Tuesday, August 28, 2007

रक्षा -बन्धन -भाई-बहन का प्यार

आज रक्षा -बन्धन या राखी है ।आज के दिन का सभी भाई और बहनों को इंतज़ार रहता है क्यूंकि ये दिन खास जो है।राखी का त्यौहार मतलब भाई-बहन का प्यार। समय वो चाहे कोई भी जमाना रहा हो राखी का महत्त्व कभी भी कम नही हुआ और ना ही होगा।पहले तो जो बहने दूर होती थी उन्हें भाई को राखी भेजने का एक ही जरिया था और वो था पोस्ट के जरिये राखी भेजना।जिसमे कई बार देर से राखी पहुंचती थी पर अब समय के साथ इन चीजों मे सुधार और बदलाव आ गया है। पिछले कुछ सालों से कोरियर और अब इन्टरनेट के जरिये राखी भेजना आसान हो गया है और सबसे बड़ी बात अब राखी समय पर पहुंच जाती है।


आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी मे जहाँ लोगों के पास समय की कमी हो रही है पर इस राखी के दिन ऐसा बिल्कुल भी नही लगता है। हर छोटे-बडे शहर मे सुबह से शाम तक लोग रंग-बिरंगे कपड़ों मे सजे-धजे सड़कों पर नजर आते है। कहीँ कोई बहन भाई के यहां जा रही होती है तो कहीँ भाई अपनी बहन के घर जा रहे होते है राखी बंधवाने के लिए। दिल्ली मे तो कई बार ट्रैफिक जाम भी हो जाता है क्यूंकि हर किसी को पहुँचने की जल्दी होती है पर कोई भी रुकना नही चाहता है। आप ये तो नही सोच रहे की भला हमे कैसे पता तो भाई वो ऐसे की हमारे पतिदेव की बहन भी दिल्ली मे रहती है और हम जब दिल्ली मे रहते थे तो उनके घर राखी मे जाते थे तब ट्रैफिक जाम मे फंस जाते थे और दिल्ली के ट्रैफिक जाम का हाल तो हम सभी जानते है। वैसे अब तो मेट्रो रेल की वजह से लोगों को काफी आराम हो गया है। और आज के दिन तो मेट्रो रेल हर चार मिनट पर चलेगी जिससे लोगों को आने-जाने मे ज्यादा परेशानी ना हो।


राखी का त्यौहार और हमारा कोई किस्सा ना हो ऐसा कैसे हो सकता है। तो चलिए चूंकि आज राखी के दिन हम अपने भईया से दूर है तो कुछ पुराना किस्सा ही याद कर लेते है। वैसे पहले तो कई बार हम लोग घर मे भी राखी बनाते थे और हम बहनों मे एक होड़ सी होती थी कि किसकी राखी सबसे अच्छी बनेगी।तो ऐसी ही एक राखी की बात है। हम लोगों के यहां या यूं कहें कि शायद सभी के घरों मे जब तक बहने भाई को राखी नही बांधती है भाई और बहन दोनो ही कुछ नही खाते है।हम सभी बहने सुबह उठकर नहा-धोकर तैयार हो रहे थे भईया को राखी बाँधने के लिए पर भईया का कहीँ पता ही नही था। क्यूंकि भईया सुबह -सुबह कहीँ चले गए थे। हम चारों बहनों को पता नही था पर पापा-मम्मी को शायद पता था कि भईया कहॉ गए है। पर हम लोगों को बता नही रहे थे क्यूंकि भईया हम लोगों को सरप्राइज देना चाहते थे। और उन्होंने पापा मम्मी को मना किया था कुछ भी बताने से।

हमारे भईया हमेशा ही हम लोगों को राखी मे कुछ ना कुछ तोहफा दिया करते थे । आम तौर पर भईया पहले से ही गिफ्ट खरीद लेते थे और हम लोगों को कई बार गिफ्ट देने मे तंग भी करते थे अरे मतलब चिडाते थे। खैर हम सब तो राखी बाँधने को तैयार पर भैया जी गायब । १० बज गया भईया का कोई सीन नही ११ बज गया पर भईया गायब। अब हम सबको कुछ ग़ुस्सा और कुछ भूख लगने लगी थी । और हम लोग अपने-अपने दिमाग के घोड़े दौडा रहे थे कि आख़िर भईया कहॉ गए है ।पर भूख और ग़ुस्से की वजह से कुछ समझ नही पा रहे थे।

करीब साढे ग्यारह बजे भईया आये और उनके आते ही हम सबने तो जैसे हल्ला बोल दिया कि तुम इतनी देर तक कहां थे। हम लोग कब से इन्तजार कर रहे है वगैरा-वगैरा।उन्होने देर से आने का कोई बहाना बनाया और भईया बोले कि चलो अब तो राखी बाँधो।और भईया अपने पीछे कुछ छिपा कर बैठ गए । तो फिर हम सबने एक-एक कर के राखी बाँधी और भईया ने सबको शगुन के रूपये दिए।जब हम चारों ने राखी बाँध ली तो उन्होने हम सभी को बुलाया और मुकेश का डबल एल .पी.रेकॉर्ड जो मुकेश के लंदन के आख़िरी शो (कन्सर्ट ) का था वो हम चारों को एक combine गिफ्ट के तौर पर दिया । रेकॉर्ड देखते ही हम सभी ख़ुशी से उछाल पडे । और उनके इस सरप्राइज गिफ्ट से हम सबका ग़ुस्सा उड़न छू हो गया। और हम लोगों ने फ़टाफ़ट स्टीरियो पर रेकॉर्ड लगाया और नाश्ता करने बैठ गए



नाश्ता करते हुए हम लोगों ने भईया से पूछा की अगर तुम्हारे पास रेकॉर्ड था तो इतनी देर कहां थे. तो भईया बोले की वो चौक गए थे । और चूंकि दुकान १० बजे बाद खुलती है इसलिये देर हो गयी। और फिर उन्होंने रेकॉर्ड खरीदने की पूरी कहानी बताई की एक दिन पहले उन्होने सिविल लाइन मे रेकॉर्ड ढूँढा था पर उन्हें नही मिला था . चूंकि उस शो के बाद मुकेश की मृत्यु हो गयी थी। और चूंकि वो मुकेश का आख़िरी शो था इसीलिये उस रेकॉर्ड की बाजार मे ख़ूब बिक्री हो रही थी। और चौक मे जो रेकॉर्ड की बड़ी सी दुकान थी शायद कोई सरदार जी की दुकान थी , हमे उस दुकान का नाम नही याद आ रहा है,वहां ये रेकॉर्ड मिल रहा था इसीलिये भईया राखी के दिन सुबह-सुबह चौक गए थे उस दुकान से हम बहनों के लिए रेकॉर्ड खरीदने। उनके इतना कहते ही हम सभी के मुंह से निकला की भईया तुम भी कमाल हो।

तो ये तो था हमारा किस्सा। आज राखी के दिन आप सभी भाईयों और बहनो को रक्षा-बन्धन की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

Sunday, August 26, 2007

ससुराल

ये ससुराल शब्द बहुत सारे संबंध अपने अन्दर समाये हुए है ठीक उसी तरह जैसे मायका शब्द अपने अन्दर संबंधों को सहेज कर रखता है।मायके मे माँ,पिता,भाई, भाभी और बहन होते है तो ससुराल मे सास,ससुर,ननद,देवर,जेठ,जेठानी होते है। और शायद इन्हीं सबसे एक भरा-पूरा घर बनता है।वो चाहे मायका हो या चाहे ससुराल हो।

ससुराल नाम से ही लोगों को एक अजीब सी भावना महसूस होती है और इस भावना को और कुछ नही इसे बस मन मे चल रहे मिले-जुले भाव या शायद डर ही कहना चाहिऐ। हर लडकी जिसकी शादी होती है वो इन भावनाओं से जरुर गुजरती है कि पता नही उसके ससुराल वाले कैसे होंगे। वो वहां एडजस्ट कर पाएगी या नही। सास और ननद से उसकी निभेगी या नही और ऐसे ही तमाम सवाल मन मे उठते रहते है। और ऐसे मे शादी के समय जो रिश्तेदार आते है वो कई बार लडकी को बहुत सारी हिदायतें देते है कि बिटिया ठीक से रहनाबडों का आदर करनाकभी पलट कर जवाब मत देना वगैरा-वगैरापर कई बार तो कुछ लोग ससुराल के नाम पर बहुत डराते भी है कि देखों फलानी की लडकी के साथ ऐसा हो गया तो ढमाकी की लडकी के साथ ससुराल वालों ने बड़ा अत्याचार किया वगैरा-वगैरा । आज भी और पहले भी ससुराल मे होने वाले अत्याचारों के भी सैकडो उदाहरण मिल जायेंगे। पर साथ ही अच्छे उदाहरण भी मिलते है।

तो चलिए आज हम आपको अपनी ससुराल का एक किस्सा सुनाते है। ये किस्सा शादी के समय का ही है। वो क्या है ना हमने पहले भी अपनी एक पोस्ट मे लिखा था कि पहले हमे खाना बनाना नही आता था । पर जब शादी तै हुई तो हमने कुछ खास-खास व्यंजन मम्मी से बनाने सीखे ,अब खास इसलिये क्यूंकि इतने बडे होने पर सादा दाल-चावल कैसे बनाते है, ये हमे आ गया था।पर तब भी हर चीज बनाने मे expert नही थे।पर यहां हम ये बता दे कि अब हम काफी expert हो गए है।पापा को हमेशा रहता था की लडकियां किचन मे काम ना करें क्यूंकि बाद मे अपने घर मे तो हर लडकी को काम करना ही पड़ता है। जबकि मम्मी हम लोगों को यदा कदा खाना बनाना सीखने को कहती रहती थी।खैर हमे तो छोटे होने का भी फायदा था। पर शादी के समय मम्मी को लग रहा था की बिटिया को खाना -वाना तो ज्यादा बनाना आता नही है पता नही ससुराल मे कैसे करेगी। यहां हम ये भी बताना चाहते है कि हमारी ससुराल मे भी नौकर-चाकर थे तो इसलिये मम्मी कि चिन्ता निरर्थक थी। पर फिर भी माँ तो माँ ही होती है।

खैर शादी के बाद जब बिदाई हो रही थी तो हमारी मम्मी और मौसी ने सोचा कि हमारी सास को इस बारे मे बता देना चाहिऐ। तो मम्मी और मौसी ने हमारी सास से कहा कि उन्हें कुछ बात करनी है। तो अम्माजी (सास)ने सोचा कि पता नही क्या बात हो गयी है।

तो हमारी मौसी ने बात शुरू की कि वो ममता को खाना बनाना ठीक से नही आता है।

तो अम्माजी ने कहा कोई बात नही।

तब मम्मी ने कहा की वो दरअसल ममता चूंकि घर मे सबसे छोटी है और घर मे हमेशा नौकर-चाकर रहे है तो इसलिये ममता ने कभी काम नही किया है।

तो अम्माजी ने मुस्कराते हुए कहा (ये मम्मी ने बताया था) की आप चिन्ता ना करे उसे लखनऊ या दिल्ली मे भी काम नही करना पड़ेगा।

अम्माजी के इतना कहने पर हमारी मम्मी और मौसी आश्वस्त हो गयी । और हम बिदाई के बाद ससुराल पहुंच गए। सारी रस्मों के बाद बहु के खाना बनाने की रस्म आयी तो अम्माजी ने कहा कि बहुरानी (वो हमे इसी तरह बुलाती थी)तुम्हे गुलगुले बनाने है। अब थोडा संकोच और ज्यादा डर कि अगर हमने गुलगुले बनाए और गड़बड़ हो गए तो क्या होगा। पर अब बनाना तो था ही सो जैसे ही हम रसोई मे गए तो हम बिल्कुल चौंक गए क्यूंकि अम्माजी ने सारे गुलगुले बना रखे थे और हमसे बस एक गुलगुला बनवाया और फिर हमे सबको परोसने के लिए कहा। और ये देख कर हमारा मन अपनी अम्माजी के लिए आदर ,श्रद्धा ,और प्यार से भर गया। तो ऐसा था हमारा ससुराल की रसोई मे पहला दिन

अरे अभी किस्सा खत्म नही हुआ है । कुछ दिन ससुराल मे रहने के बाद जब हम दिल्ली के लिए चलने लगे क्यूंकि हमारे पतिदेव दिल्ली मे थे तो हमारे आश्चर्य की सीमा नही रही जब अम्माजी ने एक नौकर भी हमारे साथ भेजा क्यूंकि अम्माजी को हमारी मम्मी और मौसी की कही बात याद थी की ममता ने कभी किचन मे काम नही किया है। तो भला एकदम से दिल्ली मे जाते-जाते ही कैसे खाना बनाएगी।हमने बहुत कहा की हम थोडा बहुत खाना बना लेते है और बाक़ी सीख जायेंगे । पर उन्होंने हमारी नही सुनी और उस नौकर को हमारे साथ दिल्ली भेज दिया ये कह कर की घर का नौकर है तुम लोगों को कोई परेशानी नही होगी। हालांकि हमारे पतिदेव ने एक नेपाली नौकर रखा हुआ था (उन दिनों दिल्ली मे काम करने के लिए नेपाली बहुत मिलते थे) पर अम्माजी का ये कहना था कि दिन भर घर मे बहुरानी अकेले रहेगी तो अनजान नौकर घर मे रहना ठीक नही है। इसलिये उन्होंने घर के ही एक नौकर को हमारे साथ भेज दिया था जिसपर हम लोग विश्वास भी कर सकें क्यूंकि दिल्ली मे तब भी काम करने वालों का भरोसा नही किया जा सकता था। ऐसी थी हमारी अम्माजी (सास)।

धीरे-धीरे हमने खाना बनाना सीखा । कैसे वो फिर कभी !


Saturday, August 25, 2007

गर्दिश मे सितारे

आज तो मुकेश का गाया हुआ गाना याद गया
गर्दिश मे हों तारे ,ना घबराना प्यारे

आजकल फिल्म इंडस्ट्री की हालत कुछ ऐसी ही हो रही है जिसके तारे और सितारे दोनो ही गर्दिश मे है।इंडस्ट्री के तारे इसलिये गर्दिश मे है क्यूंकि ज्यादातर फ़िल्में फ्लॉप हो जाती है और सितारे गर्दिश मे है ये तो हम सभी जानते है मतलब जहाँ कभी संजय दत्त जेल के अन्दर जाते है तो कभी सलमान खान । खैर संजय दत्त तो फिलहाल जेल से बाहर आ गए है पर सलमान खान कितने दिन जेल मे रहेंगे ,ये कहना मुश्किल है। संजय दत्त तो तेईस दिन मे जेल से बाहर आ गए पर सलमान खान का तो फिलहाल कोई सीन नजर नही आ रहा है।बाक़ी तो ऊपर वाला जाने।


सितारों के जेल जाने मे निर्माता का तो जो नुकसान होता है वो अब २-४ करोड़ नही बल्कि १००-२०० करोड़ का होता है। अब वो क्या है ना की आजकल लाखों मे तो कोई फिल्म बनती ही नही है।वो भी इतने बडे सितारों के साथ तो छोटी-मोती फिल्म बनना नामुमकिन है। मामूली से मामूली पिटे हुए निर्माता अतुल अग्निहोत्री जैसे जब २० करोड़ की फिल्म बना सकते है तो बडे निर्माताओं का क्या कहना। अब अगर संजय दत्त पर फिल्म वालों का ५०-६० करोड़ या कुछ कम ज्यादा रुपया लगा था तो सलमान पर १०० -२०० करोड़ लगा है। ऐसा कहा जा रहा है। अब देखना है कि कितने निर्माताओं की नैया पार होती है और कितने डूबते है।

अब संजय दत्त हों या सलमान खान जब गलती की है तो सजा तो मिलेगी ही। अब चाहे संजय ने गन रखी हो या सलमान ने चिंकारा का शिकार किया हो।भाई गलत तो गलत है। अब बाद मे भले ही समाज सेवा करें पर क्या उससे गलती गलती नही रहेगी।माना की परिवार की सुरक्षा के लिए ही संजय ने गन ली थी पर उसे नष्ट करना गलत था। और सलमान तो खैर अपने ही शिकार मे फंस गए है। अरे शिकार पर एक और की याद आ गयी । जी हाँ बिल्कुल ठीक समझे है आप ,जी हाँ बडे नवाब पटौदी ,उन्होंने भी तो शिकार किया था। पर जब सजा सुनाई जाती है तो हर तरफ हाय-तौबा मच जाती है। टी.वी.और सारे अखबार इन्ही ख़बरों से पाट दिए जाते है।


सितारों के जेल के अन्दर और बाहर होने मे घरवाले और सितारे तो परेशान होते है पर हमारे ख़्याल से सबसे ज्यादा परेशान इनको चाहने वाले इनके प्रशंसक होते है। इन सितारों के प्रशंसको को कितनी मुसीबत झेलनी पड़ती है ये तो बेचारे प्रशंशक भी नही जान पाते है। कभी पुलिस की लाठी खानी पड़ती है तो कभी ये प्रशंशक कोर्ट मे या जेल के बाहर या इनके घरों के बाहर घंटो इंतज़ार करते है।वैसे पुलिस वालों को भी इन प्रशंसको को रोकने मे कम मशक्कत नही करनी पड़ती है। धूप हो बारिश हो किसी की भी परवाह ना करते हुए ये प्रशंसक अपनी जगह डटे रहते है।


डटे रहने मे तो मीडिया भी इन प्रशंसको से पीछे नही है। जब संजय दत्त जेल गए तो भी मीडिया के लोग अपनी-अपनी गाड़ियों मे संजय दत्त को ले जा रही पुलिस वन के साथ-साथ अपनी कार दौडाते रहे और बीच-बीच मे दूसरी गाड़ियों जिनमे संजय के दोस्त वगैरा थे उन्हें भी दिखाते थे।मीडिया वाले खुद तो कहते कि संजय के दोस्त कितनी तेज गाड़ी चला रहे है पर शायद संजय की एक झलक देखने और दिखाने के लिए वो लोग अपनी - अपनी गाड़ी उतनी ही तेज चला रहे थे। इसी तरह जब संजय जेल से वापिस आये तो भी मीडिया वाले सारे रास्ते उसकी गाड़ी का पीछा करते हुए दिखाए गए। और आज सलमान खान के पीछे भागते नजर आये।


अब जब कोर्ट ने सजा सुना दी तब भी लोग परेशान है की क्या न्याय की नजर मे सब एक है। पर अगर कोर्ट उन्हें छोड़ देती तो भी लोग चुप नही रहते क्यूंकि तब ये सवाल उठता की कानून की नजर मे सब बराबर नही है। सारी फिल्म इंडस्ट्री सजा सुनाये जाने पर यकीन क्यों नही कर पाती है । ये समझना जरा मुश्किल है। हर कोई ये ही कहता नजर आता है कि इतनी ज्यादा कड़ी सजा नही मिलनी चाहिऐ थी। पर आख़िर क्यूँ। अरे भाई तो इसका सीधा सा जवाब है कि सबको अपने किये की सजा यहीं मिलती है।


संजू बाबा और सल्लू मियां को अगर छोड़ दिया जाए तो शायद उनके लिए अच्छा ही होगा। पर ऐसा कहॉ हो सकता है ।






Friday, August 24, 2007

एक और डरावनी पोस्ट (सांप )

पोस्ट के इस नाम की प्रेरणा हमे ज्ञानदत्त जी से मिली है।(हमने आपकी टिपण्णी का बुरा नही माना है । इसलिये आप इसे अन्यथा मत लीजियेगा। ये तो महज एक बहाना है. वरना हम आप लोगों को अपने घर के साँपों से कैसे मिलवाते. ) और कल हमने दीपक की एक कविता पढी थी जिससे भी हमारी ये पोस्ट कुछ प्रेरित है।

अब जब नाम ही ऐसा है तो पोस्ट मे भी कुछ होना चाहिऐ। तो चलिए हम आपको अपने अंडमान के घर के कुछ साँपों से मिलवाते है। पर उससे पहले हम कुछ कहना भी चाहते है। जब हम लोग अंडमान गए तो जैसा की आप सबको अब पता ही है कि वहां बहुत जंगल है तो जंगल मे कुछ जीव-जंतु भी होंगे ही।शुरू-शुरू मे जब हम लोग अंडमान गए तो साँपों के बहुत किस्से सुने और हम लोगों को वहां रहने वालों ने ने हिदायत दी कि कभी भी अलमारी मे से कपडे वगैरा बिना झाडे मत पहनना और दरवाजा हमेशा ठीक से बंद किया करना क्यूंकि अंडमान मे सांप बहुत है। क्या हुआ डर गए. अरे डरिये मत. ये मटमैले रंग का सांप कुछ नही करने वाला है ये बहुत सीधा है. कैसे गुडाई की हुई जमीन मे मजे से घूम रहे है.



लोगों ने तो ये तक बताया की कई बार सांप दरवाजे पर दस्तक (नॉक )भी करते है। क्यों आश्चर्य हुआ ,अरे बिल्कुल भी चौंकिए मत क्यूंकि ये मजाक नही हक़ीकत है। वो क्या है ना कि कई बार सांप जब दरवाजे पर आते थे और अगर दरवाजा बंद होता था तो वो जोर से अपना फ़न दरवाजे पर मारते थे और उसी आवाज को वहां के लोग सांप के द्वारा नॉक करना कहते थे। वैसे हमारे घर मे सांप तो जरुर निकले पर गनीमत कि किसी ने नॉक नही किया वरना तो पता नही हमारा क्या होता। :)

सांप के ऐसे किस्से सुनकर जबहम लोगों ने अंडमान के लोकल लोग जैसे कि अपने ड्राइवर से पूछा कि क्या यहां सांप बहुत होते है।
तो सब कहते कि हाँ सांप तो बहुत है पर यहां के सांप बडे सीधे है। किसी को काटते नही है। अपने रास्ते चले जाते है इसका उदाहरण ये देखिये की ये जनाब कैसे विचरते हुए जा रहे है

अब ऐसी बात सुनकर यकीन तो नही होता था पर यकीन करना पड़ता था।

अब जैसे ये भूरा सांप हम लोगों के घर के आस-पास ही रहता था। और जब भी ये बाहर निकलता था तो मैना ख़ूब जोर-जोर से चिल्लाने लगती थी ।और जैसे ही मैना चिल्लाती थी हम लोग अपना कमरा लेकर दौड़ते थे कि सांप आया।और ये महाशय मैना के चिल्लाने कि वजह से ही पेड़ मे जाकर चुप गए है और फोटो के लिए पोज दे रहे है। अब फोटो खीचने से ये मत समझिए कि हम बहुत बहादुर है और सांप से बिल्कुल नही डरते है। पर हम है ठीक इसके उलट। ये सारी फोटो तो हमारे बेटे ने खीची है।वैसे इनका एक विडियो भी है पर हम अभी लगा नही रहे है क्यूंकि सबको ज्यादा डराना ठीक नही है।

और ये काला सांप हमारे कार गैराज मे निकला था ।जिसकी यहां पर आप फोटो देख रहे है। और सांप को क्यों मारते है तो डर इसकी सबसे बड़ी वजह है।और इसे बाद मे मार दिया गया था. क्यूंकि इसकी तो कोई गारंटी नही थी की वो हम लोगों को काटेगा नही.

वैसे अंडमान मे हमारी दो दोस्त सांप से बिल्कुल भी नही डरती थी. एक तो अगर सांप निकल आए तो उसके पीछे-पीछे जाती थी ये देखने के लिए की आख़िर वो जा कहाँ रहा है. और हमारी दूसरी दोस्त का कहना था कि ये कितना सुंदर है. इसे इतना बड़ा होने मे कितने साल लगे है. और भगवान ने इसे बनाया है तो इसे मारना क्यूँ. बाप रे हम तो उनके ये ख्यालात सुनकर ही घबरा जाते थे.

और हम उनके इन विचारो से बिल्कुल भी सहमत नही थे और न है क्यूंकि सांप इस नाम मे ही डर है .और एक बात हम लोगों के यहाँ कहा जाता है की इन्सान का जन्म ८४ करोड़ योनियों मे जन्म लेने के बाद मिलता है. तो मारने का ये एक सकारात्मक पहलू ये भी हो सकता है. इसे ग़लत न समझें.

अंडमान क्या गोवा मे भी बहुत सांप है. अंदमान और गोवा मे फर्क बस इतना है कि अंडमान मे सिर्फ़ सांप थे पर गोवा के घर मे सांप,नेवला और बिच्छू भी है. और बरसात मे तो आप इन्हे टहल कदमी करते हुए देख सकते है. और छोटे नही भारी-भरकम कि देख कर ही डर लग जाए. चलिए अब और नही डराते है अपनी पोस्ट यही ख़त्म करते है. अंडमान के बाकी के जीव-जंतुओं की बात फ़िर कभी करेंगे।

Thursday, August 23, 2007

अब कैसे बचे नोकिया से क्यूंकि अब तो .....

अभी तक तो यही खबर थी की नोकिया की बी.एल.-५सि.की जापानी बैटरी के फटने का खतरा है पर ये क्या अब तो बी.एल-४ बैटरी भी ओवर चार्जिंग से फट रही है और वो बैटरी जो हंगरी की बनी हुई है।

उत्तर-प्रदेश के आजमगढ़ जिले मे ये हादसा हुआ है। जब इसे चार्ज किया जा रहा था तभी ये बैटरी फट गयी और ये भी कहा जा रहा है की इसमे दो लोग घायल भी हो गए है।

अभी तक तो जनता बी.एल.-५सि से ही नही निपट आयी उसपर से ये एक और मुसीबत।

ये अचानक नोकिया मे क्या हो रहा है। अब तो लोगों को फ़ोन रिचार्ज करते हुए भी डर लगेगा की क्या पता कब
बैटरी मे विस्फोट हो जाये।

अब ये देखना है कि नोकिया किस तरह की चेतावनी निकालेगी ।

चलते-चलते आल द बेस्ट !!

Wednesday, August 22, 2007

कसाई है हम कसाई

इस शीर्षक से ये बिल्कुल भी मत समझिए कि हम कोई बकरा या मुर्गा काटने जा रहे है। ये तो हमारे गिटार सिखाने वाले मास्साब के शब्द है जो अब इस दुनिया मे नही है।दुलाल मजुमदार नाम था उनका ।मास्साब बंगाली थे। पर उनके इन्ही शब्दों ने हमे गिटार सीखने की प्रेरणा दी थी। यूं तो वो ज्यादा ग़ुस्सा नही करते थे पर अगर उनके कई बार समझाने पर भी कोई गलत बजाता था तो उन्हें बहुत ग़ुस्सा आ जाता था और तब वो जो डांटना शुरू करते थे तो वो बिल्कुल भी कुछ नही सोचते थे की सामने बैठा हुआ शिष्य रो रहा है या दुःखी हो रहा है।कई बार तो उनके डांटने पर आंटी (मास्साब की पत्नी)भी वहां आ जाती थी और कहती थी कि इतना मत डांटा करो। बच्चे है सीख जायेंगे। और इसी तरह जब कोई अच्छा बजाता था तो वो बड़ी जोर से बाह (वाह)कहते थे और पूरी क्लास मे क्या हर ग्रुप मे उसकी तारीफ भी ख़ूब करते थे। वैसे वो छोटे -छोटे ग्रुप मे क्लास लेते थे पर तब भी उनकी तारीफ और डांट की खबर हर क्लास मे पहुंच जाती थी।

ये बात तब की है जब हम नवीं क्लास मे पढते थे और हमने गिटार सीखने का मन बना लिया था।इन्ही मास्साब से हमारे भईया ने गिटार सीखा था और बाद मे हमारी बहन सीख रही थी। तो हमे भी लगा कि गिटार बजाना तो बहुत आसान है तो क्यों ना हम भी सीख लें ।अक्सर जब दीदी की क्लास ख़त्म होने वाली होती थी तो हम उन्हें लेने के लिए क्लास मे जाया करते थे । तो कई बार मास्साब हमसे पूछते भी थे की तुम नही सीखेगा।तो हम बस गरदन हिला कर मना कर देते थे। क्यूंकि हमे उनकी डांट से डर लगता था और आंसू बहाने मे तो हम तेज ही है।पर बाद मे दीदी को गाने बजाते सुनते -सुनते हमारा भी मन करने लगा सीखने का। तो बस जैसे ही गरमी की छुट्टियाँ आयी हमने ममी से कहा कि हमे भी गिटार सीखना है तो भला ममी को क्या ऐतराज हो सकता था उन्होंने अनुमति दे दी क्यूंकि हफ्ते मे तीन दिन ही क्लास होती थी। और हमने भी मास्साब की क्लास मे जाना शुरू कर दिया।

जब पहले दिन हम क्लास मे गए तो मास्साब ने हम सभी नए बच्चों को अपना -अपना परिचय देने को कहा । सभी ने डरते हुए अपना -अपना परिचय दिया। डरते हुए इसलिये क्यूंकि हम सभी के भैया या बहन मास्साब से या तो गिटार सीख चुके थे या सीख रहे थे और हम सब उनके ग़ुस्से से वाकिफ भी थे। खैर धीरे-धीरे वहां सीखते हुए हम लोगों को लगा की मास्साब तो बहुत अच्छे है और हम बच्चों को तो बिल्कुल भी नही डांटते थे। हमेशा और अच्छा बजाओ कह कर हम लोगों का हौसला बढ़ाते थे।

सब कुछ बढ़िया चल रहा था क्लास मे और हम भी खुश थे और मास्साब भी खुश थे क्यूंकि हमने बड़ी जल्दी सीख लिया था। क्लास से घर आकर भी हम प्रैक्टिस करते थे जिससे क्लास मे जो कुछ भी सिखाया गया होता वो अगली क्लास मे अच्छे से बजा सकें। पर एक दिन गड़बड़ हो ही गयी।उस समय हम याराना का गाना छूकर मेरे मन को सीख रहे थे । घर से ख़ूब प्रैक्टिस करके गए थे पर पता नही क्लास मे क्या हुआ कि जैसे ही बजाना शुरू किया तो मुखडा तो ठीक बजाया पर अंतरे मे अटक गए और जो अंतरे मे गलत बजाया तो पहले तो मास्साब ने कहा कोई बात नही फिर से बजाओ।और कहा कि रिदम पर ध्यान दो। हमने फिर से शुरू किया पर बार-बार एक ही जगह पर आकर गड़बड़ हो जाती थी और गिटार के तार की आवाज जोर से सुनाई देती । हमे भी पता था की हम गलत बजा रहे है क्यूंकि जब गिटार बजाते है तो उसके तार की खीच-खीच की आवाज नही आनी चाहिऐ।पर हमारे बजाने मे ये आवाज बार-बार आ जाती थी। बस हम डर गए कि अब तो पडी डांट और हुआ भी वही।


पांच-सात मिनट तक तो मास्साब ने कुछ नही कहा पर फिर वो बड़ी जोर से चिल्लाये तुम्हे पता नही है हम कसाई है कसाई।
उनका इतना कहना था कि हम जो सही बजा रहे थे वो भी गलत बजाने लगे।
तो उन्हें और ग़ुस्सा आ गया और ग़ुस्से मे वो बोले आज जब तक तुम सही नही बजाओगी हम तुम्हे घर नही जाने देंगे।
बस इतना सुनकर तो हमारे आंसू झरने लगे । और गिटार बजाते-बजाते हमने मन ही मन सोचा कि बस अब आज के बाद गिटार सीखना तो दूर हम गिटार को भी हाथ नही लगाएंगे। और उसी ग़ुस्से मे मास्साब ने अपने गिटार पर अंतरा बजाकर दिखाया और कहा कि ऐसे बजाओ। फिर बोले कि नही हमारे साथ-साथ बजाओ। और हमने रोते-रोते जब सही अंतरा बजाया तो उन्होने जोर से बाह (वाह)कहा जिसका मतलब कि वो खुश है।


अगले दिन हर क्लास मे यही चर्चा कि ममता को मास्साब ने बहुत डांटा। पर उसी दिन हमने भी निश्च्च्य किया कि अब हम ख़ूब प्रैक्टिस करेंगे और मास्साब को कभी भी ये मौका नही देंगे कि वो हमे फिर से इस तरह डांट सके। बस फिर क्या था कुछ दिन बाद हम मास्साब के चहेते शिष्यों मे से हो गए।और हमने एक साल गाने सीखने के बाद शास्त्रीय संगीत का छे साल का कोर्स किया। शादी के बाद भी हम जब भी इलाहाबाद जाते थे तो मास्साब और आंटी से मिलने जरुर जाते थे । आज मास्साब इस दुनिया मे नही है और आंटी भी अब इलाहाबाद मे नही रहती है। मास्साब का बड़ा बेटा गौरव जो उस समय वायलिन बजाता था अब सितार बजाता है और देश-विदेश मे अपने प्रोग्राम करता है।

आज यूं ही मास्साब की डांट याद आ गयी और हमे ये सोचकर ख़ुशी हो रही है कि अच्छा हुआ हो जो उस समय डांट के डर से हमने गिटार बजाना नही छोड़ा क्यूंकि अगर उस समय डांट के डर से हमने गिटार बजाना छोड़ दिया होता तो हम एक बहुत ही मधुर वाद्य को बजाने की कला को सीखने से वंचित रह जाते।

Tuesday, August 21, 2007

अब हिंदी मे लिखना कितना सुविधाजनक

आज का दिन तो बहुत ही अच्छा है. आज से हिन्दी मे काम करना अरे लिखना इतना आसान जो हो गया है. अब कहीँ आप ये तो नही सोच रहे होंगे कि जब अभी तक हिन्दी लिख ही रही थी तो अब ये कहने का क्या मतलब है कि अब हिंदी मे लिखना आसान हो गया है। तो वो इसलिये की हम आज वाली पोस्ट सीधे गूगल के indictransliteration के जरिये लिख रहे है. वैसे इससे पहले भी ट्रांसलिटरेशन के जरिये हम ब्लॉगर पर लिखते थे. पर कई बार गड़बड़ भी हो जाती थी.इसीलिये कई बार जब हम आप लोगों के ब्लॉग पढते है तो हम टिप्पणी इंग्लिश मे या तो कर देते है या कई बार नही भी करते है. क्यूंकि हमे इंग्लिश मे टिपण्णी करने मे बिल्कुल भी अच्छा नही लगता है. अब वो क्या है न की इतने दिन मे तो आप लोग जान ही गए है की हम बहुत ज्यादा तकनीकी किस्म के इंसान नही है . बस इतना जानते है कि ब्लॉगिंग कर लेते है जो हमारे लिए बहुत है.

अभी दो दिन पहले ही श्रीश जी ने और जगदीश जी ने इस बारे मे अपने चिट्ठों पर लिखा था पर तब हम सोचते थे की अभी तो कुछ दिन और इंतजार करना पड़ेगा . पर आज सुबह-सुबह अखबार मे ख़बर पढ़कर हम बहुत खुश हुए और सोचा की चलो देखा जाए कि अब हिन्दी मे लिखना कितना आसान हुआ है. तो भाई हमारी खुशी का तो ठिकाना ही नही रहा ये सोचकर कि कंप्यूटर पर अब हिन्दी का भी बोलबाला हो रहा है.

यहाँ हम एक बात जरुर कहेंगे कि काश ये हिन्दी मे लिखने वाला सोफ्टवेयर कुछ साल पहले आया होता तो हमारी मम्मी जिन्हे कंप्यूटर सीखने और चलाने का बहुत शौक था वो भी इसका कुछ इस्तेमाल कर पाती। वैसे उन्हें कंप्यूटर आता था और वो इ.मैल वगैरा भी करती थी. पर फ़िर भी अपनी भाषा मे लिखने का मजा ही कुछ और होता है.


गूगल कि इस साईट http://www.google.com/transliterate/indic पर सीधे जाकर हिन्दी मे काम कर सकते है.
आपको कितना मजा आया ये तो हम नही जानते पर हमे तो बहुत अच्छा लगा. और हमारे ख़्याल से इससे हिन्दी को बढ़ावा भी मिलेगा . और हाँ इसमे आप http://local.google.co.in मे जाकर होटल,रेस्टोरेंट ,और शॉप (दुकानों)के बारे मे और www.google.co.in/local मे जाकर व्यापार यानी कि बिजनेस के बारे मे जानकारी ले सकते है।

तो कहिये कैसी रही ,अरे अच्छी रही और क्या।:)

Monday, August 20, 2007

क्या रेडियो बदला है.

रेडियो से तो हम सभी का बड़ा ही पुराना नाता है । ये रेडियो ही है जो उन गांवों और पहाड़ों मे पहुँचता है जहाँ हमारे टी.वी.के कार्यक्रम नही पहुंच पाते है। और ये रेडियो ही है जो हमारे फौजी भाईयों के मनोरंजन का एकमात्र साधन होता है। कई बार तो हम ये सोचते है कि अगर पिछले दशकों मे रेडियो नही होता तो भला लोग कैसे दुनिया भर मे होने वाली घटनाओं के बारे मे जान पाते। रेडियो से तो हम सभी की ढेरों यादें जुडी होंगी।७० के दशक की लडाई के दौरान रेडियो ही तो हर तरह की सूचना देता था कि कितने बजे ब्लैक-आउट होगा और उस ब्लैक-आउट मे सभी को इसी रेडियो का सहारा रहता था।एक रेडियो ही होता था जिससे हम ना केवल समाचार और गाने सुनते थे बल्कि क्रिकेट जैसे खेल को लोकप्रिय बनाने मे भी रेडियो का बहुत बड़ा योगदान रहा है ऐसा कहा जा सकता है


क्या हम कभी भूल सकेंगे सुशील दोषी और जसदेव सिंह की कमेंट्री। सुशील जिस तरह बाल के साथ भागते हुए कमेंट्री करते थे कि सुनने वाला भी ये महसूस करता था मानो वो भी क्रिकेट के मैदान मे मौजूद हो। और कोई कैच छोड़ने पर भी ऐसे बोलते थे मानो उन्ही के हाथ से कैच छूट गया हो। क्रिकेट के दिनों मे हर व्यक्ति के कानो के पास छोटा ट्रांजिस्टर सटा हुआ देखा जा सकता था।वैसे ये कान से ट्रांजिस्टर लगा कर कमेंट्री सुनने का मंजर तो आज भी देखा जा सकता है । पर अब हमारा रेडियो पर कमेंट्री सुनना तो छूट ही गया है।


अब तो पता नही कि रेडियो सिलोन पर बिनाका गीत माला आती है या नही पर कुछ सालों पहले सुनी थी पर वो मजा नही आया जो ६० और ७० के दशक मे आता था। अमीन सायानी के बिनाका गीत माला पेश करने का स्टाइल की बड़ा निराला था। बुधवार की रात ८ बजे बिनाका गीत माला छूट जाये तो बड़ा अखरता था । उस समय रेडियो सिलोन का भी बड़ा क्रेज था। हमारी सेकंड नम्बर वाली दीदी तो रेडियो चलाये बिना पढ़ाई ही नही करती थी क्यूंकि वो कहती थी कि बिना रेडियो के उनका पढाई का मूड ही नही बन पाता है।कई बार हम लोग उन्हें छेड़ते भी थे कि कहीँ इम्तहान मे तुम गाना लिख कर ना आ जाना।


वैसे विविध भारती तो आज भी कुछ पहले जैसा है पर अब इसमे भी थोडा-बहुत बदलाव आ गया है। हालांकि कार्यक्रम तो पहले वाले नाम के ही है जैसे पिटारा ,एक ही फिल्म से,हवा महल,चित्रलोक वगैरा।वैसे अब हम बहुत ज्यादा तो नही पर फिर भी रेडियो सुन लेते है। पर अब विविध भारती भी कुछ बदल सा गया है ।विज्ञापन तो पहले भी आते थे पर पहले तो दो गानों के बीच मे ही विज्ञापन आते थे वही टु न्न्न्न की आवाज वाले विज्ञापन। पर अब कई बार उदघोषक कहते है की अब आप फलां गाना सुनेगे पर उससे पहले ये विज्ञापन सुनिये। अभी एक विज्ञापन ख़त्म हुआ ही कि एक और विज्ञापन सुनिये ये कह देते है वैसे ये दूसरा वाला विज्ञापन वाद्य संगीत मतलब सितार,गिटार,बांसुरी या अन्य कोई वाद्य पर किसी फिल्म का मुखडा बजाते है। ये अलग बात है कि ये संगीत भी सुनने मे अच्छा लगता है पर दो-दो विज्ञापन का मतलब नही समझ नही आता है।

यूं तो अब पिछले दस सालों से रेडियो मे भी बहुत अधिक बदलाव आ गया है। बिल्कुल टी.वी.वाला हाल है
जैसे इतने सारे एफ.एम्.चैनल शुरू हो गए है और अब भी रोज नए-नए एफ.एम्.शुरू हो रहे है। पर इनमे कुछ से कुछ एफ.एम् पर गाना तो कम बातें ही ज्यादा सुनाई देती है. पर दूरदर्शन की ही तरह विविध भारती ने भी अपने मे बहुत ज्यादा बदलाव नही लाए है जो की बहुत ही अच्छी बात है। सबके बीच मे रहकर भी अलग रहना और लोकप्रिय रहना ही विविध भारती की खासियत है।

Saturday, August 18, 2007

बैंकों के चोंचले और ग्राहक की मुसीबत

कभी -कभी अपने ही रूपये-पैसे के लिए बैंक को इतना हिसाब देना पड़ता है कि लगता है आख़िर ये बैंक हमारी सुविधा के लिए है या परेशानी खड़े करने के लिए। आजकल तो अगर बैंक से किसी तरह की जानकारी अगर फ़ोन पर हासिल करना हो तो समझ लीजिये कि आप का कम से कम आधा घंटा तो गया और उसपर भी अगर पूरी जानकारी मिल जाये तब तो जरुर आपका दिन और समय अच्छा है।

कुछ सालों पहले तक तो ऐसा नही था हर जानकारी फ़ोन पर मिल जाती थी और ऐसा बैंक दावा भी करता था। और दावा सही भी था पर आजकल ऐसा दावा ग्राहक के लिए मुसीबत बन कर आता है। ये मल्टी - नेशनल बैंक तो इसकी जीती जागती तस्वीर है। अब आप ये भी कह सकते है कि भाई मल्टी नेशनल मे खाता ही क्यों खोला जब अपने नेशनल बैंक है। तो हम ये बता दे कि एम.एन .सी.मे खाता उस समय खोला था जब ये बैंक नए-नए थे और उस समय अपने नेशनल बैंकों मे ए.टी.एम.की सुविधा नही थी और हर बार पैसा लेने और जमा करने के लिए लाइन मे खड़ा होना पड़ता था जो इन एम.एन.सी.बैंकों मे नही था । और दूसरे ए.टी.एम.मे समय की पाबंदी नही होती है कि दो बजे के बाद पैसा ही नही निकाल सकते ,जब चाहे जहाँ चाहे पैसा निकाल सकते है।

हमे याद है पहले जब भी हम लोग कहीँ घूमने जाते थे तो ट्रैवलर चैक लेकर जाते थे क्यूंकि कैश लेकर सफ़र करना तो कभी भी सुरक्षित नही था।और फिर जहाँ घूमने जाओ वहां कैश कराओ पर कई बार इस सबमे बहुत समय लग जाता था और समय की पाबंदी तो रहती ही थी। पर इन एम.एन.सी.बैंकों की वजह से ये सारे चक्कर ख़त्म हो गए। और कहीँ भी आना-जाना बहुत ही आसान हो गया और चिन्ता रहित भी क्यूंकि कैश साथ जो नही ले जाना पड़ता था।

तो अब सवाल ये की जब हम इन सारी सुविधाओं का लाभ हम उठा रहे है तो फिर शिक़ायत कैसी। और ये भी की अब तो सभी नेशनल बैंक भì