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पेड़ों की क़ुर्बांनी क्यों ?

आज सुबह अखबार में ये ख़बर पढ़ी कि दिल्ली के कुछ एरिया जैसे सरोजनी नगर ,नैरोजी नगर तथा कुछ और पश्चिमी दिल्ली की पुरानी कॉलोनियों को तोड़कर वहाँ दुबारा बहुमंज़िला इमारत बनने वाली है ।

बहुमंज़िला बिल्डिंग बनाना तो ठीक है पर इन्हें बनाने के लिये पेड़ों को भी काटना पड़ेगा । और पेड़ भी हज़ार दो हज़ार नहीं बल्कि सत्रह हज़ार से ज़्यादा पेड़ों की क़ुर्बांनी होगी । जबकि अभी तकरीबन इक्कीस हज़ार से ज़्यादा पेड़ है । तो सोचिये भविष्य में दिल्ली का क्या होगा ।

एक तरफ़ तो कहा जाता है कि पेड़ लगाओ और दूसरी तरफ़ सालों पुराने पेड़ों को काटकर बिल्डिंग बनाई जा रही है । वैसे ही दिल्ली में अब काफ़ी कम पेड़ रह गये है । पर अगर इसी तरह पेड़ काटकर बिल्डिंग बनती रही तो वो दिन दूर नहीं जब हर तरफ़ सिर्फ़ बिल्डिंग ही बिल्डिंग दिखाई देगी ।





अन्तराष्ट्रीय योग दिवस

आज २१ जून को ना केवल हिन्दुस्तान बल्कि पूरे विश्व में योग दिवस मनाया जा रहा है । तो सबसे पहले तो योग दिवस की आप सबको बधाई ।

वैसे योग हज़ारों सालों से हमारे ऋषि मुनि लोग करते रहे है । और ये माना जाता है कि योग से तन और मन दोनों स्वस्थ रहते है । योग से जहां मन शांत रहता है तो वहीं शरीर स्वस्थ रहता है । योग हमेशा से ही स्वास्थ्य के लिये अच्छा माना जाता रहा है ।जब हमने नब्बे के दशक में योगा सीखा था तब भी लोग स्वस्थ रहने के लिये योगा किया करते थे । वैसे आजकल लोग योगा को लेकर कुछ ज़्यादा ही जागरूक हो गये है जो कि बहुत अच्छी बात है ।

अपने देश में समय समय पर दूरदर्शन पर भी योग गुरू होते रहे है। जैसे पहले धीरेन्द्र ब्रह्मचारी थे और एक सहगल नाम के भी योग गुरू होते थे । और फिर आये बाबा रामदेव जिन्होंने आस्था चैनल पर सुबह चार बजे से जो योग सिखाना शुरू किया कि बस हर कोई योगमय हो गया ।

अब तो योगा इतना अधिक प्रचलित हो गया है कि बहुत सारे योग संस्थान खुलते जा रहे है और अच्छी खासी फ़ीस देकर लोग योगा में प्रशिक्षण लेने लगे है ।

आज जहाँ मोदी जी ने पचास हज़ार लोगों के साथ देहरादून में योग किया वहीं…

अर्बन क्लैप से दुखी हो गये

वैसे आमतौर पर अर्बन क्लैप की सर्विस से हम ख़ुश ही रहते है पर अबकी बार हम इनकी सर्विस से ख़ुश नहीं बल्कि चीटेड महसूस कर रहें है ।

वो क्या है कि हमारे एक ए.सी. से पानी गिर रहा था तो हमने अर्बन क्लैप में ए.सी रिपेयर के लिये बुक किया जिसमें पूरी तरह से ए.सी. को देख कर उसकी प्रोब्लम को पकड़ना और ठीक करना लिखा था । साथ ही ये भी लिखा था कि फ़ाइनल चार्जेज़ इन्सपेकशन पर आधारित होगा और २४९ रूपये विजिटिंग चार्ज है अगर कोई सर्विस नही ली जाती है तो ।

खैर हमने ऑनलाइन २४९ रूपये का पेमेंट किया । और अगले दिन उनका आदमी काम करने आ गया । उसने ए.सी. देखा और छत पर लगे यूनिट को भी देखा और फिर नीचे तार देखकर बताया कि तार जल गया है और फिर उसने तार काटकर टेप लगा दिया और ए.सी चलाया तो ए.सी. काम करने लगा ।

फिर उसने हमसे २४९ रूपये माँगे तो हमारे कहने पर कि हमने ऑनलाइन पेमेंट की हुई है उसने कहा कि ये ए.सी.रिपेयर का चार्ज है । तो हमें बड़ा अजीब लगा और हमने उनके कसटमर केयर पर फोन किया और सब बताया तो उन्होंने अपने टेक्नीशियन से बात की और हमसे कहा चूँकि उसने तार जोड़ा है तो इसलिये हमें २४९ रूपये और देने पड़ेंगे । औ…

फ़ीफ़ा फीवर

आजकल विदेश ही नहीं अपने हिन्दुस्तान में भी लोग फ़ुटबॉल के दीवाने हो रहे है । जब से फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप शुरू हुआ है तब से हर तरफ़ फ़ुटबॉल का सुरूर सा दिखाई दे रहा है ।

वैसे अपने हिन्दुस्तान में बंगाल,गोवा,अंडमान निकोबार और उत्तर पूर्व के राज्यों में फ़ुटबॉल एक लोकप्रिय खेल है और लोगों मे ये खेल काफ़ी प्रचलित भी है ।

वैसे अब तो लोग भारतीय फ़ुटबॉल खिलाड़ियों के नाम जानने लगे है जैसे बाइचंग भूटिया , सुनील छेत्री और भारतीय गोलकीपर गुरप्रीत सिहं ,वरना पहले तो फ़ुटबॉल के नाम पर पेले को ही जानते थे पर बाद में माराडोना ,बैखम,मैसी,जिडान ,रोनालडो,रोनालडिनो, जैसे खिलाड़ियों के ही नाम जानते थे ।

वैसे जब भी फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप होता है तो हम भी कुछ मैच देखते है । हाँ हर मैच तो नहीं पर ब्राज़ील ,जर्मनी ,अर्जेंटीना,फ़्रांस पुर्तगाल जैसी टीमों के मैच देखते है अगर बहुत रात में नहीं आते है तो । पर अगर गोल नहीं होता है तो मैच बड़ा बोरिंग लगता है । जैसे शनिवार को अर्जेंटीना वाले मैच में मैसी कोई गोल नहीं कर पाये तो वहीं रविवार वाले जर्मनी के मैच में जर्मनी की टीम कोई गोल नहीं कर पाई जबकि जर्मनी पिछले वर्ल्ड…

आख़िर लोग पैट (डॉगी ) क्यूँ पालते है

द्वारका में आजकल बड़ी आम सी बात हो गई है कि लोग अपने पालतू डॉगी यहाँ छोड़ जाते है । अगर डॉगी पाला है तो फिर उसे इस तरह से सड़क पर कैसे छोड़ देते है । अगर उसे एक दिन सड़क पर लावारिस छोड़ना ही है तो पालते ही क्यूँ है ।

तीन चार दिन पहले जब हम लोग वॉक के लिये गये तो एक पॉमरेनियन डॉगी दिखाई दिया था पर फिर दो दिन तक वो नहीं दिखा तो लगा कि वहीं आस पास रहने वाले किसी का पालतू डॉगी होगा जो बिना लीश के घूम रहा होगा । पर आज जब हम वॉक के लिये गये तो देखा कि वो फिर से सड़क पर है ।

सबसे बड़ी बात कि अगर अपने प्यार से पाले हुये डॉगी को घर में नहीं रख सकते है तो कम से कम सड़क पर तो मत छोड़ो । ऐसी कितनी सारी संस्थायें है जहाँ लोग अपने बीमार डॉगी को छोड़ सकते है । पर शायद संस्था में ये बताना पड़ता होगा कि आप अपने डॉगी को संस्था में क्यूँ रखना चाहते है । और शायद इसी सवाल से बचने के लिये वो इन बेज़ुबानों को सड़क पर छोड़ जाते है । इससे अच्छा है कि पालो ही मत ।


पापा

परिवार में माँ और पापा दोनों का स्थान बराबर होता है । पापा एक ऐसा स्तंभ जिसकी छत्र छाया में हम बच्चे बडे होते है । पिताजी,पापा,बाबूजी जैसे ये सारे सम्बोधन हमें ये एहसास दिलाते है कि हमारे सिर पर उनका प्यार भरा हाथ है । और हम बिना किसी चिन्ता या फ़िकर के रहते है क्योंकि हमें पता है कि हम तक पहुँचने से पहले उस चिन्ता या परेशानी को पापा से होकर गुज़रना है ।

हमारे पापा से ना केवल है हम भाई बहन बल्कि हमारे सभी कज़िन भी बहुत खुलकर बात कर लेते थे क्योंकि ना तो मम्मी ने और ना ही पापा ने कभी हम बच्चों से कोई दूरी रकखी । हम लोगों को कोई भी परेशानी होती तो झट से पापा को बताते थे । कभी कभी मम्मी हम लोगों को ज़रूर डाँटती थी और पिटाई भी कर देती थी पर पापा ने कभी भी हम लोगों को डाँटा हो ,ऐसा कभी याद हुआ । कई बार मम्मी कहती भी थी कि बच्चों को कभी कभी डाँटा भी करिये । पर पापा तो पापा ही थे ।

बचपन से हम सब की आदत थी कि जब पापा शाम को घर आते थे तो सारा परिवार उनके कमरे में बैठता था और एक डेढ़ घंटे खूब बातें हुआ करती थी ।पापा अपने क़िस्से सुनाते और हम सब अपनी बातें बताते थे । बाद में जब हम सबकी शादी ह…

धूल धूसरित दिल्ली

इस साल गरमी का मौसम कुछ अलग ही चल रहा है । अभी तक गरमी,तपन और लू तो चल ही रही थी पर आजकल तो दिल्ली और एन.सी.आर धूल धूसरित हो रहे है । जहाँ तक हमें याद है ऐसा धूल धूसरित मौसम हमने पहले नहीं देखा है । हाँ आँधी ज़रूर चलती थी पर उसके बाद बारिश हो जाती थी और मौसम ख़ुशगवार हो जाता था ।

वैसे हर साल कम से कम एक -दो बार तो ज़बरदस्त आँधी तूफ़ान के साथ बारिश होती ही थी पर इस साल ज़रा अलग सा मौसम चल रहा है ।पिछले हफ़्ते चली आँधी में तो हमारा अचार भी उड़ गया । अब हँसिये मत वो क्या है ना कि जब तेज़ आँधी चली तो हम अचार का जार (छोटा ) बालकनी से उठाना भूल गये और जब आँधी के शांत होने के बाद हमें अचार की याद आई तब तक बड़ी देर हो चुकी थी ।

पिछले कुछ दिनों में २-३ बार तो खूब तेज़ धूल भरी आँधी चली और जब ये आँधी आती है तो पूरा घर धूल से भर जाता है । सब कुछ खुस खुस करने लगता है । जहाँ हाथ रकखो वहाँ बस धूल ही धूल । कितनी भी सफ़ाई कर लो धूल वापिस आ जाती है और हर चीज़ खसराती सी है ।

और अब तो पिछले दो दिनों से तो धूल भरा वातावरण हो गया है । आसमान तो दिखता है मगर भूरा भूरा सा । धूल की भूरी सी एक चादर चारों ओर…