और हम सँभल ही नहीं पाये थे ।

घर से बाहर खड़े होकर हम लोग घर को हिलता हुआ और नारियल के पेड़ से नारियल गिरते हुये देखते रहे । और सोच रहे थे कि अगर धरती कहीं फट गई तो क्या होगा । ऐसा भूकम्प तो हमने सिर्फ़ फ़िल्मों में ही देखा था ।

खैर थोड़ी देर बाद सब कुछ शांत सा हुआ तो हम लोगों ने एक सूटकेस में कुछ कपड़े वग़ैरा रक़्खे और सूटकेस कार में रख दिया और कार में चाभी भी लगा दी थी ,क्योंकि गुजरात भूकम्प की याद थी और ये मन में था कि अगर घर गिर जाता है तो कम से कम कपड़े पास हों तो कार में भी रह सकते है । और हमने अपनी मम्मी को फोनकर के कहा कि यहाँ बहुत तेज़ भूकम्प आया है अगर दो चार दिन फोन ना मिले तो परेशान मत होना ।

पर ये कहाँ पता था कि वहाँ सुनामी आने वाली है । हम लोग समुद्र से मुश्किल से सौ मीटर की दूरी पर रहते थे क्योंकि जब हम अंडमान गये थे तो हमारा मानना था कि अगर अंडमान में समुद्र के पास नहीं रहे तो फिर कहाँ रहेंगे। और घर के पास जो जैटी थी वो भूकम्प में आधी धँस गई थी और हम लोग ऊपरी मंज़िल पर कैमरा लेकर जैटी के धँसने पर जो पानी उछलता ( स्पलैश ) उसकी फ़ोटो खींचने की तैयारी में खड़े थे और सामने जो पानी दिखता था वहाँ पानी की जगह बस जमींन दिख रही थी ।

हम लोग बात कर ही रहे थे कि पानी कहाँ गया तभी पतिदेव बोले कि पानी आ रहा है । और जब तक हम लोग कुछ समझते पानी सड़क पर आ गया था । बस फिर तो हम तीनों तेज़ी से सीढ़ी से उतरे और कार में बैठे और बस पतिदेव ने कार चलाना शुरू की पर तब तक पानी कार के पायदान तक आ गया था पर उस दिन कार ने ( क्वालिस ) बड़ा साथ दिया क्योंकि जब तक हम लोग मेन रोड पर पहुँचे तब तक पानी कार के बोनट तक पहुँचने लगा था और अगर गाड़ी बंद हो जाती तो पता नहीं क्या होता । पतिदेव की ड्राइविंग का भी कमाल था क्योंकि उन्होंने गाड़ी एक ही स्पीड पर चलाई क्योंकि अगर गाड़ी में स्पीड कम या ज़्यादा करते है तो कार रूक सकती थी ।

जब गाड़ी से घर से भाग रहे थे तो सामने हर तरफ़ पानी नज़र आ रहा था और जिस चढ़ाई वाले रास्ते से हम लोग जा रहे थे वो बिलकुल फ़िल्मी सीन लग रहा था हर कोई बस चढ़ाई पर चल रहा था और जो जिस हाल में था बस उसी में जान बचाने के लिये भाग रहा था ।और उसी भीड़ भरे रास्ते में हम लोगों की कार भी धीरे धीरे ऊपर चल रही थी । कार में ही हमने बेटे से कैमरा माँगा तो वो बोला कि कैमरा तो घर पर सोफ़े पर ही रह गया ।

वैसे तब तक भी हम इसकी भयानकता नहीं समझे थे और हम उस क्षण को अपने कैमरे में क़ैद करना चाहते थे । हाँ ये ज़रूर समझ गये थे कि कुछ बहुत गड़बड़ हुआ है ।क्योंकि जब पीछे मुड़कर देखा था तो हर तरफ़ पानी नज़र आ रहा था । पर इतनी तबाही का तो अंदाज़ा ही नहीं था । जब गाड़ी ऊपर पहुँची तो लोग हम लोगों की गाड़ी को कुछ अजीब नज़रों से देख रहे थे वो तो बाद में देखा कि गाड़ी के बोनट और सामने लगी जाली में खूब सारा समुद्र का काला हरा कचरा लगा हुआ था ।

वहां से हम लोग पतिदेव के ऑफ़िस गये क्योंकि वो ऊँचाई पर था और वहाँ पहुँचते ही जो स्टाफ़ वहाँ था उसने हमसे पूछा मैडम घर को ताला मार दिया है ना । अब उस समय ताला लगाना किसे याद रहता तो हमने उससे कहा कि जाओ आप ताला लगा आओ तो पाँच ही मिनट में वापिस आकर बोला कि वहाँ सब कुछ पानी में डूब गया है और पुलिस किसी को घर तक जाने नहीं दे रही है ।

खैर ऊपर पहुंचकर हम लोगों ने राहत की साँस ली और ग्यारह बजे के आसपास जब पानी उतर गया और लोगों को घर तक जाने की इजाज़त मिली तो हम लोग घर गये और घर की हालत देखकर समझ आया कि सुनामी क्या होती है । सब कुछ उलटा पलटा ,किचन का सामान ,फ्रिज ,कपड़े ,सोफ़े,बर्तन ,डिब्बे ,ड्राइंग रूम मे सिर्फ़ काला काला कचरा , और ड्राइंग रूम की अलमारी पर दो चार मछलियाँ , पड़ोसी की किताबों से भरी अलमारी हमारे घर और पतिदेव का ऑफ़िस का बैग हमारे घर से तीन घर आगे । मतलब हर तरफ़ सामान बिखरा हुआ पर हमारे ड्राइंग रूम में रक्खे गनेश जी हमारे घर की सीढ़ियों पर बैठे मिले थे ।

सुनामी के बाद से तो हमने समुद्र से दूरी ही बना ली और जब तक अंडमान में रहे वहाँ की सबसे ऊँची जगह पर रहे थे ।


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