Posts

फ़िल्मी गीतो की किताब

हिन्दी फ़िल्मे देखना अगर यूँ कहे कि बचपन से ही हमें इसका शौक़ रहा है तो ग़लत नहीं होगा क्योंकि कभी भी मममी पापा ने फ़िल्म देखने पर कोई रोक टोक नहीं की। और अकसर हम लोग मममी पापा के साथ ही फ़िल्म देखने जाते थे। वैसे हमारे बाबा भी फ़िल्मों के बहुत शौक़ीन थे और सपनों का सौदागर फ़िल्म देखने के बाद तो वो हेमा मालिनी के बहुत बड़े फ़ैन बन गये थे और हेमा मालिनी की कोई भी पिकचर देखे बिना नहीं रहते थे । 🙂

वैसे उस समय पिकचर देखना मनोरंजन का एकमात्र साधन होता था और शायद इसीलिये लोग सपरिवार फ़िल्म देखने जाते थे। शादी के पहले भी और शादी के बाद भी फ़िल्मे देखने का सिलसिला जारी रहा और अभी तक ये शौक़ बरक़रार है।

पहले तो एक स्क्रीन वाले सिनेमा हॉल होते थे और वहाँ पिकचर देख कर जब निकलते थे तो हॉल के बाहर फ़िल्मी गीतों की किताब बिक रही होती थी जिसमें कम से कम दो तीन फ़िल्मों के पूरे पूरे गाने ,गायक का नाम और गीतकार और संगीतकार का नाम भी लिखा होता था । बिना ये किताब ख़रीदे पिकचर देखना पूरा नहीं माना जाता था । शाम को छत पर बैठकर इस गाने की किताब का पूरा इस्तेमाल होता था अरे मतलब गाने गाये जाते थे । वैसे…

हरी और बोलने वाली छिपकली

हाँ कुछ अजीब सा विषय है लिखने के लिए । चूँकि आजकल गरमियों के दिन है तो छिपकलियॉ भी निकलने लगी है। हमें तो इनसे बहुत डर लगता है हालाँकि हमारे पतिदेव का कहना है कि उससे डरने की क्या बात है क्योंकि उसका इतना छोटा सा मुँह है वो भला क्या काटेगी। पर हम पर ऐसी दलील का कोई असर नहीं होता है। जहाँ गरमी आई नहीं कि ना जाने कहां से ये अवतरित हो जाती है।

अंडमान में पहली बार हमने इसे बोलते सुना । एक अजीब तरह की किट किट करती सी आवाज़ । पहले तो हम समझ ही नहीं पाये कि ये आवाज़ किस जीव जन्तु की है। पर बाद में पता चला कि ये तो छिपकली आवाज़ करती है। अब दिल्ली में तो हमने कभी नहीं सुना ना देखा था।

और वहाँ पर ही पहली बार हमने हरे रंग की छिपकली भी देखी थी। अरे देखी क्या हमारे कुर्ते पर बैठी थी। अंडमान में एक द्वीप है हटबे नाम का ,हम लोग वहाँ घूमने गये थे और बालकनी में बैठकर चाय पी रहे थे। हमने हलके हरे रंग का लखनवी सूट पहना था और दुपटटा आगे की तरफ़ रकखा था। और तभी चाय पीते पीते लगा कि दुपट्टे पर कुछ चल रहा है । अब चूँकि उस दिन हमने हरा सूट पहना था तो पहले पहल तो हम समझे कि कोई कीड़ा होगा । पर जब समझे तो ह…

मोबाइल फोन के फ़ायदे और नुक़सान

अरे अरे हम जानते है कि आप सोच रहे है कि मोबाइल फोन के फ़ायदे भी कोई बताने वाली बात है वो तो हम सब जानते है । और ये सच भी है कि मोबाइल ने हम सबकी ज़िन्दगी बहुत आसान कर दी है। अब तो मोबाइल पर ही हम सबकी दुनिया टिक सी गई है। पहले तो सिर्फ़ इसे एक चलते फिरते फोन की तरह इस्तेमाल किया जाता था। और घर से दूर रहने वाले से कभी भी किसी भी समय बात की जा सकती थी। हालाँकि नब्बे के दशक में मोबाइल पर कॉल करना बहुत महँगा होता था क्योंकि इसमे कॉल करने वाले और कॉल रिसीव करने वाले को भी पैसा देना पड़ता था। और मोबाइल रखना बड़ी शान और स्टेटस की बात मानी जाती थी ।


पर धीरे धीरे समय बदला और मोबाइल फोन लोगों की ज़रूरत बनता गया। और कॉल रेट भी कम होते गये । पहले जहाँ सिर्फ़ एयरटेल होता था वहाँ धीरे धीरे डॉल्फ़िन ( एम टी एन एल का ) वोडाफ़ोन ,आइडिया,जैसे नेटवर्क होने लगे। पहले के मुक़ाबले अब हर किसी के पास मोबाइल होने लगा। हर कोई मोबाइल पर बात करते हुये चलता दिखता है।

अब तो मोबाइल फोन की इतनी आदत सी हो गई है कि अगर थोड़ी देर फोन ना देखो तो लगता कि हम कही पीछे तो नहीं रह गये। क्योंकि हर थोड़ी देर में पिंग की आवाज…

बदलते हम और हमारी फ़ोटो

दो- तीन दिन पहले हमारे पतिदेव ने हमारी एक कुछ साल पुरानी फ़ोटो को फ़ेसबुक पर शेयर किया था और जिस पर हमारी एक दोस्त ने कमेंट किया कि हम पतले और प्यारे लग रहे है । जिसे पढ़कर हमने भी लिखा कि पर हम तब भी मोटे ही कहे जाते थे। 😀

जब भी हम पुरानी फ़ोटो देखते है ,भले ही वो एक या दो साल पुरानी हो या चाहे चार साल पुरानी हो तो ऐसा लगता है कि अरे तब तो हम कुछ पतले थे पर उस समय भी हम मोटे वाली कैटेगरी में ही आते थे। खाते पीते घर की । 😃

वैसे फ़ोटो बहुत ही प्यारी होती है। हर फ़ोटो के साथ कितनी यादें जुड़ी होती है। पहले के समय में ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो होती थी। क्लिक कैमरा होता था जिसमें रील भरी जाती थी और फ़ोटो खींचने के बाद फिर फ़ोटोग्राफ़र से उसे बनवाया जाता था। हम लोग जहाँ कही भी घूमने जाते थे कैमरा साथ होता था। चाहे नैनीताल हो या चाहे आगरा या बनारस या फ़ैज़ाबाद या कही और।

गरमी की छुट्टियों में जब सब कज़िन लोग इकट्ठा होते थे तो हम सब मममी की साड़ी पहनकर घर के आँगन में फ़ोटो खिंचवाते थे। पहले पापा और भइया फ़ोटो खींचा करते थे । बाद में धीरे धीरे सबने फ़ोटो खींचनी शुरू की। हमसे बड़ी दीदी तो इतन…

किटटी पार्टी

किटटी पार्टी का मतलब मौज मस्ती ,हँसना बोलना ,खाना और खेलना । और उस दो- तीन घंटे के दौरान सभी समस्याओं और चिन्ताओं को भूलकर बस जी भर कर हँसना ,खाना और खेलना । आजकल तो किटटी पार्टी का बहुत चलन हो गया है। और ये पार्टी जो होम मेकर महिलायें होती है उनके लिए आपस में मिलने का एक ज़रिया भी होती है। क्योंकि वरना वो पति ,बच्चों और घर मे ही व्यस्त रहती है।

हालाँकि पहले मेरा मतलब है कि सत्तर के दशक में किटटी पार्टी को लोग बहुत ज़्यादा पसंद नहीं करते थे और बहुत ग़लत धारणा थी इसके बारे में, क्योंकि तब शायद यह माना जाता था कि घर की ग्रहणी घर से बाहर जाकर कहीं घर परिवार को अनदेखा ना करने लगे और ये भी कि ऐसी पार्टी में सिर्फ़ परपंच होता है मतलब लोगों के बारे में उलटी सीधी बातें होती है।

हमें याद है हम लोगों के पडोस में चंडीगढ़ से एक कपूर परिवार रहने आया था और कुछ दिन बाद कपूर आंटी ने मममी को अपने घर किटटी पार्टी में बुलाया । और कुछ और जो आंटी की जानने वाली थी उन्हें बुलाया था। और उस समय हम सब के लिए ये बिलकुल नयी बात थी और उन्होंने समय दोपहर बारह बजे का दिया था क्योंकि इस समय तक घर के काम निपट जाते…

चिट्ठी आई है

कुछ याद आया , जी हॉ बिलकुल सही समझे है आप । 🙂

दरअसल कल कुछ सफ़ाई करते हुए एक चिट्ठी हमें मिली तो सोचा क्यूँ न आज चिट्ठी की ही बात करी जाये।

समय की तेज़ रफ़्तार और इलेक्ट्रानिक की बढ़ती सुविधाओं की वजह से चिट्ठी पत्री का सिलसिला कही खो सा गया है। हो सकता है आप को लगे कि भला जब इतना सुविधा जनक वहाटसऐप है तो फिर चिट्ठी की क्या बात करना । सवाल ये है कि हम सभी लोग इतने आराम और सुविधा के आदी हो चुके है कि चिट्ठी के महत्व को भूल गये है। बस फटाफट मोबाइल पर लिखा और भेज दिया और जिसे भेजा उसने तुरन्त जवाब भी दे दिया ,कभी कुछ लिख कर तो कभी कोई ईमोजी बनाकर । ☺️

ये अलग बात है कि अब किसी को भी किसी की भी चिट्ठी का इन्तज़ार नहीं रहता है पर हाँ एक समय था जब हर कोई चिट्ठी का इन्तज़ार करता था। हम तो ख़ूब करते थे ।

अनतरदेशी पत्र ,पोस्टकार्ड ,और लिफ़ाफ़े में चिट्ठियाँ भेजी जाती थी ,और विदेश एयरमेल से । पर अब घर बैठे मिनटों में मैसेज किसी को भी भेज देते है। अब कहॉ कोई अनतरदेशी पत्र लाये और चिट्ठी लिखे।पहले विदेश से तो चिट्ठी तक़रीबन दस से पन्द्रह दिन में आती थी पर लोकल मतलब अपने यहाँ दो से तीन दिन में। …

गरमी की छुटटियॉ और काम वाली बाई

गरमी की छुटटियॉ आते ही काम करने वाली बाईयो का जैसे अकाल सा पड़ जाता है। अब इसमें इन बाईयो की भी क्या ग़लती है वो भी तो साल में एक बार ही एक महीने के लिए अपने गाँव जाती है। हाँ पर उनके जाने से हम लोगों को काफ़ी परेशानी हो जाती है। क्योंकि हम लोगों को उनकी आदत सी हो जाती है।

अब वैसे तो सारा रूटीन सेट रहता है कि वो सुबह काम पर आ जाती है इससे घर की साफ़ सफ़ाई और सारे काम समय से निपट जाते है । हालाँकि ये जब गॉव जाती है तो अपनी जगह किसी और को लगा जाती है काम करने के लिए पर नये के साथ तालमेल बैठाना बड़ा मुश्किल हो जाता है क्योंकि एक तो उनका अपना काम होता है। और वो उसमें से समय निकाल कर हम लोगों का एक्सट्रा काम करती है । 😊

दूसरा रोज़ रोज़ समझाना पड़ता है कि ऐसे करो तो वैसे करो काम । और टाइम का तो कोई मतलब ही नहीं रहता है । नौ बजे का टाइम बोलो तो दस बजे आती है और कई बार इन्तज़ार करते रहो तो ग्यारह बजे आती है और कुछ कहने पर हँसकर अपने काम का हवाला देती है और हम चाह कर भी कुछ नहीं कह पाते है क्योंकि अगर ये भी चली गई तो फिर क्या होगा। ☺️
और रोज़ रोज़ नई काम वाली भी नहीं मिलती है क्योंकि अगर को…